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उस कटार की कहानी, जिससे किया हुआ एक ख़ून माफ था

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मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ ‘चला चित्रपट बघूया’ (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए.
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मराठी में जो जलवा आज फिल्मों का है, वो कभी नाटकों का हुआ करता था. मराठी रंगमंच एक ऐसी खान है जिसने अभिनय की दुनिया को ढेर सारे नगीने दिए हैं. और ये मुमकिन हो पाया मराठी रसिकों की मेहरबानी से. जिन्होंने प्लेज़ को भरपूर स्नेह दिया. कितने ही नाटक ऐसे रहे जिनपर दर्शकों ने दिल खोलकर प्यार लुटाया. ऐसा ही एक अप्रतिम संगीत नाटक था ‘कट्यार काळजात घुसली’. यानी कटार कलेजे में घुस गई. पुरुषोत्तम दारव्हेकर की कलम और पंडित जितेंद्र अभिषेकी के संगीत की शानदार जुगलबंदी. ज़बरदस्त कामयाबी मिली थी इस नाटक को. 2015 में इस पर इसी नाम से एक फिल्म बनी. आज बात इसी फिल्म की.

कहानी कटार की

फिल्म की कहानी उस वक़्त की है जब अंग्रेज़ अभी भारत में ही थे. राजे-रजवाड़े अभी हुआ करते थे. विश्रामपुर नाम की एक रियासत के राजा गीत-संगीत के बड़े कद्रदान थे. राजगायक थे पंडित भानुशंकर शास्त्री. जितने अच्छे गायक उतने ही शानदार व्यक्ति. सुरों पर तगड़ी पकड़ और दिल दरिया जितना विशाल. एक बार मिरज गए गाना गाने. वहां आफताब हुसैन खान साहब टकरा गए. खां साहब भी बेमिसाल गायक हैं. बस कद्रदानों की कमी से जूझ रहे हैं. पंडित जी उन्हें अपनी रियासत आने का न्यौता देते हैं. खां साहब आ भी जाते हैं.

पंडित जी और खान साहब.
पंडित जी और खान साहब.

विश्रामपुर में दशहरे पर गायकी का कम्पटीशन होता है. जीतने वाले को भरपूर इनाम और राज गायक का पद मिलता है. साथ ही एक बेहद खूबसूरत कटार भी दी जाती है. उस कटार से किया हुआ एक खून भी माफ़ होता है. कम्पटीशन में खां साहब भी हिस्सा लेते हैं लेकिन जीतते हैं पंडित भानुशंकर शास्त्री जी. एक बार नहीं बार बार. हर साल. हार से बौखलाए खां साहब नैतिक-अनैतिक का फर्क भूल जाते हैं. राजगायक का पद और कटार हासिल करने के छल-कपट का सहारा लेते हैं. उनके इस विद्वेष का क्या अंजाम होता है? दो तगड़े फनकारों की जंग क्या शक्ल लेती है? क्या गुरु का बदला लेने किसी शिष्य को आगे आना पड़ता है? ये सब फिल्म देखकर जान लीजिएगा.

नाटक से फिल्म में सफल रूपांतरण

हैरी पॉटर सीरीज़ में प्रोफेसर मैक्गोनेगल रूप परिवर्तन की क्लास लिया करती थी. उनका आग्रह रहता था कि जब रूपांतरण हो तो वो फ्लॉलेस हो, परफेक्ट हो. इस फिल्म ने ऐन यही किया है. नाटक से फिल्म बनते वक़्त भी इसने अपना ओरिजिनल जादू बरकरार रखा है. ये बड़ी बात है. अक्सर ऐसा ट्रांसफॉर्मेशन मूल कृति की आत्मा मार देता है. इस फिल्म के साथ ऐसा नहीं है और इसके लिए डायरेक्टर सुबोध भावे और उनकी टीम को भरपूर शाबाशी देनी ही पड़ेगी.

सुर निरागस हो

एक संगीत नाटक और उस पर आधारित फिल्म के असल प्राण उसके संगीत में ही बसते हैं. इस फिल्म की सबसे चमकदार बात इसका म्यूज़िक ही है. शानदार धुनें और बेमिसाल गायकी. आपका मन ही नहीं भरता. क्लासिकल सिगिंग के कितने ही रूप आपके कानों को तृप्त कर देंगे. पंडित जितेंद्र अभिषेकी की ज़्यादातर धुनें वैसे ही कायम रखी गई हैं. उन्हें छेड़े बगैर शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने शानदार संगीत दिया है. ‘दिल की तपिश’, ‘लागी करेजवा में कटार’ और ‘सुर निरागस हो’ जैसे गाने आप बार-बार सुनना चाहेंगे. हिंदी पट्टी के दर्शकों को ‘यार इलाही’ कव्वाली बहुत भाएगी.

सुबोध भावे इस क़व्वाली में महफ़िल लूट ले जाते हैं.
सुबोध भावे इस क़व्वाली में महफ़िल लूट ले जाते हैं.

सचिन: फ्रॉम शोले टू कट्यार…..

एक्टिंग पर बात करने से पहले तारीफ़ के दो बोल कास्टिंग के लिए खर्च करना बनता है. पहली जंग तो यहीं जीती गई है. शंकर महादेवन जैसे पहली बार एक्टिंग कर रहे शख्स को पंडित भानुशंकर शास्त्री का रोल देना और सौम्य छवि वाले सचिन से खां साहब करवाना कास्टिंग का मास्टरस्ट्रोक रहा है. शंकर महादेवन की भले ही ये पहली फिल्म है लेकिन वो इस सहजता से एक्टिंग करते हैं जैसे बरसों से यही कर रहे हो. सुरीले, प्रतिभाशाली लेकिन विनम्र, विनयशील राजगायक को उन्होंने ज़िंदा करके रख दिया है.

असल चमत्कार तो सचिन का है. ‘शोले’ का अहमद, ‘नदिया के पार’ का चंदन याद कीजिए. वो शर्मीला सा लड़का यहां तक आते-आते एक मतलबी, क्रूर आफताब हुसैन खान में तब्दील हो चुका है. इस रोल में सचिन ने अपने अभिनय करियर का शिखर छू लिया. चाहे अहंकार का प्रदर्शन हो या किसी को रास्ते से हटाने की क्रूरता या फिर किसी की कामयाबी से प्योर जलन. सबकुछ उन्होंने पूरी जीवंतता के साथ निभाया है. सचिन, सचिन नहीं खां साहब ही लगते हैं.

सचिन का ये रोल बरसों याद किया जाएगा.
सचिन का ये रोल बरसों याद किया जाएगा.

कास्टिंग का जलवा

शास्त्री जी के शिष्य सदाशिव का रोल डायरेक्टर सुबोध भावे ने अपने लिए रखा और खूब निभाया. दोनों दिग्गजों की बेटियों के रोल में अमृता खानविलकर और मृण्मयी देशपांडे परफेक्ट हैं. खां साहब की बेटी ज़रीना, जिसे अच्छाई का साथ भी देना है और पिता का मान भी रखना है. इस दुविधा को अमृता सही ढंग से पोट्रे कर पाती हैं. वहीं पंडित जी की बेटी उमा, जो बचपन की सहेली का प्यार और उसके पिता की नाइंसाफी के बीच पिस रही है. इस कशमकश को मृण्मयी ने सटीक ढंग से परदे पर उतारा है. कुल मिलाकर वही बात कि कास्टिंग ज़बरदस्त है.

ज़रीना और उमा. बड़ों की जंग में दोस्ती शहीद.
ज़रीना और उमा. बड़ों की जंग में दोस्ती शहीद.

साक्षी तंवर, पुष्कर श्रोत्री छोटे से रोल में भी याद रह जाते हैं. नैरेशन में रीमा लागू की आवाज़ इस्तेमाल की गई है जो आपको थोड़ा सा इमोशनल कर देती है.

डायरेक्टर सुबोध भावे का ये पहला ही फिल्म प्रोजेक्ट था. जिसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया है और मराठी सिनेमा को एक बेहतरीन तोहफा दिया है. उन्हें इस बात से भी मदद ज़रूर मिली होगी कि उन्होंने पहले ये प्ले भी डायरेक्ट किया था.

बंपर सफलता 

‘कट्यार काळजात घुसली’ को दर्शकों और समीक्षकों का भरपूर प्यार मिला. सबने एक सुर में इसकी तारीफ़ की. ये तारीफ़ बॉक्स ऑफिस पर भी झलकी जब फिल्म ने बंपर कमाई की. कमाई के मामले में ये फिल्म मराठी सिनेमा में तीसरे पायदान पर है. इससे ज़्यादा पैसे सिर्फ ‘सैराट’ और ‘नटसम्राट’ ने ही कमाए हैं.

कम ही फ़िल्में होती हैं जो जनता और आलोचक दोनों को पसंद आती हैं.
कम ही फ़िल्में होती हैं जो जनता और आलोचक दोनों को पसंद आती हैं.

ये फिल्म रूहानी संगीत और अप्रतिम अदाकारी का सुंदर संगम है. आपकी मस्ट वॉच लिस्ट में होनी ही चाहिए.


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