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फिल्म रिव्यू: बुलबुल

एक लंबे अरसे तक भारत में हॉरर फिल्मों का एक लगभग तयशुदा फॉर्मेट रहा है. रैंडमली चीखती कोई औरत, अपने आप खुलते-बंद होते खिड़की-दरवाज़े, अचानक से बुझ जाने वाले बल्ब, खुद-ब-खुद झूलता झूला, आगे-पीछे होने वाली कुर्सियां और मेकअप पोतकर जबरन भयानक किए हुए हास्यास्पद चेहरे. हां यदा-कदा कोहरे में गाती फिरने वाली रहस्यमयी महिला भी. ये सब कुछ हमने इतनी-इतनी बार देख लिया है कि अब डरते नहीं, बोर होते हैं.

फिर पिछले कुछ अरसे से सीन कुछ बदला. अनुष्का शर्मा ने ‘परी’ जैसी फिल्म दी. जो अपनी खामियों के बावजूद इस एक बात में बढ़िया थी कि उसने हॉरर फिल्मों को क्लीशे से बाहर निकाला. घिसे-पिटे फ़ॉर्मूले से अलग कुछ दिखाने की कोशिश की. उसके बाद हिंदी सिनेमा ने ही ‘तुम्बाड’ जैसी अद्भुत फिल्म दी. जिसके बारे में एकबारगी यकीन ही नहीं आता कि ये अपने बॉलीवुड का प्रॉडक्ट है.

इससे पहले अनुष्का शर्मा ने दो भूतोंवाली फ़िल्में बनाई. 'परी' और 'फिल्लौरी'. दोनों में खुद काम किया.
इससे पहले अनुष्का शर्मा ने दो भूतोंवाली फ़िल्में बनाई. ‘परी’ और ‘फिल्लौरी’. दोनों में खुद काम किया.

‘परी’ और ‘तुम्बाड’ ने हमारी उम्मीदों को पर लगा दिए कि अब हिंदी में भी कायदे की हॉरर फ़िल्में बनेंगी. इसी कड़ी में अब आई है ‘बुलबुल’. अनुष्का शर्मा का ही प्रोजेक्ट. क्या ‘बुलबुल’ हमारी अपेक्षाओं पर खरी उतरती है? कुछ-कुछ हां, कुछ-कुछ ना. आइए जानते हैं.

लगभग 140 साल पहले

कहानी का सेटअप लगभग डेढ़ सदी पहले का है. 1881 का बंगाल. एक छोटी बच्ची बुलबुल की शादी हो रही है. बालविवाह. बुलबुल को कुछ अता-पता नहीं शादी क्या होती है? घरवालों ने कह दिया शादी है, तो है. बुलबुल को कहानियां सुनने में बड़ा रस आता है. ख़ास तौर से डरावनी कहानियां. जब बुलबुल की डोली विदा होती है, तो उसके साथ होता है उसी का हमउम्र सत्या. जो उसको उसकी मनपसंद कहानियां सुनाता है. बुलबुल को लगता है उसकी शादी सत्या से ही हुई है. डोली हवेली पहुंचती है. हवेली में नौकर-चाकरों के अलावा कुल चार नग रहते हैं. इन्द्रनील ठाकुर, उसका जुड़वां भाई महेंद्र ठाकुर, महेंद्र की बीवी बिनोदिनी और सबसे छोटा सत्या. पांचवी बुलबुल है. शादी की पहली रात ही बुलबुल को पता चल जाता है उसकी शादी सत्या से नहीं, उसके बड़े भाई इन्द्रनील ठाकुर से हुई है. कहानी में कट. सीधे बीस साल आगे.

सत्या लंडन से पढ़ाई करके लौटा है. उसके एक भाई की हत्या हो चुकी है, दूसरा हवेली छोड़कर जा चुका है. बुलबुल ठकुराइन बनी राज कर रही है. उधर गांव में रहस्यमयी हत्याएं हो रही हैं. लोगों का विश्वास है कि ये किसी चुड़ैल का काम है. ज़ाहिर है लंडन रिटर्न सत्या ये सब नहीं मानता. उसके अंदर का शेरलॉक होम्स जाग गया है. उसका शक गांव में नए आए डॉक्टर पर है. तो क्या डॉक्टर ही किलर है? या वाकई कोई चुड़ैल है? है तो कौन? क्या हवेली की कोई औरत? ये मर्डर मिस्ट्री है या भूत-प्रेत की लीला? इन सवालों के जवाब जानने के लिए नेटफ्लिक्स पर डेढ़ घंटा खर्च कीजिए. हमने जो बताया वो सब ट्रेलर में है, इसके आगे कुछ बताएंगे तो स्पॉइलर हो जाएगा.

क्या अच्छा है?

एक तो सेटअप बहुत अच्छा है. पुराने ज़माने की हवेली, फायरप्लेस वगैरह सुंदर दिखता है. सिनेमेटोग्राफी भी शानदार है. कोहरे में डूबता-उतराता अंधेरा जंगल, हवेली के लॉन्ग शॉट्स वगैरह ज़बरदस्त हैं. जंगल में लगी आग का फिल्मांकन मस्त है. कुछ फ्रेम्स देखकर तो एटीज़ की ‘पुराना मंदिर’, ‘वीराना’ जैसी फ़िल्में याद आती हैं. माइनस क्लीशे. एक सीन में तो हिंसक दृश्य भी कलात्मकता की उंचाइयां छू गया है. बताएंगे नहीं कौन सा सीन है, खुद देख लीजिएगा. शुरू में भुतहा हरकतों के बाद फिल्म मानवी स्वभाव के पहलुओं पर फोकस करती है. प्रेम, ईर्ष्या, घृणा, शक, डर, नफरत. तमाम किरदारों ने इन्हें सटीक ढंग से पेश किया है. कुल मिलाकर एक्टिंग के फ्रंट पर कोई निराश नहीं करता.

तृप्ति डिमरी की बतौर लीड एक्ट्रेस ये दूसरी फिल्म है और उन्होंने निराश नहीं किया.
तृप्ति डिमरी की बतौर लीड एक्ट्रेस ये दूसरी फिल्म है और उन्होंने निराश नहीं किया.

तृप्ति डिमरी बेहद अच्छी लगी हैं. अविनाश तिवारी और वो दोनों ही सहज लगे हैं. शायद ‘लैला-मजनू’ के समय की बॉन्डिंग का असर हो. तृप्ति ने इमोशनल सीन्स शानदार ढंग से निभाए. एक सीन में वो चरित्र पर ढका-छुपा लांछन लगाने वाले की बात पर हंस देती हैं. उसी वक्त उनकी आंखों में निराशा का, आहत होने का भाव भी झलक जाता है. दर्शक के तौर पर आप इससे कनेक्ट कर जाते हैं. ये एक्टर की कामयाबी ही है.

अविनाश तिवारी का आवाज़ में जो डेप्थ है, वो उनकी पूंजी है. अभिनय भी उनका बेहद सधा हुआ है. राहुल बोस तो खैर हैं ही मंझे हुए कलाकार. ठाकुर के पात्र को बढ़िया निभा ले गए. पाओली दाम भी संतुष्ट करती हैं. एक सीन में वो शादी के वक्त लड़कियों को परिवार वालों द्वारा दिए जाने वाले झांसे गिना रही होती है. उस वक्त की उनकी हताशा से भारतवर्ष की ज़्यादातर लड़कियां तुरंत रिलेट कर जाएंगी. कभी विक्टिम तो कभी विलेन लगना उन्होंने खूब अच्छे ढंग से किया. पराम्ब्रता चटर्जी ने डॉक्टर के रोल में फिल्म को मज़बूत कंधा दिया है. कम सीन्स के बावजूद उनकी धमक दिखती है.

एक्टिंग, सेटअप, अच्छे बैकग्राउंड म्यूज़िक के अलावा फिल्म अंडरकरंट की तरह जो मैसेज दे रही है, वो अच्छा है. सही से डेवलप न होने के बावजूद. कुछ-कुछ ‘स्त्री’ फिल्म की तर्ज पर. कुछ लोग इसे फेमिनिज़्म पर बैक डेट में मॉडर्न टेक भी कह सकते हैं. डॉमेस्टिक वायलेंस, पितृसत्ता, मेंटल हरासमेंट जैसे तमाम विषयों को ये फिल्म छूती हुई चलती है.

खामियां क्या हैं?

सबसे पहली खामी तो ये कि फिल्म तृप्त नहीं करती. लेंथ में इतनी छोटी है कि चीज़ें डेवलप ही नहीं हो पाती ठीक से. आप समझ तो लेते हो कि किस वजह से क्या हो रहा है लेकिन उतने कन्विंस नहीं हो पाते. किरदारों के ख़ास बर्ताव की वजहें या तो एस्टैब्लिश नहीं हो पातीं, या दमदार नहीं लगती. सस्पेंस के नाम पर ऐसा कुछ नहीं है कि आप प्रेडिक्ट न कर सकें. संवाद भी उतने प्रभावी नहीं हैं. इसीलिए बावजूद तमाम एक्टर्स की उम्दा परफॉरमेंस के आप संतुष्ट नहीं हो पाते. मतलब ऐसे समझिए कि रेसिपी तो शानदार थी पर फाइनल डिश में कुछ कमी रह गई.

राहुल बोस लंबे अरसे बाद परदे पर नज़र आए हैं लेकिन मैजिक टच बरकरार है.
राहुल बोस लंबे अरसे बाद परदे पर नज़र आए हैं लेकिन मैजिक टच बरकरार है.

डायलॉग, स्क्रिप्ट, स्टोरी, लिरिक्स राइटिंग में अपना लोहा मनवा चुकी अन्विता दत्त का ये बतौर डायरेक्टर पहला प्रोजेक्ट था. उन्होंने इसे विजुअली तो बढ़िया बनाया है, पर उतना असरदार नहीं बन पाया जितने की उम्मीद थी. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि ‘बुलबुल’ बुरी फिल्म है. इसके अपने मोमेंट्स हैं और महज़ उनके लिए भी ये फिल्म देखी जा सकती है.

बेसिकली, ‘बुलबुल’ न तो पूरी तरह संतुष्ट करती है, न ही डिज़ास्टर है. बीच में कहीं घूमती रहती है. आप देखकर बताइएगा कि आपको कैसी लगी?


वीडियो:

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