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ये मां ना तो गाजर का हलवा बनाती है, ना ही दूध का क़र्ज़ वसूलती है

“तुझे अपने बाप के ख़ून का बदला लेना है बेटे. जालिमों का सर्वनाश करना है.”

“रुक जा बेटे, तुझे मेरी ममता का वास्ता!”

“देखिए जी, आप मेरे लाल को ऐसे न डांटिए.”

“मेरे दूध का क़र्ज़ चुकाने का वक़्त आ गया है.”

“क्या इसी दिन के लिए तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया था?”

“एक बार मुझे मां कह कर बुला!”

“मेरे लिए एक चांद सी बहू ले आ बस, फिर उसके बाद मैं चैन से मर सकूंगी.”

“तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया?”

और सबसे बड़ा वाला,

“मेरे करन-अर्जुन आएंगे.”

इन डायलॉग्स को सुनते ही आंखों के सामने टिपिकल बॉलीवुड मां का चेहरा आ जाता है. वो मां, जिसका काम अपने स्क्रीन प्रेजेंस के ज़्यादातर वक्फे में रोना-धोना और अपने लाल की चिंता करना होता है. ये पूर्ण संस्कारी मां या तो आलू के परांठे बनाती पाई जाती है या गाजर का हलवा. बहुत संभावना होती है कि ये विधवा हो. ये अपने बेटे की ज़िंदगी में ये सदेह ममता कम मसला होती है.

100 में से 95 बार किडनैप हो जाती है और बेचारे बेटे को गंभीर उठापटक करनी पड़ती है उसे छुड़वाने के लिए. बहू से खिदमत करवाना और पोते का मुंह देखना इसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है, जिसके बाद वो सुकून से मर जाना चाहती है. निरूपा रॉय से लेकर राखी गुलज़ार तक और दुर्गा खोटे से लेकर रीमा लागू तक तमाम अभिनेत्रियों ने इस रणक्षेत्र में अपनी ममता के दिए जलाए हैं.

लेकिन फिर बॉलीवुड को अक्ल आ गई और वो मेलोड्रामा के कोमा से उबरने लगा.

पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा ने कुछ ऐसी मांओ से हमारी मुलाक़ात करवाई है, जिसकी आंखों में पानी नहीं बल्कि लहज़े में दोस्ती है. जो हर वक़्त रोती रहने, किडनैप होने, मर जाने या किचन में घुसी रहने के अलावा भी बहुत कुछ करती है. मिलते हैं ऐसी ही कुछ मांओ से जो इस दौर की मांग के मुताबिक़ ही ‘कूल’ हैं.


# डॉली अहलूवालिया (विक्की डोनर)

पैग छलकाती पंजाबी मां. अपनी सांस से दहशत खाती हुई नहीं बल्कि उसके साथ जाम टकराती हुई बहू. डॉली अहलूवालिया ने विकी अरोड़ा की मां के किरदार में धमाल मचा दिया था इस फिल्म में. खुदमुख्तार, मेहनतकश, साथ ही ओपन माइंडेड भी. परदे पर मां होने को रिडिफाइन करती हुई डॉली को बेहद सराहा गया. आज भी इस फिल्म के उनके सीन यूट्यूब पर खोज के देखे जाते हैं. एक आप भी देख लीजिए.


# किरण खेर (दोस्ताना)

मेलोड्रामा करती लेकिन मॉडर्न ज़माने की मां. बिगड़े हुए ‘मां दे लाडले’ की मां. बहू की जगह दामाद मिलने के शॉक को सहजता से हैंडल करती मां. श्रीमती आचार्य के रोल में किरण खेर ने दिखाया था कि मांए भी दोस्ताना हो सकती हैं. होमोसेक्सुअलिटी जैसे मसले पर भारतीय समाज में चाहे जैसा रुख हो लेकिन इस फिल्म की मां उसके साथ सहज थी. ऐसी मांए कुछ और हो जाएं तो बेहतरी दूर नहीं.


# रत्ना पाठक (जाने तू या जाने ना)

नाम सावित्री है लेकिन ज़िंदगी के प्रति रवैया पौराणिक नहीं. एक्टिविस्ट है. इलाके के पुलिस इंस्पेक्टर तक से भिड़ जाती है. अपने पति और उसके खानदान की राजपूताना ऐंठ को अपने बेटे के अंदर नहीं आने देने की ज़िद पर अड़ी सावित्री अपने बेटे की मां कम दोस्त ज़्यादा है. लेकिन जब आखिर में बेटे के अंदर का ‘राठोड़’ जाग ही जाता है, तो उस स्थिति को भी वो गरिमा के साथ कबूलती है.


# ज़ोहरा सहगल (चीनी कम)

ज़ोहरा सहगल उन अभिनेत्रियों में से हैं जो अपनी मौत तक जवान बनी रहीं. 102 सालों तक. चीनी कम में उन्होंने 64 वर्षीय अमिताभ की मां के किरदार में ज़िंदादिली के नए पैरामीटर सेट किए. बुढ़ापे में कदम रख चुके बल्कि बूढ़े ही हो चुके अपने बेटे के लव-अफेयर पर ख़ुशी से नाचती मां हिंदी सिनेमा के दर्शकों के लिए नया नज़ारा था. इसी तरह का रोल ज़ोहरा का ‘हम दिल दे चुके सनम’ में भी था.


# स्वरा भास्कर (निल बटे सन्नाटा)

शहरों से निकल कर कसबे की ओर चलते हैं. कूलत्व को देसीपना बख्शती चंदा सहाय हाल के समय में हिंदी सिनेमा में दिखी समर्थ मां का सबसे शानदार उदाहरण है. अपनी औलाद की बेहतरी के लिए उसी से कम्पटीशन करने पर उतारु मां भारतीय सिनेमा के दर्शकों के लिए अनोखी चीज़ थी. चंदा एक कामवाली बाई है. चाहती है कि उसकी बेटी उसका मुकद्दर शेयर ना करे बल्कि अपना नसीब खुद बनाए. उसके लिए पढ़ना ज़रूरी है और चंदा की बेटी की इसमें कोई रुचि नहीं. उसे मोटिवेट करने के लिए वो उसी के स्कूल में दाखिला ले लेती है. स्वरा भास्कर के करियर में मील का पत्थर कहलाए जाने लायक भूमिका थी ये.

इन तमाम अभिनेत्रियों के चलते अब भारतीय सिनेमा की मांए लेस इरिटेटिंग हैं.


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