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आपने देखी है कभी अफगान जलेबी?

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कटरीना कैफ बड़ा भला नाच रही हैं. देखकर सवाल उठा – कटरीना मैडम आपने अफगान जलेबी खाई है? सवाल उठा क्योंकि अफगान जलेबी सुन खुटका हुआ. जलेबी अफगान ही क्यों? हमारे यहां मावा डाल जो जलेबी बनती है कि हलवाई खुद की पाककला पर मर मिटते हैं,वो क्यों नहीं? क्रिश्चियन कॉलेज के काका कैंटीन की जलेबी खा-खाकर किशोर कुमार गायक बन गए वो जलेबी क्यों नहीं? फिर याद आया गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य तो खुद लखनऊ के हैं. वहां तो इमरती,जलेबी और बालूशाही हचक के बनाई-खाई जाती है. उसी का जिक्र कर देते. इतना इंटरनेशनल होने की क्या जरुरत थी. फैंटम के डायरेक्टर कबीर खान हैदराबाद में जन्मे थे. हो ही नहीं सकता वहां ‘हाईकोर्ट की जलेबी’ न खाई हो . प्रेमनाथ चलाते हैं दुकान . उनके पापा 40-42 साल पहले राजस्थान के बाड़मेर से आए थे. तब से ‘हाईकोर्ट की जलेबी’ खिला रहे हैं.

कोलकाता की जिलपी

संगीतकार प्रीतम कोलकाता के हैं. चने की जलेबी और पनीर जलेबी के बूते अफगान जलेबी की बजाय बंगाल जलेबी. माफ़ कीजियेगा जिलपी कहलवा देते. बंगाल में इसे जिलपी कहते हैं. अफगान जलेबी गाया है पाकिस्तानी गायक असरार ने. पिछले चार सालों में वो पाकिस्तानी गायकी में कंधे खोल चुके हैं. मजे की बात देखिये जहां फैंटम आधारित थी हिन्दुस्तान पर पाकिस्तान की ओर से हुए आतंकी हमले पर. उसी फिल्म का गाना कोई पाकिस्तानी गा रहा है. कलाकारों ने कब खून-खराबे को तवज्जो दी है. उस कश्मीर के जिस हिस्से में असरार पैदा हुए वहां से अफ़ग़ानिस्तान का बॉर्डर भी कोई हजार किलोमीटर पड़ता है. तो ये भी नहीं कह सकते कि असरार ने पड़ोस के नाते जलेबी अफ़ग़ानिस्तानी बता दी.

जल-वल्लिका बनाम जबालिया 

जलेबी को भारतीय मिठाई बताने वाले इसका प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं. कुछ इसे जल-वल्लिका भी कहते हैं. इसे विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वालों को तकलीफ हो सकती है,जब कोई कहे जलेबी का असल नाम जलाबिया है. और ये अरबी भाषा का शब्द है. तुर्की वाले इसे ज़ुलुबिया कहते हैं. ईरान वाले रमजान के महीने में जलेबी गरीबों में बांटा करते हैं. यहां पन्द्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी को सरकारी स्कूल के बच्चों में बंटती है. हर मुल्क के अपने गरीब होते हैं. जलेबी ग्रीस और साइप्रस तक मिलती है बस नाम बदल जाते हैं.

अपनी जलेबी और अफगान जलेबी में फर्क सिर्फ इतना है कि अफगान जलेबी में आपको मैदा न मिलेगा,शक्कर की चाशनी के बजाय शहद मिल जाएगा. तो सवाल जो रह गया वो ये कि जलेबी अफगान ही क्यों? विद्वान जलेबी कहां से आई इस पर भी बहस कर सकते हैं. पर समझदारों को चाहिए कि नुक्क्ड़ से जलेबी मंगाएं और अफगान जलेबी सुनते हुए जलेबी के मजे लें.

जलेबी से एक बात और 

जलेबी का नाम लेते ही कुछ लोगों को दूरदर्शन के जमाने का धारा तेल वाला वो विज्ञापन याद आया होगा. जिसमें बच्चा घर छोड़कर चला जाता है और फिर जलेबी का नाम सुनकर वापिस घर आ जाता है. नॉस्टैल्जिक प्राणी हों तो इस वीडियो को देखकर पुराने दिन याद कर सकते हैं.

गुजरात दंगों में खोए बच्चे के हाथ लगी बन्दूक

बात निकली तो बताते चलें कि परज़ान दस्तूर नाम का ये मासूम सा बच्चा जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो इसने ‘परज़ानिया’, ‘सिकंदर’ और ‘ब्रेक के बाद’ जैसी फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए. परज़ानिया में गुजरात दंगों में खोए पारसी बच्चे के तौर पर नजर आया.वहीँ सिकंदर में फुटबॉल से प्यार करने वाले कश्मीरी मुसलमान बच्चे का किरदार निभाया. जिसके हाथ कहीं से एक रोज बन्दूक लग जाती है.रिलीज हो जाए तो ‘फैंटम देखिए.तलाशिए सिकंदर देखिये,परज़ानिया देखिए.कश्मीर और गुजरात का नाम आएगा तो बातें जलेबी सी उलझेंगी. उलझिए परज़ान की मासूमियत आपको बताएगी,बुरे सिर्फ वो नहीं जिनसे ‘फैंटम’ में लड़ाई है.
बाकी जलेबी तो सबको अच्छी लगती है.

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