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मूवी रिव्यू: राधे - योर मोस्ट वांटेड भाई

ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्में रिलीज़ होती आई हैं. कोरोना वायरस के चलते पिछले साल इस ‘परंपरा’ पर ब्रेक लगा था. पर इस बार फिर से ये शुरू हो गया है. ईद पर रिलीज़ हुई ‘राधे – योर मोस्ट वांटेड भाई’. फिल्म को आप ज़ी प्लेक्स पर देख सकते हैं. हमने भी ये फिल्म देखी. और भाई की ये पिक्चर देखकर हमें कैसा लगा, हम वही बताएंगे.

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सलमान भाई, ऐसी फिल्में लाओगे तो जनता स्वागत कैसे करेगी? फोटो – यूट्यूब

# Radhe की कहानी क्या है?

‘प्रेम रतन धन पायो’ और ‘भारत’ के बाद सलमान खान की ये तीसरी फिल्म है जो कोरियन सिनेमा से प्रेरित है. प्लॉट सेट है मुंबई में. यहां के बच्चे तड़प रहे हैं. आत्महत्या करने को मजबूर हैं. वजह है ड्रग्स की लत. स्कूली बच्चों को ये लत कौन लगा रहा है, किसी को नहीं पता. पुलिस के हाथ भी खाली हैं. कोई क्लू नहीं. शहर के पूरे क्रिमिनल नेटवर्क तक को भनक नहीं कि ये नया बंदा आखिर कौन है. ऐसे में पुलिस फैसला लेती है कि ऐसे शातिर क्रिमिनल को पकड़ने के लिए कोई टेढ़ा पुलिसवाला चाहिए. यहीं एंट्री होती है राधे की.

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एक ड्रग किंगपिन जिसके बारे में कोई कुछ नहीं जानता. फोटो – यूट्यूब

राधे. एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट. बदमाशों के साथ फुल ऑन उठा पटक मचाता है. जितने साल नौकरी नहीं की, उससे ज्यादा क्रिमिनल्स को ऊपर पहुंचा चुका है. अपनी धुन में रहता है. पुलिस के अनुशासन का आदी नहीं. फिल्म में सलमान खान बने हैं राधे. ‘वांटेड’ में भी उनके पुलिसवाले किरदार का यही नाम था. खैर, विलेन के किरदार का नाम है राणा. निभाया है रणदीप हुड्डा ने. अब राधे और राणा की इस चेज़ एंड रन में कौन आगे निकलता है, यही पूरी फिल्म की कहानी है.

# डिसक्लेमर तो सही देना चाहिए था

प्रभुदेवा के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म की शुरुआत होती है एक डिसक्लेमर से. फिल्म की मेकिंग के दौरान किसी भी जानवर को हानि नहीं पहुंचाई गई. सही बात है. किसी जानवर को हानि नहीं हुई. हानि हुई है तो बस फिज़िक्स को. लॉजिक को. हमारे ‘टू प्लस टू इज़ फोर’ समझने वाले दिमाग को. फिज़िक्स से तो सलमान भाई का पुराना बैर है. इधर भाई की फिल्म रिलीज़ होती है, उधर न्यूटन चचा की कब्र में हरकतें होना शुरू हो जाती हैं. ऐसा हम नहीं बोल रहे, लोग बोलते हैं. फिज़िक्स से अपनी पुरानी दुश्मनी जारी रखते हुए सलमान खान ने यहां भी इसका कत्लेआम किया है. फिल्म से ही इसके एग्ज़ाम्पल देते हैं.

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सलमान की फिल्मों से अकसर लोगों को शिकायत रहती है कि इनकी फिल्मों में लॉजिक नहीं होता. फोटो – यूट्यूब

पहला है राधे का एंट्री सीन. बदमाश के ठिकाने में घुसता है. टिपिकल हीरो की तरह. कांच की बड़ी खिड़की को तोड़कर. कांच के टुकड़े हवा में हैं. और राधे इन्हीं के बीच से अंदर आ रहा है. अपनी बड़ी-बड़ी आंखें खोले. कोई डर नहीं कि कांच के टुकड़े आंख में लग सकते हैं. चेहरे में धंस सकते हैं. लेकिन असली कैच तो आगे है. जब वो हवा में झूल रहे कांच के टुकड़ों में से एक को मुंह से लपककर बदमाश के गुर्गे पर हमला कर देता है. ये सब कुछ होता है चंद सेकंड्स में. मतलब अगर मीमर्स का धंधा चलते रहने के लिए इस सीन को डाला गया है, तो हमें कोई शिकायत नहीं. नेक विचार है. लेकिन अगर वजह कुछ और है, तो हमारे पास शब्द नहीं.

एक और सीन बताते हैं. जहां ग्रैविटी के नियम से दुश्मनी निकाली गई. एक एक्शन सीन. बदमाशों से लड़ने के बाद राधे पास में पड़ा एक डंडा उठाता है. गुस्से में भरकर उसे हवा में उछालता है. गुर्राता है. हीरो माफिक पोज़ देता है. सब कुछ होता है. लेकिन वो आज्ञाकारी डंडा नीचे नहीं आता. इस पॉइंट पर हैरानी नहीं होती. बस सवाल उठते हैं. कि ऐसे क्रिएटिव फैसले लिए किसने. फिल्म के डायरेक्टर प्रभुदेवा ने? स्क्रीनप्ले राइटर्स विजय मौर्या और एसी मुगिल ने या किसी और ने.

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देखकर हैरानी भी होगी और हंसी भी आएगी. फोटो – यूट्यूब

# यार मेनस्ट्रीम सिनेमा, तुम कब सुधरोगे

विलेन बने रणदीप हुड्डा को छोड़ दें तो ये फिल्म हर मायने में एक टिपिकल फिल्म है. उनके किरदार की इंटेंसिटी के जरिए फिल्म में नयापन लाने की कोशिश की गई. लेकिन उस कोशिश को भी सीमित घेरे में रखा. रणदीप को चाहे जितने भी सीन मिले हों, वो बड़ी आसानी से ‘स्टैंड आउट’ कर जाते हैं. उनके अलावा फिल्म में जैकी श्रॉफ भी हैं. पुलिसवाले बने हैं. पूरी फिल्म में इनके और राधे के बीच खिटपिट चलती रहती है. ऐसे सीन्स से कॉमेडी निकालने की कोशिश की गई. लेकिन कमजोर राइटिंग की बदौलत ऐसा हो नहीं पाया. बावजूद इसके जैकी श्रॉफ का अंदाज़ ऐसा है कि आपका अटेंशन उनपर जाएगा ही.

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फिल्म देखकर लगेगा कि दिशा को सिर्फ ग्लैमर अपील के लिए रखा गया है. फोटो – यूट्यूब

अब आते हैं फिल्म की हिरोइन पर. क्योंकि इन्हें फीमेल ‘लीड’ कहना गलत होगा. फिल्म की हिरोइन हैं दिशा पाटनी. हिरोइन इसलिए क्योंकि यहां इनका रोल ऐसा ही है. इनके किरदार दिया का अस्तित्व सिर्फ हीरो के इर्द-गिर्द ही घूमता है. दिया फिल्म में हो या नहीं, किसी को कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा. ऐसा लगता है कि वो बस ग्लैमर अपील के लिए फिल्म में हैं. उसके अलावा तो जैसे इनके किरदार का कोई मकसद न हो. जो कि आज के सिनेमा के संदर्भ में बेहद दुखद है. जहां पिछले एक दशक में हम ‘कहानी’ की विद्या बालन और ‘थप्पड़’ की तापसी पन्नू जैसे सशक्त महिलाओं के किरदार देख चुके हैं. वहीं दूसरी ओर दिया को बस डांस नंबर्स से याद रखा जाएगा. ये अपने आप में दुखद है.

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रणदीप हुड्डा – फिल्म के इकलौते अच्छे फैक्टर. फोटो – यूट्यूब

# दी लल्लनटॉप टेक

अंग्रेजी में एक शब्द है. ‘सेडिस्ट’. ऐसा इंसान जिसे दूसरों को यातना देकर मज़ा आता है. खुशी होती है. साफ कर दें कि हम सेडिस्ट नहीं. फिल्म देखते समय जो कुछ हमनें झेला, हम नहीं चाहते कि आप भी उस में भागीदार बनें. इशारा आप समझ ही गए होंगे. बाकी अगर फिर भी फिल्म देखने की इच्छा कुलबुला रही हो तो आप इसे ज़ी प्लेक्स पर 249 रुपये के रेंट पर देख सकते हैं.

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बस ऐसी हालत थी फिल्म खत्म होने तक. फोटो – यूट्यूब

वीडियो: हर्षद मेहता की कहानी से इंस्पायर्ड फिल्म ‘ द बिग बुल’ आखिर है कैसी?

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