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एक तवायफ, एक सैनिक, एक मज़दूर, एक पोस्टमैन और तीन ख़त

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मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ ‘चला चित्रपट बघूया’ (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए.
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आज की फिल्म है ‘पोस्टकार्ड’.

उस वक्त की कहानी जब सूचनाएं और भावनाएं दूरभाष की तरंगों के सहारे नहीं, बल्कि कागज़ पर लिखे शब्दों में लपेटकर एक्सचेंज हुआ करती थीं. जब एक ख़त का आना उम्मीदों का आना हुआ करता था. जब ये सुविधा नहीं थी कि जेब से मोबाइल निकाला और खटाक से नंबर डायल कर बात कर ली. तब कागज़ पर सियाही से हर्फ़ उकेरे जाते थे जो संदेसा बनकर डिलीवर हुआ करते थे. सुख-दुःख का समाचार एक्सचेंज करने के लिए जो एक चीज़ खासोआम सबके इस्तेमाल में आती थी, वो थी पोस्टकार्ड. इसी पोस्टकार्ड के इर्दगिर्द बुनी गई तीन कहानियों का गुलदस्ता है ये फिल्म.

साठ के दशक का भारत. एक पोस्टमैन है जो अपनी सायकल पर रोज़ाना न जाने कितने ही पैगाम अपनी मंज़िल तक पहुंचाते रहता है. किसी के द्वारे ख़ुशी की ख़बर पहुंचाता है तो कहीं दुःख का संदेसा. पोस्टमैन की एक पत्नी भी है. जिसका शौक है पति के झोले में से लोगों के पोस्टकार्ड्स निकाल कर पढ़ना. यूं वो तमाम पत्रलेखकों के सुख-दुख से वाकिफ होती रहती है. पोस्टमैन के इस रोज़ाना के काम में तीन कहानियां ऐसी घटती हैं जिन्हें वो कभी भुला नहीं पाता.

पोस्टमैन, सुख-दुख की सूचनाओं का हरकारा.
पोस्टमैन, सुख-दुख की सूचनाओं का हरकारा.

पहली कहानी है भिकाजी काळे नाम के एक सॉ मिल वर्कर की. जो दिन भर लकड़ियां चीरकर पैसे इकट्ठा कर रहा है. अपने घर जाने के लिए. उसे अपना बुढ़ापा अपने परिवार में काटना है. पर मालिक के हज़ार रुपए चुकाए बिना वो जा नहीं सकता. अपनी उम्र के हिसाब से जितना काम वो कर पाता है उतना तो उसके रहने खाने में ही खर्च हो जाता है. हज़ार रुपए जुटे भी तो कैसे? तो अंकल जी भगवान को ख़त लिखते हैं. इस उम्मीद में कि भगवान पैसे भेजेगा. किसी और युग में ये मुमकिन भले ही होता हो, कलियुग में कहां हो पाएगा? सो न ख़त का जवाब आता है, न पैसे. बूढ़े बाबा की याचना में करुणा की मात्रा दिन ब दिन बढ़ती जाती है. जो भगवान तक तो नहीं लेकिन पोस्टमैन और उसकी पत्नी तक ज़रूर पहुंचती है. फिर आगे जो होता है वो आपको प्रेडिक्टेबल लगेगा, लेकिन है नहीं. आप बरसों बरस से सुने एक चुटकुले जैसा इस कहानी का भी हश्र समझ रहे हैं तो एक सरप्राइज़ मिलेगा आपको.

दूसरी कहानी में एक बाप की अपनी बेटी से मिलने की छटपटाहट है. पोस्टमैन जिस लड़कियों के स्कूल में ख़त देने जाता है, वहीं पर ये लड़की पढ़ती है. और उसी स्कूल के गेट के आसपास भटकता रहता है ये बाप. जो सेना का जवान है और ख़ास अपनी बिटिया से मिलने बॉर्डर से लौटा है. वो पोस्टमैन के हाथ ख़त तो भेजता है लेकिन खुद स्कूल के अंदर नहीं जाता. क्यों? ऐसा क्या रहस्य है उसका, जिसकी वजह से पोस्टमैन को अपना काम छोड़कर किसी की तलाश में निकलना पड़ता है?

तीसरी कहानी में गुलज़ार नाम की एक तवायफ अपने प्रेमी के ख़त का इंतज़ार कर रही है. ऐसा ख़त जो उसकी रिहाई का परवाना होगा. तो क्या पोस्टमैन उसकी इस ख़ुशी का हरकारा बन पाता है? इन तमाम सवालों के जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

गुलज़ार, जिसका भविष्य एक ख़त के आने की उम्मीद पर अटका है.
गुलज़ार, जिसका भविष्य एक ख़त के आने की उम्मीद पर अटका है.

‘पोस्टमैन’ एक ऐसी फिल्म है जो सीन दर सीन आपको लुभाते चलती है. कितने ही सीन हैं जो आपके ज़हन में रच बस जाते हैं. जैसे गुलज़ार का तपती धूपी में डाकिए के पीछे भागना. या फिर अपने मालिक की बेईमानी के बाद भिकाजी की देहबोली में बदलाव आना. इस फिल्म की कास्टिंग भी इसका बेहद स्ट्रोंग पॉइंट है. एक से बढ़कर एक कलाकार. सुबोध भावे, विभावरी देशपांडे, किशोर कदम, सई ताम्हणकर. लेकिन सबसे ज़्यादा संतुष्ट करते हैं दिलीप प्रभावळकर, राधिका आपटे और गिरीश कुलकर्णी.

दिलीप प्रभावळकर लगभग चार दशकों से मराठी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रीय हैं. उनका ये विशाल अनुभव उनके अभिनय में भी दिखता है. जब भी आपको लगता है कि आपने उनकी एक्टिंग के सारे रंग देख लिए हैं, वो आपको चौंका देते हैं. बूढ़े मज़दूर के इस रोल में उन्होंने अपना सारा हुनर भर दिया है. राधिका आपटे के लिए तो गुलज़ार का किरदार एकदम टेलरमेड था. एक बेचैन, बेबस तवायफ की जद्दोजहद उन्होंने बला की खूबसूरती से परदे पर पेश की है. उनका हंसना-रोना, उनका अंतर्द्वंद सिर्फ परदे तक सीमित नहीं रहता, वो आप तक भी पहुंचता है. ख़ास तौर से उनकी वो करुण पुकार, “कासिद मेरा ख़त”…

एक मामूली पोस्टमैन एक तवायफ की क्या मदद कर सकता है?
एक मामूली पोस्टमैन एक तवायफ की क्या मदद कर सकता है?

गिरीश कुलकर्णी के तो क्या ही कहने! वो मराठी फिल्म इंडस्ट्री के हाथ लगा कोहिनूर हैं. चाहे ‘देऊळ’ जैसी फिल्म हो या ‘गाभ्रीचा पाउस’. वो सब कुछ झोंककर एक्टिंग करते हैं. उनका निभाया पोस्टमैन उनकी इस ख़ासियत की एक और मिसाल है. नर्मदिल, संवेदनशील, हर एक की मदद करने को तत्पर पोस्टमैन जो अपनी सीमाओं से परे जाकर भी किसी के काम आता है. गिरीश कुलकर्णी ने इस किरदार को निभाने में वही किया है, जिसे करने में अब वो महारत हासिल कर चुके हैं. बिना किसी एक्स्ट्रा एफर्ट के क्वालिटी एक्टिंग.

गजेंद्र अहिरे का डायरेक्शन तमाम मानवीय संवेदनाओं के साथ पूरा न्याय करता हैं. उनकी ह्यूमन सायकॉलजी पर पूरी-पूरी पकड़ दिखाई देती है. उनके किरदार एब्नार्मल बिहेव नहीं करते. वो उतने ही अच्छे-बुरे हैं जितने हम और हमारे आसपास के लोग होते हैं. डायरेक्टर को एक और बात के लिए ख़ास शाबाशी कि उन्होंने विषय की सिंप्लिसिटी को मरने नहीं दिया है. जो भी परदे पर घटता है उसमें सहजता, सादगी बरकरार रहती है.

‘पोस्टकार्ड’ ऐसी फिल्म है जो आपको समय निकालकर देखनी ही चाहिए. ख़ास तौर से उन्हें जो व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजने के बाद दो मिनट में अगर ब्लू टिक न मिले तो बेचैन होने लगते हैं. कोई ख़त भेजकर हफ़्तों उसके जवाब का इंतज़ार करने में जो कसक हुआ करती थी उसे छू आने का ज़रिया है ये फिल्म. ज़रूर देखिएगा.


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