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मूवी रिव्यू: नारप्पा

अमेज़न प्राइम वीडियो पर एक तेलुगु फिल्म रिलीज़ हुई है. नाम है ‘नारप्पा’. इस तेलुगु फिल्म को लेकर तगड़ा बज़ बना हुआ था. बताया जा रहा है कि तेलुगु सिनेमा की डायरेक्ट ओटीटी पर आने वाली सबसे बड़ी फिल्मों में से एक है. पहले डिस्ट्रिब्यूटर फिल्म को थिएटर पर ही रिलीज़ करना चाहते थे. लेकिन थिएटर्स न खुल पाने की वजह से फिल्म को और ज्यादा नुकसान न हो, इसलिए डायरेक्ट ओटीटी रिलीज़ का रास्ता चुना. जिस फिल्म को लेकर इतना बज़ था, वो फिल्म हमनें भी देखी. हमें फिल्म कैसी लगी, वो भी बताएंगे. लेकिन रिव्यू शुरू करने से पहले उन कारणों पर बात करेंगे जिनकी वजह से फिल्म को लेकर इतनी हाइप बनी हुई थी.

Bharat Talkies


# जाबड़ फिल्म का रीमेक

वेट्रीमारन. तमिल सिनेमा के सशक्त फिल्ममेकर. उनका सिनेमा हमेशा एक काम करता आया है. समाज के फैब्रिक में बुनी अमानवीयता, वहशीपन को उधेड़कर सबके सामने लाने का काम. वेट्रीमारन फिल्ममेकर होने के प्रिविलेज को समझते हैं. साथ ही उस जिम्मेदारी को भी जो इस प्रिविलेज के साथ अपने आप जुड़ी चली आती है. इसलिए हमेशा सही सवाल पूछते हैं. जैसे उनकी 2015 में आई फिल्म ‘विसारनाई’. जिसने सवाल किया पुलिस ब्रूटैलिटी पर. फिल्म ने बेस्ट फीचर फिल्म इन तमिल का नैशनल अवॉर्ड भी अपने नाम किया.

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वेट्रीमारन की फिल्म ‘असुरन’ का ऑफिशियल रीमेक है ‘नरप्पा’.

2019 में वेट्रीमारन ने धनुष के साथ मिलकर ‘असुरन’ बनाई. जिसने फिर समाज से असहज करने वाले सवाल पूछे. उसे बेबाकी से आईना दिखाया. उसी बेबाकी की बदौलत फिल्म को दो नैशनल अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया. फिल्म धनुष की फिल्मोग्राफी में एक माइलस्टोन साबित हुई. न्यू एज तमिल सिनेमा की पहचान बनी. ये वो दौर भी था जब हिंदी भाषी ऑडियंस अच्छे सिनेमा की तलाश में रीजनल फिल्मों का रुख कर रही थी. नतीजतन, ‘असुरन’ वो फिल्म बनी जिसने साउथ की फिल्मों से झिझक करने वाले अनेकों लोगों को इसका नया आयाम दिखाया. अब ‘असुरन’ की कमर्शियल और क्रिटिकल सक्सेस को भुनाने के लिए इसे तेलुगु में बनाया जा रहा है. ‘नारप्पा’ के टाइटल से. जब आप एक दिग्गज फिल्म का रीमेक बनाने जाते हैं तो पाते हैं कि सबकी निगाहें आप पर ही हैं. कि पहले से कही जा चुकी कहानी के साथ अब क्या नया करेंगे. ऐसा ही ‘नारप्पा’ के केस में भी है.


# वेंकटेश, वो एक्टर जिनके नाम से फिल्में चलती हैं

वेंकटेश दग्गुबाती. तेलुगु सिनेमा के दिग्गज एक्टर. कई हिट्स हैं इनके नाम. लेकिन आज भी उनका नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में एक हिंदी फिल्म का गाना याद आता है. ‘फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुस्कान है’. उदित नारायण की आवाज़ में गाया गया गीत. फिल्म थी 1993 में आई ‘अनाड़ी’. जहां वेंकटेश अपने गले में लटके गमछे को घुमा-घुमाकर करिश्मा कपूर के लिए ये गाना गा रहे थे. ‘अनाड़ी’ के बाद वेंकटेश ने एक और हिंदी फिल्म की. 1995 में आई ‘तकदीरवाला’. जो अकसर टीवी पर आती रहती है.

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‘अनाड़ी’ के गाने ‘फूलों सा चेहरा तेरा’ में वेंकटेश.

वेंकटेश अपने करियर में अब तक करीब 90 से ज्यादा फिल्में कर चुके हैं. इसलिए जब उनका नाम ‘नारप्पा’ की कास्ट से जुड़ा तो फिल्म को लेकर बज़ बनना ज़ाहिर था. लेकिन इस बज़ के पीछे एक और वजह थी. हम आपको बता चुके हैं कि ‘नारप्पा’ 2019 में आई तमिल फिल्म ‘असुरन’ का रीमेक है. और रीमेक के मामले में वेंकटेश का रिकॉर्ड काफी सॉलिड रहा है. जैसे उनकी 2017 में आई फिल्म ‘गुरु’. जो तमिल फिल्म ‘इरुदी सूट्र’ का रीमेक थी. इसे हिंदी में भी बनाया गया था. ‘साला खडूस’ के टाइटल से. फिल्म के तेलुगु रीमेक में वेंकटेश का काम काफी सराहा गया था. 2012 में अक्षय कुमार की फिल्म आई थी. ‘ओ माइ गॉड’. एक क्रिटिकल और कमर्शियल सक्सेस साबित हुई. 2015 में इसे तेलुगु में बनाया गया. तेलुगु रीमेक का टाइटल था ‘गोपाला गोपाला’. अक्षय कुमार वाला रोल निभाया पवन कल्याण ने. वहीं, परेश रावल वाले किरदार में नज़र आए वेंकटेश दग्गुबाती. ‘गोपाला गोपाला’ एक बड़ी हिट साबित हुई.

इन दोनों रीमेक्स की कामयाबी के बाद डिस्ट्रिब्यूटर्स और ऑडियंस की ‘नारप्पा’ से भी उम्मीदें बढ़ गईं. कि यहां भी वेंकटेश अपना कमाल दिखा पाने में सफल रहेंगे.


# Narappa की कहानी क्या है?

कहानी खुलती है नारप्पा और उसके छोटे बेटे सिनब्बा से. दोनों रात के अंधियारे में छुपते-छुपाते भाग रहे हैं. दूसरी तरफ नारप्पा की पत्नी और बेटी भी अपना घर छोड़ किसी दूसरी दिशा में भाग निकले हैं. फिर समझ आता है इस परिवार के अलग होकर भागने का कारण. जब पुलिस गांव के ज़मींदार पांडुसामी के घर पहुंचती है. पांडुसामी की हत्या हो चुकी है. गुस्से में पागल उसके परिवारवाले बस किसी भी तरह हत्यारे तक पहुंचना चाहते हैं. ताकि उसे तड़पाकर मार सकें. पांडुसामी का चैप्टर क्लोज़ करने वाला कोई और नहीं बल्कि नारप्पा का बेटा सिनब्बा ही था. इसलिए पुलिस या पांडुसामी के आदमियों के पहुंचने से पहले ही नारप्पा अपने बेटे को लेकर भाग गया.

Narappa's Wife And Daughter
फर्क मिटाने की कहानी जिसकी शुरुआत मर्डर से होती है.

इतना सुनकर लगेगा कि कहानी पांडुसामी और नारप्पा के परिवार की किसी निजी दुश्मनी पर है. कुछ कहा-सुनी हुई होगी और गुस्से में आकर बच्चे ने पांडुसामी को मार डाला. लेकिन ये सिर्फ कहानी का एक पहलू है. फिल्म का प्लॉट इससे कहीं ज्यादा गहरा है. कहानी है फर्क की. उस व्यवस्था की जो एक को दूसरे से ऊंचा समझने का अधिकार देती है. कहानी है पूर्वाग्रहों की. और उससे जन्म लेने वाली हिंसा और वहशीपन की. ये सब परत-दर-परत खुलेगा जब आप फिल्म देखेंगे.


# एक्टिंग परफॉरमेंसेज़ कैसी हैं?

फिल्म में नारप्पा का किरदार निभाया है वेंकटेश ने. नारप्पा से हमारे पहले साक्षात्कार में देखकर लगता है कि बूढ़ा, थका-हारा आदमी है. जो बस गर्दन झुका कर ईमानदारी से जीना चाहता है. झगड़ों और झंझटों के सामने हाथ जोड़कर चलता है नारप्पा. कोई भी बात बढ़े उससे पहले ही अपने हाथ बांध लेता है. और शांति बनाए रखने के लिए सामने वाले की शर्त मान लेता है. कहते हैं कि एक ईमानदार बाप अपने बेटे को कायर नज़र आता है. यहां ये बात सही बैठती है. सिनब्बा गुस्सैल किस्म का है. उसे लगता है कि पिता के बस की कुछ भी नहीं. वो डरपोक हैं. सिनब्बा उम्र के जिस पड़ाव से गुज़र रहा है, वहां ये सोच नॉर्मल भी है.

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नारप्पा के लिए परिवार से बढ़कर कुछ भी नहीं.

लेकिन नारप्पा को लेकर उसका और ऑडियंस, दोनों का नज़रिया एक तरफा है. क्योंकि जैसा नारप्पा अब है, उसका पास्ट ठीक उससे उलट था. झुके हुए कंधे, थकी हुए आंखें और अक्सर लड़खड़ाते हुए कदम ही नारप्पा की पहचान नहीं थे. जब जवान था, तो अपनी मस्ती में रहता था. जो जी में आए, वो करता था. भूल गया था कि समाज उसे अलग नज़र से देखता है. ‘जाति कभी नहीं जाती’ को माननेवाला समाज अपनी सहूलियत के अनुसार नारप्पा और उसके जैसे लोगों को हम और वो के कटघरे में ला खड़ा करता है. लेकिन ये नारप्पा का पर्सनल प्रॉब्लम नहीं. इसलिए वो प्रत्यक्ष भेदभाव को नज़रअंदाज़ करता रहा. लेकिन जब ये भेदभाव गांव, पड़ोस से होते हुए उसके अपने घर तक पहुंच जाता है, तब जाकर उसकी आंखें खुलती हैं. पूंजीवाद के खिलाफ. जातिवाद के खिलाफ. फर्क के खिलाफ. जिनके यहां जी-हुज़ूरी करता आया था, अब उन्हीं के सामने खड़ा हो जाता है. लड़ता है. इसके बाद नारप्पा के साथ जो कुछ भी होता है, उसका आकलन खोया-पाया जैसे शब्द नहीं कर सकते. उसकी जवानी के ऐसे ही अनुभव उसके बुढ़ापे का आधार बने. जवानी का गुस्सैल नारप्पा हो या वो बूढ़ा आदमी जिसके लिए परिवार से बढ़कर कुछ नहीं. उनकी सलामती से बढ़कर कुछ नहीं. वेंकटेश ने किरदार के दोनों पहलुओं के साथ बराबर इंसाफ किया.

फिल्म में एक सीन है, जहां नारप्पा को अपने गायब हुए बड़े बेटे की लाश मिलती है. दूर खेत में पड़ी लाश को देखते ही वो बेतहाशा उसकी ओर दौड़ने लगता है. इस अफसोस के साथ कि जिस परिवार को बचाने के लिए अपने आत्मसम्मान की बलि तक दे दी, आज वो उसे सुरक्षित रखने में नाकाम रहा. अब वो इसी वेदना के साथ जिएगा. खुद को अंदर-ही-अंदर कोसेगा. लेकिन परिवार के लिए उसे मजबूत भी बने रहना है, इसलिए ये कश्मकश उसके मन में उमड़ती रहती है. ऐसे हालात में वेंकटेश अपने किरदार को लेकर ओवर द टॉप नहीं गए. बल्कि उसे कंट्रोल में रखा. जो कि अपने आप में चैलेंजिंग है.

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शांत नारप्पा की गुस्सैल पत्नी बनी हैं प्रियमणि.

वेंकटेश के अलावा एक और एक्टर की बात की जानी जरुरी है. वो हैं प्रियमणि. फिल्म में उन्होंने नारप्पा की पत्नी सुंदरम्मा का किरदार निभाया. शांत और गंभीर नारप्पा के विपरीत है सुंदरम्मा. तेज़-तर्रार किस्म की. किसी भी ज्यादती को अपनी किस्मत न माननेवाली. किसी से भी भिड़ जानेवाली. लेकिन उनकी एक्टिंग की परीक्षा होती है बड़े बेटे के मरने वाले सीन के साथ. सब मान चुके हैं कि बेटा नहीं रहा. लेकिन मां का मन मानने को राजी नहीं. गांव में भटकती है. अपने बेटे को पुकारती हुई. कि शायद कहीं मिल जाए. बेटे की हत्या के ट्रॉमा से उभरने की बजाय वो उसके साथ जीती है.


# क्या ‘असुरन’ ही फिल्म की दुश्मन निकली?

फिल्म शुरू होती है. क्रेडिट्स में स्टोरी और स्क्रीनप्ले राइटर के नीचे नाम है वेट्रीमारन का. इससे एक बात क्लियर हो जाती है. कि ये रीमेक अपनी ओरिजिनल फिल्म के प्रति फेथफुल है. यानी मेकर्स ने अपनी तरफ से कुछ तोड़-मरोड़ करने की जरुरत नहीं समझी. इसका फायदा भी है और नुकसान भी. फायदा ये कि जो लोग ओरिजिनल फिल्म देखने के बाद ‘नारप्पा’ को देखेंगे, उनको फिल्म से शिकायत नहीं होगी. ऐसा नहीं लगेगा कि उनके साथ कोई धोखा हुआ है. या उनकी पसंदीदा फिल्म को उनके लिए खराब कर दिया गया है.

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रीमेक चाहे जैसा भी हो, ओरिजिनल के साथ की जाने वाली तुलना से नहीं बच सकता.

अब बात करते हैं नुकसान की. एक फेथफुल अडैप्टेशन बनने के चक्कर में फिल्म ने अपनी आवाज़ खो दी. वेट्रीमारन वाला इफेक्ट रीक्रिएट करने के चलते मेकर्स फिल्म में अपना सिग्नेचर जोड़ना ही भूल गए. फिल्म देखते वक्त बस यही लगेगा कि ‘असुरन’ को अलग कास्ट के साथ तेलुगु में बनाया गया है. इससे ज्यादा कुछ और नहीं.


# दी लल्लनटॉप टेक

फिल्म की स्टोरी-स्क्रीनप्ले का क्रेडिट भले ही वेट्रीमारन के नाम है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि डाइलॉग राइटर श्रीकांत आदल के काम को इग्नोर कर दिया जाए. फिल्म के डाइलॉग्स चंद शब्दों में अपना इम्पैक्ट छोड़ जाते हैं. जैसे शुरुआत में आया डाइलॉग. “गरीब का कोई धर्म नहीं होता, और अमीर का कोई ईमान नहीं होता.”

एक और चीज़ मेंशन करना चाहेंगे. फिल्म में एक जगह पांडुसामी नारप्पा को पूरे गांव के सामने बेइज्जत करता है. ये बात नारप्पा के बड़े बेटे को पता चलती है. वो पिता से पूछने जाता है कि क्या ऐसा सच में हुआ था. उसके सवाल पूछते ही सीन कट हो जाता है. अगला शॉट आता है पांडुसामी का. जो थिएटर में बैठा अपनी गर्दन हां में हिला रहा होता है. नारप्पा के बेटे के सवाल का जवाब ऑडियंस को मिल जाता है.

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चाहे ‘असुरन’ जैसी न हो, फिर भी देखी जा सकती है.

‘नारप्पा’ भले ही ‘असुरन’ से इतर अपनी पहचान बना पाने में पूरी तरह सफल नहीं हुई हो. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि ये बुरी फिल्म है.


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