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मूवी रिव्यू: नो फादर्स इन कश्मीर

फिल्म के एक सीन से बात शुरू करते हैं. कश्मीर में पोस्टेड एक आर्मी ऑफिसर की कही एक बात से. वो कहता है,

“मुझे सीधी जंग दीजिए. एक ऐसा दुश्मन, जिसे मैं देख सकूं. यहां रहने वाला हर एक बंदा दुश्मन है और हमवतन भी. किससे लडूं और किसकी हिफाज़त करूं?”

कश्मीर में आपका स्वागत है. दुनिया का वो हिस्सा जो क्या चुने इस कन्फ्यूजन से दशकों से जूझ रहा है. और इससे उपजे कंफ्लिक्ट की मार से लहूलुहान है. कश्मीर संघर्ष के हमेशा-हमेशा दो वर्जन रहे हैं. शेष भारत के लिए जो आतंकी हैं, वो वहां मिलिटेंट हैं. कश्मीरियों की नज़र में जो संघर्षरत जनता है, वो यहां स्टोन पेल्टर्स हैं. सिक्के के इन दो परस्पर विरोधी पहलूओं ने जन्नत जैसी वादी को जहन्नुम बनाके छोड़ा है. ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ इसी जन्नत कम जहन्नुम के एक बेहद डिस्टर्बिंग पहलू पर बात करती है.

उठा ले गए

अपनी मां के साथ ब्रिटेन में रहती नूर कश्मीर आई है. यहां आकर उसे पता चलता है कि उसके पिता उसे छोड़ नहीं गए थे बल्कि उन्हें आर्मी ने उठा लिया था. इस ‘उठा लेने की’ जो व्याख्या है, वो विचलित करने वाली है. मिलिटेंट होने के शक में जिन लोगों को आर्मी ले जाती है, उनका एक मेजर हिस्सा कभी घर लौट ही नहीं पाता. घरवालों को ये भी नहीं पता चलता कि उनका अज़ीज़ जेल में है या जीवन से मुक्ति पा गया. संशय की ये स्थिति मौत की ट्रेजेडी से भी ज़्यादा भयावह है. ये लोग अब सिर्फ तस्वीरों में मिलते हैं. ऐसा सिर्फ नूर के पिता के साथ ही नहीं हुआ है. पड़ोस में रहते माजिद की भी यही कहानी है. उन दोनों के पिता दोस्त थे और दोनों का ही एक सा हश्र हुआ. लेकिन क्या था वो हश्र? पता लगाने की नूर की कोशिश उसके और माजिद के लिए डरावना एक्सपीरियंस बन जाती है. किस तरह का एक्सपीरियंस ये फिल्म देखकर जानिएगा.

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कैसी है फिल्म?

विषय से परे जाकर फिल्म को परखा जाए तो कुछेक जगहों पर फिल्म निराश करती है. बीच में तो काफी बोझिल होती है और कुछेक सीन्स के होने की वजह पल्ले नहीं पड़ती. जो चीज़ फिल्म को संभालती है, वो है एक्टर्स की सहजता. ज़ारा वेब और शिवम रैना ज़बरदस्त हैं. ज़ारा का चेहरा बला का एक्सप्रेसिव है और शिवम ग़ज़ब का एक्टिंग टैलेंट रखते हैं. इन टीन एजर्स ने फिल्म का एक बड़ा हिस्सा अपने कंधों पर ढोया है. सोनी राजदान और कुलभूषण खरबंदा जैसे सीनियर एक्टर्स अपनी रेपुटेशन से पूरा न्याय करते हैं और उम्दा परफॉरमेंस देते हैं. यही बात मेजर का रोल करते अंशुमन झा के लिए भी बोली जा सकती है. म्यूजिक डिपार्टमेंट में कुछ कश्मीरी गाने बैकग्राउंड में बजते हैं जो समझ तो नहीं आते, लेकिन भले लगते हैं.

डायरेक्टर अश्विन कुमार इससे पहले कश्मीर पर कुछेक उम्दा शॉर्ट फ़िल्में बना चुके हैं. ‘लिटल टेररिस्ट’ तो ऑस्कर के लिए नॉमिनेट भी हुई थी. इस फिल्म में भी कश्मीरी अवाम के लिए उनका कंसर्न साफ़ महसूस होता है. उन्होंने फिल्म में एक रोल भी किया है जो एक्टिंग के लिहाज़ से तो ठीक है लेकिन लिखा कमज़ोर ढंग से गया है.

फिल्म आधी बेवाओं और आधे यतीम बच्चों की कहानी है, जो इसके साथ जीना सीख गए हैं.
फिल्म आधी बेवाओं और आधे यतीम बच्चों की कहानी है, जो इस जिंदगी के साथ जीना सीख गए हैं.

न्यू नॉर्मल इन कश्मीर

नो फादर्स इन कश्मीर’ मुकम्मल फिल्म नहीं है. ये बीच में अपनी लय भी खोती है और विषय से भटकती भी है. लेकिन एक डिपार्टमेंट में फिल्म तगड़ा स्कोर करती है. ये दर्शकों को सरल और उन्हें सूट करने वाले नैरेटिव को त्यागकर बाकी पहलूओं पर गौर करने को किसी हद तक मजबूर करती है. ये आर्मी को हीरो-विलेन दिखाने से परे जाकर बिखरे परिवारों की दयनीयता पर फोकस करती है. उनकी पीड़ा को फ्रंट पर लाती है. वजहें चाहे जो हों, कश्मीर में ऐसे कितने ही परिवार हैं जहां के चश्मोचिराग किसी शापित दिन गुम हो गए. कभी न लौटकर आने के लिए. ये फिल्म इन्हीं परिवारों की तकलीफ को ज़ुबां देती है. आधी बेवाओं और आधे यतीम बच्चों की कहानी कहती है. सबसे भयावह बात तो ये कि वो लोग ‘इस ज़िंदगी’ के साथ जीना सीख गए हैं. उनके लिए ये न्यू नॉर्मल है.

कश्मीर और सेना के कॉम्बिनेशन पर पहले भी फ़िल्में बनी हैं. जैसे ‘रोज़ा’, ‘यहां’, ‘मिशन कश्मीर’. कुछ तो बेहद संजीदा थी. जैसे विशाल भारद्वाज की ‘हैदर’. मुझे हैदर का एक सीन याद आता है. एक आदमी अपने ही घर में घुस नहीं रहा क्योंकि उसकी तलाशी नहीं ली गई है. कितनी भयानक बात! ऐसी ही एक फिल्म दो हफ्ते पहले भी आई थी ‘हामिद’. जिसमें पिता को खो चुका बच्चा अल्लाह को कॉल लगाता है और वो एक सैनिक को लगती है. ‘नो फादर्स…’ इसी लीग की फिल्म है.

जिस जगह ये फिल्म ख़त्म होती है उसे इस तमाम सिलसिले पर सटीक टिप्पणी की तरह देखा जा सकता है. नूर इंग्लैंड लौट रही है. उसकी कार के पीछे भागता माजिद एक पॉइंट पर आकर रुक जाता है. कश्मीर का मुद्दा भी बाकी दुनिया के लिए ऐसा ही है. या तो हम बाहर से देख पाते हैं या कुछ लोग थोड़े से अरसे के लिए उसकी आंच महसूस कर पाते हैं. फिर अपनी सेफ दुनिया में लौट जाते हैं. भुगत वहां की जनता रही है. एक संवेदनशील दर्शक ये दुआ करते हुए घर लौटता है कि जन्नत कहलाने वाले कश्मीर में जल्द अमन लौटे. अगर आप भी संवेदना से भरे हैं तो ये फिल्म आपके लिए है.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू: जंगली

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