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जब एक पत्रकार ने तीखे सवाल पूछे तो नेताजी ने उसको उठवा लिया

मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ ‘चला चित्रपट बघूया’ (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए.
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आज की फिल्म है ‘त्या रात्री पाउस होता’. जिसका मतलब है, उस रात बारिश थी.

कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो दिलचस्प कहानी से ज़्यादा, ज़बरदस्त परफॉरमेंसेस के लिए याद रखी जाती हैं. ‘त्या रात्री पाउस होता’ एक ऐसी ही फिल्म है. सयाजी शिंदे, सोनाली कुलकर्णी, अमृता सुभाष, सुबोध भावे जैसे शानदार एक्टर्स, एक दिलचस्प कहानी को किसी अलग ही लेवल पर ले जाकर रखते हैं. महज़ अपने अभिनय से. मैं कह क्या रहा हूं ये समझने के लिए आपको एक बार ये फिल्म देखनी पड़ेगी बॉस. 2009 की फिल्म है और काफी सारे ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध है.

एक रात की कहानी

कहानी महज़ एक रात की है. वो रात जो फ्लैशबैक से तार जोड़ते हुए एक पावरफुल घटनाक्रम के तौर पर खुलती जाती है. किसी नेता का एक फार्म हाउस है. वहां रात के अंधेरे में एक गाड़ी आकर रुकती है. कुछ गुंडेनुमा लोग एक आदमी को गाड़ी से निकालते हैं, बंगले के केयरटेकर को सौंपते हैं और भागने न देने की चेतावनी देकर चले जाते हैं. पता चलता है कि भयंकर ज़ख़्मी वो आदमी एक पत्रकार है. किसी रैली में एक नेताजी से तीखे सवाल पूछ लिए, तो नेताजी ने उठवा लिया. अब दिन निकलने पर नेताजी आकर फैसला करेंगे. तब तक पत्रकार को भागने नहीं देना है.

ये फिल्म एक रात की कहानी है, जो एक निर्भीक पत्रकार पर भारी पड़ने वाली है.
ये फिल्म सिर्फ एक रात की कहानी है, जो एक निर्भीक पत्रकार पर भारी पड़ने वाली है.

कुछ समय बाद फार्म हाउस पर एक लड़की भी आती है. ड्रग एडिक्ट, गालीबाज़ लड़की. उस लड़की का नेता से कुछ कनेक्शन है. पत्रकार से भी कुछ कनेक्शन है. वो कनेक्शन क्या है इसी सवाल का धीरे-धीरे जवाब देते हुए फिल्म आगे बढती रहती है. और आप देखते हैं एक सोशियो-पॉलिटिकल थ्रिलर जो टॉप क्लास एक्टिंग के चलते एक विजुअल ट्रीट बन जाता है. तमाम सस्पेंस ख़त्म करना चाहते हैं, तो खोजकर फिल्म देख डालिए.

दी सयाजी शिंदे

वैसे तो ये फिल्म देखे जाने की बहुत सी वजहें हो सकती हैं लेकिन अगर सिर्फ एक बतानी हो, तो मैं कहूंगा ‘दी सयाजी शिंदे’ की रोंगटे खड़े कर देने वाली एक्टिंग के लिए देखिए. पूरी फिल्म पर सयाजी छाए हुए हैं. अपनी देहबोली से, अपनी डायलॉग डिलीवरी से वो आपके बदन में अक्सर सिहरन पैदा कर देते हैं. एक सीन है जिसमें सयाजी, सोनाली कुलकर्णी को मोलेस्ट करते हैं. उस सीन में परदे पर कुछ भी ऐतराज़ के काबिल नहीं होता लेकिन सयाजी अपनी संवाद अदायगी से दर्शकों के मन में डर और चिढ़ दोनों पैदा कर देते हैं. वो सीन उनकी अदाकारी की सुपर हाई क्वालिटी का सिग्नेचर है. इतना ज़बरदस्त कि महज़ उस एक सीन के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है.

सयाजी शिंदे महज़ अपनी देहबोली से दर्शकों को डरा देते हैं.
सयाजी शिंदे महज़ अपनी देहबोली से दर्शकों को डरा देते हैं.

सयाजी शिंदे का टैलेंट देखते हुए हैरानी होती है कि उन्हें हिंदी वालों ने ज़्यादा इस्तेमाल कैसे नहीं किया? बावजूद इसके कि हिंदी के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने ‘शूल’ के बच्चू यादव जैसी कमाल की परफॉरमेंस दी थी. विधानसभा में बिजली प्रोजेक्ट का विरोध करने वाला नेता याद ही होगा आपको. जो इसलिए बिजली नहीं बनने देना चाहता था क्योंकि पानी में से बिजली निकालेंगे तो किसानों की फसल कैसे होगी? उस जैसी टॉप क्लास अदाकारी के बाद भी हिंदी वालों से सयाजी की प्रतिभा का ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाया. यूं तो वो आज भी हिंदी फ़िल्में करते हैं लेकिन इक्का-दुक्का रोल छोड़ दिए जाएं, तो हिंदी वाले उन्हें साइडकिक की तरह ही ट्रीट करते हैं. जबकि उस आदमी का कैलिबर बहुत आला दर्जे का है.

बहरहाल, फिल्म पर वापस लौटते हैं.

सहज सोनाली, अप्रतिम अमृता

सयाजी के बाद अगर किसी का काम याद रहता है तो वो है फिल्म की दोनों एक्ट्रेसेस. अमृता सुभाष ने दमदार रोल निभाया है. एक ड्रग एडिक्ट लड़की जो नेताजी का खिलौना बनने को अभिशप्त है. अपने पास्ट से, अपने पिता से खफा ये लड़की क्लाइमैक्स में आपको हिलाकर रख देगी. चाहे बोल्ड सीन हो या इमोशनल, अमृता ने सब सहजता से कर दिखाया है. सोनाली कुलकर्णी भी पावरफुल लगी हैं. उन्होंने एक टैलेंटेड, मेहनती इंजीनियर गायत्री का रोल किया है. जिसपर नेताजी की बुरी नज़र पड़ गई है. नेता के कमीनेपन से जूझती, पॉलिटिक्स के बखिए उधेड़ती गायत्री, सोनाली ने कामयाबी से परदे पर उतारी है.

सोनाली कुलकर्णी ने साबित किया है कि क्यों वो मराठी फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा नाम हैं.
सोनाली कुलकर्णी ने साबित किया है कि क्यों वो मराठी फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा नाम हैं.

पत्रकार का रोल सुबोध भावे के हिस्से आया है. जो उन्होंने ठीक-ठाक ढंग से किया. एक सीन है जब उन्हें बरसों बाद अपनी बिछड़ी मां की मौत का घटनाक्रम पता चलता है. उस एक सीन में उनकी एक्टिंग अप्रतिम है. उस एक सीन भर से वो अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.

क्रूर तानाजी

अब बचा फिल्म का एक्स फैक्टर. फार्म हाउस का केयरटेकर तानाजी. नेताजी का ट्रबलशूटर. उनके हुक्म पर कुछ भी करने को तैयार ये आदमी, अब तक पांच ख़ून कर चुका है. मिलिंद शिंदे ने तानाजी का रोल बला की कन्विक्शन से निभाया है. एक ऐसा आदमी जो ज़िंदगी-मौत की बहस के पार है. जितनी क्रूरता से मर्डर करता है, उतनी ही उत्कटता से गाने भी गाता है. मिलिंद ने ये सब ग़ज़ब की डिटेलिंग के साथ परदे पर पेश किया है. एक सीन है. जिसमें नेताजी उसे पत्रकार को ठिकाने लगाने का हुक्म सुनाते हैं. तानाजी कहता है,

‘हड्डियों का चूरा पोल्ट्री में डाल दूंगा, गोश्त केले के बाग़ में और दिमाग तेज़ है सो उसे मछलियों को खिला दूंगा.’

इतना क्रूर वर्णन तानाजी इतनी सहजता से सुनाता है जैसे परचून की दुकान से सामान खरीदने वाला हो. मिलिंद ने इस सीन में जान डाल दी है. या शायद दर्शकों की जान निकाल दी है. उनकी भरपूर तारीफ़ होनी चाहिए.

मिलिंद शिंदे ने तानाजी के क्रूर रोल में ग़ज़ब की परफॉरमेंस दी है.
मिलिंद शिंदे ने तानाजी के क्रूर रोल में ग़ज़ब की परफॉरमेंस दी है.

फिल्म का एक गाना याद रह जाता है. बारिश का गाना जो करंट रात में स्थिति की भयानकता बताता है, तो वही फ्लैशबैक के सुनहरे दिन भी याद करता है. एक जैसे लिरिक्स से दो भाव व्यक्त हो जाते हैं. बहुत बढ़िया प्रस्तुति है ये.

अलग, हटके कहानियों पर फिल्म बनाने के लिए मशहूर डायरेक्टर गजेंद्र अहिरे ने इस फिल्म में थ्रिल की मात्रा बढ़िया ढंग से संभाली है. फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती. उत्सुकता बनी रहती है. ढेर सारे अवार्ड्स से नवाज़े जा चुके गजेंद्र अहिरे का ये एक और उम्दा काम है. समय निकालकर ज़रूर देखिए.


‘चला चित्रपट बघूया’ वीडियो:

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