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'मैं मरूं तो मेरी नाक पर सौ का नोट रखकर देखना, शायद उठ जाऊं'

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ये अपनी साहित्यिक वसीयत में लिख गए थे हरिशंकर परसाई. हमको लोगों के लिखे की तारीफ करनी होती है तो कहते हैं अहा, कितना मधुर. कितना मीठा. अद्भुत. उनके लिखे को मीठा कहना मानो बेइज्जती का ड्रम उड़ेलना. उसको तीखा कहो. कड़वा, एकदम नीम जैसा. मुर्दे को पढ़कर सुना दो तो उठकर कत्थक करने लगे.

हमारे तुम्हारे पढ़ने लिखने के दिनों में एक चलन होता था. जिसे जानना बालबुद्धि के लिए संभव नहीं थी. कि हिंदी साहित्य के जो लेखक कोर्स में शामिल हो जाते थे, वो खुद को सीरियसली लेना शुरू कर देते थे. ऐसा नहीं है कि वो पहले सीरियस नहीं होते थे. वो चिर धीर गंभीर होते थे. लेकिन ऐसा वैसा कुछ भी लिख लेने वाले साहित्यकार फिर बहुत ध्यान से कलम चलाते थे. अपनी इमेज के चलते. हरिशंकर परसाई इसमें भी गेम खेल गए. जब से कोर्स की किताबों में आए, और तीखा लिखने लगे. आज हरिशंकर परसाई का जन्मदिन है. आज ही की तारीख, सन 1924 में जन्मे थे वो.

परसाई के बारे में कहा जाता था कि वो लिखते तो गुरू शानदार, धारदार हैं. लेकिन कठिन लिखते हैं. और उनकी तारीफ करने वाले भी टेंसन में रहते थे. कि कहीं हमारे ऊपर ही न व्यंग्य लिख दें. धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक माने जहां जहां कुरीति और करप्शन के पिस्सू मिले, वहां कलम की स्याही को साबुन वाला पानी बनाकर नहला दिया. वो व्यंग्य लेखक को डॉक्टर की जगह रखते थे. जैसे डॉक्टर पस को बाहर निकालने के लिए दबाता है. वैसे व्यंग्य लेखक समाज की गंदगी हटाने के लिए उस पर उंगली रखता है. उसमें वो कितने कामयाब हुई ये बताना नापने वालों का काम है. हमारा तुम्हारा काम है उनको और पढ़ना. अपने लिटरेचर में जो सबसे मारक लाइनें लिखकर गए हैं वो. यहां पढ़ो.

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