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दे 'राजा' के नाम तुझको अल्ला रक्खे!

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राजा पुराने जमाने से दुनिया का सबसे इंपॉर्टेंट आदमी है. उसकी ताकत से लोग डरते भी हैं, सिक्योर फील करते हैं और जलते भी हैं. खैर अब राजा महाराजा तो चले गए और ज्यादातर देशों में डेमोक्रेसी है. लेकिन राजाओं का भौकाल इतना है कि उनके नाम पर मांएं अपने बच्चों के नाम रखती हैं. कितनी हिंदी फिल्मों के नाम भी राजा और उसके पर्यायवाची नामों पर हैं. सलमान खान की फिल्म आ रही है ‘सुल्तान’. ये लिस्ट देख लीजिए.

samraat
1. सम्राट(1982)

इस मूवी में सम्राट था एक पानी का जहाज. सम्राट में खूब सारा सोना लदा होता है. लेकिन शुरू में ही एक साजिश के तहत सम्राट चला जाता है समंदर के अंदर. अपने साथ डुबाता है सारा सोना और तमाम राज. पूरी फिल्म ये राज और जहाज खोजने में खत्म हो जाती है. गब्बर सिंह यानी अमजद खान इसमें वजनदार दिखे हैं. धर्मेंद्र और हेमा की जोड़ी सलामत रहे. जीतेंद्र और जीनत अमान भी हैं. खास बात फिल्म में ये है कि विलेन अपने फैशन स्टेटस के प्रति लापरवाह है. हेयरस्टाइल तक नहीं बदलता जिसके चक्कर में पकड़ा जाता है. लास्ट में किसी के हाथ आता है सोना, किसी को पड़ता है सब कुछ खोना और जनम जनम तक रोना. पानी का जहाज डूबने पर हमने हॉलीवुड की टाइटैनिक से पहले फिल्म बना ली थी.

shahanshah

2. शहंशाह (1988)

रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं नाम है शहंशाह..हंई. एक जमाने में लौंडों ने ये डायलॉग इतना घिसा कि इससे आग पैदा होने की बजाय चुक गई. आवाज भारी बनाने के चक्कर में बेचारों की खांसी निकल जाती थी. खैर, अमिताभ बच्चन इस फिल्म में कभी सोते नहीं. दिन में दरोगा विजय श्रीवास्तव और रात में ओवर टाइम शहंशाह के रूप में. हाथ में रस्सी और आंख में घुसते बाल जिसकी पहचान हैं. असल में उनके बचपन में ही लाइफ का झोल सामने आ चुका होता है. बाप बेचारा मुजरिमों को पकड़ाने के चक्कर में खुद चक्कर खा जाता है और काल की विचित्र महिमा की अकाल मौत मिलती है. इस दुर्घटना से इंस्पायर्ड है शहंशाह. वह जुर्म की दुनिया के शहंशाहों से निपटने के दौरान कहता है, ‘हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं शुरू होती है.’ इसके निर्माता निर्देशक थे टीनू आनंद.

raja

3. राजा (1995) 

राजा बने थे संजय कपूर. उनकी दूसरी फिल्म थी और माधुरी दीक्षित का जलवा शबाब पर था. फिल्म के शुरुआत में ही राजा बन जाता है भिखारी. उसको हो जाता है अपने भाई के दोस्तों की बहन से प्यार. वो दोस्त निकलते हैं इनके दुश्मन. शादी तो कराते नहीं, ऊपर से लगा देते हैं चूना. बिजनेस से निकाल बाहर करते हैं तो राजा का भाई हो जाता है पागल और राजा नौकरी करने लगता है. आखिर में सच्चे प्यार की जीत होती है. मुकेश खन्ना तब शक्तिमान नहीं बने थे लेकिन ज्ञान देने के कीटाणु पैदा हो चुके थे. फिल्म के बीच में वह एक जबर रहस्य उजागर करते हैं कि ‘प्यार करना खेल नहीं है बच्चों का, तेल निकल जाता है अच्छे अच्छों का.’ इसके डायरेक्टर थे इंद्र कुमार. संजय, माधुरी, मुकेश के अलावा दिलीप ताहिल और परेश रावल भी थे.

maharaja

4. महाराजा (1998)

राजा का खानदान बचपन में खतम हो जाए और प्रॉपर्टी हथिया ली जाए तो वह बन जाता है महाराजा. आदमी महाराजा बने या नहीं, फिल्म जरूर बन जाती है. इस फिल्म में महाराजा होते है गोविंदा. वो अभी नर्सरी के स्टूडेंट ही होते हैं कि उनकी फैमिली में घुस जाता है एक चोर रिश्तेदार. उसकी पहचान शक्ल से ज्यादा बेतुके जूतों से होती है. सिगरेट का लती है. मैनेजर के पद पर आता है और दामाद के पद पर बैठ जाता है. फिर चालाकी से महाराजा को कर देता है बेदखल और घर वालों को हलाक. महाराजा के पास प्लस पॉइंट ये है कि जानवर उसकी भाषा समझते हैं. अपनी हिप्नोटाइज करने वाली ताकत के दम पर अपने सारे काम बना लेता है. लास्ट में फिर वही सच्चाई की जीत. विलेन की हृदय विदारक हत्या और महाराजा की शादी. इसके निर्देशक थे अनिल शर्मा. महारानी बनती हैं मनीषा कोइराला. सलीम घोष और राज बब्बर भी हैं. लेकिन बड़े कलाकार तो हैं जानवर जिन्होंने जम के धमाल मचाया.

badshah

5. बादशाह(1999)

मैं तो हूं पागल, ये कहूं हर पल. अगर प्राचीन सभ्यता में कोई बादशाह ऐसा कहता तो उसे फांसी चढ़ा कर कोई जलनखोर बन जाता बादशाह. 1999 तक हालात बदल चुके थे. एक फिल्म आई शाहरुख खान की जिसमें वो चलाते हैं एक जासूसी कंपनी. बादशाह के नाम से. कंपनी में एक जासूस है जो जासूसी छोड़ कर सब कुछ करता है. जेम्स बॉन्ड अगर एक कैरेक्टर होने की बजाय एक आदमी होता तो गजब हो जाता. अपने गैजेट्स का आइडिया चुराने और उन गैजेट्स से ही अपने हिस्से की जासूसी कराने के लिए बादशाह को गोली मार देता. ऊपर वाले के करम से या शायद किस्मत की चाल से वह लास्ट तक अपना केस सुलझाने में कामयाब हो जाता है. फिल्म में ट्विंकल खन्ना, राखी अमरीश पुरी हैं. हंसाने के लिए जॉनी लीवर हैं. अब्बास मस्तान थे डायरेक्टर.

sultan

6. सुल्तान(2000)

मिथुन चक्रवर्ती लीजेंड्री हीरो हैं. गांवों में खटिया पर उकड़ू बैठकर देखी जाती हैं उनकी फिल्में. जहां फाइट सीन आता है वहां उचक के आइस्सबास भी कहना होता है. सुल्तान भी उनकी ऐसी ही फिल्म है. इस फिल्म में दरअसल दो सुल्तान होते हैं. धर्मेंद्र को भी थोड़ी देर सुल्तान बनने का मौका मिला है. लेकिन दोनों में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग होती है कि एक वक्त पर एक ही आदमी सुल्तान रहेगा. जब धर्मेंद्र रिटायर हो जाते हैं तो मिथुन पुलिस की नौकरी छोड़ कर बन जाते हैं सुल्तान. फिर दुश्मनों के अच्छे दिन चले जाते हैं. इस फिल्म में कहानी हो न हो लेकिन एक गाना जरूर है जो हर टैंपो और पान की दुकान पर बज चुका है. हां वही ‘गोरे बदन पर यार कुर्ती कस कसी’. मिथुन के फैन हैं TLV प्रसाद, वही थे इसके डायरेक्टर. जल्दी ही एक और सुल्तान आ रहा है, सलमान.

 

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