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वो 22 बातें जो राजकुमार हीरानी अपनी फिल्में रचते हुए हमेशा ध्यान में रखते हैं

हिंदी सिनेमा में वे आज टॉप के डायरेक्टर हैं. उनकी सक्सेस रेट 100 परसेंट है. यहां तक कि दूसरे डायरेक्टर भी उन्हें अपना फेवरेट मानते हैं. आज उन्हीं राजू हीरानी का बर्थडे है.

नागपुर के एक सिंधी परिवार में 20 नवंबर 1962 को राजकुमार हीरानी का जन्म हुआ. पिता सुरेश हीरानी वहीं टाइपिंग इंस्टिट्यूट चलाया करते थे. राजू याद करते हैं कि पिता रोज सुबह जब भी उन्हें देखते थे, गले लगाया करते थे. वहीं से ‘जादू की झप्पी’ आई. राजू को फिल्ममेकर बनाने में भी प्यारे पिता का बड़ा हाथ रहा. राजू ने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया था. वे उन दिनों थियेटर भी किया करते थे, तो पिता ने बेटे की कुछ फोटो खिंचवाई और मुंबई के एक एक्टिंग स्कूल में भेजीं. वहां स्वीकार हो गए तो राजू गए, लेकिन लौट आए क्योंकि उन्हें वहां जमा नहीं.

उसके बाद पिता ने उनको भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे (ftii) में दाखिला लेने के लिए कहा. लेकिन तब तक एक्टिंग का कोर्स खत्म हो गया था इसलिए उन्होंने एडिटिंग का कोर्स किया. यहां से निकलने के बाद फिल्मों में कुछ हो नहीं पाया इसलिए विज्ञापन फिल्में डायरेक्ट करने लगे. उन्होंने फैवीकॉल के उस मशहूर एड में एक्टिंग भी की थी जिसमें हाथी और इंसान मिलकर भी जोड़ तोड़ नहीं पाते और पेंसिल छाप मूछों व प्यारी मुस्कान वाले पतले से राजू आकर बोलते हैं, “ये फैवीकॉल का मजबूत जोड़ है टूटेगा नहीं”. फिर वे एक लूना के एड में भी दिखे थे.

ख़ैर, फिल्मों में उनकी शुरुआत डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा के साथ हुई. जब उन्होंने विधु की फिल्म ‘1942: अ लव स्टोरी’ के प्रोमो को काटने पर काम किया. विधु को उनका काम पसंद आया. फिर राजू ने उनकी फिल्म ‘करीब’ (1998) के प्रोमो एडिट किए. इसके बाद विधु ने उनको ‘मिशन कश्मीर’ (2000) में फिल्म एडिटर बनाया. ये खत्म हुई तो वे डायरेक्टर बनने की राह पर आगे बढ़े. 2003 में उनकी पहली फिल्म ‘मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.’ आई जिसे विधु ने ही प्रोड्यूस किया था.

मौजूदा समय में हिंदी सिनेमा में वे 100 फीसदी सफलता वाले डायरेक्टर हैं. उनके समकालीन बड़े डायरेक्टर्स से भी अगर पूछें तो राजू अधिकतर के फेवरेट हैं. वो इसलिए क्योंकि उनकी फिल्मों में समाज की बेहतरी वाली बातें बहुत मनोरंजक ढंग से रची गई होती हैं और वे बॉक्स ऑफिस पर कमाई भी जोरदार करती हैं. पहली फिल्म के बाद उन्होंने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ (2006), ‘3 ईडियट्स’ (2009), ‘पीके’ (2014) और ‘संजू’ (2018) लिखी व डायरेक्ट कीं.

उनकी हालिया फिल्म ‘संजू’ के इरादतन या गैर-इरादतन प्रोपोगैंडा कंटेंट को और ‘3 ईडियट्स’ के कुछ निम्नतर हास्य दृश्यों को छोड़ दें तो राजू का काम उल्लेखनीय और प्रशंसनीय रहा है. ऐसा है कि आकांक्षी फिल्ममेकर सीख सकते हैं.

उनसे जो कोई भी सीखना चाहे, उसे उनके मुंबई दफ्तर जाना चाहिए जहां एक दीवार पर वो सूत्र लिखे हैं जो हर फिल्म लिखने और बनाने के दौरान वे और उनके राइटिंग-पार्टनर अभिजात जोशी हमेशा याद रखते हैं. वे ही उनके लिखने का पैमाना हैं. राजू ने अपना दफ्तर बनाया तो अपने अनुभवों और वर्ल्ड सिनेमा के राइटर-डायरेक्टर्स से सीख लेते हुए, यहां चार श्रेणियों में ऐसे सूत्र सोचकर तैयार किए.

पहली, फिल्ममेकिंग
दूसरी, फिल्म एडिटिंग
और तीसरी श्रेणी एक्टर्स को डायरेक्ट करने को लेकर है.
हम बात करेंगे चौथी श्रेणी के उन 22 बिंदुओं की जो फिल्मों की कहानियां क्रिएट करने को लेकर बनाए गए हैं. राजू अपनी हर फिल्म की कहानी रचते हुए इन्हीं का अनुसरण करते हैं.

'पीके' के शूट के दौरान राजू और आमिर. (फोटोः राजकुमार हीरानी फिल्म्स)
‘पीके’ के शूट के दौरान राजू और आमिर. (फोटोः राजकुमार हीरानी फिल्म्स)

1. हमेशा एक विशेष (unique) कहानी ढूंढो. सिनेमा को आए 100 साल बीत चुके हैं. दर्शकों को वही कचरा बार-बार मत दो.

2. बहुत सी चीजों के प्रारंभ, मध्य और अंत होते हैं – लेकिन इससे वो कहानियां नहीं हो जातीं.

3. अधिकतर अच्छी कहानियां एक ऐसे नायक के बारे में होती हैं जो कुछ चाहता है लेकिन वो पाने में उसको मुश्किल पेश आ रही है.

4. कहानी से संचालित, या किरदार से संचालित कहानियां दरअसल होती ही नहीं हैं; सभी कहानियां द्वंद्व/तनाव (conflict/tension) से संचालित होती हैं.

5. सस्पेंस, टेंशन और द्वंद्व – ये चीजें किन्हीं भी खास शैलियों (genres) तक नहीं सीमित करनी चाहिए.

6. LCD – अगर किसी सीन में हंसना (laugh), रोना (cry) और नाटकीयता (drama) नहीं है तो उस सीन को फिल्म में नहीं रहने देना चाहिए.

7. व्याख्या – किरदारों की सूचना या पृष्ठभूमि की कहानियां अदृश्य होनी चाहिए.

8. दर्शक आपकी कहानी में तभी हिस्सा लेंगे जब उसमें अनिश्चितता होगी – भविष्य को लेकर, और, आगे आने वाली घटनाओं को लेकर.

9. टिक टिक करती घड़ियां, आपकी कहानी को एक समय सीमा (deadline) और एक मंजिल (destination) देती हैं. और, टेंशन भी. इससे ज्यादा भला आप क्या चाह सकते हैं.

10. अपने किरदारों को कहानी के स्तर पर कुछ लक्ष्य दो, जैसे – तय करो कि आपके किरदार क्या चाहते हैं, फिर उनको उसके पीछे जाने दो, और इससे कहानी खुद को अपने को अंदर से तकरीबन भर लेगी.

11. क़िस्सागोई (storytelling) समय-काल से परे एक स्वाभाविक मानव वृत्ति है – अपनी नैसर्गिक क्षमता पर भरोसा करो और उसे स्वीकार करो.

12. अपनी कहानियां ऐसे कहो जैसे आप किसी एक इंसान से बात कर रहे हो – एक की दर्शक संख्या एकदम सही संख्या है.

13. अंत से शुरू करो, और आप सही पथ पर बने रहोगे.

14. अधिकतर कहानियां काफी जल्दी शुरू हो जाती हैं.

15. कई कहानियों का अंत काफी देर से होता है.

16. जोखिम लेना बहुत आवश्यक है. प्रायः जितना ऊंचा जोखिम, उतना ही बेहतर.

17. असल जिंदगी में हम द्वंद्व/टकराव टालते हैं क्योंकि ये बहुत खराब होता है. वहीं, अपनी कहानियों में आपको इसे स्वीकारना चाहिए, यहां तक कि उसका पीछा करना चाहिए.

18. चीजें हमेशा बद्तर हो सकती हैं – हमें संभवतः इसे पढ़ते हुए ज्यादा मजा आएगा.

19. सभी कहानियों का अंत खुशीभरा होना जरूरी नहीं है; इतने साफ, सही, करीने वाले अंत तो पैकेजों के लिए होते हैं.

20. एक अच्छी कहानी न तो उपदेश देती है, न ही नैतिक होने की कोशिश करती है – वो जुड़ती है और समझ में आती है.

21. अच्छी कहानियां अनावश्यक हिस्सों को बाहर रखती हैं.

22. आपको अहसास भी नहीं है, उससे ज्यादा कहानियां आपके पास कहने के लिए हैं. अपनी में यकीन रखो.

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