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मूवी रिव्यू: सारपट्टा परंबरै

कुछ दिन पहले अमेज़न प्राइम वीडियो ने अपने प्लेटफॉर्म पर जुलाई में रिलीज़ होने वाली फिल्मों का लाइनअप अनाउंस किया था. उन फिल्मों में से फहद फ़ाज़िल की ‘मालिक’ और फरहान अख्तर की ‘तूफान’ रिलीज़ हो चुकी हैं. 22 जुलाई को उस लाइनअप से एक और फिल्म रिलीज़ हुई. नाम है ‘सारपट्टा परंबरै’. 13 जुलाई को रिलीज़ हुए फिल्म के ट्रेलर से पता चला कि ये तमिल फिल्म एक बॉक्सिंग ड्रामा है. हाल ही में रिलीज़ हुई ‘तूफान’ भी बॉक्सिंग के खेल को सेंटर स्टेज बनाकर रची गई कहानी थी. लेकिन उसे ऑडियंस की तरफ से मिक्स्ड रिस्पॉन्स मिला. अब आई है ‘सारपट्टा परंबरै’.

क्रिकेट प्रेमी देश में बॉक्सिंग पर बनी ये फिल्म स्टैंड आउट करती है या नहीं, यही जानने के लिए हमनें भी फिल्म देख डाली. फिल्म में क्या अच्छा लगा और क्या बुरा, रिव्यू में यही जानेंगे. शुरू करने से पहले बता दें कि फिल्म का तेलुगु वर्ज़न भी साथ ही रिलीज़ किया गया. ‘सारपट्टा परंपरा’ के टाइटल से. किरदारों के नाम के अलावा दोनों वर्ज़न्स में कोई अंतर नहीं. हमनें फिल्म का तेलुगु वर्ज़न ही देखा.

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# Sarpatta Parambarai की कहानी क्या है?

70 के दशक का चेन्नई. इमरजेंसी लागू हो चुकी है. फिल्म के शुरुआत में ही ये बात क्लियर हो जाती है. जब बैकग्राउंड में कुछ लोग इंदिरा गांधी को तानाशाह बता रहे होते हैं. कहानी खुलती है समरा से. फैक्ट्री में मजदूरी करता है. बोझ ढोता है. इंतज़ार करता है तो बस अपनी शिफ्ट खत्म होने वाले साइरन के बजने का. जैसे ही साइरन बजा, समरा फौरन हवा हो जाता है. और पहुंच जाता है बॉक्सिंग का मुकाबला देखने. समरा खुद कोई बॉक्सर नहीं, न ही कभी किसी कोच से ट्रेनिंग ली है. लेकिन बचपन से ही उसे बॉक्सिंग से बहुत लगाव रहा है. बॉक्सर्स को लड़ता देख खुद उनके मूव ट्राइ करने लगता है.

Boxing Match 1
कहानी सेट है 70 के दशक वाले चेन्नई में.

समरा और उसके गांव के अनगिनत लोग बॉक्सिंग का मुकाबला देखने के लिए जमा हुए हैं. अपने सारपट्टा समुदाय को सपोर्ट करने आए हैं. सारपट्टा समुदाय के बॉक्सर्स को तैयार करते हैं गुरुजी. जो खुद अपने जमाने के जाने-माने बॉक्सर थे. सारपट्टा समुदाय का बॉक्सर एक के बाद एक मुकाबला जीतता जाता है. फिर उसके सामने आती है सबसे बडी चुनौती. वेटापुल्ली के रूप में. वेटापुल्ली इडियप्पा समुदाय का बॉक्सर है. जो लगातार सारपट्टा वालों को हराता आया है. आज भी कुछ ऐसा ही होता है. जब वो सारपट्टा वाले बॉक्सर को बुरी तरह हराता है. उसके साथ रिंग में बच्चों की तरह खिलवाड़ करता है. मैच जीतने के बाद इडियप्पा समुदाय के लोग सारपट्टा वालों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं. तुमसे ना हो पाएगा टाइप बातें करते हैं. सुनकर गुरुजी गुस्से में तमतमा जाते हैं. चैलेंज दे डालते हैं कि वेटापुल्ली उनके समुदाय के किसी बॉक्सर से एक फाइनल मैच लड़े. अगर वो हार गए, तो कभी उनकी तरफ से कोई बॉक्सिंग रिंग में नहीं उतरेगा. मैच तय हो जाता है. रिंग में उतरने के बाद वेटापुल्ली एक जल्लाद है. तो क्या कोई उसे हरा पाएगा. और क्या सारपट्टा समुदाय अपना मान बचा पाएंगे. और समरा इस पूरी इक्वेशन में कहां फिट होता है, यही फिल्म में आगे देखने को मिलता है.

वेटापुल्ली और सारपट्टा समुदाय के बीच होने वाले इस मैच को मेन प्लॉट की तरह पेश किया गया है. लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं. ये मैच होने से पहले और उसके बाद भी कहानी में बहुत कुछ घटता है, जो आपको एंगेज कर के रखता है. अब आपको ये फिल्म क्यों देखनी चाहिए, उन कारणों पर बात करेंगे.


# नाक से ऊंचा कुछ नहीं

कहते हैं कि बॉक्सर्स अपना झगड़ा सिर्फ रिंग तक रखते हैं. उससे बाहर आते ही सब नॉर्मल. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. यहां बॉक्सर अगर हारा तो रात को आवारा घूमता शराबी भी उसे कोसकर जाएगा. बॉक्सिंग पर अपना ज्ञान देकर जाएगा. अगर बॉक्सर जीता तो उसे पूरा गांव, पूरा समुदाय सिर आंखों पर बिठा लेगा. फिल्म में बॉक्सिंग को सिर्फ एक गेम की तरह इस्तेमाल नहीं किया. बल्कि बॉक्सिंग एक जरिया है. एक समुदाय का दूसरे को नीचा दिखाने का. एक कोच का दूसरे कोच को अपनी जगह दिखाने का.

गर्व एक बेसिक ह्यूमन ट्रेट है. जो हम सभी में किसी न किसी स्तर पर पाया जाता है. फिल्म में गर्व को ही बॉक्सिंग मुकाबले का आधार बनाया है. जैसे वेटापुल्ली से लड़ने के लिए समरा को तैयार किया जाता है. उस बीच पूरा गांव समरा के सामने एक ही बात दोहराता है. कि सारपट्टा समुदाय का सवाल है. उसके लिए तुम्हें जीतना ही होगा. सब में जैसे होड़ मच जाती है कि बॉक्सिंग के जरिए ही खुद के समुदाय को दूसरे से ऊंचा दिखा सकते हैं. अपने समुदाय की संस्कृति, या उसका अलगपन जैसी चीज़ें तो कोई मायने ही नहीं रखती.

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बॉक्सिंग को नाक का सवाल बनाकर देखते हैं.

कुछ और पॉइंट्स की बात की जानी जरुरी है, जो फिल्म को अपना ह्यूमन टच देते हैं. उसे मानवीय बनाते हैं. पहला है जलन, ईर्ष्या. समरा ने कभी बॉक्सिंग रिंग में कदम नहीं रखा. फिर भी उसे वेटापुल्ली से लड़ने के लिए तैयार किया जाता है. ये ठीक ‘सड़क से उठाके स्टार बना दूंगा’ जैसा ही है. लेकिन गुरुजी को उसमें वो प्रतिभा नज़र आती है. बॉक्सिंग को लेकर ललक दिखती है उसकी आंखों में. इसलिए उसे ट्रेन करना शुरू कर देते हैं. लाज़मी था कि ये बात सबको हज़म नहीं होगी. कुछ लोग समरा के खिलाफ हो जाते हैं. उससे जलने लगते हैं. उसकी एक वजह तो ये कि कल के आए हुए लड़के ने हमारी जगह ले ली. लेकिन उनके ऐसा करने की दूसरी और सबसे प्रमुख वजह उनके पूर्वाग्रह से जुड़ी हुई है. कि जिसका बाप हमारे यहां नौकरी करता था. आज उसका बेटा हमारी बराबरी कर रहा है. फिल्म की सबसे उम्दा बात थी कि इस पॉइंट का ढिंढोरा पीटकर अपने सब्जेक्ट को सोशल ड्रामा में तब्दील नहीं होने दिया. फिल्म में सिर्फ एक जगह ही ये डाइलॉग है. जहां समरा के खिलाफ रहने वाला आदमी इस फर्क का जिक्र करता है. उसके बाद ये पॉइंट फिल्म में कभी नहीं उठाया जाता. लेकिन उस आदमी के एक्शन्स से आपको उसका चोटिल हुआ अहंकार लगातार नज़र आता रहेगा. कि जो हमारे बराबर में नहीं बैठ सकता, वो आज हमसे आगे निकल रहा है. उसका अभिमान समरा की प्रतिभा को मानने के लिए तैयार ही नहीं.


# मेहनत करने वाला ही असली हकदार है?

फिल्म को लिखा है तमिल प्रभा और पा रंजीत ने. पा रंजीत फिल्म के डायरेक्टर भी हैं. इन दोनों की तारीफ होनी चाहिए. बॉक्सिंग जैसे स्पोर्ट के इर्द-गिर्द ऐसी कहानी रचने के लिए. मद्रास वाले चेन्नई की झलक देने के लिए. इंदिरा गांधी सरकार की इमरजेंसी के दौरान तमिलनाडु में घटती घटनाओं का पॉलिटिकल बैकड्रॉप देने के लिए. बॉक्सर्स को इंसान बनाने के लिए. उन्हें लार्जर दैन लाइफ टाइप इमेज न देने के लिए. मानवीय पोट्रेयल है तो उनमें कमी भी होगी. वो अपनी ऑडियंस के लिए कुछ सवाल भी छोड़ जाएंगे.

ऐसा ही एक सवाल छोड़ा फिल्म में गुरुजी के बेटे ने. गुरुजी ने अपनी ज़िंदगी बॉक्सिंग को समर्पित कर दी. वो एक आदर्श कोच हैं. हां, थोड़े सख्त और गुस्सैल किस्म के भी हैं. उनसे बॉक्सिंग सीखने वाले उन्हें बहुत मानते हैं. ऐसे ही लोगों में से एक उनका बेटा भी है. जो हमेशा अपने पिता के साथ रहता है. बचपन से बॉक्सिंग की प्रैक्टिस करता है. ताकि एक दिन अपने समुदाय के लिए लड़ सके. अपने पिता का सीना गर्व से चौड़ा कर सके. लेकिन उसकी सारी उम्मीदें धरी की धरी रह जाती हैं. जब उसके पिता समरा को ट्रेन करना शुरू कर देते हैं.

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गुरुजी का बेटा, जो मेहनत करते हुए भी काबिल नहीं.

उनका बेटा बचपन से जो सपना देख रहा था, वो एक मिनट में चूर हो जाता है. बर्दाश्त नहीं कर पाता. आखिर बचपन से मेहनत की. जो पिता ने कहा, वो आंख बंद कर माना. फिर भी वो असली हकदार क्यों नहीं. उसके मन में उमड़ती ये कशमकश उसे बेचैन कर देती है. उसकी गलती न होते हुए भी उसे कसूरवार जैसा महसूस कराती है. और ऑडियंस के लिए छोड़ जाती है एक सवाल. कि क्या सिर्फ मेहनत ही प्रतिभाशाली होने का आधार है?


# फिल्म में सिर्फ बॉक्सिंग या ड्रामा भी?

अपनी कोई भी पसंदीदा पढ़ी हुई, सुनी हुई या देखी हुई कहानी याद कीजिए. किस फैक्टर ने आपको उस कहानी के प्रति आकर्षित किया? किस वजह से आप कहानी के मुख्य किरदार से कनेक्ट कर पाए या उसके लिए खुद को चियर करते पाया. वो वजह थी आपके हीरो की लाइफ में आई बाधाएं. ये बाधाएं या रुकावटें बाहरी दुनिया से जुड़ी भी हो सकती हैं. या उसका अंदरूनी मतभेद भी. मॉरल ऑफ द स्टोरी है कि कैसे वो इन बाधाओं को पार कर एक बेहतर इंसान बनता है. स्क्रीन राइटिंग की भाषा में इसे कन्फ्लिक्ट कहा जाता है. कहानी तभी इंटरेस्टिंग बनेगी जब आपका किरदार कन्फ्लिक्ट से जूझेगा.

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समरा के सारे चैलेंज सेकंड हाफ में शुरू होते हैं.

ये बात ‘गली बॉय’ देखते वक्त खली थी. जब मुराद की लाइफ में कन्फ्लिक्ट की कमी थी. उसे रैपर बनने में ज्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता. ऐसा ‘सारपट्टा परंबरै’ देखते वक्त भी लगेगा. कि समरा की लाइफ में सब कुछ आसानी से घट रहा है. वो बॉक्सर बन जाता है. गुरुजी से सीखने लगता है. लगता है कि उसके लिए सबकुछ सेट है. कोई बड़ी रुकावट नहीं लाइफ में. लेकिन ऐसा सिर्फ फर्स्ट हाफ में लगेगा. क्योंकि सेकंड हाफ में सारी मुसीबतें एक साथ आ पड़ती हैं. जब वो खुद अपना दुश्मन बन जाता है. वो बिना नियंत्रण की एक फोर्स है. जिसे अगर सही दिशा में नहीं मोड़ा गया, तो परिणाम सबके लिए हानिकारक होंगे. फिल्म में भी ऐसा ही होता है. वो खुद को अपना दुश्मन बनने से रोक पाता है या नहीं, ये फिल्म देखकर जानिए.


# दी लल्लनटॉप टेक

फिल्म की लेंथ करीब तीन घंटे है. लेकिन बावजूद इसके, आप एक मिनट भी खुद को बोर होते हुए नहीं पाएंगे. फिल्म इतनी एंगेजिंग है. विदा लेने से पहले एक और पॉइंट मेंशन करना चाहेंगे. फिल्म ग्रामर की भाषा में कलर्स का बड़ा महत्व है. चाहे किसी सीन की लाइटिंग हो, या किरदार ने किसी खास रंग के कपड़े पहने होंगे. एक अच्छी फिल्म में ऐसी तमाम बातों का एक खास मतलब होता है. ‘सारपट्टा परंबरै’ से ही एग्ज़ाम्पल देते हैं. समरा की फाइनल फाइट से पहले सबका उससे भरोसा उठ जाता है. किसी वजह से लगता है कि समरा उस रिंग में अपनी जगह डिज़र्व नहीं करता. समरा खुद को साबित करने में जुट जाता है. करता भी है. अंत में अपनी फाइट में ब्लू कलर का रोब पहनकर आता है. सिनेमा की भाषा में ब्लू कलर भरोसे और आस्था को दर्शाता है. बिना कुछ कहे भी मेकर्स ने स्टेटमेंट दे दिया.

Samra In Blue Robe
नीले रंग को भरोसे के प्रतीकात्मक रूप में इस्तेमाल किया गया है.

फिल्म की लेंथ देखकर मत हिचकिचाइएगा. क्योंकि एक बार शुरू करने के बाद फिल्म पूरी किए बिना बंद करने का मन नहीं करेगा.


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