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मूवी रिव्यू: स्केटर गर्ल

कुछ दिनों पहले एक फिल्म का ट्रेलर आया था. नाम था ‘स्केटर गर्ल’. हो सकता है फिल्म के बारे में आपने ज्यादा ना सुना हो, क्योंकि कोई बड़ा स्टार इस फिल्म का हिस्सा नहीं है. लेकिन सिर्फ स्टार फैक्टर ही तो एक अच्छी फिल्म की गारंटी नहीं हो सकती ना. स्क्रिप्ट नाम की भी एक चीज़ होती है. फिल्म की स्क्रिप्ट और बाकी पहलुओं में कितना दम है, यही जानने के लिए हमनें ये फिल्म देखी. फिल्म 11 जून से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है. हमें फिल्म में क्या अच्छा लगा और क्या नहीं, जानते हैं.

# Skater Girl की कहानी क्या है?

कहानी सेट है राजस्थान के एक पिछड़े गांव में. नाम है खेमपुर. मशहूर टूरिस्ट आकर्षण उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर. केंद्र बिंदु है प्रेरणा. करीब 12-15 साल की लड़की. स्कूल नहीं जाती. हां, लेकिन मन में दबी सी इच्छा है स्कूल जाने की. प्रेरणा जब तक घर पर रहती है, मां का हाथ बटाती है. उसके बाद बाज़ार जाकर मूंगफलियां बेचती है. ताकि कर्ज़ में डूबे पिता की मदद हो सके. छोटा भाई भी है. अंकुश नाम का. उसे पूरी आजादी है स्कूल जाने की. पिता की भाषा में कहें तो ‘बस प्रेरणा को ही लड़कों वाले काम करने की मनाही है’.

Jessica
जेसिका के आने के बाद सब बदल जाता है. फोटो – ट्रेलर

सब नॉर्मल चल रहा होता है. लेकिन बदलाव आता है जेसिका के आने के बाद. जेसिका एक अंग्रेज महिला है. जिसके पिता इंडियन थे. अपनी एक खोज उसे इस गांव तक ले आई है. जेसिका की मुलाकात होती है प्रेरणा और उसके भाई से. नजर पड़ती है उनके लकड़ी के पट्टे पर. जिसके नीचे छोटे पहिए लगाकर वो उसे इधर-से-उधर ढुलाते रहते हैं. जेसिका के दिमाग में कुछ आता है. वो प्रेरणा और उसके जैसे गांव के अनेकों बच्चों को स्केट बोर्ड गिफ्ट करती है. बच्चों की जैसे दुनिया बदल जाती है. नई-नई मिली इस चीज़ से पूरे गांव में उधम मचाना शुरू कर देते हैं. जब बदलाव आएगा तो उसके खिलाफ आवाज़ें भी उठेंगी, यहां भी उठती हैं. लेकिन ऐसी आवाज़ों के सामने डटकर बच्चे क्या कुछ करते हैं, ये फिल्म में पता चलेगा. साथ ही पता चलेगा उस राज का, जो जेसिका को इस गांव में खींचकर लाया है.


# एक लकड़ी के पट्टे से समाज का क्या नुकसान होगा भला?

प्रेरणा को स्केट बोर्ड मिलता है. खुशी होती है. ऐसी जो मानो उसने पहले कभी अनुभव ही न की हो. लगने लगता है कि बंदिशें कम हुई हैं थोड़ी. किसी ने पंख उतारकर लगा दिए उसके नन्हें कंधों पर. पहले पहल लगेगा कि स्केट बोर्ड ने उसे लड़की होने पर लगी बंदिशों से आजादी दिलवाई है. ये ऊपर से देखने पर लगेगा. लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं. प्रेरणा का पूरा नाम है प्रेरणा भील. भील, जिसे छोटी जाति माना जाता है. गांव में वो हर चबूतरे पर नहीं बैठ सकते. हर हैंडपम्प से पानी नहीं ले सकते. लेकिन कोई भी पूरी फिल्म में ये कहता नहीं. जैसे ये अनकहा कानून हो कोई. कि बना दिया तो बस बना दिया. जो अपने को ऊंची जाति मानते, वो अपने बच्चों को छोटी जाति वालों के साथ घुलने-मिलने नहीं देते.

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फिल्म में स्केट बोर्ड को प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया है. फोटो – ट्रेलर

स्केट बोर्डिंग ऐसी परंपराओं को माचिस की तीली लगाने का काम करता है. स्केटिंग का पहला लेसन ही ये है कि आपको किसी का हाथ पकड़कर स्केट पर चढ़ना होगा. और फिर धीरे-धीरे सीखना होगा. अब हाथ पकड़कर सीखेंगे तो क्या छोटी जात और क्या बड़ी. बातों-बातों में सदियों की दकियानूसी परंपराओं के प्रभाव को क्षीण कर दिया.


# डिटेलिंग ही फिल्म और फिल्म में फर्क करती है

फिल्म में स्केट बोर्ड के प्रतीकात्मक रूप को बड़े सटल तरीके से यूज़ किया गया है. फिल्म में सटीक बात कहने के कई उदाहरण हैं. उन्हीं में एक आपको बताते हैं. प्रेरणा के परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं. एक किताब खरीदनी है, लेकिन पैसे नहीं हैं. स्कूल से किताब ना लाने पर सजा भी मिलती है. इसलिए किताब की दुकान पर जाती है. किताब उठाकर उसका रेट देखती है. 20 रुपए. इतने रुपए तो उसके पास नहीं है. तभी उस दुकान पर जेसिका आती है. पानी की बॉटल मांगकर उसकी कीमत पूछती है. जवाब आता है 20 रुपए. जेसिका बॉटल खरीद लेती है और प्रेरणा खाली हाथ घर लौटती है. बिना कुछ बोले समाज का इतना बड़ा अंतर समझा दिया.

Manjari And Vinati
द मैकीजानी सिस्टर्स – मंजरी और विनती. फोटो – इंस्टाग्राम

ये कमाल है मंजरी मैकीजानी और उनकी बहन विनती मैकीजानी की राइटिंग का. मंजरी ही फिल्म की डायरेक्टर भी हैं. सिर्फ राइटिंग ही नहीं, पूरी फिल्म की डिटेलिंग पर भी बारीकी से काम हुआ है. सबसे ज्यादा राजस्थानी पहनावे पर. फिल्म को उसका नैचुरल फील देने के लिए खेमपुर में ही जाकर शूट किया गया. मंजरी और विनती को शायद आप न पहचानें. लेकिन इन दोनों का हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से एक कनेक्शन है. ये दोनों हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ‘सांभा’ यानी एक्टर मोहन मैकीजानी की बेटियां हैं. आप उन्हें मैक मोहन के नाम से पहचानते हैं.


# सिर्फ कास्ट देखकर फिल्म देखना समझदारी नहीं

फिल्म दो लड़कियों पर फोकस करती है. पहली है प्रेरणा. जो सपना देखती है. दूसरी है जेसिका. जो प्रेरणा का सपना पूरा करने में लगी है. प्रेरणा के किरदार से डेब्यू किया है रेचल संचिता गुप्ता ने. वहीं, जेसिका बनी हैं अमृत मघेरा. अमृत को इससे पहले आपने ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेस’ में भी देखा है. भले ही रेचल की ये पहली फिल्म थी, लेकिन वो अपने काम से आपको ऐसा महसूस नहीं होने देंगी. उनके किरदार की आंतरिक कश्मकश, वो जद्दोजहद आपको उनके चेहरे पर नजर आएगी.

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वहीदा रहमान ने भी फिल्म में कैमिओ किया है. फोटो – ट्रेलर

फिल्म की कास्ट में एक और नाम है. जिन्हें मेंशन किया जाना जरूरी है. भले ही फिल्म में उन्होंने कैमियो किया. वो हैं वेटरन एक्ट्रेस वहीदा रहमान. वो दो सीन्स के लिए फिल्म में हैं, फिर भी उनकी ग्रेस ऐसी है कि नजरें नहीं हटेंगी उन पर से.


# फिल्म जिसने लिटरली समाज बदल दिया

फिल्म में जेसिका बच्चों के लिए स्केटिंग पार्क बनाती है. गांव में ही. ताकि बच्चों में स्केटिंग को लेकर बने उत्साह को सही दिशा में ले जाया जा सके. जेसिका एंड टीम ने जो पार्क बनाया वो कोई नकली पार्क नहीं था. बल्कि, फिल्म की टीम ने एक पूरा फंक्शनल स्केटिंग पार्क बनाया. वो भी गांव में. जब शूटिंग पूरी हुई तो वो पार्क गांव के बच्चों के सुपुर्द कर दिया. आज बच्चे वहां प्रैक्टिस करते हैं और चैम्पियनशिप्स में कम्पीट करने जाते हैं. मेकर्स ने इंतज़ार नहीं किया कि कोई उनकी फिल्म देखकर बदलाव लाएगा. बल्कि, बदलाव की शुरुआत उन्होंने खुद से की.

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मेकर्स के बनाए स्केट पार्क में आज बच्चे प्रैक्टिस करते हैं. फोटो – ट्रेलर

ऐसा नहीं है कि फिल्म में सब कुछ ही परफेक्ट है. जैसे इसका क्लाइमैक्स. जिसे जल्दी-जल्दी में रैप अप किया गया. लेकिन बावजूद इसके फिल्म देखने लायक है. ये फिल्म देखकर आपकी ज़िंदगी नहीं बदलेगी. ना ही दिमाग घूम जाएगा. बस ये आपकी भाग-दौड़ भरी लाइफ में ठहराव देने का काम करेगी. ऐसी है ये फिल्म.


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