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जिस इरफ़ान के लिए पूरा देश रो रहा है, उनके लिए घटिया बातें बोलने वाले ये कौन लोग हैं?

इरफ़ान चले गए. ऐसा कोई चेहरा न था, जिसपर मुर्दनी न छाई हो. समूचे हिंदुस्तान को लगा कि जैसे कोई सगा बिछड़ गया. किसी एक्टर से ये लगाव कल्पनातीत था. यूं लग रहा था जैसे धर्म, जाति और क्लास में बंटा देश, इस बार एक ही पाले में खड़ा है. इरफ़ान से इश्क करने वाली साइड. अजातशत्रु शब्द का मतलब समझ आने लगा था. लेकिन फिर शाम होते-होते भरम टूट गया. कुछ लोग ऐसे निकल आए, जिन्होंने इरफ़ान जैसी शख्सियत के बारे में, ऐन उनके देहांत वाले दिन, नफरती उल्टियां करना बेहतर समझा. किसी को इरफ़ान का जाना एक जिहादी का कम होना लगा. तो किसी ने उनके देहांत को अल्लाह की दी हुई सज़ा तसलीम किया. दोनों तरफ के जाहिलों की विषवमन में बराबर की शिरकत रही.

और इस ज़हर के पीछे तर्क क्या था? देखते हैं.

खेमा नंबर एक – मर्द-ए-मुजाहिद

ये वाला खेमा मज़हबी है. अल्लाह को मानने वाला. अल्लाह के दीन इस्लाम का सच्चा फॉलोअर. इनकी समस्या क्या थी? ये कि इरफ़ान ने कभी कुछ मज़हबी मामलात में ऐसी राय रखने की गुस्ताखी की थी, जो इनके ‘आईडिया ऑफ इस्लाम’ से मेल नहीं खाती. उन्होंने ईद की कुर्बानी और मुहर्रम को लेकर कुछ ख़यालात ज़ाहिर किए थे. क्या कहा था?

ये कि कुर्बानी का मतलब है कुछ ऐसी चीज़ कुर्बान करना, जो आपके दिल के करीब हो. बाज़ार से बकरा खरीदकर काट देना असली कुर्बानी नहीं है. इसी तरह मुहर्रम को लेकर कहा था कि ये मातम का मौक़ा है, न कि जुलूस निकालने की वजह. इरफ़ान ने ये बात 2016 में कही थी. कुछ लोग तबसे ऑफेंड हुए पड़े हैं. उनकी नफरत का- बेबुनियाद, बेतुकी, बेशर्म नफरत का- लावा उनके इंतेकाल के बाद भी शांत न हुआ. नतीजतन उन्होंने सोशल मीडिया पर गंद बिखेर दी. किसी ने गाली दी, तो किसी ने जहन्नुम में जलने की दुआ की.

नमूने देख लीजिए:

इस्लाम का सबसे ज़्यादा नुकसान इन जैसे लोगों ने ही किया है.
इस्लाम का सबसे ज़्यादा नुकसान इन जैसे लोगों ने ही किया है.

एक ने यहां तक लिखा कि ‘मर गया मरदूद, न फातिहा न दरूद’. मरदूद, यानी जिसे रद्द किया गया हो. मज़हब से. मौत के बाद इंसान के लिए फातिहा या दरूद पढ़ना, अच्छा बताया जाता है इस्लाम में. ऐसी मान्यता है कि ये उस शख्स को जन्नत के और करीब करता है. इनका न पढ़ा जाना मृतात्मा की बदनसीबी मानी जाती है. कुल मिलाकर इस कथन का अर्थ ये कि इरफ़ान ने इस्लाम के कुछेक प्रिंसिपल्स पर डाउट किया, इसलिए वो मज़हब से खारिज थे और सजावश फातिहा-दरूद जैसी चीज़ों से महरूम रहें. जितने दिमाग उतनी बातें.

इनमें से एक साहब तो सोशल मीडिया पर मज़हबी उन्माद फैलाने के सीरियल ऑफेंडर हैं. गिरफ्तार तक हो चुके हैं. अक्ल तब भी न आई. खैर.

खेमा नंबर दो – राष्ट्रवादी लड़ाके

मज़हबियों के चंगुल से छूटे, तो दूसरे उन्मादियों के हत्थे चढ़ गए इरफ़ान. इस बार वो वाले थे, जिन्हें नफरत करने के लिए सिर्फ एक वजह काफी होती है. अगले का मुसलमान होना. नाम में ख़ान, अली या मुहम्मद लगा हो, तो अगला बाई डिफ़ॉल्ट नफरत का अधिकारी है. फिर चाहे उसने जीवन में कुछ भी अचीव किया हो. करोड़ों लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी हो. जिसके गुज़र जाने पर पूरी दुनिया सदमे में हो. मुसलमान था न! बस. कोसो फिर. इस एक सिंगल पॉइंट विचार से चलने वाले कई सारे ‘सज्जन’ इरफ़ान को जिहादी, आतंकी और भांड कहते रहे.

ये भारत में बढ़ते इस्लामोफोबिया की ही एक कड़ी है. आदमी भले जैसा हो, अगर इस्लाम से आता है तो गाली के ही काबिल है. ये उसी बिरादरी के लोग हैं, जो मोहल्ले में आनेवाले सब्जीवालों से उनका धर्म पूछने लगे हैं. इनमें से ज़्यादातर की प्रोफाइल में आपको तिरंगा/भगवा झंडा मिलेगा. राष्ट्र पर कुर्बान हो जाने की गर्जनाएं मिलेंगी. फिर भले ही राष्ट्रभाषा लिखने की तमीज़ न हो. इनको इस बात का मर्म समझ ही नहीं आता कि राष्ट्र लोगों से बनता है. खैर. इनकी नफ़रत पर भी नज़र मार लीजिए.

देश और हिंदुत्व की खिचड़ी से इन लोगों ने मुल्क के माहौल में पलीता लगा दिया है.
देश और हिंदुत्व की खिचड़ी से इन लोगों ने मुल्क के माहौल में पलीता लगा दिया है.

खेमा नंबर तीन – निरे मूर्ख

इन दोनों तबकों के अलावा भी एक तबका ऐसा रहा, जिसने मूर्खतावश सोशल मीडिया को डंपिंग ग्राउंड बना दिया. अपने वाहियात विचारों का. इन मोहतरमा को ही देख लीजिए. इनकी मांग थी कि ईश्वर अक्षय कुमार को ले जाएं और इरफ़ान को लौटा दें. किसी कलाकार से आपकी निजी नापसंदीदगी हो सकती है. लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उसकी मौत की कामना बेहद खराब विचार है. और उस विचार को पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म पर रखना, निरी मूर्खता.

देखिए उनका ट्वीट. हालांकि जनता द्वारा बेतहाशा लताड़े जाने पर अकाउंट बंद हो चुका है.

इनके बायो के अनुसार इन्होंने बड़ी-बड़ी जगहों पर काम किया हुआ है.
इनके बायो के अनुसार इन्होंने बड़ी-बड़ी जगहों पर काम किया हुआ है.

इसके अलावा जो कसर बाकी थी वो कुछ लोगों ने इरफ़ान की फर्ज़ी तस्वीरें पोस्ट कर निकाल दी. एक तस्वीर खूब वायरल हुई, जिसमें किसी मरीज़ के चेहरे पर इरफ़ान की शक्ल अलग से लगाई हुई साफ़ नज़र आ रही है. किसी वेबसाइट ने तो इसे अपनी फीचर इमेज तक बना डाला था.

फेक न्यूज़ कोरोना जितनी ही बड़ी महामारी है. शायद उससे बड़ी. क्योंकि कोरोना को तो एक दिन हम हरा ही लेंगे.
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तो बेसिकली, अगर आपको फेसबुक-ट्विटर पर रहना है, तो कई फ़िल्टर लगाकर रहना होगा. आपको मज़हबी वॉरियर्स भी अवॉयड करने हैं, कथित देशभक्तों से भी दूर रहना है और फेक न्यूज़ फैक्ट्री, सर्वव्यापी मूर्खता से भी अपना बचाव करना है. यकीनन बहुत कठिन है डगर पनघट की. बुरी बात ये कि आप बचाव के अलावा कुछ ख़ास कर भी नहीं सकते. सिवाय इनकी अक्ल पर मातम ज़ाहिर करने के.

खैर छोड़िए इन ज़हरीलों को, आप तो इरफ़ान भाई का वो वीडियो देखिए जब वो हमारे घर आए थे:

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