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नौशाद ने शकील बदायूंनी को कमरे में बंद कर लिया, तब जाकर 'टाइमलेस' गीत जन्मा

सुब्ह का अफ़साना कहकर शाम से

खेलता हूं गर्दिशे-आय्याम से,

उनकी याद उनकी तमन्ना, उनका ग़म

कट रही है ज़िन्दगी आराम से.

ये ग़ज़ल है शकील बदायूंनी की. ऐसी कई ग़ज़लें, शेर और बॉलीवुड गाने लिखने वाले फेमस साहित्यकार शकील बदायूंनी का जन्म हुआ था 3 अगस्त, 1916 को.

नन्हा मुन्ना राही हूं, जब प्यार किया तो डरना क्या, चौदहवीं का चांद हो, मन तड़पत हरि दर्शन को जैसे कई गीत बदायूंनी ने रचे हैं.

शकील बदायूंनी शुरुआत में सरकारी नौकरी कर रहे थे. सप्लाई विभाग में. उन दिनों वो मुशायरों के जाने-पहचाने चेहरे थे. 1942 से 1946 के बीच नौकरी करते हुए उन्होंने खूब शायरी की. और बहुत फेमस भी हो गए.

बदायूंनी फिल्मी दुनिया में भी वाया मुशायरा पहुंचे. हुआ ये कि 1946 में किसी मुशायरे में शामिल होने के लिए मुम्बई पहुंचे थे. उन दिनों फिल्म निर्माता भी मुशायरों में बहुत जाया करते थे. उस मुशायरे में फेमस डायरेक्टर और प्रॉड्यूसर ए. आर. कारदार भी आए थे. उन्होंने जब बदायूंनी को सुना तो अपनी फिल्म दर्द के गाने लिखने का ऑफर दे दिया. यह फिल्म आई थी 1947 में. इस फिल्म का एक बहुत ही फेमस गाना है. अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का. जिसे गाया है टुनटुन(उमादेवी) ने.

मुगले-आज़म मूवी के फेमस गाने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ के बनने का एक किस्सा है. ये गाना बनाने के लिए नौशाद ने बदायूंनी और खुद को शाम के 6 बजे कमरे में बंद कर लिया. बहुत देर तक माथा खपाने के बाद नौशाद के दिमाग में एक पूरबी लोकगीत की पंक्ति आ गई. ये थी प्रेम किया क्या चोट करी. नौशाद ये वाला लोकगीत बचपन से सुनते आ रहे थे. इसी से प्रेरित होकर बंदायूनी ने लिखी ये पंक्तियां

प्यार किया तो डरना क्या

प्यार किया कोई चोरी नहीं की

छुप-छुप आहें भरना क्या!

गाने का मुखड़ा मिल चुका था. और जब तक गाना पूरा हुआ, सुबह हो गई थी. इस गीत के लिए दोनों पूरी रात सोए नहीं.

शकील बदायूंनी ने बहुत सारे भजन भी लिखे है. उनका लिखा एक बहुत ही फेमस भजन है. 1952 में आई फिल्म बैजू बावरा  का मन तड़पत हरि दर्शन को. दिलचस्प बात ये है कि इस भजन को लिखा शकील बदायूंनी ने और गाया है मोहम्मद रफी ने. उनका एक और फेमस भजन है पत राखो गिरधारी.

बदायूंनी को बैडमिंटन और पतंग का खूब शौक था. 20 अप्रैल, 1970 को वो ये दुनिया छोड़ गए. बदायूंनी के मरने के बाद उनकी मेमोरी में एक ट्रस्ट बनाया गया “याद-ए-शकील” नाम का. इसे बनाया था उनके दोस्तों नौशाद, अहमद जकारिया और रंगूनवाला ने.

यहां पढ़िए उनके कुछ शेर-

1.10

 

2.9

 

3.8

 

4.7

 

5.6

 

6.5

 

7.4

 

8.3

 

9.2

 

10.1


ये आर्टिकल सुमेर रेतीला ने लिखा है.


 

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