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फिल्म रिव्यू: 'नाळ'

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मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ ‘चला चित्रपट बघूया’ (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए.
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आज फॉर अ चेंज एक नई फिल्म ‘नाळ’ की बात करेंगे. नागराज मंजुळे मराठी सिनेमा का बड़ा नाम बन चुके हैं. उनके हर प्रोजेक्ट पर दर्शकों की नज़र रहती है. भले भी फिर वो किसी फिल्म के डायरेक्टर न हो, प्रोड्यूसर के तौर पर उनका जुड़ना भी फिल्म के लिए पर्याप्त अटेंशन बटोर लेता है. ‘नाळ’ में आपकी शुरूआती दिलचस्पी महज़ इसीलिए होती है कि इसे नागराज ने प्रड्यूस किया है. लेकिन सिर्फ यहीं तक. इसके बाद फिल्म अपना जलवा आप लुटाती है.

‘नाळ’ कहानी है एक बच्चे चैतन्य भोसले की. चैतन्य अपने माता-पिता के साथ एक दूर दराज़ के गांव में रहता है. यहां दूर-दराज़ सिर्फ कहने के लिए नहीं कहा है. वाकई बड़ी दूर है ये जगह. यहाँ यहां पहुंचने के लिए ट्रेन, बस, नाव और बैलगाड़ी ये चारों साधन इस्तेमाल करने पड़ते हैं. चैतन्य उर्फ़ चैत्या की ज़िंदगी का एक सेट पैटर्न है. रोज़ सुबह उठना, मुर्गियों को दड़बे से बाहर निकालना, टमटम से स्कूल जाना, दोस्तों के साथ खेलना, नदी पर मटरगश्ती करना और बचा हुआ सारा समय मां के इर्द-गिर्द घूमना. इतने सुंदर आईने पर एक मेहमान के रूप में पत्थर आ लगता है.

फिल्म का पोस्टर.
फिल्म का पोस्टर.

चैत्या का मामा थोड़े समय के लिए उसके घर आता है और जाते-जाते उसकी छोटी सी दुनिया में भूकंप छोड़ जाता है. वो चैत्या को बता जाता है कि जिसे वो अपनी मां समझ रहा है, वो उसकी मां है ही नहीं. इन लोगों ने तो उसे गोद ले रखा है. उसकी असली मां तो कहीं और है. चैत्या की मासूम दुनिया के लिए ये शॉक विध्वंसकारी साबित होता है. एक मासूम बच्चा कैसे इस असहज सिचुएशन से निपटता है इसका खूबसूरत प्रेज़ेंटेशन है ‘नाळ’. चैत्या का अपनी मां के साथ रिश्ता क्या शक्ल लेता है, क्या मुहब्बत नफ़रत में बदलती है, असली मां की तलाश में ये मासूम क्या कदम उठाता है ये सब फिल्म देखकर जानिएगा.

‘नाळ’ उस तरह की फिल्म है जो आपको अच्छा फील करवाती है. जो आपको एहसास करवाती है कि बच्चे सिर्फ बड़ों के इर्द-गिर्द धूम मचाती भीड़ नहीं होते. वो भी चीज़ों को, रवैयों को महसूस करते हैं. उन्हें अपने हिसाब से एनलाइज़ करते हैं. अपनी व्याख्या बनाते हैं और फिर वैसा ही रिएक्शन देते हैं. उनकी दुनिया में एक खिड़की खोलने की कोशिश डायरेक्टर सुधाकर रेड्डी यकंट्टी ने की है और ये कोशिश बेहद कामयाब रही है.

चैतन्य.
चैतन्य.

अभिनय की बात की जाए तो फिल्म की स्टार अट्रैक्शन चैत्या का किरदार निभाने वाले श्रीनिवास पोकळे हैं. उनके फेशियल एक्सप्रेशंस इतने बैंग ऑन हैं कि आप उनके सीन में चलता सिनेमा पॉज़ करने की ख्वाहिश करने लगते हैं. उनकी एक्टिंग में इतनी सहजता है कि लगता ही नहीं उन्हें आसपास कैमरा होने का भान होगा. ऐसी एक्टिंग इन बिल्ट होती है, इसे सिखाया नहीं जा सकता. खासतौर से क्लाइमेक्स सीन में तो आपका मन करता है दौड़कर इस बच्चे को गले लगा लें.

श्रीनिवास के बाद अगर आप किसी से प्रभावित होते हैं तो वो हैं देविका दफ्तरदार. चैत्या की मां के रोल में उन्होंने इमोशंस का समंदर उड़ेल दिया है. कितने ही सीन ऐसे हैं जहां उनके हिस्से संवाद नहीं आए हैं लेकिन वो महज़ आंखों से या देहबोली से परफेक्ट भाव डिलीवर करती हैं. ‘ देवराई’, ‘नितळ’ जैसी फिल्मों के बाद ये उनकी एक और जानदार परफॉरमेंस है.

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नागराज मंजुळे ने न सिर्फ फिल्म प्रड्यूस की है बल्कि डायलॉग भी लिखे हैं और चैत्या के पिता का रोल भी किया है. अपना काम वो पूरी ज़िम्मेदारी से करते हैं. ओम भुतकर के हिस्से जो दो सीन आए हैं उसमें उन्होंने मज़ा दिला दिया है. चिड़चिड़ी दादी रोल सेवा चौहान ने परफेक्शन से निभाया है. दीप्ति देवी क्लाइमेक्स में कुछ समय के लिए आती हैं और तूफानी प्रभावित कर जाती है.

अब बात डायरेक्टर की. सुधाकर रेड्डी यकंट्टी यूं तो ‘सैराट’, ‘देऊळ’ जैसी फिल्मों में अपने शानदार कैमरा वर्क के लिए पहले से मशहूर हैं. पहली बार उन्होंने डायरेक्टर की सीट संभाली है. और पहली ही बार में उन्होंने तृप्त करने वाली फिल्म दी है. जिस परिपक्वता से उन्होंने चाइल्ड साइकोलॉजी जैसा सब्जेक्ट हैंडल किया है वो काबिलेतारीफ़ है. बिना किसी मेलोड्रामा का तड़का लगाए वो पूरी ज़िम्मेदारी से अपनी बात कहते नज़र आते हैं. जैसे मां और बच्चे की बॉन्डिंग हाईलाइट करने के लिए उन्होंने एक भैंस और उसके मर चुके बच्चे के प्रतीक का इस्तेमाल किया है. ये ट्रैक बहुत ही सुंदर लगता है.

देविका दफ्तरदार.
देविका दफ्तरदार.

कैमरा वर्क तो इस फिल्म में भी अप्रतिम है. ग्रामीण भारत की सुंदरता को बेहद खूबसूरती से कैमरे में कैद किया गया है. गांव और नदी के एरियल शॉट्स देखकर मन करता है एक दिन की छुट्टी लें और वहां जाकर रह आएं.

कुल मिलाकर ‘नाळ’ एक बेहद संतुष्ट करने वाला अनुभव है. समय निकालिए और ज़रूर-ज़रूर देख आइए.

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Review of Marathi Movie Naal directed by sudhakar reddy yakkanti and produced by Nagraj manjule

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