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रंगीला राजा: मूवी रिव्यू

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गोविंदा. शक्ति कपूर. पहलाज निहलानी. प्रेम चोपड़ा. ये लोग नाइंटीज़ में इतने हिट थे कि अगर रंगीला राजा 90’s में रिलीज़ होती तो एडवांस बुकिंग से थोड़े-बहुत पैसे तो कमा ही लेती. लेकिन थोड़े-बहुत ही. वो भी इन फेमस नामों के चलते. ठीक जैसे ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ ने कमाया था.

मतलब ये कि उस समय की फिल्मों को मानक मानकर भी अगर इस मूवी का रिव्यू किया जाए, तो भी इसे अच्छी या औसत फिल्मों में शुमार नहीं किया जा सकता.

तीन घंटे. जी बिलकुल यही है मूवी का रनिंग टाइम. अगर आपके पास ढेर सारा कंटेंट, ढेर सारे प्लॉट, ढेर पैरलल सब-प्लॉट हों, तो भी ये रनिंग टाइम ज़्यादा, बहुत ज़्यादा है. लेकिन यहां तो स्क्रिप्ट राइटर पहलाज निहलानी, जो इसके प्रोड्यूसर भी हैं, मानो टास्क लेकर चले हों कि फाइट, ह्यूमर, फैमिली ड्रामा, सेक्स, सस्पेंस, गोविंदा और कुछ गानों और डांस की सिचुएशन से मिला कर वही ओल्ड स्कूल फ़ॉर्मूला लिखना है. ‘इल्ज़ाम’, ‘शोला और शबनम’ या ‘आंखे’ सरीखा. सो लिखा. उसमें डायलॉग डालकर डायरेक्टर सिकंदर भारती को एज़ इट इज़ दे दिया. और डायलॉग कैसे? राइमिंग वाले.

न न ‘हीर रांझा’ सरीखी राइमिंग वाले नहीं, कल्ट हो चुकी फिल्म ‘गुंडा’ जैसी राइमिंग वाले. कुछ बानगी देखिए –

एरोटिक कहानी और शर्माती जवानी

बदनाम गलियां और मसली हुई कलियां

कमीज़ में जेब और राजा में ऐब

और ये वाला तो एपिक है –

कंधे में बाज़ और सीने में राज़

पहलाज निहलानी और प्रेम चोपड़ा
निर्माता और स्क्रीन-प्ले राइटर पहलाज निहलानी और फेमस एक्टर प्रेम चोपड़ा जो इसमें विलेन नहीं बने हैं.

‘रंगीला राजा’ ऐसी रश ड्राइविंग है जो फिल्मिंग के हर डिपार्टमेंट को रौंदती हुई चलती है. और इस दौरान न जाने किस-किस को ऑफेंड करती है. इसमें आप मी टू पर भी जोक सुनेंगे और किसानों की आत्महत्या पर भी. यूपी के मुख्यमंत्री योगी पर भी और कॉर्पोरेट वर्ल्ड पर भी. महिलाओं को तो खासतौर पर ऑब्जेक्टीफाई किया गया है. लेकिन अगर कोई इन सब जोक्स को उनकी ओफेंसिवनेस से जज करना बंद कर दे तो भी ये सारे जोक एक असफल कोशिश भर हैं जो आपको हंसाना तो दूर इरिटेट और करते हैं. जैसे एक बार गोविंद नामदेव का किरदार गोविंदा के किरदार से कहता है –

तू ‘मी टू’ में तो नहीं फंसा, लेकिन म्हारे जाल में फंस गया.

और वो वन लाइनर जो ट्रेलर में भी था –

यार ये लड़कियां इतने कम कपड़े क्यूं पहनती हैं, ज़रूरी नहीं न कि हर आदमी शरीफ होवे है.

बीस कट वाली फ़िल्म की फाइनल रिलीज़ में ये डायलॉग आ जाना, सैकड़ों सालों से चले आ रहे ‘असमानता’ और ‘पितृसत्तात्मकता’ वाले विमर्शों को मुंह चिढ़ाता हुआ और बड़ा ही भौंड़ा लगता है.

फिल्म की कहानी की बात करते हैं. दो भाई हैं – बड़ा भाई विजेंद्र प्रताप सिंह, जोधपुर का एक बिज़नेस टाइकून और छोटा भाई अजय प्रताप सिंह एक योगी. बड़ा भाई विमेनाइज़र है. विमेनाइज़र मतलब औरतों के पीछे लगे रहने वाला, वैसे हिंदी भाषा में भी इसके लिए एक शब्द है, लेकिन चलिए छोड़िए. उसकी बीवी इससे परेशान है लेकिन कहती कुछ नहीं क्यूंकि विजेंद्र उसे आत्महत्या की धमकी देते रहता है. अब ये एक योगी और एक भोगी वाली कहानी सुनकर आपको सालों पहले केदार शर्मा की आई कल्ट मूवी ‘चित्रलेखा’ याद आ रही हो तो बता दें कि दोनों ही फ़िल्में अलग-अलग ध्रुव हैं. पोल्स अपार्ट.

खैर! धीरे-धीरे स्टोरी चल रही होती है इसी दौरान एक गाना आता है, जिसे देखकर लगता ही नहीं कि हम ‘रंगीला राजा’ देख रहे हैं, उन पांच मिनटो में फिल्म अचानक प्रीमियम लगने लगती है. फिर फिल्म के डायरेक्टर सिकंदर भारती का लिखा ऊँ नाद गाना. अच्छी धुन, अच्छे बोल वाला ये गीत या भजन इस फिल्म का सबसे बड़ा या एक मात्र प्लस पॉइंट है. होने को फिल्म इस गीत में भी अश्लीलता से किनारा नहीं करती. दूसरे लिरिक्स राइटर महबूब जिन्होंने फिल्म के बाकी सारे गीत लिखे हैं, जिन्हें कभी रामगोपाल वर्मा की पिल्म ‘रंगीला’ के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिला था. अब ‘रंगीला राजा’ में वो उसके आसपास फटकते हुए भी नज़र नहीं आते.

फ़िल्म की प्रमुख ऐक्ट्रेसेज़ (बाएं से - अनुपम अग्निहोत्री, दिगांगना सूर्यवंशी, मिशिका चौरसिया)
फ़िल्म की प्रमुख ऐक्ट्रेसेज़ (बाएं से – अनुपम अग्निहोत्री, दिगांगना सूर्यवंशी, मिशिका चौरसिया)

एक्टिंग के मामले में सब की ही एक्टिंग दोयम दर्ज़े की थी. खासतौर पर मिशिका चौरसिया जिन्होंने एक रेप विक्टिम नताशा का किरदार निभाया है, वो तो जब-जब स्क्रीन पर आती हैं अपने अजीब से एक्सेंट और फ्लैट फेस के चलते इरिटेट करती हैं. फिल्म में विजेंद्र की पत्नी शिवरंजनी का किरदार निभा रहीं दिगांगना सूर्यवंशी थोड़ा प्रभावित तो करती हैं लेकिन वो फिल्म का कम और सास-बहू वाले सीरियल्स की फील ज़्यादा देती हैं. शक्ति कपूर ने नो डाउट अच्छी एक्टिंग की है, प्रेम चोपड़ा भी बुरे नहीं हैं. लेकिन वही बात, ये लोग भी आखिर बंजर स्क्रिप्ट में एक्टिंग की कितनी फसल उगा लेते?

पहलाज निहलानी ने ये मूवी शायद सेंसर बोर्ड से कोई बदला लेने के लिए बनाई. वो मकबूल फिल्म का डायलॉग था न तब्बू वाला –

सोलह तिल हैं मेरे बदन में, देखना चाहोगे?

पहलाज भी गोया सेंसर बोर्ड वाले अपने पुराने साथियों को हूल दे रहे थे –

बीस कट हैं मेरी फिल्म में, देखना चाहोगे!

ड्राईवर पद्मपद बने हैं शक्ति कपूर. उनके और गोविंदा के कई फनी मोमेंट्स क्रियेट करने के प्रयास किए गए हैं. लेकिन...
ड्राईवर पद्मपद बने हैं शक्ति कपूर. उनके और गोविंदा के कई फनी मोमेंट्स क्रियेट करने के प्रयास किए गए हैं. लेकिन…

और यूं उनसे और मुझ जैसे सभी समीक्षकों के साथ मेरी सहानुभूति है, जिन्हें ये मूवी पूरी देखनी पड़ी. मतलब अपने पहले ही बाइट से स्वादहीन हो चुके च्युइंग-गम को चबाना पड़ा. लेकिन आप लोगों के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. आपको बधाई.


वीडियो देखें:

फिल्म रिव्यू: उरी – दी सर्जिकल स्ट्राइक –

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