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पागलपंती: मूवी रिव्यू

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‘एक और एक ग्यारह’ मूवी में एक डायलॉग था ओ पाजी! जब हमारे साथ सब राईट ही राईट हो रहा है तो एक और राईट ले लेते हैं. और यूं राईट लेते-लेते वो जहां से निकले थे वहीं पहुंच जाते हैं. यानी गुंडों के अड्डे. इस सीन की याद मुझे ‘पागलपंती’ देखते हुए आई क्यूंकि इसमें भी ऑलमोस्ट यही सीन दोहराया गया है.

# मूवी कैसी लगी-

जब हमें बचपन में ‘सेवन टाइल्स’ के लिए बॉल बनानी होती थी तो हम दर्ज़ी के पास जाते थे. उसके सिले हुए कपड़ों की कतरनें बीनने. उनको आपस में सिलकर एक बहुत अच्छी तो नहीं पर कामचलाऊ बॉल बन जाती थी. तो इस फिल्म के साथ भी यही हुआ है. डायरेक्टर अनीस बज़्मी ने अपने स्क्रिप्ट राइटिंग के दौर की कई फिल्मों की कतरनों से एक नई मूवी बना ली है. जो बहुत अच्छी तो नहीं कामचलाऊ ज़रूर बन पड़ी है.

# कहानी क्या है-

फिल्म का स्पॉइलर दूं- इसमें कोई कहानी ही नहीं है. फिर भी जो कुछ है उसे बताने की कोशिश करते हैं. और बहुत हद तक संभव है ये कोशिश, फिल्म की स्क्रिप्ट से बेहतर निकल जाए. दो भाई हैं. जंकी और चंदु. उन दोनों का एक ‘अपशकुनी’ दोस्त है राज किशोर. इनके ‘बेड लक’ के चलते तीनों की ही किस्मत में ताले लग जाते हैं.  और अपनी इसी फूटी किस्मत के चलते ये डॉन ‘राजा साहब’ और उसके साले ‘वाईफाई भाई’ के पास पहुंच जाते हैं. ‘राजा साहब’ गुंडों की ह्यार्की में सबसे ऊंची रेंक पर नहीं हैं. उनसे और सबसे ऊंची रेंक पर हैं. नीरज मोदी. नीरज मोदी के पास बहुत पैसा है, और कुछ पैसा वो इंडिया के पीएमबी बैंक से लेकर भागा है. अगर आपको ये नीरज मोदी वाली बात किसी ‘रियल स्टोरी’ पर बेस्ड लग रही है तो, धोखा मत खाइए. क्यूंकि रियल स्टोरी, इस फ़िल्मी स्टोरी से कहीं ड्रामेटिक है.

हां तो यही सब कुछ चलता रहता है और बाकी फिल्मों की तरह ये फिल्म भी The End तक पहुंच जाती है.

# क्या चीज़ मस्त है-

कहीं-कहीं लोगों की पागलपंती अच्छी लगती है. कहीं-कहीं कैरेक्टर्स के डायलॉग भी हंसाते हैं. जैसे वाईफाई भाई का अपने जीजा से कहना-

हम ग़लत प्रोफेशन में आ गए, अगर किसान होते को लोन माफ़ हो जाता.

 

इतने करैक्टर्स पर रोल एक भी नहीं.
इतने करैक्टर्स पर रोल एक भी नहीं.

# म्यूज़िक कैसा है-

तनिष्क बागजी की धुन में शब्बीर अहमद का लिखा ‘बीमार दिल’ गीत सुंदर है. जिसके लिरिक्स अपने साथी म्यूज़िक के साथ बड़े अच्छे से ब्लेंड होते हैं. इस गीत के दो बार आने के चलते एक रिकॉल वैल्यू क्रियेट होती है. बाकी गीत ओके-ओके हैं. स्टार्ट के क्रेडिट्स रोल होते वक्त का गीत ‘तुम पर हम हैं अटके’ बड़ी ज़ल्दी आ गया सा लगता है. लेकिन इसके बीच-बीच में आने वाले विज्ञापनों की पंच लाइन क्रिएटिव लगती हैं जैसे- ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी.  यो यो हनी सिंह का गीत ठुमका भी ओके ओके है. एंड क्रेडिट रोल होते वक्त का गीत पागलपंती पैपी है.

# क्या चीज़ बुरी है-

फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि आपको इसे देखकर लगेगा ही नहीं कि ‘अरे! ये सीन तो हम किसी फिल्म में पहले भी एक बार देख चुके हैं.’ क्यूंकि आप वो सीन, वो कॉन्फ्लिक्ट, वो जोक, वो ह्यूमर पहले भी एक बार नहीं बल्कि हज़ारों बार देख चुके हैं. फिल्म के हिट होने के जो-जो मसाले संभव थे वो सब जोड़े गये हैं. नीरज मोदी टाइप रियल लाइफ करैक्टर से लेकर यूरोप की लोकेशन तक. गाड़ियां उड़ाने से लेकर चेज़ सीन्स तक. क्लाइमेक्स में कॉमेडी और एक्शन की ब्लेडिंग से लेकर लाउड बैकग्राउंड म्यूज़िक तक. जंगल के शेर से लेकर देशभक्ति तक. देशभक्ति वाला आईडिया शायद जॉन अब्राहम का रहा होगा. और इस सब मसालों के बाद एक ‘यूपी’ बचा था वो एक गीत में डाला गया है. वो भी जैसे किसी चेक लिस्ट में इस वाले फ़ॉर्मूले को भी चेक करना हो. बिलकुल प्लस्टिक तरीके से. दो बार. एक बार यूपी एक बार उत्तर प्रदेश. आई मीन कम ऑन.

# एक्टिंग कैसी की है-

वाई फाई बने हैं अनिल कपूर. राज किशोर बने हैं जॉन अब्राहम. अरशद वारसी, जंकी बने हैं. चंदू बने हैं पुलकित सम्राट. राजा साहब का रोल किया है सौरभ शुक्ला ने और नीरज मोदी बने हैं इनामुलहक. मूवी में हर एक एक्टर के पास करने को इतना कुछ है कि कोई कुछ भी नहीं करता. इस तरह की फिल्मों से वैसे भी किसी की एक्टिंग की बुराई या तारीफ़ इसलिए नहीं की जा सकती क्यूंकि हर एक को क्यू मिला होता है कि ओवर एक्टिंग करनी है. लाउड रहना है. दर्शकों के लिए ऑन योर फेस.

# फाइनल वर्डिक्ट-

जब मूवी में हर चीज़ इतनी घिसी पीटी है तो फिर क्या इस मूवी को देखना बनता है? उत्तर ये है कि अगर किसी राइड या किसी झूले में आपको मज़ा आता है तो आप उसे दूसरी बार, तीसरी बार देखते हो न. तो बस ये वो राइड ‘नहीं’ है.

लास्ट में अगर आप पूछें कि ये फिल्म पैसा वसूल है या नहीं. तो इसका उत्तर है कि डिपेंड करता है आपने फिल्म बालकॉनी में बैठकर देखी है या सेकेंड क्लास में.


वीडियो देखें:

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