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सेक्रेड गेम्स 2: रिव्यू

महीनों लंबे इंतज़ार के बाद आख़िरकार सेक्रेड गेम्स का सीज़न 2 आ ही गया. आज़ादी के जश्न वाले दिन आए इस सीज़न से लोगों की ढेर सारी उम्मीदें थीं. कई सवाल थे जिनका जवाब दिया जाना था. ‘त्रिवेदी’ बन गया था ‘क्वेश्चन ऑफ़ दी नेशन’. त्रिवेदी बचा कि नहीं? हर कोई जानना चाहता था. जनता को यूं तड़पता देखकर ज़रूर ही इस सीरीज के राइटर वरुण ग्रोवर मन में कभी-कभी बुदबुदाते होंगे ‘ कभी-कभी लगता है अपुन इच भगवान है’

आख़िरकार आ ही गया मार्केट में त्रिवेदी
आख़िरकार आ ही गया मार्केट में त्रिवेदी

तो कहानी शुरू हुई थी ‘पच्चीस दिन’ वाले गायतोंडे के फोन कॉल से. और जब पहला सीज़न ख़त्म हुआ तो सरताज को इतना तो मालूम हो ही गया था कि बात बड़ी है. बात है ‘न्यूक्लियर अटैक’ की. गायतोंडे को काले कपड़ों वाले लोग जेल से बचा कर ले जा चुके थे. उसी शख्स के कहने पर जिसे गायतोंडे ने अपना ‘तीसरा बाप’ मान लिया था.

गुरूजी ने कसम से छप्पर फाड़ दिया है
गुरूजी ने कसम से छप्पर फाड़ दिया है

इस बार ये पूरी सीरीज गायतोंडे के ‘तीसरे बाप’ के चारों ओर चक्कर लगाती है. चक्कर लगाते हुए सरताज भी गायतोंडे के उस चक्कर को समझने की कोशिश करता है जिसकी वजह से कभी अपने आप को बम्बई का भगवान कहने वाला गणेश गायतोंडे सूट बूट पहनकर दूर देश में किसी का मुनीम बन जाता है.

अगर आप अब तक ये नहीं समझ पाए थे कि इस सीरीज़ का नाम ‘सेक्रेड गेम’ ही क्यों रखा गया तो अब आपको पता चलेगा कि क्यों ये सारा खेल धर्म के नाम पर खेला जा रहा था.

दूर देस में मुनीम बनकर बैठा गायतोंडे इस बार ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आया, लेकिन सूरज चढ़ा था तो उतरेगा भी
दूर देस में मुनीम बनकर बैठा गायतोंडे इस बार ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आया, लेकिन सूरज चढ़ा था तो उतरेगा भी

इस बार विक्रमादित्य मोटवाने की जगह अनुराग कश्यप के साथ डायरेक्शन संभाल रहे हैं नीरज घ्येवान. मोटवाने इस सीज़न में पर्दे के पीछे वाला, लेकिन मुश्किल काम संभाल रहे हैं. अनुराग के जिम्मे आया है गायतोंडे और सरताज को फिल्माया है नीरज ने.

# कहानी

भारतीय वेदान्त परंपरा में एक महावाक्य है ‘अहं ब्रह्मास्मि’. इस सीज़न में दो चीज़ें हैं, पहला तो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और दूसरा ‘न्यूक्लियर बम’. दोनों में से क्या ज़्यादा ख़तरनाक है ये आपको तय करना है. इस महावाक्य के साथ सीरीज़ में प्रकट होते हैं गुरुजी. गणेश गायतोंडे का तीसरा बाप. जो गायतोंडे को धर्म के बेसन में लपेटकर उसका ऐसा पकौड़ा बनाता है कि गायतोंडे के दिमाग़ का साकीनाका हो जाता है. इस बार गायतोंडे की जगह कहानी ज़्यादातर सरताज कहता दिखाई देता है.

सरताज इस बार कहानी कहने में लीड ले रहा है
सरताज इस बार कहानी कहने में लीड ले रहा है

कहानी को छौंका देने के लिए नए किरदारों के तौर पर गुरुजी की पक्की वाली चेली बात्या है, बम्बई की जान का दुश्मन शाहिद है और है शातिर जोजो.

कुल मिलाकर कहानी है ‘बम’ और ‘ब्रह्म’ की. और कहानी है बिल्कुल नॉन लीनियर फॉर्म में. माने किसका धागा कब कहां क्यों जुड़ रहा है ये समझने में दिमाग़ी कसरत करनी होगी. कई जगह पे कहानी अब्सर्ड है, जिसका कहीं कोई लॉजिक नहीं दिखता, या शायद हम जो लॉजिक खोजते हैं वो वाला लॉजिक नहीं मिलता.

ये ठीक वैसा ही है जैसे एक अंग्रेज़ी का प्रोफेसर रोज़ सुबह नियम से 4 बजे भोजपुरी गाने पर नाचता हो, घंटों नाचता हो. अब इसके पीछे क्या लॉजिक हो सकता है. लेकिन जो है वो है.

गायतोंडे से बलिदान लेते दिखेंगे गुरूजी
गायतोंडे से बलिदान लेते दिखेंगे गुरुजी

# ऐक्टिंग

गुरुजी के किरदार में पंकज त्रिपाठी इस सीजन का सबसे खूबसूरत हासिल है. गायतोंडे समझ चुका है कि बम्बई का बाप वो नहीं बल्कि गुरुजी हैं. नवाज़ के पास काम करने के लिए कुछ ख़ास था नहीं. कल्कि केक्लां ने बात्या और रणवीर शौरी ने शाहिद के कैरेक्टर में बहुत ख़ास काम नहीं किया है.

दूसरी तरफ़ सरताज के किरदार में सैफ़ से कई जगह एक्सपेरिमेंट करवाए गए हैं. ट्रांजिशन करते हुए सैफ़ अजीब तौर पर कमज़ोर दिखाई देते हैं. और आख़िरी के दो एपिसोड में तो जब तक उन्हें ऐक्शन का डोज़ नहीं मिलता तब तक बहुत ही औसत काम किया है.

इस बार कहानी को कई लोग छौंका लगाया है
इस बार कहानी को कई लोग छौंका लगाया है

# डायलॉग

मछली से घड़ियाल, घड़ियाल से शेर और शेर से बन्दर तो हम बन गए, लेकिन बन्दर से इन्सान हम तब बने जब हमको धरम मिला…

डायलॉग इस बार भी धारदार हैं. ज़ाहिर तौर पर वरुण ग्रोवर और उनकी टीम ने ये सीज़न लिखने में भी बहुत मेहनत की है.

लेकिन जब राशिद एक जगह कहता है कि ‘65 का, 71 का, 99 का सबका कर्ज़ चुकाएगा’… तो लगता है कि बस फैज़ल बोलना बाक़ी रह गया था.

गुरुजी के डायलॉग कई जगह भारी और ग़ैर-ज़रूरी लगते हैं. फिर भी पंकज ने डायलॉग निभाने की भरपूर कोशिश की है.

इस बार भी किरदार हिस्ट्री के रेफरेंस देते हैं मसलन ‘ओसामा में डेयरींग था, पूरी दुनिया के सामने अमेरिका का एक नहीं, दो दो *** काट के ले गया’

गायतोंडे का ये डायलॉग ‘वहां त्रिवेदी के लोगों ने बाबरी मस्जिद गिराया, और शाहिद खान ने बम्बई जलाया…’ और जेल में बंद एक सस्पेक्ट जब सरताज के पूछने पर जवाब में कहता है कि ‘मुसलमान को उठाने के लिए कोई वजह चाहिए क्या?’ तब ये सीरीज़ हमारे समय के बेहद क़रीब से गुज़रती महसूस होती है.

# कुछ बोनस पॉइंट भी हैं

रामू. रामगोपाल वर्मा का किरदार भी आया है इस सीरीज़ में. बंटी अपनी छतरी लेकर ख़ुद जाएगा रामू वाले किरदार के पास. और रामू के किरदार को आना पड़ा गायतोंडे की छतरी में.

गायतोंडे और रामू का क्या कनेक्शन है देखिए इस सीज़न में
गायतोंडे और रामू का क्या कनेक्शन है देखिए इस सीज़न में

अब आपका यक्ष प्रश्न ‘क्या सेक्रेड गेम्स 3’ भी आएगी? त्रिवेदी वाले सवाल के बाद यही इस साल का सवाल है.

इसका जवाब है अश्वत्थामा. कहते हैं महाभारत का ये इकलौता पात्र है जो आज भी धरती पर भटक रहा है. अजर, अमर और शापित अश्वत्थामा. अपने माथे की मणि ढूंढ अश्वत्थामा. और गुरुजी ने अपना अश्वत्थामा बनाया था सरताज के पिता को. और सीरीज के उस आख़िरी सीन को अगर आप ध्यान से देखें जहां से ‘सेक्रेड गेम्स 3’ की शुरुआत हो सकती है, तो आपको ये याद रखना चाहिए कि ‘अश्वत्थामा मर नहीं सकता’ यानि ख़त्म नहीं होगा. और ख़त्म नहीं होगा, तो फिर शुरू होगा.

# क्यों देखें?

अगर पहला सीज़न देख लिया हो तो देख लीजिए. एक बार तो देखा ही जा सकता है. और अगर कहानी कहने के क्राफ्ट को समझना हो तो दोबारा तिबारा देखिए.

# क्यों न देखें?

अगर अब तक कहीं से Netflix का पासवर्ड जुगाड़ न कर पाए हों. पहले भी दोस्तों को शेयरिंग के नाम पर धोखा दे चुके हों और अब कोई नया कार्ड बचा ना हो जिससे एक महीने वाला काम हो सके… तो क्या ही देख पाएंगे. रहने दीजिए.


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