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ऋचा चड्ढा ने एक पोस्ट लिखी और बॉलीवुड की तमाम गंदगी को एक्सपोज़ करके रख दिया

सुशांत सिंह राजपूत के जाने के बाद से ही एक शब्द जमकर सोशल मीडिया पर घूम रहा है. वो शब्द है- नेपोटिज़म, यानी भाई-भतीजावाद. एक धड़ा ये कह रहा है कि बॉलीवुड में पसरे नेपोटिज़म ने सुशांत को परेशान कर दिया था, जिसके चलते उन्होंने सुसाइड जैसा कदम उठाया. और भी तरह-तरह की बातें हो रही हैं. इन सबके बीच एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा ने भी अपनी बात रखी. सुशांत के लिए एक लंबा सा ब्लॉग लिखा. उसे शेयर किया. ऋचा ने नेपोटिज़म समेत कई अहम मुद्दों पर बात की. ब्लॉग की शुरुआत उन्होंने, सुशांत को याद करते हुए की. उन्होंने सुशांत को अपना पुराना दोस्त बताया.

क्या क्या लिखा ऋचा ने?

“यहां इक खिलौना है
इन्सां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
यहां पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है”

साहिर लुधियानवी की इन लाइनों के साथ शुरुआत की. लिखा,

“पिछले महीने के आखिरी दिनों में साहिर लुधियानवी के ये शब्द मेरे कानों में फातिहा (शोक-गीत) की तरह बजते रहे. यहां नेपोटिज़म पर बहुत बातें हो रही हैं. इस मुद्दे पर कम कि ये माहौल किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के साथ क्या कर सकता है. और ये सब उस प्यारे एक्टर के सुसाइड के नतीजे में हो रहा है, जो मेरा पुराना दोस्त हुआ करता था.”

इसके बाद ऋचा ने इनसाइडर्स और आउटसाइडर्स वाली बहस पर लिखा. कहा,

“ये कहा जा रहा है कि ये इंडस्ट्री ‘इनसाइडर्स’ और ‘आउटसाइडर्स’ के बीच बंटी हुई लगती है? मेरे विचार में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और इसका पूरा इको-सिस्टम (संरचना) केवल विनम्र और निर्दयी लोगों के बीच बंटा है. निर्दयिता के विस्तार की शुरुआत हल्की नाराज़गी से होती है और अपने सबसे खराब स्तर पर, सबसे जघन्य स्तर पर ये सोशियोपेथिक प्रतिशोध की मंशा के तौर पर ज़ाहिर होती है. लेकिन अगर कोई किस्मत वाला हो, तो दयालुता भी एक सरल-सीधे तरीके से व्यक्त की जाती है. सच्चे लोग एक-दूसरे की तरफ आकर्षित होते हैं और कई बार ज़िंदगी भर के संबंध भी बन जाते हैं.”

इसके बाद ऋचा ने अपने एक्सपीरियंस पर बात की. कहा,

“मैंने जो वक्त यहां बिताया, मेरा मूल्यांकन ये है कि इंडस्ट्री एक फूड चेन की तरह काम करती है. कई बार लोग बदमाश हो जाते हैं, जब वो जानते हैं कि इसके साथ वो बचकर निकल सकते हैं. जो लोग आज दुखी हैं, वो खुद भी अपने अधीन काम करने वालों के प्रति क्रूर रहे हैं. आपका बुली आपके साथ नैतिकता से पेश नहीं आता तो आप उससे नफरत करते हो, जबकि आप खुद अपने अधीन काम करने वालों को बुली कर रहे होते हो, मानो ये कोई संस्कार हो. ये ‘कुत्ता कुत्ते को खाता है’ वाली बात दुनिया में स्वीकार्य है. कोई पछतावा न होना लीडरशिप क्वालिटी मानी जाती है. शालीनता, संवेदनशीलता एक बाधा (अपंगता) मानी जाती है. इसके बावजूद हमसे उम्मीद की जाती है कि हम बिना पीड़ित हुए काम करें. अच्छा मनोरंजन करें, जिसके लिए हम कहानियां सुनाते हैं. हमारी रोजी रोटी क्रिएटिव होने और अपनी भावनाओं को सत्यता के साथ सामने रखने पर निर्भर करती है. लेकिन ये कोई राज़ नहीं है कि हम भी कलाकार के तौर पर अपूर्ण, कमज़ोर और आसानी से चोट खाने वाले हैं. ये एकदम अलग पेशा है, जहां सफलता और नाकामी दोनों ही पब्लिक के सामने होती है. हमारा बिज़नेस ऐसा है, जहां हमारा व्यक्तिगत जीवन हमारे सार्वजनिक जीवन से प्रभावित होता है. कई बार, बिना किसी कारण के एक्टर्स नेशनल हेडलाइन्स में बने रहते हैं, वो भी काफी समय तक.”

इसके बाद ऋचा ने कहा कि कई ‘इनसाइडर्स’ ऐसे हैं, जो विनम्र और उदार हैं, जबकि कई ‘आउटसाइडर्स’ ऐसे हैं जो अहंकारी हैं. आगे कहा,

“अपने करियर के शुरुआती दिनों में, कई बार आउटसाइडर्स ही मुझे कम आंकते थे. इन सारे नुकसान से रिकवर होने के लिए मैंने अपनी पूरी ताकत लगाई. लेकिन ये सब मेरे बारे में नहीं है. दुखद बात ये है कि यहां हर किसी ने इस तरह का एक्सपीरियंस किया है.”

इसके बाद ऋचा ने नेपोटिज़म पर बात की. कहा,

“जहां तक नेपोटिज़म की बात है, इससे असल में मुझे बहुत तेज़ हंसी आती है. मैं ‘स्टार किड्स’ से नफरत नहीं करती. हमसे ऐसा करने की उम्मीद क्यों की जाती है? क्या किसी दूसरे से ये उम्मीद करना कि वो अपने पैरेंट्स, फैमिली या उनकी विरासत पर शर्मिंदा हो, क्या ये सही है? ये एक नफरतभरा और बकवास तर्क है. इस बिज़नेस में मैं एक सेल्फ मेड (खुद को बनाने वाली) व्यक्ति हूं. क्या आप मेरे बच्चों से कहोगे कि वो मेरे स्ट्रगल पर शर्मिंदा हों? ‘स्टार किड्स’ को अपने खुद के बिरादरी (clans) के अंदर विरोध का सामना करना पड़ता है. कई बार ये पीढ़ियों के बीच की निर्मम प्रतियोगिता होती है. इन बिरादरी के अंदर हायरार्की भी होती है, जैसे किसी लिजेंड्री सिंगर के पोते या नाती या फिर किसी बढ़िया स्टंटमैन के बेटे को किसी डायरेक्टर या एक्टर के बच्चों से कम समझा जाता है. ये जानते हुए कि कास्ट सिस्टम हमारे देश में कितने अंदर तक मौजूद है, ये रैंकिंग सिस्टम किसी को हैरान क्यों करता है? हम कभी नहीं जान सकते कि यहां कोई व्यक्ति किस चीज़ से डील कर रहा है. मैं सहानुभूति रखती हूं, लेकिन मैं तब तक उस दर्द को नहीं जान पाऊंगी, जब तक मैं उनकी जगह नहीं होऊंगी.”

इसके बाद ऋचा ने ये भी कहा कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि जो व्यक्ति इंडस्ट्री के अंदर पैदा हुआ हो, वो उस व्यक्ति की तरह एक्सपीरियंस करे, जो इंडस्ट्री के बाहर का है. उन्होंने कहा,

“ये मुझे करीब एक दशक पीछे ले जाता है. सुशांत और मैंने एक थियेटर में वर्कशॉप करना शुरू किया था. मैं अंधेरी वेस्ट में 700 वर्ग फीट का एक अपार्टमेंट अपनी दिल्ली की एक दोस्त के साथ शेयर करती थी. सुशांत मुझे अपनी बाइक से लेने आते और हम रिहर्सल के लिए जाते थे, जिसके लिए मैं शुक्रगुज़ार हूं. मैं गरीब या टूटी हुई नहीं थी. लेकिन मैं ये नहीं कह सकती कि जब मुझे एक स्किन ब्रांड के विज्ञापन के ऑडिशन के लिए जाना था, तब पैसे के बारे में मैं सोच नहीं रही थी. मैं ऑटो-रिक्शा से जाते वक्त इसलिए चिंता में थी कि कहीं मेरा मेकअप पहुंचने से पहले ही खराब न हो जाए. ये ऐसा है जो कभी किसी ‘स्टार किड’ के साथ नहीं होगा, और अगर ऐसा होता है तो इस बात के लिए उनकी तारीफ होगी कि उन्होंने रिक्शा किया. लेकिन मैं उनके विशेषाधिकारों पर नाराज़गी नहीं जताती.”

इसके बाद ऋचा ने बताया कि वो हमेशा अपने पैरेंट्स से पैसे मांग सकती थीं, और वो मांगती भी थीं, लेकिन चाहती थीं कि अपने पैसों पर वो अपने एक्स्ट्रा खर्च उठाएं. उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से आने वाले एक्टर्स के बारे में बात की. कहा,

“मैं NSD से आने वाले उन शानदार प्रतिभाशाली एक्टर्स को देखती थी, जिनमें से बहुतों के लिए मुझे डर रहता था कि वो फिल्मों में नहीं आ पाएंगे. क्योंकि उनके पास या तो इंग्लिश का लिमिटेड नॉलेज होता था या फिर वो खुद को संवारने (groom) की ज़रूरत और सोशल मीडिया की ज़रूरत के बारे में नहीं जानते थे. कई सारी प्रतिभाशाली एक्ट्रेस मेरे सामने खारिज कर दी गई थीं, क्योंकि वो ठीक से इंग्लिश नहीं बोल पाती थीं या फिर पूरी तरह तैयार (Groom) नहीं थीं. उन्हें कोई दूसरा मौका भी नहीं मिला. आप आज उन्हें गुमनाम से वेब शो की होर्डिंग्स में कभी-कभार देखोगे. तो ये सब क्या है? पोस्ट-कोलोनियल (उपनिवेशवाद के बाद का वक्त) आत्म घृणा का एक विचित्र रूप?”

आगे ऋचा ने सेक्सिज़म पर बात की. उन्होंने कहा,

“एक ‘यथार्थवादी अभिनेता’ जो स्टार बनता है और फिर वो लज्जाते हुए इवेंट्स में ये घोषणा करता है कि वो इंग्लिश नहीं बोल पाता, तो वो आकर्षक होता है. फिर भी मैंने देखा है कि मेरे कई कलीग्स उस एक्ट्रेस को देखकर आंखें तरेरते हैं. ये भी तब, जब इस फील्ड में एजुकेशन पर बिल्कुल भी ज़ोर नहीं दिया जाता. आखिर किस आधार पर वो दूसरों का मज़ाक बनाते हैं? ये सही है कि एक्टिंग के लिए एस्ट्रोफिजिसिस्ट की डिग्री नहीं चाहिए. लेकिन हरीशंकर परसाई या शेक्सपियर के बारे में जानने से क्या आपकी जान चली जाएगी? बीते दिनों में दिग्गजों की जो कुशलता थी, वो अब गायब होती सी लगती है. हम अमिताभ बच्चन और जीनत अमान नहीं हैं, और ये दिखता है.”

आगे ऋचा ने कहा कि वो जानती हैं कि सेक्सिज़म कुछ समय के लिए और फलेगा-फूलेगा. फिर उन्होंने दोबारा नेपोटिज़म वाले मुद्दे पर फोकस किया. लिखा,

“मैंने साल 2014 में पहली बार नेपोटिज़म के बारे में बात की थी, इसके फैशनेबल बनने से पहले. परिभाषा के मुताबिक, नेपोटिज़म का मतलब है किसी के रिश्तों से फायदा होना. बहुत से एक्टर्स खुद को ‘स्वीकार नहीं किए जाने’ के पीछे नेपोटिज़म का हवाला दे रहे हैं. ये वो एक्टर्स हैं जिन्हें उनके ब्रेक्स खासतौर पर नेपोटिज़म की वजह से ही मिले थे. मतलब, वो लोग शारीरिक तौर पर और/या लाक्षणिक तौर पर प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ बिस्तर पर जाते थे, यही प्रभावशाली व्यक्ति उन्हें प्रोड्यूसर्स से मिलाता था और फिर उन्हें अपनी पहली फिल्म मिलती थी. या फिर उनके फैमिली फ्रेंड का बेटा कोई फिल्म बना रहा था, और उसे एक ‘नए चेहरे’ की ज़रूरत थी, जो आसानी से फैमली वॉट्सऐप ग्रुप पर मिल गया था. अगर हमारी इंडस्ट्री नेपोटिज़म और विरासत के बीच अंतर समझ पाती, तो ज़ाहिर तौर पर हम वर्ल्ड क्लास होते. विरासत उस्ताद अल्लाह रखा खान और ज़ाकिर हुसैन साहब हैं. नेपोटिज़म के बारे में आप बताओ. तर्क ये है कि एक एक्टर के तौर पर आपकी स्वीकार्यता दर्शकों पर निर्भर करती है. स्वीकार या अस्वीकार होने के लिए आपको कास्ट होना पड़ता है.”

इसके बाद ऋचा ने प्रिविलेज यानी विशेषाधिकारों पर बात की. कहा कि जिनके पास प्रिविलेज होता है, उन्हें दिखाई नहीं देता. उन्होंने कहा,

“हकदारी का सामना करने या उसे मानने से पहले हम बराबरी के बारे में गंभीर बहस नहीं कर सकते. और किसी आदमी की मौत का आरोप किसी ‘प्रविलेज्ड (विशेष अधिकार रखने वाले)’ के ऊपर लगाने से या किसी एक्ट्रेस के रेप की बात करने से गंभीर चर्चा नहीं होगी. क्या ‘शुभ-चिंतक’ ये चाहते हैं कि कोई दूसरा व्यक्ति भी उनकी फैलाई घृणा की वजह से सुसाइड के कगार पर पहुंच जाए? तब हम क्या करेंगे, आप पर आत्महत्या के लिए उकसाने का केस करें? इस द्वेष से क्या हासिल होगा? कुछ भी नहीं.”

ऋचा ने आगे लिखा,

“जहां तक प्रिविलेज की बात है, मैं गलत भी हो सकती हूं, लेकिन अभी तक किसी ने भी इसकी स्वीकृति के अलावा कुछ भी मांग नहीं की है. ये उस तरह है जैसे हम कह रहे हों कि कोहिनूर एक भारतीय हीरा है, जिसे भारत को वापस दिया जाना चाहिए. क्योंकि एक दस बरस के राजकुमार पर दबाव डालकर उससे संधि पर साइन करवाकर इसे प्राप्त किया गया था. हमारे ऐसा कहने से, क्वीन उसे क्राउन से हटाकर हमे नहीं देने वालीं, क्योंकि इससे ऐतिहासिक गलतियां नहीं सुधरेंगी और साथ ही पूरा म्यूज़ियम भी फिर खाली हो जाएगा. लेकिन, ये केवल एक प्रतीकात्मक जेस्चर होगा.”

इसके बाद ऋचा ने एक क्रांतिकारी आइडिया सुझाया. कहा,

“मैं एक क्रांतिकारी आइडिया पेश कर रही हूं, जिससे दोनों ही चीज़ें सही हो सकती हैं. ये कि ‘स्टार किड्स’ के लिए भी सब आसान नहीं है, हालांकि ‘आउटसाइडर्स’ की तुलना में उन्हें काफी आसानी से चीज़े मिल जाती हैं, और ये कि किसी ‘आउटसाइडर’ को यहां हैप्पी एंडिंग मिल जाए, ये भी बहुत ही कम होता है. इसलिए, जब कोई मुझसे पूछता है कि क्या ‘स्टार किड’ न होने की वजह से मुझे सफ़र करना पड़ा, तो मैं ज़ोर से और गर्व से कहती हूं कि वास्तव में मैं हूं. मेरे पैरेंट्स केवल स्टार्स नहीं हैं, वो सुपरस्टार्स हैं, क्योंकि उन्होंने मुझे सही तरीके से पाला.”

फिर ऋचा ने मेंटल हेल्थ पर फोकस किया. कहा,

“ये ‘आरोप’ इस तरह की गंभीर स्थिति को महत्वहीन बना रहे हैं और मानसिक स्वास्थ्य की भूमिका की आसानी से अनदेखी कर रहे हैं. मैं ये देखकर हैरान हूं कि हम अपनी बातचीत में कितना नीचे गिर गए हैं. मृत एक्टर के दोस्तों और गर्लफ्रेंड की सोशल मीडिया टाइमलाइन गंदगी से पटी पड़ी हैं. ये सारे ‘फैन्स’ कौन हैं? मैंने कुछ प्रोफाइल्स को ऑनलाइन चेक किया. वही गटर मुंह वाले लोग, जिन्होंने सुशांत को उस वक्त भला-बुरा कहा था, जब उन्होंने ‘पद्मावत’ मुद्दे पर अपना स्टैंड लिया था, और यही लोग अब उनके प्रियजनों को ‘उनके (सुशांत) साथ मौजूद न होने’ के लिए भला-बुरा कह रहे हैं. इनमें से बहुत सारी तो फेक फैन प्रोफाइल्स हैं, जो रातों-रात सामने आ गईं. ये लोग उन्हीं (सुशांत) की ही तस्वीरों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन बॉट्स को अब नफरत फैलाने के लिए बहानों को खोजना बंद कर देना चाहिए और केवल ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि वो घृणास्पद बुरे आदमी हैं और ईर्ष्यालु हैं. ये पाखंड रणनीतिक भी है और दयनीय भी है. और फिर, जब इस देश में वानखेड़े मैदान में क्रिकेट के भगवान पर लोग छी-छी कर सकते हैं, तो मनुष्य मात्र के पास क्या ही उम्मीद होगी? अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए कि ये नैतिक पतन एक पैरेंट के तौर पर, एक व्यक्ति के तौर पर आपको बैचेनी से भरी रातें नहीं देता?”

‘सोशल मीडिया पर कई प्रोड्यूसर्स ने मगरमच्छ के आंसू बहाए’

ऋचा चड्ढा ने इसी पोस्ट के आगे प्रोड्यूसर्स पर भी कमेंट किया. लिखा,

“मैंने देखा कि सोशल मीडिया पर कई सारे प्रोड्यूसर्स इस मृत एक्टर के लिए मगरमच्छ के आंसू रो रहे थे. इनमें से कइयों को तो अभी तक इस बात की शर्म नहीं आती कि उनके चेक्स अभागे प्रोफेशनल्स के पास जाकर बाउंस हुए थे. उन्हें (अभागे प्रोफेशनल्स) अपनी मेहनत की कमाई के लिए इनके आगे भीख मांगनी पड़ी थी. एक मेकअप आर्टिस्ट, जिनके साथ मैं अक्सर काम करती थी, उन्होंने मुझे बताया था कि ‘मार्केट’ में उनका इतना पैसा बकाया है, जितने में अंधेरी में 1BHK की प्रॉपर्टी आ जाए. इस लॉकडाउन पीरियड में, उन्हें अपना किराए का अपार्टमेंट खाली करना पड़ा और अब वो किसी दूर बस्ती में रह रहे हैं, जिसका किराया उनके पिछले किराए का एक अंश मात्र है. मैं उन प्रोड्यूसर्स को जानती हूं, जिन्होंने उनके फ्रीलांस स्पॉट बॉयज़ तक को पे नहीं किया. इस कैटेगिरी के वर्कर्स, सामान्य परिस्थितियों में बहुत ही थोड़े में गुज़ारा करते हैं. ये सब हमारे बिज़नेस के ‘फीस्ट एंड फेमिन (ऐसी स्थिति जहां या तो बहुत ज्यादा मौजूद होता या फिर बहुत ही कम)’ नेचर की वजह से होता है. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस लॉकडाउन के विनाशकारी प्रभाव ने उनकी ज़िंदगी पर क्या असर डाला होगा? अलग-अलग एक्टर्स की दरियादिली, जैसे सलमान खान हो गए, और जो चुपचाप मदद कर रहे हैं, उनकी सराहना की जानी चाहिए.”

ऋचा ने उन यूनियन्स की भी तारीफ की, जो लॉकडाउन के वक्त स्पॉट बॉयज़ की मदद कर रहे हैं. उन्हें राशन मुहैया करा रहे हैं. साथ ही अपील की इस वक्त मदद के लिए सबको साथ आना चाहिए. आगे लिखा,

“इससे मेरी नज़र में एक बड़ा मुद्दा आता है. बदलाव बुरा और असहज होता है, लेकिन बदलाव न होना घातक हो सकता है. तो अभिनेताओं को रॉयल्टी का भुगतान क्यों नहीं किया जा सकता? स्थायी गुमनामी के नुकसान का भुगतान करने के लिए ये एक छोटी सी कीमत है. ठीक इसी प्रकार से डायरेक्टर्स और राइटर्स के लिए भी हो? मुझे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ दोनों पार्ट्स के लिए ढाई लाख रुपए मिले थे और जो कि ठीक थे. कश्यप ने मुझे मौका दिया, और उसके लिए मैं हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी. मैंने तो उम्मीद भी नहीं की थी कि इस तरह के ब्रेक के लिए मुझे पे भी किया जाएगा. वो फिल्म एक कल्ट हिट रही. मेरा निरंतर करियर उसी का वसीयतनामा है. हालांकि, कहीं न कहीं किसी न किसी को उस फिल्म की निरंतर लोकप्रियता से पैसे बनाने चाहिए.”

इसी बात के आगे ऋचा ने कुछ नामी एक्टर्स का ज़िक्र किया. कहा,

“क्या इसका कोई मतलब बनता है कि परवीन बॉबी जैसी बड़ी स्टार के पास कथित तौर पर उनके इलाज के लिए आखिरी पड़ाव पर पैसे नहीं थे? इसी प्रकार से हंगल साब के साथ क्या हुआ? या भगवान दादा, जो अपने आखिरी दिनों में चॉल में रहे? मैं जानती हूं कि मेरी ये इच्छा कि हर संबंधित विभाग को उनके हिस्से की रॉयल्टी मिले, बहुत ही अवास्तविक सी है. ये नहीं होगा, कम से कम मेरे लाइफ-टाइम में तो नहीं ही होगा. लेकिन चूंकि हमारे आस-पास के सभी ढांचे चरमरा रहे हैं, तो शायद हम इस मलबे से नया कुछ बना लें. एक व्यक्ति ने कहा था कि प्रतिकूलता को अवसर में बदलो. हालांकि ज्यादातर लोगों ने इसे आसानी से गलत समझते हुए ‘अवसरवाद’ समझ लिया था. हमारे पास एक मौका है, चलिए इस विराम का उपयोग विकसित करने के लिए करें.”

‘सोने से मना किया, तो निकाल दिया’

ऋचा चड्ढा ने आगे डायरेक्टर्स को लेकर बड़ी बात कही. उन्होंने लिखा,

“बहुत से डायरेक्टर्स एक महीने पहले तक सहानुभूति भरे मैसेज शेयर करते दिखे. इनमें से बहुतों ने तो आखिरी मिनट पर एक्ट्रेस को निकाल दिया, क्योंकि एक्ट्रेस ने उनके साथ सोने से मना कर दिया था. और इनमें से कई तो पहले ही अंदाजा लगा बैठे थे कि ‘इसका कुछ नहीं होगा’. हमेशा की तरह, इस तरह के कई भविष्यवक्ता आखिर में अपने चेहरे पर अंडे की भुर्जी बनाते रह गए. आप भगवान नहीं हो. इसलिए अपनी सनक से इस दुनिया को संक्रमित करना बंद करो.”

एजेंसी या मैनेजर पर भी बात की

ऋचा ने अपने लंबे ब्लॉग में लगभग-लगभग इंडस्ट्री से जुड़े सारे सेक्टर को कवर किया. मैनेजर और एजेंसी पर बात करते हुए कहा,

“इस बिज़नेस में कोई अपनी एजेंसी या अपने मैनेजर पर भी भरोसा नहीं कर सकता, क्योंकि भले ही आप एक टैलेंट के तौर पर उस एक व्यक्ति या एजेंसी पर अपना सारा भरोसा और विश्वास लगा दो, फिर भी वो आपसे चोरी करेंगे. मैंने एक बार मेरे एक्स-एजेंट का सामना किया था, उसने कहा था, ‘ये तो सब करते हैं’.”

मीडिया पर भी हमला

ऋचा ने आगे मीडिया को भी निशाने पर लिया. लिखा,

“मैंने पत्रकारों को, पब्लिकेशन्स को और फिल्म प्रमोशन के लोगों को ये मैसेज पोस्ट करते देखा है कि कैसे वो इस बिज़नेस और इसके ‘ज़हरीलेपन’ से परेशान हैं. इनमें से कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो सबसे ‘विषैले’ होंगे. वो हेडलाइन्स-TRP के लिए किसी की ज़िंदगी को कुर्बान करते वक्त दो बार भी नहीं सोचते. वो खुद भी धोखाधड़ी, रेप और बाल यौन शोषण के आरोपों के तहत जांच के दायरे में हो सकते हैं, लेकिन जिस हायरार्की के प्रदर्शन से घृणा करने का दावा करते हैं, उसमें हिस्सा लेने से खुद को रोक नहीं सकते. वो तो पाखंड (hypocrisy) की स्पेलिंग भी ठीक से नहीं बता सकते, लेकिन फिर भी जजमेंट के लिए बैठे होते हैं, कई बार ‘जागरूक’ ट्विटेरिटी बनना चाहते हैं, और कई बार इंटरव्यूअर्स के तौर पर बेशर्मी के साथ झूठ बोलते हैं. पिछले साल मैंने अक्षय खन्ना के साथ एक फिल्म की थी. मैंने फिल्म के प्रमोशन के दौरान उन्हें देखकर ऐसा अमूल्य सबक सीखा. एक नामी जर्नलिस्ट ने उनसे उनके पिता की बीमारी और मौत को लेकर सवाल किया. ये भी पूछा कि चार साल तक उन्होंने कोई काम क्यों नहीं किया? अनिच्छा से थोड़े-थोड़े शब्दों में जवाब देने के बाद मिस्टर खन्ना ने बहुत कोमलता से कहा, ‘इससे मुझे पीड़ा होती है. मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता.’ साधारण चीज़ें हमेशा आसान नहीं होतीं.”

फिर ऋचा ने फिल्म जर्नलिस्ट पर फोकस किया. लिखा,

“फिल्म ‘जर्नलिस्ट’ की परिभाषा का बड़ी सावधानी से विस्तार किया गया, अब इनमें ट्रोल्स, भड़काने वाले भी शामिल हैं. मैं उस ‘ज़िम्मेदार’ पत्रकार को जानती हूं, जिसने इरफ़ान के गुज़रने के कुछ घंटों पहले गुस्से से उनके स्टाफ को कॉल किया था, ये जानने के लिए कि क्या वो वास्तव गुज़र गए. और बाद में इसलिए कॉल किया कि उसे इस खबर के बारे में सबसे पहले नहीं पता चला, और उसे ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ नहीं मिल सकी थी. मैं एक एक्टर को जानती हूं, जिन्होंने इरफ़ान के निधन के पहले ही प्रेस रिलीज़ जारी कर दी थी, ताकि इस त्रासदी से उन्हें थोड़ा फायदा हो सके और आखिरी बार एक ही फ्रेम में आ सकें. एक महीने पहले एक पब्लिकेशन अली के घर, उनके होमटाउन पहुंच गया था, उनकी मां के निधन की ‘जानकारी’ इकट्ठा करने के लिए. वो एंबुलेंस और शव के विज़ुअल्स चाहते थे. अगर आप मुझे बताने वाले हो कि हमने इसके लिए हामी भरी है, तो मुझे भी आपकी गर्दन मरोड़कर ये पूछने का मन हो सकता है कि मेमो कहां है? मुझे दिखाइए कि कहां ऐसा कहा गया है कि हम केवल प्रोडक्ट्स हैं, जिनकी मृत्यु में भी इज़्ज़त नहीं होनी चाहिए या फिर हमारे प्रियजन इस अपराध के हकदार हैं.

सुशांत के निधन पर जिस तरह की रिपोर्टिंग हुई है वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था, इसके बाद आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ गई. सुशांत के निधन के बाद छह लोगों की सुसाइड से मौत हो गई, जिनमें से चार नाबालिग थे. सेलिब्रिटीज़ या आइकॉन्स अगर सुसाइड करते हैं, तो मेंटल हेल्थ से लड़ रहे लोगों को ये अक्सर ट्रिगर करता है. क्या प्रेस इसकी ज़िम्मेदारी लेगा? सुसाइड के मामलों को कवर करने के लिए रिमाइंडर के तौर पर बार-बार गाइडलाइन्स जारी की गईं, लेकिन रिपोर्टिंग के सारे नियमों का उल्लंघन किया गया. उनके शव की तस्वीरें वॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हुईं. कथित तौर पर उनके सायकाइट्रिस्ट का स्टेटमेंट लीक हुआ और कई पोर्टल्स ने उसे पब्लिश किया. पुलिस को इस मामले में सामने आकर ये कहना पड़ा कि डॉक्टर का स्टेटमेंट दर्ज ही नहीं हुआ है, क्योंकि सोशल मीडिया डॉक्टर के खिलाफ लगातार बोल रहा था. तब फिर किसने उनके (मेंटल हेल्थ के संघर्ष की फिक्शनल बात लिखने का फैसला किया था? और अगर आप सच में फिक्शन लिखना चाहते हैं, तो फिर आप पत्रकार क्यों हैं?”

आगे ऋचा ने पैपराजी पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने लिखा,

“वही सेम जर्नलिस्ट काजोल की टीनेज बेटी की तस्वीरें लेने के लिए पैपराजीज़ को सड़कों पर भेजते हैं. वो तैमूर अली खान के पू (शौच) का रंग भी जानना चाहते हैं. ये पैपराजीज़ सड़कों पर आपका पीछा करते हैं, ताकि आपकी तस्वीरें लेकर न्यूज़पेपर्स और पोर्टल्स को बेच सकें. अगले दिन आप अपनी तस्वीर को पेज-3 पर देखते हो, आपको एक मोटे और गोल पेट वाला आदमी ‘फैशन कलप्रिट (अपराधी)’ कह रहा होता है, वो आदमी डोम्बिवली के अपने बंकर में बैठकर आपके लिए नफरत भरे मैसेज टाइप करता है और आपको बॉडी शेम करता है. उसे इस बात से नफरत होती है कि आपके कपड़े महंगे नहीं हैं. यहां कुछ अजीब तरह के लंपट ‘पैपराजी’ भी हैं, जो खुद कार के दरवाज़े के सामने खड़े हो जाएंगे, इस उम्मीद में कि कार से जब एक्ट्रेस उतरेगी तो उसके अंडरवियर का अच्छा शॉट मिल जाएगा. फिर वो इन वीडियो को #wardrobemishap के साथ यूट्यूब पर अपलोड करता है, और एक्ट्रेस के बॉडी पार्ट्स पर घेरा मार्क कर देता है.”

आगे ऋचा ने इन्हीं पैपराजी के लिए कहा कि अगर वो ये महसूस करते हैं कि उनकी जॉब उन्हें भ्रष्ट आदमी बना रही है, तो उसे छोड़ दें. इसके बाद उन्होंने जर्नलिज़्म की फील्ड में अच्छा काम कर रहे लोगों पर बात की. कहा,

“मीडिया में हर पांच बेईमान तत्वों के साथ ही, कुछ अच्छे लोग भी हैं, जो हर कठिनाइयों के सामने सही काम के लिए आवाज़ ऊंची करते हैं. वो उन मुद्दों पर बात करते हैं, जो हमारी इंसानियत के लिए खतरा हैं. वो उन विषयों पर बात करते हैं जो असहज हैं और जिन पर बात करने से रोका जाता है, कई बार अपने खुद के बॉस या स्टूडियो के फरमान के खिलाफ जाते हैं. उन्हें नियमित रूप से शक्तिशाली लोगों से ‘मानहानि के नोटिस’ मिलते रहते हैं. वो उम्मीद की किरण हैं.”

आगे फिर ऋचा ने आउटसाइडर्स वाले मुद्दे पर बात की. कहा,

“इस विषय में किसने सबसे पहले ‘आउटसाइडर’ शब्द का इस्तेमाल किया था, क्या ये आप मेरे लिए पता कर सकते हो? क्या ये कोई कैटेगिरी है या फिर विशेषण है? हम क्या हैं, एलियन्स? आप विदेशी नागरिकों को सचमुच स्वीकार कर लेते हो, और आप इंडियन्स को, अपने देश के लोगों को, जो किसी दूसरे शहर से आते हैं, उन्हें ‘आउटसाइडर्स’ कहते हो? ये एक ऐसा देश है, जहां टॉम अल्टर जैसे कलाकार हुए, जिनकी हिंदी और उर्दू में ऐसी पकड़ थी जिससे कई मौजूदा ‘एक्टर्स’ को शर्म आ जाए.”

फिर 2020 कैसा बीत रहा है, उस पर बात की. कहा,

“अगर वाकई साल 2020 एक तूफान है, तो उसे फिर हमारा रास्ता साफ करने दो. अगर इस इंडस्ट्री में कोई ठोस बदलाव लाना है तो फिर कई सारे मुद्दों पर चर्चा करने की ज़रूरत है. फैक्ट ये है कि छोटी फिल्मों के रिलीज़ के लिए पब्लिसिटी और एडवर्टाइज़िंग (P एंड A) के महंगे दाम बॉटलनेक यानी संकरे और ट्रैफिक भरे रास्ते की तरह काम करते हैं, यानी रोड़ा बनते हैं. इस मुद्दे पर बहस हुई है लेकिन कभी निपटारा नहीं किया गया. यहां किसी भी स्तर का खेल का मैदान नहीं है, केवल प्रतिस्पर्धी विज्ञापनों का स्कैम है. कई बार किसी छोटी फिल्म के प्रचार-प्रसार और रिलीज़ का दाम उसके प्रोडक्शन की कीमत से भी ज्यादा हो जाता है. इस वक्त वास्तव में हमें चेन्नई में स्थित अपनी सिस्टर फिल्म इंडस्ट्री को देखकर उससे सीखना चाहिए. इसके अलावा सिनेमाहॉल में फिल्मों के टिकट पर भी कैप प्राइस (निश्चित दाम) होना चाहिए. किसी भी OTT प्लेटफॉर्म से कहीं ज्यादा, ये चीज़ फिल्मों को मार रही है. हमें एक ऐसे इको-सिस्टम की ज़रूरत है, जहां राइटर्स और डायरेक्टर्स को सबसे ज्यादा महत्व मिले. हमने हाल ही में देखा है कि बॉक्स ऑफिस या स्मॉल स्क्रीन पर ‘कंटेंट ही किंग’ है. तो फिर ये कोरोनेशन (राज-तिलक, यहां पर डायरेक्टर्स और राइटर्स को मिलने वाली तवज्जो से मतलब है) शिड्यूल में पीछे क्यों होता जा रहा है? हमें वास्तविक तौर पर, जीवंत रूप में लैंगिक समानता (जेंडर इक्विलिटी) की ज़रूरत है. ‘फेमिनिज़्म (नारीवाद)’ शब्द को मेंशन करने भर से लोगों के मुंह से झाग निकलने लगता है, यानी लोगों को ये व्यर्थ की बात लगती है, तो क्या ये बताने के लिए कि हम एक सेक्सिस्ट सोसायटी या इंडस्ट्री में काम करते हैं, किसी सबूत की ज़रूरत है? लैंगिक समानता आधार है और इस पर समझौता नहीं होगा. हमें स्टंट आर्टिस्ट्स और लाइट मैन के लिए भी अच्छे इंश्योरेंस की ज़रूरत है.”

इसके बाद ऋचा ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में जो भी मुद्दे हैं, उन्हें ठीक करने की ज़रूरत है. इन्हें ठीक करने के लिए बाहर कोई सिस्टम मौजूद नहीं है, इन्हें इंडस्ट्री के अंदर के लोग ही फिक्स कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि दूसरों की उपलब्धि में खुश होने के लिए अपने दिलों को खोलने की ज़रूरत है, न कि उनकी नाकामी से खुश होना है. उन्होंने आखिरी में लिखा,

“अगर हम इंडस्ट्री को ज़हरीला कहते रहे, तो हमें ये भी देखना चाहिए कि इस ज़हरीलेपन का सोर्स क्या है. आइने में देखो और सबसे पहले पता लगाओ कि कहीं आप खुद तो नहीं हो.”

आखिरी में फिर ऋचा ने साहिर लुधियानवी के उसी गाने की आखिरी लाइनें लिखीं-

“जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
जला दो, जला दो, जला दो”

ऋचा का ये ब्लॉग इस वक्त काफी लोग पढ़ रहें. उन्होंने इसमें करीब-करीब सारे मुद्दों को कवर करने की कोशिश की है. इस ब्लॉग के साथ ही उन्होंने सुशांत के साथ की अपनी एक प्यारी सी तस्वीर भी पोस्ट की है.


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