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मूवी रिव्यू: नक्काश

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आज जिस फिल्म का रिव्यू होगा उसका नाम है ‘नक्काश’.

अल्लाह के भाई भगवान?

कहानी क्या है? एक आदमी है. बनारस में रहता है. मंदिर में नक्काशी का काम करने में महारत रखता है. अपने बेटे को बताता है कि भगवान जो हैं, वो अल्लाह के भाई हैं. मंदिर के पुजारी का दावा है कि इस काम में उससे ज़्यादा हुनरमंद आदमी कोई नहीं. दिक्कत सिर्फ एक है. मुसलमान है. नाम है अल्लाह रक्खा सिद्दीकी उर्फ़ अल्ला मियां. उसकी ये आइडेंटिटी उसके लिए परेशानी का विषय तो है ही, साथ ही कई और लोगों के माथे पर शिकन की वजह भी है. एक तरफ तो अल्लाह रक्खा के अपने मज़हबवाले उससे ख़फा हैं कि वो काफिरों की इबादतगाह में काम करता है. उधर कुछ हिंदू लोग इस बात को हज़्म नहीं कर पा रहे कि कैसे एक मुसलमान उनके पवित्रतम मंदिर में घुस पाता है. न सिर्फ घुसता है बल्कि भगवान के मंदिर की दीवारों को अपने हाथों से सजाता-संवारता है. ज़ाहिर है नफरत की दोतरफा तलवार के घाव अल्लाह रक्खा के मुकद्दर में बहुतायत में होने ही होने हैं. ये घाव किस हद तक घातक होते हैं ये फिल्म देखकर जान लीजिएगा.

वेदांती जी को अल्लाह रक्खा के हुनर और नीयत पर पूरा भरोसा है.
वेदांती जी को अल्लाह रक्खा के हुनर और नीयत पर पूरा भरोसा है.

लेखनी की सशक्तता

राइटर-डायरेक्टर ज़ैग़म इमाम इससे पहले ‘दोज़ख’ और ‘अलिफ़’ जैसी फ़िल्में दे चुके हैं. उनकी तीनों ही फिल्मों में कुछ चीज़ें कॉमन हैं. जैसे बनारस, गंगा, मंदिर और मज़हबी कट्टरता से लड़ने की, उसे खारिज करने की छटपटाहट. हर फिल्म के साथ ये छटपटाहट ज़्यादा विज़िबल होती जा रही है. फिल्म के शुरूआती फ्रेम में ही उनका कंसर्न स्पष्ट हो जाता है जब एक मुसलमान गंगा के पानी से वुज़ू कर रहा होता है. बिना किसी संवाद के बात आप तक पहुंच जाती है. ज़ैग़म के लेखन की ख़ासियत ये है कि वो हर तरह की कट्टरता को एक समान बेबाकी से सामने रखते हैं. ये उनके किरदारों में दिखता है. जैसे एक तरफ अल्लाह रक्खा के बेटे को मदरसे में दाखिला न देने वाले मौलवी हैं, तो दूसरी तरफ ‘इस देश पे पहला हक़ हिंदुओं का है’ कहने वाला मुन्ना त्रिपाठी भी है. पुलिस वाले हैं जो इस्लामोफोबिया से पीड़ित हैं, तो मोहल्लेवाले भी हैं जो काफिरों के सगे अल्लाह रक्खा से घृणा करते हैं. और नफरतों की इन्हीं कारगुज़ारियों के बीच सर्वाइवल की जंग लड़ रहा है अल्लाह रक्खा.

अदाकारी के जलवे

इनामुलहक़ बिलाशक इस फिल्म के कोहिनूर हैं. अल्लाह रक्खा जैसे उनकी रूह से चिपटा हुआ है. एक हुनरमंद आदमी, जो मज़हब को अपने ढंग से परिभाषित करता है. जिसके लिए दूसरा धर्म महज़ एक अलग रास्ते की तरह है, जो अंत-पंत एक ही ईश्वर तक पहुंचेगा. इनामुलहक़ इस किरदार की मासूमियत, उसका ग़म, गुस्सा, हताशा सब पूरे कन्विक्शन से व्यक्त कर पाते हैं. जब वो स्क्रीन पर होते हैं, उनसे नज़रें नहीं हटतीं.

इनामुलहक़ बेहद कन्विंसिंग लगे हैं.
इनामुलहक़ बेहद कन्विंसिंग लगे हैं.

अल्लाह रक्खा के दोस्त समद के रोल में शारिब हाशमी परफेक्ट हैं. एक मासूम दोस्त जो हालात की सितमज़रीफी के बाद कट्टरता की राह पर चला गया. जिसका पहले ज़मीर बिका और फिर ईमान. शारिब ने अदाकारी का अपना हिस्सा बेहद कामयाबी से निभाया है. कुमुद मिश्रा वेदांती जी के रोल में खूब जमे हैं. वो पंडित जी, जिनका अल्लाह रक्खा में भरोसा किसी हाल में नहीं डगमगाता. जो अपने बेटे को सीख देते हैं कि राजनीति कर्म की होनी चाहिए, धर्म की नहीं. कुमुद हर फिल्म के साथ अपना कद और ऊंचा किए दे रहे हैं. मुन्ना भैया के रोल में पवन तिवारी पर्याप्त एग्रेशन ले आए हैं. पवन इस फिल्म के प्रड्यूसर भी हैं और आजकल आसपास दिखते कितने ही अतिवादी नेताओं का प्रतिरूप लगते हैं फिल्म में.

पवन तिवारी इस फिल्म के प्रड्यूसर भी हैं.
पवन तिवारी इस फिल्म के प्रड्यूसर भी हैं.

क्यों देखें?

फिल्म का अंत विचलित तो करता है लेकिन चकित नहीं करता. दरअसल इससे अलग अंत शायद हो भी नहीं सकता था. ये अंजाम इस बात को रेखांकित करता है कि तोड़ने वालों के पीछे लोगों का मेला खड़ा मिलता है, जोड़ने वाले अकेले हैं, असहाय हैं. ज़ैगम इमाम और इनामुलहक़ की ये फिल्म समय निकालकर देखी जानी चाहिए. जब मुल्क के दो प्रमुख समुदायों में आपसी अविश्वास मुकम्मल तौर से नष्ट होने की कगार पर हो, तब ऐसे किसी भी प्रयास की भरपूर हौसलाअफज़ाई होनी चाहिए. जो मज़हबों की कट्टरता को खारिज करने की बात करे. जो हाथ काटने की नहीं, हाथ थामने की अहमियत समझाए. अल्लाह रक्खा के लफ़्ज़ों में ही कहा जाए तो, “इंसान जैसी चाहेगा वैसी ही बनेगी ये दुनिया.” तो इस दुनिया को बेहतर बनाने का पैगाम देती इस फिल्म को और इसकी तमाम टीम को साधुवाद.

‘नक्काश’ वाकई बेहद ज़रूरी फिल्म है. जाइए, देख आइए.


वीडियो:

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Nakkash Movie Review starring Inamulhaq, Sharib Hashmi, Kumud Mishra, Pawan Tiwari, Gulki Joshi and directed by Zaigham Imam

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