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फिल्म रिव्यू: मेड इन चाइना

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इस शुक्रवार राजकुमार राव की ‘मेड इन चाइना’ थिएटर्स में लगी है. साथ में मौनी रॉय, बोमन ईरानी, परेश रावल, गजराज राव और सुमित व्यास जैसे एक्टर्स भी हैं. ये फिल्म डायरेक्ट की है, गुजराती फिल्म ‘रॉन्ग साइड राजू’ के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले फिल्ममेकर मिखिल मुसाले ने. ये उनकी पहली हिंदी फिल्म है. तो भाई इन सब लोगों की पिक्चर ‘मेड इन चाइना’ हमने थिएटर्स में देखी. और फिल्म के बारे में हमें क्या लगा, ये हम नीचे बता रहे हैं.

फिल्म की कहानी

रघुबीर मेहता उर्फ रघु नाम का एक आदमी है. अपनी पत्नी और बच्चे के साथ अहमदाबाद में रहता है. उसे आंत्रप्रेन्योर (या और जैसे भी इस शब्द को लिखा या बोला जाता हो) बनना है. कई बिज़नेस ट्राय कर चुका है. रोटी मेकर से लेकर नेपाली चटाई सब फेल हुए हैं. पत्नी बच्चों के अलावा रघु के एक तानेबाज बड़े पापा और एक बुली करने वाला कज़िन भी है. इन्हीं के प्रेशर में वो चाइना जाता है. वहां उसे इंडिया के बारे में कुछ इंट्रेस्टिंग बातें पता चलती हैं. जैसे इंडिया के लोगों की सबसे बड़ी ज़रूरत सड़कें नहीं सेक्स है. और सेक्स में सैटिसफैक्शन की कोई गारंटी नहीं है. वो चीन से टाइगर सूप लाता है, जो वायग्रा से 10 गुणा तेजी से मार्केट में बिक रहा है. मतलब फुल सैटिसफैक्शन. रघु ये प्रोडक्ट इंडिया लाता है और अंडरग्राउंड यानी कानून की नज़रों से बचकर बेचने लगता है. आइडिया मार्केट में चल पड़ता है. और तभी रघु के बिज़नेस के तार उसके परिवार से जुड़ते हैं और पिक्चर में शॉर्ट सर्किट होना शुरू हो जाता है. आगे क्या होता है, जब इस बारे में फिल्म के ट्रेलर ने नहीं बताया, तो हम क्यों बताएं.

अपनी पत्नी रुक्मणी और स्कूल में पढ़ने वाले बेटे के साथ रघु.
अपनी पत्नी रुक्मणी और स्कूल में पढ़ने वाले बेटे के साथ रघु.

एक्टिंग परफॉर्मेंसेज़

राजकुमार राव ने रघु के कैरेक्टर को बड़ी ईमानदारी से निभाया है. वो किरदार उनके चेहरे से लेकर बदन तक पर दिखाई पड़ता है. लेकिन उस कैरेक्टर के साथ दिक्कत ये है कि वो बहुत दिक्कत में कभी दिखाई नहीं देता. जबकि उसकी लाइफ सिर के बल खड़ी हो चुकी है. मौनी रॉय ने रघु की पत्नी रुक्मणी बनी हैं. सबसे पहली बात तो इन दोनों के बीच में केमिस्ट्री जैसी कोई चीज़ नहीं है. या रणबीर-आलिया जैसी पीआर टीम. खैर, मौनी रॉय के करने के लिए भी कुछ खास है नहीं है. पहले वो सिर्फ रघु के साथ सिगरेट पीती दिखाई देती हैं. और फिर क्लाइमैक्स में आकर ये बता जाती हैं कि उन्हें फिल्म के इंट्रो सीन्स से जज ना किया जाए.

फिल्म के एक सीन में राजकुमार राव और मौनी रॉय. इनके बीच कोई भी ऐसा मजबूत सीन नहीं है, जो ये साबित कर पाए कि ये पति-पत्नी हैं.
फिल्म के एक सीन में राजकुमार राव और मौनी रॉय. इनके बीच कोई भी ऐसा मजबूत या गंभीर सीन नहीं है, जो ये साबित कर पाए कि ये पति-पत्नी हैं.

70 साल के बूढ़ सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. वर्धी का रोल किया है बोमन ईरानी ने. ये किरदार फिल्म की आन-बान-शान और पूरी फिल्म का हासिल है. ये किरदार चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कितनी भी सो कॉल्ड गंदी बात कह देता है.लेकिन कुछ ही समय में हम डॉ. वर्धी की आदतों को जान जाते हैं. लेकिन उन्हें नहीं जान पाते. उनसे जुड़ी एक बात का रेफरेंस भी बार-बार आता है लेकिन उस बारे में कहीं कोई क्लैरिटी नहीं दी जाती. साथ में सुमित व्यास भी हैं. उनका कैरेक्टर निराश करता है. सुमित नहीं. ये दिक्कत राइटर-डायरेक्टर के लेवल की है. क्योंकि सुमित का कैरेक्टर ऑलमोस्ट फिल्म का विलेन होता है. लेकिन वो कैरेक्टर उंगली पर गिनकर 5-6 सीन्स में दिखता है, जिसकी वजह से उसके कैरेक्टर के आगे ऑलमोस्ट लगाना पड़ा.

रघु के बिज़नेस पार्टनर और सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. वर्धी. और दूसरी तस्वीर में रघु का थोड़ा बुली कज़िन देवराज यानी सुमित व्यास.
रघु के बिज़नेस पार्टनर और सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. वर्धी. और दूसरी तस्वीर में रघु का थोड़ा बुली कज़िन देवराज यानी सुमित व्यास.

बाकी फिल्म में परेश रावल और गजराज राव भी गेस्ट अपीयरेंस में हैं. परेश ने तन्मय शाह नाम के एक इंवेस्टर का रोल किया है, जो चाइना में रहता है. परेश साथ राज के जितने भी सीन्स हैं, वो सारे मज़ेदार हैं. और शायद इस फिल्म की सबसे खास बात भी. गजराज राव ने एक मोटिवेशनल स्पीकर का रोल किया है. लेकिन वो अधिकतर समय नेपथ्य में ही रहते हैं. एकाध सीन्स में दिखते हैं, जिसमें उन्होंने वो कर दिया है, जिस काम की वजह से उन्हें फिल्म का हिस्सा बनाया गया है.

फिल्म के दो अलग-अलग सीन्स में परेश रावल और गजराज राव.
फिल्म के दो अलग-अलग सीन्स में परेश रावल और गजराज राव. इन दोनों ने एक तरह से रघु के मेंटोर का रोल किया है. 

म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर

फिल्म के गाने पहले ही काफी चल रहे हैं. फिल्म के म्यूज़िक की अच्छी बात है इसका अपनी जमीन से जुड़े होना. यानी ये कहानी अहमदाबाद में घटती है और ऐसे में हल्का ही सही लेकिन गुजराती टच लिए ‘सनेड़ो’, ‘ओढ़नी’ और ‘वालम’ जैसे गाने इसकी ऑथेंटिसिटी बनाए रखते हैं. ‘वालम’ के लिरिक्स तो काफी रेगुलर हैं लेकिन वो गाना सुनने में काफी स्वीट लगता है. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर काफी हेवी है. थोड़े कूल तरीके से कहें, तो हाई ऑन बेस है. काफी धूम-धड़ाके भरा माहौल पूरी फिल्म में बना रहता है. लेकिन इससे फिल्म देखने के एक्सपीरियंस में कोई कमी नहीं आती. फिल्म का म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर सचिन-जिगर की जोड़ी ने किया है. ‘वालम’ गाना सुनकर कान मीठा करते जाइए:

फिल्म की बुरी बातें

फिल्म शुरू होने के बाद कहानी को खड़ा करने में बहुत समय लेती है. इंटरवल तक हम पॉपकॉर्न खा रहे होते हैं और फिल्म टाइम. कुछ ऐसे सवाल जो फिल्म खड़े तो करती है लेकिन उसका जवाब दिए बिना चली जाती है. और ये बात खालिस लापरवाही लगती है. फिल्म का पहला सीक्वेंस है कि एक चाइनीज़ नेता भारत में टाइगर सूप पीकर मर जाता है. इसी को लेकर बहुत सारे तमाशे होते हैं. इस मामले का मुख्य आरोपी छूट जाता है. लेकिन फिल्म ये बताने का जहमत नहीं उठाती कि चीनी नेता अगर इस सूप से नहीं मरे, तो मरे कैसे?

टाइगर चाइनीज़ सूप की तस्वीर नहीं मिली, तो हमने फिल्म से उस सूप की सांकेतिक तस्वीरें दिखा रहे हैं.
टाइगर चाइनीज़ सूप की तस्वीर नहीं मिली, तो हम फिल्म से उस सूप की सांकेतिक तस्वीरें दिखा रहे हैं.

साथ इस फिल्म को स्ट्रीम की दिक्कत है. ये कंफ्यूज़ रहती है कि क्योंकि कई चीज़ों को एक-साथ मिलाकर दिखा देना चाहती है. पहले महिला सशक्तिकरण फिर क्वॉलिटी ऑफ सेक्स और मेन टॉपिक सेक्स अवेयरनेस तो है ही. लेकिन कहना गलत होगा कि ये कोई बात ठीक से नहीं कह पाती है. ये सेक्स अवेयरनेस के बारे में खुलकर बात करती है. लेकिन ‘खानदानी शफाखाना’ की तरह लाउड नहीं होती.

फिल्म की अच्छी बातें

इसका ज़िद्दीपन. कई चीज़ों के बारे में बात करना इस फिल्म की खामी है लेकिन उसके पीछे की सोच सही है. तीन घंटे से कुछ छोटी फिल्म सेक्स और समाज से जुड़ी हर बड़ी और ज़रूरी बात आप तक पहुंचा देना चाहती है. लेकिन चाहने और होने में फर्क होता है. हालांकि, इन दो चीज़ों के गैप में फिट होने वाली मेकर्स की नीयत को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. जहां तक डायलॉग्स की बात है, तो वो फिल्म को बस सीरियस होने से बचाते हैं. लेकिन ये लाइनें फनी वाली कैटेगरी में तो नहीं आएंगी. फिल्म के कई बार बहुत ज्ञान देने वाले मोड में चले जाने के बाद ये लाइनें मामले को संभालने का काम करती हैं.

चाइनीज़ बिज़नेसमैन के साथ मीटिंग के दौरान देवराज माफ करिएगा रघु. इन्हीं के सौजन्य से वो टाइगर सूप इंडिया लेकर आता है.
चाइनीज़ बिज़नेसमैन के साथ मीटिंग के दौरान देवराज माफ करिएगा रघु. इन्हीं की मदद से वो टाइगर सूप इंडिया लेकर आता है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

‘मेड इन चाइना’ अपने नाम को कई मायनों में सीरियसली लेती है. जैसे फिल्म मुख्य किरदार टोटली मेड इन चाइना है. लेकिन हमारे यहां चाइना में बनी चीज़ों के साथ एक डिस्क्लेमर जोड़ दिया जाता है- चले तो चांद तक नहीं तो रात तक. इस फिल्म को देखने आप चांद तक वाला उम्मीद लेकर गए थे और मिला रात तक बात बस इतनी सी ही है. लेकिन ये फिल्म जो बात कर रही है, वो रातों को बंद कमरे में भी नहीं होती. और इन्हीं चक्करों में न जाने कितने कपल आज भी अपने चांद-रात का इंतज़ार कर रहे हैं.


 

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