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फिल्म रिव्यू - बायोस्कोपवाला

1892 में रवींद्रनाथ टैगोर ने एक कहानी लिखी. काबुलीवाला. घर-घर घूमकर मेवा बेचने वाले एक अफ़गानी शख्स की एक पांच साल की भारतीय बच्ची से आत्मीयता की कहानी. भावनाओं से भरपूर. इस कहानी पर 1957 में बांग्ला में और 1961 में हिंदी में फ़िल्में भी बनी. इसी कहानी को विस्तार देते हुए डायरेक्टर देब मेधेकर एक उम्दा फिल्म लेकर आए हैं. नाम है ‘बायोस्कोपवाला’.

फिल्म का पोस्टर.
फिल्म का पोस्टर.

कहानी से शुरू करते हैं. एक फैशन फोटोग्राफर हैं. रोबी बासु. काबुल की फ्लाइट पकड़ रहे हैं. फ्लाइट पर चढ़ने से पहले अपनी बेटी से बात करना चाहते हैं. नहीं हो पाती. एक लैटर लिखकर प्लेन पकड़ लेते हैं. प्लेन क्रैश हो जाता है. बेटी मिनी जो कि पैरिस में पढ़ रही है, वो कोलकाता लौटती है. यहां आकर पता चलता है कि मरने से पहले पिता ने एक कैदी को रिहा कराकर उसकी कस्टडी लेने के लिए दस साल तक जंग लड़ी थी. वो कस्टडी अब जाकर मिली है और अल्जाइमर से पीड़ित एक बूढा आदमी अब मिनी की ज़िम्मेदारी है. इस बदमज़ा ज़िम्मेदारी से मिनी चिढ़ी हुई है. उसका रवैया तब बदलता है जब उसे पता चलता है कि ये आदमी और कोई नहीं उसके बचपन का बायोस्कोपवाला है.

वो बायोस्कोपवाला जिसने, बकौल खुद मिनी के. उसे कहानी कहना सिखाया था. जो अफ़ग़ानिस्तान से आया था. और जो मर्डर के इल्ज़ाम में जेल काट रहा था. अब मिनी के सामने कुछ सवाल हैं. क्यों उसके पिता काबुल जा रहे थे? बायोस्कोपवाले रहमत ख़ान का परिवार कहां है? क्या वाकई मर्डर रहमत ख़ान ने ही किया था? अगर हां तो क्यों? रहमत ख़ान की बेटी राबिया की क्या मिस्ट्री है? और सबसे बड़ा सवाल ये कि आगे मिनी क्या करें? सवालों के जवाब तलाशती मिनी कोलकाता के रेड लाइट एरिया सोनागाछी से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक भटकती है. इसी क्रम में बायोस्कोपवाले की ज़िंदगी कई लोगों की यादों के सहारे परत दर परत खुलती जाती है. इनमें शामिल है सोनागाछी का एक दलाल, वहीदा और ग़ज़ाला नाम की वो दो औरतें जो रहमत के साथ अफ़ग़ानिस्तान से आई थीं, रवि बासु की डायरी, उनका आखिरी ख़त और मिनी की यादें.

इस किरदार के लिए डैनी से बेहतर कोई नहीं हो सकता था.
इस किरदार के लिए डैनी से बेहतर कोई नहीं हो सकता था.

बायोस्कोपवाला कई मायनों में एक बेहद सुंदर फिल्म है. विजुअली भी और सिनेमाई अनुभव के नज़रिए से भी. मैं आपको तीन चीज़ें बताता हूं जिसकी वजह से ये फिल्म आपको कतई मिस नहीं करनी चाहिए.

# पहली वजह – डैनी के लिए. ये फिल्म देखकर एक सवाल आप ज़रूर पूछेंगे कि डैनी ज़्यादा फ़िल्में क्यों नहीं करते? रहमत ख़ान का किरदार उन्होंने निभाया नहीं जिया है. अपनी मिट्टी से दरबदर, वतन से दूर एक शख्स की ज़हनी हालत को डैनी ने बेहतरीन तरीके से पेश किया है. मिनी में अपनी बेटी का अक्स ढूंढता रहमत ख़ान, साथी महिलाओं की हिफाज़त के लिए जान दांव पर लगाता रहमत ख़ान, एक कपड़े के टुकड़े पर अपनी बेटी की हथेलियों की छाप लिए घूमता रहमत ख़ान, बच्चों को बायोस्कोप पर चलचित्र दिखाकर सच्ची ख़ुशी बटोरता रहमत ख़ान. हर एक फ्रेम में डैनी सिर्फ और सिर्फ रहमत ख़ान लगे हैं. उन्हें ढेर सारा काम करना चाहिए.

मिनी के साथ रहमत ख़ान.
मिनी के साथ रहमत ख़ान.

# दूसरी वजह – ये अनुभव हासिल करने के लिए कि साहित्य को किस तरह परदे पर उतारा जाए. डायरेक्टर देब मेधेकर लिबर्टी लेते हुए कुछ बदलाव तो करते हैं लेकिन टैगोर की कहानी की आत्मा पर कोई दाग नहीं लगाते. ये कहानी उसी संजीदगी से परदे पर उतारी गई है जिस संजीदगी से टैगोर ने उसे लिखा था. कहानी में मौजूद तमाम भावनात्मक उतार-चढ़ाव सिनेमा में तब्दील होते वक़्त कतई कम नहीं हुए हैं. बल्कि इम्प्रोवाईजेशन से और भी निखर गए हैं.

# तीसरी और सबसे बड़ी वजह ये कि ऐसी छोटी फिल्मों का हौसला बना रहना चाहिए. इनको देखा-दिखाना चाहिए. इनकी चर्चा होनी चाहिए. ऐसी फ़िल्में ज़्यादा देखी जाएंगी तभी और बनेंगी.

गीतांजलि थापा के करियर में ये फिल्म चार चांद लगाएगी.
गीतांजलि थापा के करियर में ये फिल्म चार चांद लगाएगी.

डैनी के अलावा अगर किसी की मुंह भर के तारीफ़ होनी चाहिए तो वो हैं गीतांजलि थापा. रहमत से अपनी बॉन्डिंग को जीती और उसके लिए परेशान होती मिनी को गीतांजलि थापा ने बेहद उम्दा ढंग से निभाया है. अपने पिता के छोड़े हुए काम को पूरा करने में मिनी अपनी जान झोंक देती है. यकीनन गीतांजलि थापा के करियर में ये फिल्म मील का पत्थर साबित होगी. छोटी मिनी की भूमिका में मिराया सूरी बेहद क्यूट लगी हैं. आदिल हुसैन कुछेक सीन में भी अपनी मौजूदगी पूरी ताकत से दर्ज करा जाते हैं. उनके कद के एक्टर से ये अपेक्षित भी था.

आदिल हुसैन ने वही किया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं, अच्छी एक्टिंग.
आदिल हुसैन ने वही किया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं, अच्छी एक्टिंग.

टिस्का चोपड़ा, ब्रिजेंद्र काला, माया सराओ, एकावली खन्ना सब अपनी जगह परफेक्ट हैं. सिनेमेटोग्राफी की ख़ास तारीफ़ बनती है. चाहे नब्बे के दशक का कोलकाता हो या अफ़ग़ानिस्तान की हॉन्टेड खूबसूरती. सब परदे पर बेहद कलात्मक ढंग से दिखता है. फिल्म में सिर्फ एक गाना है जो बेहद शानदार है. गुलज़ार के लिखे लफ़्ज़ों को के मोहन ने असरदार तरीके से गाया है. आप थिएटर से निकलकर पहले ये गाना ही डाउनलोड करते हैं.

सुन लीजिए गाना:

डायरेक्टर देब मेधेकर की ये पहली फिल्म है. पहली ही फिल्म में उन्होंने एक बेहद मशहूर साहित्यिक कृति के साथ न्याय करने जैसा कारनामा कामयाबी से कर दिखाया है. उनको बधाई और बड़ा वाला थैंक यू भी.

फिल्म का ट्रेलर:


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