Submit your post

Follow Us

श्राद्ध की तरह दुनिया भर में मृत आत्माओं के लिए मनाए जाते हैं त्योहार. इन्हें पढ़कर तो आप चौंक ही जाएंगे

इंसानी सभ्यता की शुरुआत के साथ ही शुरू हुआ सामाजिक कर्मकांडों का सिलसिला अब तक जारी है. त्योहारों से लेकर अपने पूर्वजों को याद करने का सिलसिला बरसों पुराना है. हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने की परंपरा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि हिंदू धर्म या अकेले भारत में ही इस तरह की परंपरा है. इस परंपरा के सूत्र तकरीबन हर देश और सभ्यता में फैले हैं. आइए जानते हैं मृत लोगों की याद में मनाए जाने वाले ऐसे त्योहारों के बारे में, जो दुनिया के कोने-कोने में धर्मों की सीमाओं के परे फैले हैं.

सबसे पहले श्राद्ध और पितृपक्ष को जान लीजिए
श्राद्ध मतलब अपने पितरों या पूर्वजों के लिए श्रद्धा और समर्पण प्रकट करना. वो पूर्वज, जो हमे छोड़कर परलोक जा चुके हैं। हम उनका आह्वान करते हैं और उनको भोजन के साथ श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें याद करते हैं. इसे पितृपक्ष पूर्णिमा (इस साल 2 सितंबर, 2020) से लेकर अमावस्या (17 सितंबर, 2020) तक मनाया जाता है. मतलब तकरीबन 15-16 दिन का वक्त इसके लिए रखा गया है. ऐसी मान्यता भी है कि पितरों ने भगवान से याचना की थी कि उन्हें पृथ्वी पर अपने कुल-कुटुंब के लोगों से मिलने का एक मौका दिया जाए. भगवान ने पितृ पक्ष के दिनों को पितरों की आत्मा को पृथ्वी भ्रमण के लिए तय किया. जब पितर इस वक्त पृथ्वी पर आते हैं तो अपने परिवार के किए गए तर्पण से मिले भोग का ही सेवन करते हैं और अपने परिवार के लोगों के मंगल की कामना करते हैं. ये तो हुई कर्मकांड की बात, लेकिन समाजशास्त्री इसे समाज को अपने पूर्वजों से जोड़कर रखने वाली एक प्रैक्टिस की तरह देखते हैं. उनका मानना है कि इससे लोग अपने पूर्वजों से जुड़ा महसूस करते हैं. और यही वजह है कि पूरी दुनिया में मृत लोगों से जुड़े त्योहार मनाए जाते हैं.

Sale(100)
बोधगया में अपने पितरों की याद में पिंड दान करने हर साल लाखों लोग पहुंचते हैं.

अब जानते हैं दुनिया के दूसरे देशों के बारे में

डाई डे मुरेटोस या डे ऑफ डेड

देश – मैक्सिको और दक्षिण अमेरिका के देश

यह दुनिया का शायद सबसे बड़ा आयोजन है, जो मर चुके लोगों की याद में किया जाता है. इसके रंगीन नजारे और संगीत दक्षिण अमेरिकी कल्चर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. आप एक बड़े आयोजन में जो भी सोच सकते हैं, वह सब होता है इस फेस्टिवल में. मैक्सिको में इसके आयोजन पर बाकायदा छुट्टी रखी जाती है. लोग रात को कब्रिस्तानों में जमा होते हैं. चीनी के नरमुंड बनाए जाते हैं. शहर में एक कार्निवाल मतलब मेला लगता है, जिसमें लोग मरे हुए लोगों की तरह तैयार होकर आते हैं. खाने-पीने की तरह-तरह की चीजें बनती हैं. इसे लोग जमकर सेलिब्रेट करते हैं. मैक्सिको के कल्चर में सेंटा म्यूरते नाम की मृत्यु की देवी भी मिलती हैं. इनका काम लोगों की रक्षा करना और मृत आत्माओं को सुरक्षित बैकुंठ पहुंचाने जैसा माना जाता है. इस दिन इन्हें मानने वाले इन्हें भी याद करते हैं. इसे गर्मियों की शुरुआत में 31 अक्टूबर, 1 नवंबर और 2 नवंबर को मनाया जाता है.

Sale(95)
मैक्सिको में डे ऑफ डेड मनाने के लिए लोग रात में कब्रिस्तान में जाकर अपने पुरखों को याद करते हैं.

 

Sale(93)
दुनिया भर में लोग मैक्सिको के इस त्योहार को पहचानने लगे हैं.

 

Sale(94)
इस त्योहार में हिस्सा लेने के लिए लोग बाकायदा कॉस्ट्यूम सिलवाते हैं.

इस त्योहार के बारे में समझने का सबसे अच्छा तरीका है 2017 में आई एनिमेशन फिल्म कोको. इस फिल्म में 12 साल के एक बच्चे के जरिए इस त्योहार को बहुत ही रोचक तरीके से पेश किया गया है. फिल्म को साल का बेहतरीन एनिमेशन मूवी और म्यूजिक के लिए ऑस्कर अवॉर्ड से भी नवाजा गया था.

Sale(97)
2017 में रिलीज हुई फिल्म एनिमेशन फिल्म कोको में डे ऑफ डेड फेस्टिवल के बारे में बहुत रोचक तरीके से दिखाया गया है.

 

Pchum Ben या चम बेन

देश – कंबोडिया

इसके बारे में जानकर आप चौंक जाएंगे कि यह हमारे पितृपक्ष से कितना मिलता-जुलता हुआ है. हमारे पितृपक्ष की तरह चम बेन भी 15 दिनों का कर्मकांड है. कंबोडिया में भी ऐसी मान्यता है कि इस दिन मृत आत्माएं अपने परिवार के पास आती हैं. इसके शुरुआती दिनों को कान बेन कहा जाता है. इन दिनों में अपने पूर्वजों को घर पर याद किया जाता है. 15वें दिन को चम बेन का दिन कहते हैं. इस दिन लोग एक साथ जमा होकर सेलिब्रेट करते हैं. खाना-पीना अपने पूर्वजों को अर्पित करते हैं और खुद भी खाते हैं. लोग अपने पूर्वजों से बेहतर भविष्य और गलती से हुए गलत कामों के लिए माफी भी मांगते हैं.

Sale(96)
कंबोडिया में मृत पुरखों के लिए मनाया जाने वाला त्योहार हमारे श्राद्ध से बहुत मिलता-जुलता है.

यह त्योहार मूल रूप से बौद्ध लोग मनाते हैं. कंबोडिया और भारत के पितृपक्ष की समानता का एक कारण यह भी है कि कंबोडिया में हिंदू धर्म के अंकोरवाट जैसे बड़े मंदिर हैं. इसके अलावा वहां बौद्ध धर्म को मानने वाले भी बहुत हैं, जो मूल रूप से भारत से वहां पहुंचे हैं.

 

Halloween या हालोवीन

देश- अमेरिका और यूरोप

इस फेस्टिवल की सबसे बड़ी पहचान है कद्दू को खोखला करके बनाया गया एक भुतहा चेहरा. अमेरिका और यूरोप में क्रिश्चियन इस फेस्टिवल को बहुत चाव से मनाते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि यह भी मैक्सिको के फेस्टिवल ऑफ डेड की तरह 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक मनाया जाता है. इस त्योहार पर बच्चे तरह-तरह की अजीबो-गरीब ड्रेसेज में तैयार होते हैं. रात में घर-घर जाते हैं जहां कैंडी या टॉफी उनकी हालोवीन बास्केट में डालने की परंपरा है. इस त्योहार को भी अपने पूर्वजों की याद में और मर चुके लोगों को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है. पॉपुलर कल्चर में दिखने वाला यह मृत लोगों से जुड़ा सबसे बड़ा त्योहार है.

Sale(101)
अमेरिका में हालोवीन पर डरावनी और रोचक कॉस्ट्यूम में तैयार होने का चलन है.

 

Sale(102)
कद्दू को खोखला कर उसमें भुतही आकृति बनाकर हालोवीन मनाना बच्चों को खूब लिभाता है.

 

Sale(103)
हर साल अमेरिकी राष्ट्रपति व्हाइट हाउस में हालोवीन पर बच्चों से मिलते हैं और उन्हें कैंडी देते हैं.

हॉलिवुड की फिल्मों ने हालोवीन को डर पैदा करने वाले त्योहार की तरह इतना दिखाया कि यह नाम त्योहार से ज्यादा डरावनी फिल्मों से जुड़ गया है. आपको भी अगर डर और हालोवीन का कनेक्शन देखना है तो 1978 से लेकर 2018 तक Halloween के नाम से बनी कई फिल्में देख सकते हैं.

 

शब-ए-बारात

देश – अरब सहित सभी इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग

शब-ए-बारात दो शब्दों, शब और बारात से मिलकर बना है. शब का अर्थ है रात और बारात का मतलब बरी होना। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार, यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है. यह अरब में लैलतुल बराह या लैलतुन निसफे मीन शाबान के नाम से जाना जाता है। जबकि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, अफगानिस्तान और नेपाल में यह शब-ए-बारात के नाम से जाना जाता है। जैसा कि बाकी मृत लोगों के त्योहारों पर होता है, वैसे ही इस त्योहार पर मस्जिदों और कब्रिस्तानों में खास सजावट की जाती है। घरों पर खास रोशनी की जाती है। पुरखों की कब्रों पर चिराग जलाए जाते हैं. रात में लोग कब्रों पर आकर इबादत करते हैं. मान्यता है कि शबे-बरात की रात मुस्लिमजन दुनिया से रुखसत हो चुके परिजनों के लिए दुआएं मांगते हैं। शब-ए-बारात इस्लाम की 4 मुकद्दस रातों में से एक है। इसमें पहली आशूरा की रात दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बारात और चौथी शब-ए-कद्र होती है।

Sale(98)
शब-ए-बारात पर लोग सूरज ढलने के बाद कब्रिस्तानों में जमा होकर इबादत करते हैं

ये जनजाति हर साल बिछड़ों को कब्र से बाहर निकाल मनाती है फेस्टिवल

देश – इंडोनेशिया

ये कुछ अलग है. आपने मृत पुरखों की याद में उनके लिए त्योहार मनाते तो सुन लिया लेकिन एक जनजाति ऐसी भी है, जो अपने मर चुके परिजनों के शरीर को हर साल कब्र से बाहर निकालते हैं और उसके साथ सेलिब्रेट करते हैं. इस जनजाति का नाम है तोराजा. इस जनजाति में 10 लाख से ज्यादा लोग हैं, जो इस तरह की प्रैक्टिस करते हैं. किसी भी मर चुके परिजन को ये लोग एक खास विधि से जमीन में दफन करते हैं. इसके बाद हर साल अगस्त के महीने में एक खास दिन बॉडी को कब्र से बाहर निकाला जाता है. उसे बेहतरीन और पसंद के कपड़े पहनाए जाते हैं और उसके साथ बैठकर ही खाना-पीना होता है. ऐसा सिर्फ बुजुर्गों के साथ ही नहीं बल्कि मर चुके छोटे बच्चों के साथ भी किया जाता है. शरीर को दफनाने से पहले उसे महीनों तक घर पर रखा जाता है और उसे मृत नहीं बल्कि बीमार माना जाता है. इस दौरान उसे चाय-कॉफी-सिगरेट और खाना ऑफर किया जाता है. अपने परिजनों को इस तरह से दफन करने में वो लाखों रुपए खर्च करते हैं और इसके लिए लोन तक लेते हैं.

Sale(99)
इंडोनेशिया की 10 लाख की आबादी वाली जनजाति टोराजा के लोग अपने परिजनों को हर साल कब्र से बाहर निकाल कर सेलिब्रेट करते हैं.

हमने आपको चुनिंदा ऐसे कल्चर के बारे में बताया, जहां लोग अपने पूर्वजों को सम्मान और स्नेह देने के लिए अलग-अलग तरह से त्योहार मनाते हैं. इनके अलावा भी बहुत से ऐसे कल्चर हैं, जहां इस तरह के त्योहार मनाए जाते हैं.

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

फिल्म रिव्यू- सड़क 2

जानिए कैसी है संजय दत्त, आलिया भट्ट स्टारर महेश भट्ट की कमबैक फिल्म.

वेब सीरीज़ रिव्यू- फ्लेश

एक बार इस सीरीज़ को देखना शुरू करने के बाद मजबूत क्लिफ हैंगर्स की वजह से इसे एक-दो एपिसोड के बाद बंद कर पाना मुश्किल हो जाता है.

फिल्म रिव्यू- क्लास ऑफ 83

एक खतरनाक मगर एंटरटेनिंग कॉप फिल्म.

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

आज ट्रेलर आया और कुछ लोग ट्रेलर पर भड़क गए हैं.

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

कद्दावर डायरेक्टर हंसल मेहता बनायेंगे ये वेब सीरीज़, सो लोगों की उम्मीदें आसमानी हो गई हैं.

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म.

फ़िल्म रिव्यू: गुंजन सक्सेना - द कारगिल गर्ल

जाह्नवी कपूर और पंकज त्रिपाठी अभिनीत ये नई हिंदी फ़िल्म कैसी है? जानिए.

फिल्म रिव्यू: शकुंतला देवी

'शकुंतला देवी' को बहुत फिल्मी बता सकते हैं लेकिन ये नहीं कह सकते इसे देखकर एंटरटेन नहीं हुए.

फ़िल्म रिव्यूः रात अकेली है

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे अभिनीत ये पुलिस इनवेस्टिगेशन ड्रामा आज स्ट्रीम हुई है.

फिल्म रिव्यू- यारा

'हासिल' और 'पान सिंह तोमर' वाले तिग्मांशु धूलिया की नई फिल्म 'यारा' ज़ी5 पर स्ट्रीम होनी शुरू हो चुकी है.