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जब रमेश सिप्पी की 'शक्ति' देखकर कहा गया,'दिलीप कुमार अमिताभ बच्चन को नाश्ते में खा गए'

कल्ट. मतलब नहीं पता? मुझे भी कुछ साल पहले ही पता चला. उससे पहले जहां कहीं कल्ट लिखना होता था, मैं ‘शोले’ लिख आता था.

ये आपको अतिश्योक्ति लगेगा. लेकिन अतिश्योक्ति भी, एक्सट्रीम भी, किसी कल्ट का एक और ट्रेट होता है. शोले का भी था. कि तीनों का बच जाना… कि सूरमा भोपाली के ठीक पीछे जय और वीरू का ठीक तब होना, जब वो शेखियां बघार रहा था… कि एक जोड़ी उचक्कों का पुलिस वाले को बचाना…

…मतलब अविश्वसनीय लेकिन कमाल. या अविश्वसनीय, इसलिए कमाल. और इस ‘कमाल’ का मतलब मुझे हमेशा से पता था. लेकिन फिर भी, जहां कहीं ‘कमाल’ लिखना होता था, मैं ‘शोले’ लिख आता था.

'शोले' का इंडियन पॉप कल्चर में जितना प्रभाव है, उतना किसी मूवी का नहीं. और ये बात बिना 'शायद' लगाए कही जा सकती है.
‘शोले’ का इंडियन पॉप कल्चर में जितना प्रभाव है, उतना किसी मूवी का नहीं. और ये बात बिना ‘शायद’ लगाए कही जा सकती है.

अब दिक्कत ये है कि मुझे रमेश सिप्पी की बात करनी है, ‘शोले’ की नहीं. ये ऐसा ही है जैसे, जब आपके पास ‘बालकाण्ड’ के बारे में कहने को बहुत कुछ हो तो आपको ‘रामायण’ के बारे में कहने को कहा जाए. खैर, ‘बालकाण्ड’ के ही एक दोहे,‘हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता’, की तर्ज़ पर हम आपको तीन किस्से या तीन बातें उनके बारे में बताते हैं. थोड़ी यूनिक, या थोड़ा विस्तार से. So here is Ramesh Sippy for you. Take him away….

# गेस दी मूवी-

जब फिल्म रिलीज़ हुई तो जितनी आशाएं थीं उसके मुताबिक नहीं चली. थोड़ी सी घबराहट भी हुई. क्यूंकि ये बहुत ही बड़ी फिल्म थी. कई सालों से बन रही थी. बजट से ऊपर चली गई थी.

– ये अमिताभ बच्चन ने एक मूवी के बारे में कहा था. 2015 में. उस मूवी के रिलीज़ के 40 साल पूरे हो जाने पर. गेस कीजिए किस मूवी के बारे में? चलिए एक किस्सा सुनाते हैं. फिर दोबारा अनुमानों के घोड़े दौड़ाइएगा.

16 अगस्त, 1975. मूवी के डायरेक्टर रमेश सिप्पी अपनी कल रिलीज़ हुई मूवी को देखने सिनेमाघर गए. वो अपनी मूवी के सारे रिव्यू पढ़ चुके थे. कोई ऐसा रिव्यू नहीं था जिसमें फिल्म की तारीफ़ की गई हो. एक जाने-माने समीक्षक ने लिखा था-

शोर और आवेश से भरी हुई ऐसी फिल्म, जिसका कोई मतलब नहीं निकलता.

एक हतोत्साहित इंसान जहां कहीं जाता है, उस जगह का माहौल भी डिप्रेसिंग हो जाता है. नहीं भी होता है तो उसे लगने लगता है. यूं, जब रमेश सिप्पी अपनी मूवी देखने सिनेमाघर पहुंचे, तो वो मूवी से ज़्यादा दर्शकों को देख रहे थे. पूरे पिक्चर हॉल में सन्नाटा पसरा था. गोया किसी के मातम में आए हों दर्शक. क्या ये उनकी फिल्म की असामयिक मृत्यु का मातम था? रमेश सिप्पी खुद बताते हैं-

कोई सीटी नहीं. कोई ताली नहीं. कोई ठहाके नहीं. कुछ भी नहीं.

मूवी देखते ही रमेश सिप्पी अपने साथ सलीम खान और जावेद अख्तर को लेकर अमिताभ बच्चन के घर पहुंच गए. अमिताभ बच्चन अभी-अभी सुपर स्टार बने थे. उसी साल 7-8 महीने पहले उनकी ‘दीवार’ रिलीज़ हुई थी. उसमें भी अंत में अमिताभ का किरदार मर जाता था, और इस ‘फ्लॉप’ घोषित की जा चुकी फिल्म में भी.

अभी-अभी तो दीवार में अमिताभ का कैरेक्टर मरते हुए दिखाया गया था. कहीं इस मूवी में यही दांव तो उल्टा नहीं पड़ चुका था?
अभी-अभी तो दीवार में अमिताभ का कैरेक्टर मरते हुए दिखाया गया था. कहीं इस मूवी में यही दांव तो उल्टा नहीं पड़ चुका था?

तो अमिताभ के घर में ये तय किया गया कि फिल्म की एंडिंग बदल देते हैं. अमिताभ को जीवित कर देते हैं. कल यानी रविवार को फिर शूट करेंगे, और एडिट-वेडिट करके, नया वाला वर्ज़न सोमवार को सबको डिस्ट्रीब्यूट कर देंगे. फिर देखते हैं क्या असर होता है. क्या कैमरामैन, क्या स्टंटमैन, सभी को शूट पर पहुंचने का आदेश भी चला गया. सब निर्णय करके अमिताभ के घर से निकले ही थे रमेश सिप्पी ने कहा-

यार! सोमवार तक देख लेते हैं, क्या होता है. और तब भी कुछ गड़बड़ हुई, तो फिर नियति है. क्या कर सकते हैं.

अमिताभ बताते हैं-

सोमवार को जो हुआ, वो फिर, ‘अद्भुत’ हो गया.

इस ‘अद्भुत’ नाम के विशेषण को संज्ञा में लिखो, तो लिखा जाएगा- ‘शोले’. यानी कल्ट. यानी कमाल. जिसके बारे में ‘मासूम’ और ‘मिस्टर इंडिया’ के डायरेक्टर शेखर कपूर ने फिल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा से कहा था-

इंडियन स्क्रीन्स में ‘शोले’ से ज़्यादा कोई और फिल्म (बॉलीवुड को) निर्धारित नहीं कर सकती. और इंडियन सिनेमा को दो समय-कालों में विभाजित किया जा सकता है- एक ‘शोले से पहले’ और दूसरा ‘शोले के बाद’.

# मल्टीस्टारर मूवीज़ बनाना मुश्किल हो गया है: रमेश सिप्पी-

‘शक्ति’. सिंतबर, 1982 में रिलीज़ हुई. इसमें अमिताभ के किरदार का नाम फिर से विजय था. चौथी बार. पहली तीन ‘दीवार’, त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ थीं. तीनों ही हिट रहीं थीं.

‘शक्ति’ की रिलीज़ से कुछ ही दिनों पहले ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को काफी गहरी चोट लगी थी. जब पुनीत इस्सर का एक ज़ोरदार घूसा उनके पेट में पड़ गया था. ये हादसा पूरे देश को ग़मज़दा कर गया. पूरा भारत अमिताभ के लिए प्रार्थना करने लगा. तो उम्मीद थी कि इस इमोशन का फायदा रमेश सिप्पी की ‘शक्ति’ को भी मिलेगा. लेकिन फिल्म औसत और फ्लॉप के बीच ही रह गई. इसके बारे में एक बार जावेद अख्तर, जिन्होंने सलीम खान के साथ मिलकर इस मूवी की स्क्रिप्ट लिखी थी, ने कहा था-

शक्ति बॉक्स ऑफिस पर बेहतर करती अगर अमिताभ बच्चन की जगह कोई और हीरो होता. अमिताभ बच्चन का कद उस वक्त उनके इस रोल से काफी बड़ा था. इतना बड़ा, कि रोल के अनुपात में लोगों की उम्मीदें हज़ार गुना थीं.

साफ़ है कि ये शब्द जावेद ने अमिताभ की तारीफ़ में कहे थे.

इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ-साथ ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार भी थे. उनकी पत्नी शीतल का किरदार निभाया था राखी गुलज़ार ने.

राखी गुलज़ार उस समय ‘बेमिसाल’ जैसी मूवीज़ में लीड एक्ट्रेस प्ले कर रहीं थीं. वैसे भी उनकी जोड़ी अमिताभ के साथ खूब पसंद की जा रही थी. ऐसे में, उनकी मां का किरदार निभाना एक रिस्की निर्णय तो था ही.

'शक्ति' अब रमेश सिप्पी की कुछ बेहतरीन मूवीज़ में से एक मानी जाती है.
‘शक्ति’ अब रमेश सिप्पी की कुछ बेहतरीन मूवीज़ में से एक मानी जाती है.

खैर, ‘शक्ति’ के साथ एक बात और भी हुई. हुई कहें या खत्म हुई कहें. कि मल्टीस्टारर मूवीज़ का दौर लगभग खत्म सा हो गया. और ये खत्म हुआ ‘इगो’ के चलते. अब आप पूछेंगे, इगो मतलब? चलिए करण जौहर और रमेश सिप्पी की बातचीत के कुछ अंश आपसे शेयर करते हैं. मामला क्लियर हो जाएगा. ये अंश इंडिया टुडे के एक प्रोग्राम ‘अनफॉरगेटेबल’ (अविस्मरणीय)  के दौरान हुई बातचीत के हैं.

तो करण जौहर बातचीत के दौरान अपनी पीठ थपथपाते हुए बोले-

मुझे लगता है कि पिछली मल्टीस्टारर फिल्म शायद मैंने बनाई थी. जब ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ के दौरान एक्टर्स एक साथ आए थे. आपने (रमेश सिप्पी ने) इसे शुरू किया था और मेरी फिल्म के साथ इस मल्टीस्टारर फिल्म का एरा खत्म हुआ.

इस पर रमेश बोले-

जिस तरह से आजकल फ़िल्में बनती हैं. जिस तरह से आजकल एक्टर्स का इगो हो गया है ऐसी फ़िल्में बनाना मुश्किल हो गया है.

फिर उन्होंने ‘शक्ति’ का ही एक किस्सा बताते हुए कहा-

ये इगो वाली बात काफी हद तक ‘शक्ति’ के साथ भी हो गई थी. जब शक्ति रिलीज़ हुई थी, देश के कुछ पहले फिल्म समीक्षकों में से एक, खालिद मोहम्मद ने लिखा,’मिस्टर खान (दिलीप कुमार) ने मिस्टर बच्चन को नाश्ते में खा लिया.’ अमित जी ने ज़्यादा कुछ कहा नहीं, लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि हमने उन्हें ‘नीचा दिखाया’ है. जबकि सच ये था कि अमित जी का रोल कहीं ज़्यादा मुश्किल था. दूसरा वाला (दिलीप कुमार का) रोल भी अच्छा था… 

और यूं दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन, दोनों की एक साथ पहली फिल्म, दोनों की एक साथ अकेली फिल्म बन गई. मतलब, दोनों फिर कभी एक ही मूवी में एक साथ नहीं दिखे. कहा जाता है कि अमिताभ के कुछ बेहतरीन सीन एडिटिंग टेबल से आगे नहीं बढ़ पाए.

इस किस्से का दी एंड यहीं पर. लेकिन अगर आप दी एंड के बाद के क्रेडिट रोल देखना भी पसंद करते हैं और अगर इस किस्से को सुनने के बाद भी असंतुष्टि का भाव कम न हुआ हो, तो पेश ए नज़र है करण जौहर और रमेश सिप्पी की बातचीत का पूरा वीडियो-

# अल्बर्ट पिंटो को जादू पे गुस्सा क्यूं आया-

‘शान’. शोले के बाद आई रमेश सिप्पी की एक और मेगा बजट, मल्टीस्टारर मूवी.

जैसा आपने पिछले वाले किस्से में पढ़ा ही कि मल्टीस्टारर मूवी में कास्टिंग को लेकर कितनी झकझक होती है. तो ये वाला पूरा किस्सा ‘शान’ की कास्टिंग को लेकर ही है.

सबसे पहले अमज़द खान की बात की जाए. उन्हें फिल्म में क्यूं नहीं लिया गया? जबकि उनका पिछला कैरेक्टर तो सुपरहिट हो चुका था? इसके बारे में खुद रमेश सिप्पी बताते हैं-

क्यूंकि हर बार ‘शान’ में अमज़द को देखकर गब्बर की याद आती. अब मैं उससे दूर जाना चाहता था. इसलिए ही तो मैंने शान में ‘शाकाल’ का किरदार उससे इतना अलग बनाया था. 

शान ऐसी फ्लॉप हुई, कि कहते हैं सिप्पी फैमिली का पूरा पैसा इसमें डूब गया. जो कुछ भी 'शोले' से कमाया था.
शान ऐसी फ्लॉप हुई, कि कहते हैं सिप्पी फैमिली का पूरा पैसा इसमें डूब गया. जो कुछ भी ‘शोले’ से कमाया था.

इसलिए संजीव कुमार को इस मूवी के मेन विलेन के रूप में कास्ट किया गया. अब आप कहेंगे कि संजीव तो इस मूवी में थे ही नहीं. तो बात दरअसल ये है कि स्टारकास्ट को लेकर शुरू हुई ये भसड़ सिर्फ अमज़द खान तक ही सीमित नहीं रही.

जब फिल्म लॉन्च हुई तो ‘शान’ की स्टारकास्ट बिलकुल अलग थी.  धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, संजीव कुमार और विनोद खन्ना भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा थे. सबसे पहले धर्मेंद्र और हेमा मालिनी इस फिल्म से अलग हुए. कारण बना वही ‘इगो’, जो हमारे पिछले किस्से में अमिताभ और दिलीप कुमार के बीच आ गया था. अबकी बार ये इगो आया रमेश सिप्पी और धर्मेंद्र के बीच. यूं धर्मेंद्र के बदले आए शशि कपूर.

लेकिन फिर शशि कपूर जिस रोल के लिए आए, मतलब जो रोल पहले धर्मेंद्र कर रहे थे, वो अमिताभ को पसंद था. पर अमिताभ को तो पहले ही मूवी में एक रोल दिया जा चुका था. तो हुआ क्या कि उन्होंने, यानी अमिताभ ने, शशि के साथ अपना रोल एक्सचेंज कर लिया.

संजीव कुमार अपनी खराब तबियत के चलते फिल्म से अलग हो गए. इस फिल्म की मेकिंग के दौरान उन्हें हार्ट अटैक आ गया था. वो बायपास सर्जरी के लिए यूएस चले गए थे. बाद में आया एक और हार्ट अटैक उनकी मृत्यु का कारण भी बना. ‘शान’ में संजीव कुमार की जगह किसने ली, ये लॉजिक आपने लगा ही लिया होगा.

विनोद खन्ना, ‘शान’ से ओशो रजनीश के पास चले गए (पन इंटेडेड). विनोद के जगह ली शत्रुघ्न सिन्हा ने. रेनू का रोल निभाया बिंदिया गोस्वामी ने, जो पहले निभाने वाली थीं, हेमा मालिनी.

अब इतना घालमेल समझ में आ चुका हो तो एक और पॉइंट बताते हैं. वो ये कि अमिताभ के लिए ‘विजय’ नाम बहुत लकी रहा था, इसलिए उन्होंने शशी से एक्सचेंज हुए कैरेक्टर का नाम भी विजय ही चाहा. मतलब इसे आसान भाषा में यूं समझ लीजिए कि अमिताभ कोई भी रोल करते, उनके किरदार का नाम ‘विजय’ ही रहना था.

लेकिन ‘शान’ की स्टारकास्ट का कन्फ्यूज़न यहीं खत्म नहीं हुआ. सबसे इंट्रेस्टिंग पार्ट आना तो अभी बाकी था.

अगर 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूं आता है' नाम की मूवी न होती तो दो बातें होतीं- पहली, 'शान' में नसीरुद्दीन शाह होते. दूसरी, मानव कौल की फिल्मोग्राफी में भी एक रिमेक कम होती.
अगर ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूं आता है’ नाम की मूवी न होती तो दो बातें होतीं- पहली, ‘शान’ में नसीरुद्दीन शाह होते. दूसरी, मानव कौल की फिल्मोग्राफी में भी एक रिमेक कम होती.

नसीरुद्दीन की ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूं आता है’ की शूटिंग पूरी ही होने वाली थी. रमेश सिप्पी इस दौरान जावेद अख्तर, सलीम खान और अपने पिताजी जीपी सिप्पी को लेकर नसीरुद्दीन से मिलने गए. बोले कि शत्रुघ्न सिन्हा सेट पर टाइम से नहीं आते, उनके एटीट्यूड ने सबको परेशान कर रखा है. ऐसा करो, तुम उनकी जगह ले लो.

नसीरुद्दीन उस वक्त स्ट्रगलिंग एक्टर थे, तो उनके लिए इस रोल को ठुकराना ऐसा ही होता गोया लक्ष्मी तिलक लगा रही हो और आप सर धोने की बात करें. तो उन्होंने ये रोल एक्सेप्ट करते हुए कहा कि ‘अल्बर्ट पिंटो…’ की शूटिंग खत्म हो जाने दीजिए, फिर आपकी मूवी करते हैं.

लेकिन जावेद अख्तर ने लगभग अल्टीमेटम देते हुए कहा कि, नहीं, तुमको वो फिल्म छोड़कर आज से ही ‘शान’ से जुड़ना होगा. वो छोटी सी मूवी है, ऐसी मूवी आई गई हो जाती हैं.

बस फिर क्या था. शाह भड़क गए. उन्होंने ‘शान’ साइन नहीं की. बाद में उन्होंने शान की टीम को अनैतिक और मतलबी बताते हुए कहा था कि ये लोग अपने फायदे के लिए दूसरे निर्माता को नुकसान पहुंचाने को तैयार थे.

खैर फिर शत्रुघ्न सिन्हा को हटाने का निर्णय मूर्त रूप नहीं ले पाया. उधर शत्रुघ्न के एटीट्यूड में भी सुधार आ चुका था.

हालांकि ये भी एक दुःखद फैक्ट है कि इस फिल्म की मेकिंग के दौरान शॉटगन के पिता की मृत्यु हो गई थी. इसी फिल्म की मेकिंग के दौरान परवीन बॉबी को भी पहली बार ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ हुआ था. वो भी ऐन शूटिंग के दौरान. संजीव कुमार के हार्ट अटैक वाली बात आपको बता ही दी. यानी कुल मिलाकर इस मूवी के साथ ढेरों ऐसे हादसे जुड़ते चले जा रहे थे.

कहते हैं कि शूटिंग के दौरान ही रमेश सिप्पी को अंदाज़ा हो गया था कि मूवी फ्लॉप होने वाली है. उन्होंने एक बार कहा भी-

शूटिंग के दौरान ही मुझे एहसास हो गया था कि कहीं कुछ मिसिंग है.

तीन पत्ती के खेल में तीन इक्के सबसे बड़े पत्ते माने जाते हैं. लेकिन कहावत ये है कि जिसके पास एक बार तीन इक्के आ गए वो बंदा उसके बाद की बाजियां हारता चला जाता है. ‘शोले’ रमेश सिप्पी के वही तीन इक्के थी…


तो ये थे तीन इक्कों पर खत्म हुए तीन किस्से. रमेश सिप्पी के. जाते-जाते उनकी लेटेस्ट मूवी का ट्रेलर देखते जाइए. नाम है शिमला मिर्ची. 2014  में बनना शुरू हुई ये फिल्म  3 जनवरी, 2020 को जाकर रिलीज़ हुई. यूं अब इसके हिट होने की कोई संभावना नहीं है. और अगर अब ये हिट हो गई, तो हमें भी कुछ लोग वैसे ही ताने देंगे, जैसे ‘शोले’ को लेकर उस वक्त के समीक्षकों को हम देते हैं.


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