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वेब सीरीज़ रिव्यू: मॉडर्न लव मुंबई

ऑफिस वाले कहते हैं, सिनेमा वालों के मज़े हैं. रिव्यू करने के नाम पर बैठकर वेब सीरीज़ और फिल्में देखते हैं. पर जब कोई मज़ेदार चीज़ आपका काम बन जाए तो धीरे-धीरे मज़ा आना बंद हो जाता है. खैर, अपने मज़े को धरते हैं किनारे और प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही ‘मॉडर्न लव मुंबई’ के रिव्यू का मज़ा लेते हैं. 

‘Modern Love Mumbai’ की कहानियां न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे ‘मॉडर्न लव’ कॉलम के पर्सनल एस्सेज़ से प्रेरित हैं. छह भागों की यह सीरीज प्रेम के कॉम्प्लेक्स और सुंदर रूपकों का पोट्रेयल है. सीरीज़, मुंबई के अलग-अलग पहलू, रंग और मूड को प्रेम के धागे में पिरोती है. जब इसका ट्रेलर आया था, तो उसमें एक पंक्ति थी: लव दैट नोज़ नो जेन्डर, एज, रेस एण्ड बाउन्ड्री. सीरीज़ इसी लाइन को जस्टीफ़ाई करने में खुद को खर्च करती है. 

चूंकि हर एपिसोड के डायरेक्टर और उनका अप्रोच डिफ़रेंट हैं. तो हमने सोचा आपके लिए हर एपिसोड का अलग रिव्यू किया जाए. 

6 कहानियां और 6 अलग डायरेक्टर
6 कहानियां और 6 अलग डायरेक्टर.

‘रात रानी’ फातिमा शेख की अदाकारी से महक उठी है 

पहला एपिसोड ‘रात रानी’, इसे ‘स्काई इज़ पिंक’ की निर्देशक सोनाली बोस ने डायरेक्ट किया है. इसलिए उनसे उम्मीद भी बढ़ जाती है. वो इस उम्मीद पर खरी उतरने की कोशिश भी करती हैं. पर थोड़ा उन्नीस रह जाती हैं. शायद इसमें उनका दोष नहीं है. कहानी बहुत सिम्पल है. जैसे निर्मल वर्मा की कोई कहानी हो, और एक ही कमरे में घट रही हो. हालांकि ‘रात रानी’ एक ही कमरे में नहीं घटती. कैमरा कई सुंदर जगहों को एक्सप्लोर करता है. कई नयनाभिराम दृश्य खींचता है. ये एक कश्मीरी लड़की की कहानी है. उस लड़की के साथ कुछ ऐसा घटता है कि वो टूट जाती है. पर वो टूटकर खुद को फिर जोड़ती है. ‘रात रानी’ दूसरों पर डिपेंड हमारी खुशी के मिथक को तोड़ती है और उसे वैयक्तिक बनाती है. फातिमा शेख ने शायद अब तक के करियर का सबसे शानदार काम किया है. अगर एकाध जगह को जाने दें, जहां उनका कश्मीरी एक्सेंट छूटता है, तो ऐसी पेरफ़ॉर्मेंसेज़ को ही एक्स्ट्राऑर्डनरी कहा जाता है. उन्होंने पूरे एपिसोड को अपने कंधे पर उठाया है. 

Fatima Shekh
‘रात रानी’ में सना शेख

‘ बाई’ को सहज बना देते हैं रणवीर ब्रार

दूसरा एपिसोड है ‘बाई’. इसे हंसल मेहता ने डायरेक्ट किया है. हंसल हैं तो हम उनसे कुछ अच्छा ही एक्सपेक्ट करते हैं. पर ये एपिसोड अपने शुरुआती कुछ सीन में कनफ्यूज़ लगता है. नॉन लीनियर एडिटिंग के जरिए इन्टरेस्टिंग बनाने के चक्कर में सब मज़ा किरकिरा कर दिया गया है. शुरुआती दस मिनट तो समझने में लग जाते हैं कि घटित क्या हो रहा है. पर जैसे-जैसे एपिसोड आगे बढ़ता है, सुंदर और सहज होता जाता है. रणवीर ब्रार इसे और सुंदर बना देते हैं. अभी तक हमने उन्हें खाना बनाते ही देखा है. पर ‘बाई’ में ऐक्टिंग करते हुए देखते हैं और क्या कमाल देखते हैं. वो मेरे लिए इस एपिसोड की खोज हैं. प्रतीक गांधी ने मंज़ूर का रोल भी बखूबी प्ले किया है. लास्ट सीन में उनकी ऐक्टिंग बहुत ज़्यादा अच्छी है. उनके चेहरे के एक-एक भाव आप पढ़ सकते हैं. बाई के किरदार में तनुजा ने फ्लॉलेस अदाकारी की है.  ‘बाई’ को सुंदर बनाने में इसके बेहतरीन संगीत ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पूरा एपिसोड एक डायलॉग पर टिका है, ‘म्यूजिक  को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, तुम कौन हो? स्ट्रेट हो, गे हो. म्यूजिक सब इक्वलाइज़ कर देता है’ 

Bai
‘बाई’ में प्रतीक गांधी और तनुजा.

‘मुंबई ड्रैगन’ विशाल भारद्वाज की मास्टरी है

इस एपिसोड में विशाल भारद्वाज की छाप है. बेहतरीन डायरेक्शन, लाजवाब संगीत और विजुअल्स में समरस होता बैकग्राउन्ड स्कोर. पास्ट और प्रेजेंट के सीन को मर्ज करना चतुराई भरा डायरेक्शन है. भारत में रह रहे चीनी मूल के लोग अपना कल्चर बचाते हुए कैसे हिंदुस्तान में मिक्स हो गए हैं, ‘मुंबई ड्रैगन’ उसी की कहानी है. भारत-चीन की लव-स्टोरी को दो लोगों के ज़रिए विशाल भारद्वाज ने बिना लाउड हुए दिखाने की सफल कोशिश की है. मलेशियन ऐक्ट्रेस यो यान यान ने उम्दा अभिनय किया है. वामिका, मियांग और नसीर साहब ने भी शानदार अदाकारी का नमूना पेश किया है. इस एपिसोड की एन्डिंग मुझे सबसे अच्छी लगी. कहते हैं जिस विजुअल मीडियम में दृश्य ही संवाद हों, उसे सबसे अच्छा माना जाता है. ‘मुंबई ड्रैगन’ ठीक वैसी ही विजुअल आर्ट है. संवाद से ज़्यादा दृश्य बोलते हैं. 

'मुंबई ड्रैगन' में मियांग और वमिका
‘मुंबई ड्रैगन’ में मियांग और वामिका.

‘माय ब्यूटीफुल रिंकल्स’ से सारिका ने चमक बिखेरी है

इसे डायरेक्ट किया है ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव ने. इसमें भी उनका डायरेक्शन सधा हुआ है. इस एपिसोड की खास बात है इसका बैकग्राउन्ड स्कोर, सारे एपिसोड्स में से सबसे अच्छा. कुछ-कुछ शॉट्स बहुत सुंदर हैं. जैसे भोर के समय में इकबाल की पुरानी गाड़ी से दिखता समंदर और ऊंची इमारतें. ये वाला फ्रेम फ्रीज़ करने का मन करता है. ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन’. एपिसोड कमोबेश इसी पंक्ति के इर्दगिर्द घूमता है. सारिका ने अपने किरदार में चार चांद लगा दिए हैं. उनके अभिनय में सहजता और ठहराव है. दानिश रज़वी ने भी ठीक ऐक्टिंग की है. वो सारिका जैसे मंझे हुए कलाकार के आगे फीके पड़ गए हैं. एन्डिंग बेकार है. ऐसा लगता है सारिका के मुंह से जबरदस्ती एपिसोड को जस्टीफ़ाई करने के लिए ‘माय ब्यूटीफुल रिंकल्स’ बुलवाया गया है. 

Sarika
‘माय ब्यूटीफुल रिंकल्स’ में सारिका

‘आई लव ठाणे’ सुंदर और मीनिंगफुल संवादों की एक रेल है

इस एपिसोड में ध्रुव सहगल का डायरेक्शन बहुत अच्छा है. उन्होंने कलाकारों से बेहतरीन अभिनय करवाया है. मुंबई के अनएक्सप्लोर्ड हिस्सों को कैमरे में उतारा है. इस एपिसोड में लगता है, किरदार बोलते रहें और हम सुनते रहें. इसकी लिखाई बहुत सुंदर है. ‘आई लव ठाणे’  लंबे, सुंदर और अर्थपूर्ण डायलॉग्स से सजा हुआ है.  जैसे: ‘वान्ट ऑफ बीइंग विद समवन इज़ वियर्ड, राइट’.  एपिसोड आगे बढ़ने के साथ-साथ खुद को परिपक्व करता जाता है. मसाबा और ऋत्विक ने बेहतरीन काम किया है. दोनों के बीच की असहजता, चाहते हुए भी न कह पाने की छटपटाहट, सबकुछ बहुत अच्छे से एक्सप्रेस करने में वो कामयाब हुए हैं. ‘आई लव ठाणे’ की एन्डिंग सुखद है और शायद यही उसकी सबसे अच्छी एन्डिंग हो सकती थी. 

Masaba Gupta
‘आई लव ठाणे’ में मसाबा गुप्ता.

‘कटिंग चाय’ का ट्रीटमेंट किसी प्ले जैसा है

एपिसोड शुरू होता है. लगता है अब कुछ दिलचस्प घटित होगा. पर ऐसा नहीं होता. रेलवे स्टेशन वाला सीक्वेंस एक समय के बाद बोरिंग हो जाता है. 17 साल पहले वाले अरशद वारसी और चित्रांगदा सिंह के फिजिकल अपीयरेन्स में कोई बदलाव नहीं होता. ‘कटिंग चाय’ के ज़रिए नूपुर अस्थाना ने पति-पत्नी के रिश्ते की सच्चाई दिखाने की कोशिश की है. उनका अप्रोच थिएट्रिकल है. ऐसा लगता है आपके सामने कोई प्ले चल रहा है. बीच-बीच में लोग गाने लगते हैं, लाइटिंग चेंज हो जाती है. आप अरशद के किरदार को और देखना चाहते हैं. पर पूरा फोकस चित्रांगदा के किरदार पर ही रहता है. व्हाट इफ़ वाला सीक्वेंस अच्छा है. इस एपिसोड के डायरेक्शन और राइटिंग दोनों डिपार्टमेंट्स में कसाव की कमी दिखती है.  

Chitrangada Singh
‘कटिंग चाय में’ अरशद और चित्रांगदा

आखिर में आकर सारी कहानियां किसी न किसी तरह से जुड़ती हैं और खुद को अंजाम देती हैं. कहानियों का मेलमिलाप अच्छा लगता है. एकदम से चेहरे पर हंसी तैर जाती है. मॉडर्न लव-मुंबई पूरी तरह से मुंबई की कहानी है. शहर भी इसमें एक किरदार है. अंत में एक डायलॉग भी है: ‘दिस सिटी गिव्स मी होप’. अगर आपको ‘मॉडर्न लव’ का पूरा आनंद लेना है तो इसके नज़दीक जाना पड़ेगा. पास जाइए और ठहरकर इसे महसूस कीजिए. 

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