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घोड़े की नाल ठोकने से ऑस्कर तक पहुंचने वाला इंडियन डायरेक्टर

साल 1957 में ‘मदर इंडिया’ रिलीज़ हुई और भारतीय सिनेमा में कभी न भूली जा सकने वाली फिल्म बन गई. आज़ादी के बाद जो फिल्में विदेशों में हमारी पहचान बना रही थीं, उनमें ये भी एक रही. इस फिल्म ने हमें पहली बार ऑस्कर में पहुंचाया. नॉमिनेशन मिला था बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में. एक वोट से ऑस्कर जीतने से रह गई. ये अवॉर्ड मिला इटैलियन फिल्म ‘नाइट्स ऑफ काबीरिया’ (Nights of Cabiria) को.

‘मदर इंडिया’ को डायरेक्ट किया था महबूब खान ने. अपने 30 साल लंबे करियर में उन्होंने बतौर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर कुल 24 फिल्में बनाईं. उस दौर में फिल्में कम बना करती थीं. लेकिन जो भी बनतीं समाज की बेहतरी और मनोरंजन के पैमाने को साधते हुए बनती थीं. महबूब साहब अपनी फिल्मों में महिलाओं के लिए सशक्त किरदार गढ़ते थे और उनकी गरिमा बचाए रखने के लिए किसी भी हद तक चले जाते थे. एक बार तो इस चक्कर में वो दिलीप कुमार के साथ भिड़ गए थे. पूरी कहानी तफ़सील से बताएंगे, तब तक इंट्रो वगैरह दुरुस्त कर लीजिए.

1. महबूब खान गुजरात के बिलमोड़ा शहर में 9 सितंबर, 1907 को पैदा हुए थे. नाम रखा गया रमज़ान खान. बचपन में कभी स्कूल नहीं गए. पापा पुलिस में थे और ये अपने रंग में. बचपन से ही फिल्मों का शौक था. एक्टर बनने का सपना लिए 16 की उम्र में ही घर से भागकर मुंबई चले गए थे. पापा को जैसे ही पता चला, गए और पकड़कर ले आए. इतने सब के बाद भी सिर से एक्टिंग का भूत नहीं उतरा था. उन्हीं के शहर से एक सज्जन फिल्म इंडस्ट्री में काम करते थे. नाम था मोहम्मद नूर मोहम्मद शिप्रा. वो फिल्मों की शूटिंग के लिए घोड़े सप्लाई करते थे. वो महबूब को अपने साथ मुंबई ले आए. तब महबूब 23 के थे. मुंबई आकर वो नूर मोहम्मद के तबेले में घोड़ों की नाल ठोकने का काम करने लगे. एक दिन महबूब किसी काम से साउथ इंडियन फिल्मों के डायरेक्टर चंद्रशेखर के फिल्म सेट पर गए. यहां रुककर उन्होंने पूरा प्रोसेस देखा और डायरेक्टर से कहा कि उनके साथ काम करना चाहते हैं. चंद्रशेखर ने कहा ठीक है, जूनियर आर्टिस्ट और एक्स्ट्रा वाले रोल कर लो. एक्स्ट्रा का मतलब छौना एक्टर जो सीन में मेन एक्टर के पीछे खड़ा रहता है और उसके हिस्से कोई डायलॉग वगैरह नहीं होता. तो वहां से महबूब खान का एक्टिंग करियर शुरू हुआ.

एक बॉलीवुड फंक्शन के दौरान डायरेक्टर के.आसिफ, बी.आर.चोपड़ा, महबूब खान (हाथ आगे किए हुए) और राज कपूर.
एक बॉलीवुड फंक्शन के दौरान डायरेक्टर के.आसिफ, बी.आर.चोपड़ा, महबूब खान  (हाथ आगे किए हुए) राज कपूर और बिमल रॉय.

2. अभी बोलती फिल्मों का दौर नहीं शुरू हुआ था. साइलेंट फिल्में ही बना करती थीं. अर्देशीर ईरानी को उस समय के बड़े डायरेक्टरों में गिना जाता था. इनका ही एक नाटक देखकर करीमुद्दीन आसिफ को ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बनाने का आइडिया आया था. अर्देशीर ने महबूब को देखा और अपनी फिल्मों में सपोर्टिंग रोल दे दिया. इस दौरान महबूब ने तकरीबन छह-सात फिल्मों में सपोर्टिंग एक्टर का रोल किया. अर्देशीर भारत के इतिहास की पहली बोलती फिल्म प्लान कर रह थे. फिल्म का नाम था ‘आलम अारा’. उन्होंने इसमें महबूब को बतौर लीड कास्ट कर लिया. लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने अर्देशीर को कहा कि आप पहले ही इतना बड़ा एक्सपेरिमेंट करने जा रहे हैं, ऊपर से नया हीरो. इसमें कोई ऐसा एक्टर लीजिए, जिसे लोग जानते हों. ये नया लड़का इस रोल के लिए ठीक नहीं है. लीड वाली फिल्म मिलने से पहले ही हाथ से निकल गई. बाद में उस दौर के मशहूर स्टंटमैन मास्टर विठ्ठल को इस फिल्म के लिए साइन कर लिया गया.

फिल्म 'आलम अरा' भारत की पहली बोलती फिल्म थी. इसमें एक स्टंटमैन ने लीड रोल किया था.
साल 1931 में आई फिल्म ‘आलम अारा’ भारत की पहली बोलती फिल्म थी. इसमें एक स्टंटमैन ने लीड रोल किया था.

3. इस घटना के बाद महबूब को ये पता लग गया कि एक्टिंग में करियर काफी दिक्कत भरा होगा. इसलिए उन्होंने फिल्में बनाने की सोची. अपने आइडिया लेकर अलग-अलग फिल्ममेकर्स के पास जाने लगे. साल 1935 में पहली फिल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला. फिल्म थी ‘अल हिलाल’ मतलब ‘ख़ुदा का इंसाफ’. फिल्म चल निकली और और महबूब को काम मिलने लगा. अगले पांच सालों में उन्होंने आठ फिल्में डायरेक्ट/प्रोड्यूस कीं. ये फिल्में थीं- ‘मनमोहन’, ‘डेक्कन क्वीन’, ‘जागीरदार’, ‘वतन’, ‘हम तुम और वो’, ‘एक ही रास्ता’, ‘औरत’ और ‘अलीबाबा.’

1940 में आई फिल्म ‘औरत’ के कॉन्सेप्ट और महबूब के डायरेक्शन की बहुत तारीफ हुई. अब महबूब सफल डायरेक्टरों में गिने जाने लगे थे. इंडस्ट्री में अपने लिए एक मुकाम बना लेने के बाद उन्होंने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म ‘औरत’ को रीमेक किया. इस फिल्म को बड़े बजट और स्टार्स के साथ बनाने की बात तय हुई. फिल्म का नाम रखा गया ‘मदर इंडिया’.

ये फिल्म पहले दिलीप कुमार करना चाहते थे.
ये फिल्म पहले दिलीप कुमार करना चाहते थे.

4. महबूब खान के बेटे इक़बाल खान ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि महबूब ने ‘मदर इंडिया’ का आइडिया सबसे पहले अपने दोस्त दिलीप कुमार के साथ डिस्कस किया. तब दिलीप कुमार इंडस्ट्री के सबसे बड़े सुपरस्टार थे. उन्हें कहानी पसंद आई. उन्होंने कहा कि वो फिल्म में बाप और बेटे दोनों का रोल करना चाहते हैं. इस बात के लिए उन्होंने महबूब को बहुत मनाने की कोशिश, लेकिन महबूब टस से मस नहीं हुए. वो नहीं चाहते थे कि एक कलाकार के स्टारडम के सामने उनका महिला किरदार फीका पड़ जाए. दिलीप कुमार के फिल्म में आने से लोग कहानी और किरदार से ज़्यादा उन पर फोकस करेंगे. इससे कहानी को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने का मक़सद धरा का धरा रह जाएगा. दिलीप कुमार भी महबूब खान की बहुत इज़्ज़त करते थे, उनकी बात मान गए.

हालांकि बाद में अपनी आत्मकथा ‘दिलीप कुमार: दी सब्सटैंस एंड दी शैडो- ऐन ऑटोबायोग्रफी’ में दिलीप कुमार ने इस मामले पर लिखा –

“मैं ‘मेला’ (1948) और ‘बाबुल’ (1950) जैसी कई फिल्मों में नरगिस के प्रेमी का रोल कर चुका था, ऐसे में उनके बेटे का रोल करना मुझे शोभा नहीं देता था. न ही दर्शक मुझे इस तरह के किरदार में स्वीकार कर पाते. इसलिए मैंने ‘मदर इंडिया’ करने से मना कर दिया.”

बाद में उन्हीं महबूब खान ने दिलीप कुमार को लेकर ‘अंदाज़’ (1949) और ‘अमर’ (1954) जैसी फिल्में बनाईं. ‘अमर’ में तो महबूब ने दिलीप कुमार से नेगेटिव रोल करवा दिया था.

फिल्म 'अमर' में दिलीप कुमार ने एक वकील का रोल किया था, जो गांव की एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उसे छोड़ देता है.
फिल्म ‘अमर’ में दिलीप कुमार ने एक वकील का रोल किया था, जो गांव की एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उसे छोड़ देता है.

5. ‘मदर इंडिया’ के बाद महबूब खान के काम की खासी चर्चा थी. एक बार उन्हें अमेरिका से न्यौता आया. हॉलीवुड के कुछ बड़े फिल्मकार उनसे मिलना चाहते थे. शायद उनके साथ फिल्में बनाना चाहते थे. महबूब को कभी पूरी शिक्षा नहीं मिली थी, इसलिए अंग्रेज़ी में उनका हाथ तंग था. अमेरिका जाने के नाम पर उनके हाथ-पांव फूलने लगे. उन्होंने दिलीप कुमार को साथ अमेरिका चलने को कहा. दिलीप कुमार मान गए.

अमेरिका में हॉलीवुड के कुछ बड़े डायरेक्टर्स महबूब खान से मिलने आए. वो महबूब से सवाल पूछते, जवाब दिलीप कुमार देते. थोड़ी देर बाद महबूब को लगने लगा कि ये अंग्रेज़ लोग इन्हें सीरियसली नहीं ले रहे और इनका मजाक बना रहे हैं. वो गुस्सा हो गए और दिलीप कुमार को साथ लेकर फौरन वहां से बाहर निकल गए. इसके बाद उन्होंने तय किया कि हॉलीवुड वालों के साथ कभी काम नहीं करेंगे.

साल 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौत के ठीक अगले दिन महबूब को हार्ट अटैक आया और उनकी डेथ हो गई.


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