Submit your post

Follow Us

इन 5 किरदारों से पता चलता है कि अतुल कुलकर्णी की एक्टिंग रेंज कितनी ज़बरदस्त है

3.01 K
शेयर्स

2006 में आई आमिर खान की ‘रंग दे बसंती’ से अंजान हो, ऐसा सिनेमाप्रेमी भारत में शायद ही कोई होगा. इस फिल्म में हर तरह के विचारधाराओं के युवाओं का समागम था.

ऐसी फिल्म जिसमें तमाम लीड कैरेक्टर्स मॉडर्न इंडिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, बस एक लड़का सभ्यता, संस्कृति का नारा बुलंद किए रहता है. और इसी वजह से बाकियों से उसकी दुश्मनी होती है. एक डॉक्युमेंट्री की शूटिंग उन्हें एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाती है और वो समझ जाते हैं कि विचारों में विविधता के बावजूद वो सब एक जैसे ही हैं.

पश्चिमी सभ्यता के धुर विरोधी उस युवक का किरदार निभाने वाले एक्टर थे अतुल कुलकर्णी. 10 सितंबर को अतुल कुलकर्णी का जन्मदिन हुआ करता है.

'रंग दे बसंती' के एक बेहद शानदार सीन में अतुल कुलकर्णी.
‘रंग दे बसंती’ के एक बेहद शानदार सीन में अतुल कुलकर्णी. 

थोड़े से में जान लें कि अतुल कुलकर्णी हैं क्या चीज़

अतुल देश के प्रतिष्ठित थिएटर इंस्टीट्यूट नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के छात्र रहे हैं. कर्नाटक के बेलगाम में पैदा हुए अतुल ने 7 भाषाओं की फिल्मों में काम किया है. 2 नेशनल अवॉर्ड जीते हैं. वो उन चुनिंदा एक्टर्स में से हैं, जिन्होंने एक्टिंग के अलावा लेखन और एक्टिविज्म भी किया. उनके लिखे आर्टिकल्स काफी पसंद किए जाते रहे हैं.

अतुल को पहले ‘हे राम’ और बाद में ‘चांदनी बार’ फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला. उन्होंने अपनी एनएसडी की साथी गीतांजलि कुलकर्णी से शादी की है. वो क्वॉलिटी एजुकेशन सपोर्ट ट्रस्ट (QUEST) नाम से एक संस्था भी चलाते हैं, जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है.

अपने अब तक के करियर में उन्होंने एक धीर-गंभीर टीचर से लेकर गर्म मिजाज़ गैंगस्टर तक, नियमों से बंधे सरकारी अफसर से लेकर आदर्शवादी पत्रकार तक जुदा-जुदा किरदार निभाए हैं. उनकी रेंज वाकई ज़बरदस्त है. आज उनकी टॉप-5 परफॉरमेंस को याद करेंगे.


#5. पोत्या सावंत
फिल्म: ‘चांदनी बार’ (2002)

पोत्या. गरम दिमाग का गैंगस्टर. एक बार डांसर के प्यार में गले-गले तक डूबा हुआ. अपने ही मामा के हाथों एब्यूज हुई मुमताज का सहारा बन जाता है. उससे शादी भी कर लेता है. लव लाइफ और गुनाहों की दुनिया के बीच फंसा पोत्या आखिर में एक हौलनाक अंजाम तक जा पहुंचता है. इस इंटेंस रोल को अतुल ने इतनी सफाई से निभाया कि नेशनल अवॉर्ड झटक ले आए.

देखिए झलक:


#4. एनकाउंटर शंकर
फिल्म: ‘दम’ (2003)

‘दम’ एक एवरेज हिंदी फिल्म थी. इसमें अगर कुछ एवरेज से ज़्यादा था, तो वो था अतुल कुलकर्णी का किरदार. एक दुर्दांत, क्रूर और बेतहाशा करप्ट पुलिस इंस्पेक्टर एनकाउंटर शंकर. फिल्म के हीरो उदय (विवेक ओबेरॉय) की जान का ग्राहक बना हुआ. गाल पर सिले हुए ज़ख्म का निशान लिए शंकर की आंखों से क्रूरता टप-टप टपकती थी. दम जैसी साधारण फिल्म भी ठीक-ठाक पैसे कमा गई. इसकी एक बड़ी वजह अतुल कुलकर्णी की शानदार एक्टिंग थी.

एनकाउंटर शंकर का स्वैग:


#3. गणेश देशमुख
फिल्म: ‘दहावी फ’ (10-F, 2002 )

अतुल कुलकर्णी की बात चल रही हो और मराठी फिल्मों का ज़िक्र न हो, ये हो ही नहीं सकता. ‘तारे ज़मीन पर’ आने से 5 साल पहले आई थी ये फिल्म. टीचर की अपने कमज़ोर स्टूडेंट्स के जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, इसका पॉवरफुल उदाहरण है ये मूवी. दसवीं के सेक्शन A में ज़हीन बच्चों की भरमार है, वहीं F सेक्शन में तमाम कमज़ोर बच्चों को एक तरह से फेंक सा दिया गया है. इन बच्चों को गुंडे-बदमाश समझा जाता है और इनके भविष्य को लेकर कोई चिंतित नहीं रहता. सिवाय गणेश देशमुख सर के.

10-F के बच्चों को गणेश सर सिखाते हैं कि कैसे अपने गुस्से को अपनी ताकत बनाया जाता है. कैसे विद्रोह की आदत को सकारात्मक ऊर्जा की तरह इस्तेमाल करते हैं.

हमारी मशीनी शिक्षा प्रणाली पर प्रहार करती कुछ चुनिंदा बेहतरीन फिल्मों में से एक.
हमारी मशीनी शिक्षा प्रणाली पर प्रहार करती कुछ चुनिंदा बेहतरीन फिल्मों में से एक.

#2.लक्ष्मण पांडे
फिल्म: ‘रंग दे बसंती’ ( 2006)

भारत और भारतीयता की अपनी परिभाषा को जुनून की तरह जीता है लक्ष्मण पांडे. उसे लेकर कट्टर है. पश्चिमी सभ्यता की पुरजोर मुखालफत करता है और मुसलमानों से नफरत भी. यूनिवर्सिटी के ‘कूल ड्यूड्स’ और उनके साथी मुसलमान छात्र से खार खाए रहता है. एक डॉक्युमेंट्री के चक्कर में उसे इन सबको झेलना पड़ रहा है. धीरे-धीरे जब बाहरी आवरण हटता है, तब वो पाता है कि अंदर से सब एक जैसे हैं. नर्मदिल, मानवीयता से भरपूर, मुल्क से मुहब्बत करने वाले.

अपने पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देते जाने का उसका सफ़र रोचक भी है और इस दौर में प्रासंगिक भी.

इस सीन में जब अतुल ‘बिस्मिल’ का लिखा ‘सरफरोशी की तमन्ना’ सुनाते हैं, तो उनसे नज़रें नहीं हटती:


#1. गुना कागलकर
फिल्म: नटरंग (2010)

‘नटरंग’ बिला-शुबह अतुल कुलकर्णी के अभिनय करियर का एवरेस्ट है. शानदार फिल्म, उससे शानदार किरदारनिगारी. महाराष्ट्र की लोककला ‘तमाशा’ पर आधारित इस फिल्म ने दर्शक और क्रिटिक्स दोनों से बोरियां भर-भर के प्यार पाया. ‘तमाशा’ के लिए अपने जुनून की कीमत गुना कागलकर को कदम-कदम पर चुकानी पड़ती है. अपने सम्मान तक से समझौता करना पड़ता है.

दो बिल्कुल जुदा किरदारों को जीने का चैलेंज अतुल कुलकर्णी ने बाखूबी निभाया.
दो बिलकुल जुदा किरदारों को जीने का चैलेंज अतुल कुलकर्णी ने बाखूबी निभाया.

‘तमाशा’ में एक स्टॉक किरदार होता है. जिसे ‘नाच्या’ बोलते हैं. ये एक ऐसा पुरुष होता है, जिसके हावभाव औरतों जैसे होते हैं. जब कोई सूटेबल एक्टर नहीं मिलता, तो गुना खुद इस रोल को निभाने की चुनौती सुधारता है. एक गबरू जवान से एक नाज़ुक मिजाज़ ‘नाच्या’ तक का परिवर्तन उसकी ज़िंदगी में भूचाल लाकर रख देता है. हमारे समाज में थर्ड जेंडर के हिस्से आती हिकारत उसका भी मुकद्दर बनती है. यहां तक कि रेप जैसी त्रासदी से भी गुज़रना पड़ता है उसे. लेकिन कला के लिए अपनी दीवानगी की खातिर वो सब भुगत ले जाता है.

यकीनन ‘नटरंग’ अतुल कुलकर्णी के एक्टिंग करियर का कोहिनूर है. बार-बार देखने लायक फिल्म.

और ये गीत तो लूप पर लगाकर सुना जा सकता है:

कुछ और फ़िल्में भी है जिन्हें अतुल की खातिर देखा जाना चाहिए. जैसे ‘पेज 3’, ‘सत्ता’, ‘हे राम’, ‘माती माय’, ‘वळू’. अतुल कुलकर्णी सिलेक्टिव लेकिन अर्थपूर्ण भूमिकाएं करने में माहिर हैं. उनके फिल्मों की कम संख्या देखते हुए लगता है कि चूज़ी भी हैं. भूमिका चाहे छोटी हो लेकिन दमदार हो, ऐसा आग्रह रहता होगा उनका.

नमूने के लिए जाते-जाते ‘पेज-3’ का ये सीन देख लीजिए:


ये भी पढ़ें:

नाम से नहीं किरदार से जाने जाते हैं ये कलाकार

ज़ोरदार किस्साः कैसे बलराज साहनी जॉनी वॉकर को फिल्मों में लाए!

6 विवादित फिल्में जिनमें धाकड़ औरतें देख घबरा गया सेंसर बोर्ड

US का नया प्रेसिडेंट प्रत्याशी, बराक-बुश सब फैन हैं इनके


वीडियो देखें: वो कलाकार, जिसे नपुंसक कहकर अपमानित किया गया

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

फिल्म रिव्यू: सेक्शन 375

ये फिल्म एक केस की मदद से ये आज के समय की सबसे प्रासंगिक और कम कही गई बात कहती है.

बॉल ऑफ़ दी सेंचुरी: शेन वॉर्न की वो गेंद जिसने क्रिकेट की दुनिया में तहलका मचा दिया

कहते हैं इससे अच्छी गेंद क्रिकेट में आज तक नहीं फेंकी गई. आज वॉर्न अपना पचासवां बड्डे मना रहे हैं.

फिल्म रिव्यू: ड्रीम गर्ल

जेंडर के फ्यूजन और तगड़े कन्फ्यूजन वाली मज़ेदार फिल्म.

गैंग्स ऑफ वासेपुर की मेकिंग से जुड़ी ये 24 बातें जानते हैं आप?

अनुराग कश्यप के बड्डे के मौके पर जानिए दो हिस्सों वाली इस फिल्म के प्रोडक्शन से जुड़ी बहुत सी बातें हैं. देखें, आप कितनी जानते हैं.

फिल्म रिव्यू: छिछोरे

उम्मीद से ज़्यादा उम्मीद पर खरी उतरने वाली फिल्म.

ट्रेलर रिव्यू झलकीः बाल मजदूरी पर बनी ये फिल्म समय निकालकर देखनी ही चाहिए

शहर लाकर मजदूरी में धकेले गए भाई को ढूंढ़ती बच्ची की कहानी.

जब अपना स्कूल बचाने के लिए बच्चों को पूरे गांव से लड़ना पड़ा

क्या उनका स्कूल बच सका?

फिल्म रिव्यू: साहो

सह सको तो सहो.

संजय दत्त की अगली फिल्म, जो उन्हें सुपरस्टार वाला खोया रुतबा वापस दिला सकती है

'प्रस्थानम' ट्रेलर फिल्म के सफल होने वाली बात पर जोरदार मुहर लगा रही है.

सेक्रेड गेम्स 2: रिव्यू

त्रिवेदी के बाद अब 'साल का सवाल', क्या अगला सीज़न भी आएगा?