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हिंदी फिल्मों के 10 बुरे और 10 जबरदस्त देशभक्ति डायलॉग्स

अगस्त 2021 के सेकंड वीक में एक ही जॉनर की दो फिल्में रिलीज़ हो रही हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा-कियारा आडवानी स्टारर ‘शेरशाह’ और अजय देवगन-संजय दत्त की ‘भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया’. कमाल की बात ये दोनों ही फिल्में असल घटनाओं से प्रेरित है. मगर इन फिल्मों के ट्रेलर कुछ और ही कह रहे हैं. उम्मीद थी How’s the josh जैसा इंस्टेंट हिट वॉर क्राई सुनने को मिलेगा. मगर इन ट्रेलर्स को देखकर सिर्फ क्राइंग वाली फीलिंग आ रही है. यानी इन्होंने असलियत से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने में ‘उड़ी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ को भी पीछे छोड़ दिया. डायलॉग्स तो ऐसे कि समझ नहीं आ रहा कि उसे प्रोसेस कैसे करें. मिसालन ‘भुज- द प्राइड ऑफ इंडिया’ का एक डायलॉग सुनिए. एक आदमी विजय कार्णिक का किरदार निभा रहे अजय देवगन को फोन करके एक कोड वर्ड बताता है. सामने वाला व्यक्ति कहता है-

”ताज महल प्यार की निशानी है.”

इसके जवाब में अजय का किरदार तपाक से कहता है-

”हिंदुस्तान तेरे बाप की कहानी.”

सेंस बने या नहीं, मगर मीटर प्रॉपर रहना चाहिए. जब मीटर की बात छिड़ी है, तो इसी फिल्म का एक और डायलॉग सुनिए, जिसकी मदद से सेना के जवानों को श्रद्धांजलि दी गई है.

”मेरे मरने का मातम मत करना, मैंने खुद ये शहादत चुनी है
मैं जीता हूं मरने के लिए, मेरा नाम है सिपाही.”

ये डायलॉग सुनकर ऐसा लगता है मानों राइटर ने ऑन सेट कॉम्प्रोमाइज़, माफ करिए इंप्रोवाइज़ किया है. ऐसा लग रहा है कि इस फिल्म में अजय देवगन को इसीलिए कास्ट किया गया क्योंकि उनके नाम में ‘गन’ है. बाकी संजू बाबा की हिस्ट्री में अपन नहीं जाएंगे. फिल्म का ट्रेलर यहां देखिए-

‘भुज’ की इस कदर चीरफाड़ देखकर आपका ‘दिल मांगे मोर’. मगर सिद्धार्थ की ‘शेरशाह’ में इस तरह के एंबैरेसिंग डायलॉग्स नहीं हैं. कम से कम ट्रेलर में देखने-सुनने को तो नहीं मिले. 15 अगस्त और दो देशभक्ति फिल्मों की रिलीज़ के कंबाइंड मुबारक मौके पर हम आपको 20 डायलॉग्स सुनाएंगे. 10 वैसे फिल्मी डायलॉग्स जिन्हें मज़ाक का विषय बना दिया गया और 10 वैसे डायलॉग्स जिनकी मदद से मेकर्स ने कुछ कायदे की बात दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की. और काफी हद तक सफल रहे.

शुरुआत करेंगे 10 बुरे देशभक्ति डायलॉग्स से.

1) जे.पी. दत्ता की फिल्म ‘बॉर्डर’ में सुदेश बेरी का निभाया किरदार मथुरा दास छुट्टी लेकर घर जा रहा है. वो अपने दोस्तों को बताता है कि फाइनली उसकी छुट्टी सैंकशन हो गई है. मथुरादास को खुशी का इज़हार करते देख मेजर कुलदीप सिंह वैसे ही रिएक्ट करते हैं, जैसे ऑफिस से छुट्टी मांगते वक्त आपका बॉस. वो कहते हैं-

”मथुरादास जी आप घर जा रहे हैं. मगर खुशी का ये बेहूदा नाच जो आप अपने भाइयों के सामने कर रहे हैं, अच्छा नहीं लगता. आपकी छुट्टी मंज़ूर हुई है क्योंकि आपके घर में प्रॉब्लम है. दुनिया में किसे प्रॉब्लम नहीं. जिंदगी का दूसरा नाम प्रॉब्लम है. अपने भाइयों में कोई ऐसा भी है, जिसकी विधवा मां आंखों से देख नहीं सकती. और उसका इकलौता बेटा रेगिस्तान की धूल में खो गया है. कोई ऐसा भी है, जिसकी मां की अस्थियां इंतज़ार कर रही हैं कि उसका बेटा जंग जीतकर आएगा और उसे गंगा में बहा देगा. किसी का बूढ़ा बाप अपनी ज़िंदगी की आखिरी घड़ियां गिन रहा है. और हर रोज मौत को ये कहकर टाल देता है कि मेरी चिता को आग देने वाला दूर बॉर्डर पर बैठा है. अगर इन सब ने अपनी प्रॉब्लम्स का बहाना देकर छुट्टी ले ली, तो ये जंग कैसे जीती जाएगी बताओ. मथुरादास इससे पहले की मैं तुझे गद्दार करार देकर गोली मार दूं, भाग जा यहां से.”

अगर इस डायलॉग और सीक्वेंस को डाइसेक्ट करने बैठे, तो मामला खिंच जाएगा. मगर गोली मारकर गद्दार साबित करने वाली बात आज ‘बॉर्डर’ की रिलीज़ के 24 साल बाद उस वक्त से ज़्यादा प्रासंगिक हो गई है. शायद अनुराग ठाकुर का ‘देश के गद्दारों को गोली मारों सालों को’ वाली बात ‘बॉर्डर’ से ही प्रेरित लगती है. अब आप यहां आ गए हैं, तो एक पर्सनल बात भी जान लीजिए, मेरी प्रॉब्लम में बहुत प्रॉब्लम चल रही है.

फिल्म 'बॉर्डर' के एक सीन में सनी देओल और सुदेश बेरी.
फिल्म ‘बॉर्डर’ के एक सीन में सनी देओल और सुदेश बेरी.

2) पिछले दिनों आई विकी कौशल की ‘उड़ी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ ने ‘ज़ीरो डार्क थर्टी’ से सिर्फ सिर्फ नाइट विज़न गॉगल्स ही नहीं, प्रोपगैंडा को बढ़ावा देने वाले आइडिया को भी कॉपी किया था. उस फिल्म का एक डायलॉग है-

”ये हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा. ये नया हिंदुस्तान है. ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.”

वैसे तो फिल्म में इस डायलॉग का इस्तेमाल दुश्मनों के लिए किया गया था. मगर इंडिया की पब्लिक ने इसे गलत समझ लिया. उन्होंने इसे अपने देश में प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया.

3) सनी देओल ने अपनी फिल्मों में इतनी देशभक्ति दिखाई कि जनता कंफ्यूज़ हो गई कि सनी फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हैं या आर्मी में. उनकी फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ के गाने बजाए बिना इंडिया का कोई देशभक्ति इवेंट पूरा नहीं होता. इस फिल्म में सनी ने दुश्मनों को बंदी बनाया और राइटर ने तुकबंदी बनाया. जैसे फिल्म का एक डायलॉग है-

”तुम दूध मांगोंगे हम खीर देंगे, तुम कश्मीर मांगोगे हम चीर देंगे.”

कश्मीर का मसला थोड़ा टची है, उसे नहीं छेड़ते हैं. मगर ये क्या बात हुई कि सामने वाले ने दूध मांगा, तो आप खीर दोगे. क्या पता उसे चाय बनानी हो! इस संवाद को सुनकर आपके भीतर देशभक्ति वाला फील नहीं आता. सिर्फ हिंसक, नफरती और सैवेज भाव महसूस होता है.

4) ‘गदर’ वाले अनिल शर्मा की एक फिल्म आई थी ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’. इसमें अमिताभ बच्चन से लेकर अक्षय कुमार और बॉबी देओल जैसे दिग्गज काम कर रहे थे. ये फिल्म कब आई, कब गई किसी को पता नहीं चला. इसके पीछे की वजह आप फिल्म का एक डायलॉग सुनकर समझ सकते हैं. मेजर जनरल अमरजीत सिंह का रोल करने वाले बच्चन कहते हैं-

”जिस देश में पैदा हुए हो तुम, उस देश के अगर तुम भक्त नहीं,
नहीं पिया दूध मां का तुमने और बाप का तुममें रक्त नहीं.”

इस भारी साउंड करने वाले हल्के डायलॉग को बच्चन साहब की वजनदार आवाज़ में सुनने के बावजूद कुछ महसूस नहीं होता. क्योंकि न तो इसका मीटर ठीक बैठ रहा है, ना मतलब क्लीयर हो रहा है. मगर देशभक्ति के नाम के नाम पर सबकुछ चलता है.

5) ‘तहलका’ फिल्म में ऑर्डर्ली अल्लाह रक्खा का रोल करने वाले गुलशन ग्रोवर बड़े सटल तरीके से एक डायलॉग बोलते हैं. बोलकर लगा होगा कि क्या ही गज़ब चीज़ बोल दी है.

”बेचकर ईमान कमाई दौलत तो इंसान क्या,
नमक खाया जिस वतन का, उसी का ना हुआ तो मुसलमान क्या!”

आज कल इतनी रेलेवेंस तो गुलशन कुमार की नहीं रही, जितनी इस डायलॉग की है. धर्म विशेष पर नमक अदा करने और उसे साबित करने का प्रेशर देख रहे हैं. तब नहीं देखी, आज कल तो देख ही रहे होंगे. तार लिखा है, चिट्ठी समझिएगा.

6) अजय देवगन वाली ‘दिलजले’ याद है. अभी-अभी तो टोक्यो ओलंपिक्स के दौरान अनु मलिक ने याद दिलाई थी. इस फिल्म का नायक श्याम उर्फ शाका कहता है-

”इस धरती से गद्दारी मत करना, वरना ये धरती फटेगी,
शोले उगलेगी, और तुझे राख कर देगी.”

शाका को धरती पर इतना भरोसा है, जितना मुझे अपने आप नहीं है. मगर कोई बात नहीं है मेरे मुल्क, मेरा देश, मेरा ये चमन वाला गाना भी इसी फिल्म है.

फिल्म 'दिलजले' के एक सीन में अजय देवगन.
फिल्म ‘दिलजले’ के एक सीन में अजय देवगन.

7) 1971 वॉर के दौरान हुई एक घटना की बात करने वाली फिल्म है ‘द गाज़ी अटैक’. ओवरऑल तो ये बढ़िया फिल्म है. मगर इसमें भी कुछ ऐसी बातें थीं, जो उस दौर के बारे में बनी तकरीबन सभी फिल्मों में पाई जाती हैं. जैसे क्रिंज, इनसेन्सिटिव और फिल्मी डायलॉगबाज़ी. फिल्म के एक सीन में अपने अनुभव का परिचय देते हुए कैप्टन रणविजय सिंह का किरदार निभा रहे के.के. मेनन कहते हैं-

”जंग जो है न, शहीद होकर नहीं, दुश्मन को शहीद करके जीती जाती है.”

सबसे पहली बात तो ये कि किसी भी युद्ध पर आधारित फिल्म को बनाने का मक़सद वॉर का ग्लोरिफिकेशन नहीं होना चाहिए. क्योंकि वॉर कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे सेलीब्रेट किया जाना चाहिए. कोई युद्ध क्यों हुआ या उस युद्ध में क्या हुआ, फिल्म का फोकस इस पर होना चाहिए. इसलिए पॉप-कल्चर में एंटी वॉर फिल्में भारी प्रचलन में हैं. ऐसे में इस तरह के डायलॉग्स फिल्म की नैया डुबो देते हैं. और ‘द गाज़ी अटैक’ तो पाकिस्तानी सबमरीन PNS Ghazi के डूबने के बारे में ही थी.

8) कंगना रनौत ने ‘मणिकर्णिका’ नाम की फिल्म की थी. वो इस प्रोजेक्ट से इतनी ज़्यादा अटैच हो गईं कि फिल्म के डायरेक्टर को हटाकर खुद ही फिल्म डायरेक्ट कर डाली. डायरेक्टर का नाम था- कृष. खैर, इस फिल्म से कंगना ने बताया कि भले हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उनकी अंग्रेज़ी और एक्सेंट का मज़ाक उड़ाती है मगर उनसे शुद्ध हिंदी कोई नहीं बोल सकता. इस फिल्म का ये डायलॉग सुनिए-

”मैं वो मशाल बनूंगी, जो हर भारतीय के अंदर आज़ादी की भूख बनकर दहकेगी.”

जब तक सिंपल लाइन को जटिल बनाकर लोगों की समझ से परे नहीं पहुंचाया, तो पीरियड फिल्म की फील कैसे आएगी! मैं ऐसे संवाद सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता हूं.

कंगना रनौत की फिल्म 'मणिकर्णिका' का पोस्टर.
कंगना रनौत की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ का पोस्टर.

9) देशभक्ति की बात हो अक्षय कुमार का नाम न आए, ऐसा थोड़ी हो सकता है. इस फिल्म में अक्षय ने नेवल कमांडर रुस्तम पावरी का रोल किया था. इस फिल्म के एक सीन में वो अपनी देशभक्ति का प्रमाण देते हुए कहते हैं-

”मेरी यूनिफॉर्म मेरी आदत है… जैसे कि सांस लेना, अपने देश की रक्षा करना.”

इंटरव्यू लेना. औसत परफॉरमेंस के बावजूद बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीतना. जैसी तमाम बातें इस लिस्ट में जोड़ी जा सकती हैं. मगर ये सब करते हुए मेरे को ऐसा धकधक होने लगता है.

10) 2014 में सलमान खान की एक फिल्म आई थी ‘जय हो’. पहले इस फिल्म का नाम ‘मेंटल’ रखा जाने वाला था. मगर फिर मेकर्स को लगा लोग सलमान को मेंटल खान बुलाने लगेंगे. फिल्म के एक सीन में जय अग्निहोत्री का किरदार कहता है-

”चाहे हमें एक वक्त की रोटी न मिले, बदन पर कपड़ा न हो, सिर पर छत न हो. लेकिन जब देश की आन की बात आती है, तब हम अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं.”

हमने हमेशा ये माना कि भाई वॉज़ ऑलवेज़ अहेड ऑफ हिज़ टाइम. जो बात सात साल बोली गई थी, वो आज के समय में भी फिट बैठती है. मगर सिर्फ ट्विटर पर. 2002 में भाई का एक्सीडेंट नहीं हुआ, ‘ड्राइवर’ ने गाड़ी इसलिए ठोकी क्योंकि सामने वाली बेकरी का नाम कराची बेकरी था.

अरे हट जा ताऊ पाछे णे क्योंकि भाई गाड़ी लेकर आ रहे हैं. फिल्म 'जय हो' के एक सीन में सलमान खान.
अरे हट जा ताऊ पाछे णे क्योंकि भाई गाड़ी लेकर आ रहे हैं. फिल्म ‘जय हो’ के एक सीन में सलमान खान.

अब बात उन 10 देशभक्ति डायलॉग्स की जो छाती पीटकर अपना देशप्रेम ज़ाहिर नहीं करते. बल्कि संवादों के माध्यम से कोई तार्किक या कायदे की बात जनता तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं.

1) पिछले दिनों एक बड़ी कमाल की फिल्म आई थी ‘मुल्क’. ऋषि कपूर ने अपने करियर के सेकंड हाफ में जितने फिल्में की, उसमें से अनुभव सिन्हा डायरेक्टेड ‘मुल्क’ स्टैंड आउट करती है. ये फिल्म उस दौर में आई, जब देश में धर्म के नाम पर लोग बंट गए. ऐसे में ऋषि का निभाया मुराद अली वाला किरदार कहता है-

”हम और वो मिलकर इस को थोड़ी न बनाते हैं. हम इस मुल्क को बनाते हैं.”

2)राकेश ओमप्रकाश मेहरा नाम के एक डायरेक्टर हुए हैं इंडिया में. बढ़िया सिनेमा बनाने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने 2006 में ‘रंग दे बसंती’ नाम की फिल्म बनाई थी. वो फिल्म एक यात्रा है, जो आप अपने भीतर तय करते हैं. बताने से समझ नहीं आएगी. देखकर महसूस करनी पड़ेगी. फिल्म के एक सीन में जब तमाम युवा इस देश को गया-गुज़रा मान चुके थे, तब आर. माधवन का निभाया किरदार फ्लाइट लेफ्टीनेंट अजय सिंह राठौड़ कहता है-

”कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता. उसे बेहतर बनाना पड़ता है.”

आपने सोशल मीडिया पर मीम्स की दुनिया की वो लाइन सुनी होगी- that hit me hard. इस डायलॉग को सुनने के बाद वैसा ही फील होता है.

फिल्म 'रंग दे बसंती' में फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय सिंह राठौड़ का किरदार निभाने वाले आर. माधवन. सोहा अली खान ने फिल्म में उनकी प्रेमिका का रोल किया था.
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय सिंह राठौड़ का किरदार निभाने वाले आर. माधवन. सोहा अली खान ने फिल्म में उनकी प्रेमिका का रोल किया था.

3)शाहरुख खान ने अपने करियर में कुछ फिल्में ऐसी की हैं, जिनके लिए उन्हें याद रखा जाएगा. वैसी ही एक फिल्म है ‘स्वदेस’. विदेश में रहने वाले मोहन भार्गव इंडिया जब इंडिया लौटकर आता है, तो अपने देश की स्थिति देखकर निराश हो जाता है. इन भावों को शब्दों में पिरोते हुए वो कहता है-

”हम आपस में लड़ते रहते हैं. जब हमें लड़ना चाहिए अशिक्षा के खिलाफ, बढ़ती आबादी, भ्रष्टाचार के खिलाफ. यहां जाति के आधार पर भेद-भाव हो रही है. दलित ब्राह्मण को दोष देता है, ज़मींदार किसान को दोष देता है पर उनका हक़ नहीं देता. फिर हम महान कैसे हुए?”

4) आशुतोष गोवारिकर डायरेक्टेड ‘स्वदेस’ फिल्म का एक और डायलॉग है-

”मन से रावण जो निकाले, उसके मन में राम है.”

इस डायलॉग को आप देशभक्ति मानते हैं या नहीं. मगर राम का नाम था, तो मुझे लगा…

फिल्म 'स्वदेस' के एक सीन में मोहन भार्गव का किरदार निभाने वाले शाहरुख खान.
फिल्म ‘स्वदेस’ के एक सीन में मोहन भार्गव का किरदार निभाने वाले शाहरुख खान.

5) समय के साथ अक्षय कुमार की फिल्मों का कलेवर बदल गया है मगर फ्लेवर वही है. एक दौर में उन्होंने ‘नमस्ते लंदन’ नाम की फिल्म की थी. वैसे तो इस फिल्म को हिमेश रेशमिया के सुपरहिट म्यूज़िक और लीक से हटकर कॉन्टेंट के लिए याद रखा जाता है. मगर इस फिल्म को याद रखने की एक और वजह हम आपको बता रहे हैं. फिल्म के एक सीन में अक्षय का निभाया बल्लू का किरदार कहता है-

”एक कैथलिक औरत प्रधानमंत्री की कुर्सी एक सिख के लिए छोड़ देती है. एक सिख प्रधानमंत्री पद की गरिमा की शपश एक मुस्लिम राष्ट्रपति से लेता है. उस देश की भाग-दौड़ संभालने के लिए जिसमें अस्सी प्रतिशत लोग हिंदू हैं.”

फिल्म 'नमस्ते लंदन' के एक सीन में अक्षय कुमार.
फिल्म ‘नमस्ते लंदन’ के एक सीन में अक्षय कुमार. ये फिल्म अच्छी थी इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि इसका सीक्वल भी अच्छा होगा. 

6) आमिर खान के एक्सपेरिमेंट वाले दिनों की एक फिल्म है ‘द राइज़िंग ऑफ मंगल पांडे’. इसमें मंगल पांडे बताते हैं कि वो आज़ादी की इस लड़ाई का हिस्सा क्यों हैं? फिल्म के एक सीन में आमिर का निभाया मंगल का किरदार कहता है-

”ये आज़ादी की लड़ाई है. गुज़रे हुए कल से आज़ादी और आने वाले कल के लिए.”

7) हमने आपको बुरे देशभक्ति डायलॉग्स की लिस्ट में फिल्म ‘द गाज़ी अटैक’ का एक डायलॉग सुनाया था. मगर इस फिल्म में कुछ चीज़ें तारीफ के काबिल भी थीं. जैसे ये डायलॉग. फिल्म में के.के. मेनन का किरदार कहता है-

”क्या है सैनिक होना? आज हमारे देश का किसान खेतों में लोगों के लिए अनाज उगा रहा है. बिना किसी फिक्र के. क्यों? क्योंकि उसे पता है कि सीमा पर हम खड़े हैं. मां हर सुबह खुशी-खुशी अपने बच्चों को स्कूल छोड़कर आती हैं. उसके मन में कोई डर नहीं होता. क्यों? क्योंकि उसे पता है कि सीमा पर हम खड़े हैं. इस देश का हर एक इंसान हर रोज़ कड़ी मेहनत करता है. अपने परिवार के भविष्य के लिए. अपने बच्चों की तरक्की के लिए. उससे उनकी सुरक्षा की कोई चिंता नहीं होती. क्यों? क्योंकि उसे पता है कि हम सीमा पर खड़े हैं और रहेंगे. इस भरोसे को निभाना, ये होता है सैनिक होना.”

गूज़बंप्स वाली फीलिंग आई?

8) अक्षय कुमार की स्पाई थ्रिलर फिल्म थी ‘बेबी’. ये इंडियन सीक्रेट सर्विस के एक मिशन की कहानी थी, जिसमें अक्षय ने एक जासूस का किरदार निभाया था. जब वो एक आतंकवादी को पकड़ते है, तो वो उनसे धर्म की कुछ बात करता है. इसके जवाब में अक्षय का कैरेक्टर कहता है-

”रिलीजन वाला जो कॉलम होता है, उसमें हम बोल्ड और कैपिटल में INDIAN लिखते हैं.”

9) नाना पाटेकर अपने टाइम के सबसे फीयरलेस एक्टर्स में गिने जाते थे. खास तौर पर उनके लिए फिल्में लिखी जाती थीं. और नाना कागज़ पर लिखे उन किरदारों में जान फूंक देते थे. ऐसी ही एक फिल्म थी मेहुल कुमार डायरेक्टेड फिल्म ‘क्रांतिवीर’. समाज के हाथों हारा नाना का निभाया प्रताप तिलक का किरदार अपने कहता है-

”ये मुसलमान का खून ये हिंदू का खून… बता इसमें मुसलमान का कौन सा हिंदू का कौन सा? बता!”

फिल्म 'क्रांतिवीर' के एक सीन में नाना पाटेकर. ये नाना के हिंदी फिल्म करियर के सबसे आइकॉनिक सीन्स में से एक है.
फिल्म ‘क्रांतिवीर’ के एक सीन में नाना पाटेकर. ये नाना के हिंदी फिल्म करियर के सबसे आइकॉनिक सीन्स में से एक है.

10) सनी देओल ने अपने करियर में कई जिंगोइस्टिक किरदार निभाए. मगर उनका एक डायलॉग ऐसा है, जो सामने वाले को नीचा दिखाए बगैर अपना देशप्रेम साबित करता है. ‘गदर’ फिल्म के एक सीन में तारा सिंह का किरदार, अशरफ अली से कहता है-

”अगर आपका पाकिस्तान ज़िंदाबाद है, तो इसमें हमें कोई ऐतराज़ नहीं. लेकिन हमारा हिंदुस्तान ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है और ज़िंदाबाद रहेगा.”


वीडियो देखें: ये हैं ‘तांडव’ के 15 सबसे शानदार डायलॉग्स!

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