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फिल्म रिव्यू- कर्णनन

इन दिनों सिनेमाघरों में हिंदी फिल्मों का अकाल पड़ा हुआ है. मगर एक के बाद एक दनादन साउथ इंडियन फिल्में रिलीज़ हो रही हैं. पिछले दिनों हमने ‘वकील साब’ पर बात की थी. अब बारी है धनुष की लेटेस्ट रिलीज़ ‘कर्णनन’ की. हमने ये फिल्म सिनेमाघरों में देखी. हमें ‘कर्णनन’ फिल्म कैसी लगी, आगे हम इसी बारे में बात करेंगे.

शुरुआत ‘कर्णनन’ की कहानी से नहीं, फिल्म के पहले सीन से करेंगे. एक 9-10 साल की लड़की को फिट आती है और बीच सड़क पर गिर जाती है. उसके आसपास से ढेर सारी बसें निकल रही हैं. मगर कोई भी उस बच्ची की मदद नहीं करता. मुंह से झाग निकालकर वो बच्ची वहीं अपना दम तोड़ देती है. इस घटना की भयावहता को हमारे दिलों-दिमाग में बैठाने के लिए कैमरा हमें बर्ड्स आई व्यू से एक बार फिर ये दृश्य दिखाता है. अब सवाल ये उठता है कि उस बच्ची की मदद को कोई आगे क्यों नहीं आता है? कोई बस रुककर उसे अस्पताल क्यों नहीं ले जाती? इस साधारण से सवाल के जवाब को समझने में हमें अगले ढाई घंटे लग जाते हैं.

फिल्म 'कर्णनन' का पोस्टर, जो लिटरल और मेटाफर दोनों ही तरीके से बात करता है.
फिल्म ‘कर्णनन’ का पोस्टर, जो लिटरल और मेटाफर दोनों ही तरीके से बात करता है.

फिल्म की मोटा-मोटी कहानी

अब आपको इस फिल्म की मोटा-मोटी स्टोरीलाइन बता देते हैं. साल 1997. तमिलनाडु में एक गांव है पोड़ियंकुलम. इस गांव में कुछ गरीब और जाति प्रथा के मारे लोग रहते हैं. पोड़ियंकुलम के लोगों को आश्रित रखने के लिए बगल गांव मेलुर वाले उनके यहां बस स्टॉप नहीं बनने दे रहे. अपनी धौंस दिखाकर वो इस गांव में किसी भी बस को रुकने नहीं देते. ताकि पोड़ियंकुलम के लोगों को मेलुर से बस लेनी पड़े. इसीलिए किसी भी बस वाले ने उस बच्ची की मदद नहीं की. पोड़ियंकुलम का एक लड़का है कर्णनन. आर्मी में जाने की तैयारी कर रहा है. वो धर्म-जाति नहीं समझता है. इसलिए खुद को किसी से कम नहीं समझता है. गुस्सैल है. लेकिन अपने गांववालों की बेहतरी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. गांव का एक बूढ़ा आदमी यमन उसका दोस्त और मेंटॉर है. एक दिन एक छोटा बच्चा, अपनी बीमार मां को जल्दी अस्पताल पहुंचाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा होता है. मगर कोई बस नहीं रुकती. वो इस गुस्से में बस पर पत्थर मार उसका शीशा तोड़ देता है. ये बात बढ़ जाती है और कर्णनन के गांव के कुछ लोगों को पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है. यहां से फिल्म की कहानी 360 डिग्री घूम जाती है. अगले एक-सवा घंटे तक हमें स्क्रीन पर जो भी दिखाया जाता है, उससे आप नज़र नहीं हटा पाते. आपको समझ आता है कि कुछ घंटों में ये फिल्म सिर्फ एक गांव या कुछ लोगों की कहानी नहीं दिखा रही. बल्कि ये कई पीढ़ियों की व्यथा की कहानी है, जो हमें हर दूसरे दिन अखबारों में पढ़ने या न्यूज़ चैनलों पर देखने को मिल जाती हैं. एक हार्ड-हिटिंग सोशल फिल्म.

बस को रोकने के लिए पत्थर मारता बीमार मां का बच्चा.
बस को रोकने के लिए पत्थर मारता बीमार मां का बच्चा.

एक्टर्स का काम

फिल्म में धनुष ने कर्णनन नाम के लड़के का रोल किया है, जो पर्सनल और सोशल दोनों वजहों से गुस्से में रहता है. धनुष मेन स्ट्रीम की फिल्में करने वाले कमर्शियल स्टार माने जाते हैं. मगर उनकी फिल्मों में आर्ट और पॉलिटिक्स की भी बराबर मात्रा देखने को मिलती है. धनुष को डिस्क्राइब करने के लिए आप उन्हें थिंकिंग मैन्स हीरो कह सकते हैं. कमाल के एक्टर, जो किरदारों को अपने अनुसार नहीं ढालते. खुद को किरदारों के अनुसार ढालते हैं. इसलिए कई एंग्री यंग मैन टाइप्स रोल करने के बावजूद उनका कर्णनन भी नए तरीके से निभाया हुआ लगता है. यमन थाचा के रोल में है एक्टर लाल. उनका किरदार प्रॉपर साउथ इंडियन फिल्म साइडकिक है. मगर ये फिल्म ऐसी है जहां कोई भी किरदार साइडकिक नहीं है. अलग-अलग मौकों पर हर किरदार इस कहानी का हीरो बन जाता है. तीसरा किरदार जो आपके ध्यान से नहीं उतरता, वो एस.पी कन्नपीरन के रोल में नटराजन. धर्म और जाति की राजनीति में उलझा हुआ पुलिसवाला, जिसमें भारी मात्रा में सुपीरियॉरिटी कॉम्लेक्स है. वो गांव के लोगों को सिर्फ इसलिए पीटता है, क्योंकि वो उसके सामने सिर पर पहनी पगड़ी नहीं उतारते. या उनके नाम अच्छे और ऊंची जातियों वाले हैं.

व्यथित गांववाले, जिन्हेंं अत्याचार, गरीबी और दुत्कार के अलावा समाज ने कुछ और नहीं दिया.
कथित नीची जाति के व्यथित गांववाले, जिन्हेंं अत्याचार, गरीबी और दुत्कार के अलावा समाज ने कुछ और नहीं दिया.

फिल्म की अच्छी बातें

इस फिल्म की शानदार बात है इसका बेसिक प्लॉट. दो गांव हैं. दोनों गांव में लोग रहते हैं. कॉनफ्लिक्ट तब बिल्ड होना शुरू होता है, जब पता चलता है कि दूसरे गांव में गरीब और निचली जाति के लोग रहते हैं. सारी लड़ाई इसी अंतर को खत्म करने की है. जमीन पर नहीं, तो दिमाग में सही.

जब आप ‘कर्णनन’ का आखिरी सीन देखते हैं, तो ऐसा लगता है मानों एक घेरा पूरा हो गया हो. कहानी जहां से शुरू हुई थी, वहीं आकर खत्म हुई. क्योंकि कहानी जहां से शुरू होती है, वहां से पूरे विस्तार से बिना किसी भटकाव आगे बढ़ाई जाती है. जितने भी सब-प्लॉट्स खुलते हैं, सब अपने मुकाम तक पहुंचते हैं. इसलिए ‘कर्णनन’ एक कंप्लीट फिल्म लगती है, जो सिनेमा के तौर पर भी बड़ी संतुष्ट करती हुई लगती है.

इस फिल्म की तीसरी खास बात ये कि इसे बड़ी आसानी से पर्सनल बदले की कहानी बनाया जा सकता था. मगर अपने मुख्य विषय से फिल्म रत्ती भर भी डिगने को तैयार नहीं होती. इन चीज़ों से फिल्मों को बनाने वालों की नीयत पता चलती है, जो कि यहां बड़ी साफ लगती है.

फिल्म का नायक कर्णनन, जो तमाम गांववालों के लाख बार समझाने के बाद भी उनके लिए लड़ना जारी रखता है.
फिल्म का नायक कर्णनन, जो तमाम गांववालों के लाख बार समझाने के बाद भी उनके लिए लड़ना जारी रखता है.

‘कर्णनन’ डिटेलिंग के मामले भी बड़ी इंप्रेसिंग लगती है. इसमें फिल्म की मदद करती है सिनेमैटोग्राफी. जब आप फिल्म देखते हैं, तो कई शॉट्स आपको ऐसे दिखेंगे, जो सुंदर हैं. मगर उससे आपको तुरंत आभास हो जाता है कि अब कहानी लोकेशन वाइज़ कहां पहुंची है. मुर्गी लेकर उड़ जाने वाले चील से लेकर बंधे पांव घूमने वाले एक गधे से लेकर, जमीन पर रेंगने वाले छोटे-छोटे कीड़े, जलसे में नज़र आने वाला हाथी, खाने की थाली पर मंडराने वाली बिल्ली. फिल्म खत्म होते-होते ये सारी चीज़ें मेकिंग सेंस वाले जोन में चली जाती हैं.

फिल्म में एक सीन है, जहां कन्नीपीरन गांव के सरपंच से उसका नाम पूछता है. जवाब मिलता है- दुर्योधन. अपने हीरो का नाम है ‘कर्णनन’ जो कि कर्ण से प्रेरित है. ऐसा लगता है कि डायरेक्टर मारी सेल्वाराज एक मायथॉलोजी रच रहे हैं, जिसमें सबकुछ उल्टा होते हुए भी सही है. अब क्या उल्टा है और क्या सही, ये आपके विवेक पर है.

फिल्म की बुरी बातें

जब ‘कर्णनन’ शुरू होती है, तब से लेकर पहले हाफ के खत्म होने तक कहानी को बहुत फैलाया जाता है. थिएटर में बैठे-बैठे एक समय के बाद ये चीज़ भारी लगने लगती है. क्योंकि एक के बाद एक चीज़ें हो रही हैं, जो आपको फाइनल कॉन्फलिक्ट तक ले जाएंगी. मगर शुरुआती चीज़ें थोड़ी जल्दी निकलती, तो प्रेशर कुकर सिचुएशन नहीं बनता.

फिल्म के जिस पहले सीन का ज़िक्र हमने पहले किया, उससे जुड़ा एक मेटाफर हमें पूरी फिल्म में देखने को मिलता है. शुरुआती मौकों पर आपको वो हिट करता है. मगर समय के साथ वो बोरिंग और बेमतलब होता चला जाता है. क्योंकि वो चलती कहानी के बीच आ जाता है. पहले रियल कहानी पर फोकस किया जाए या मेटाफर डिकोड किया जाए, ये समझने में वो सीन निकल जाता है.

इस तरह का मास्क पहने एक लड़की फिल्म की कहानी से लेकर आखिर तक हमें दिखाई देती है. उससे कई बार फ्लो टूटता है.
इस तरह का मास्क पहने एक लड़की फिल्म की कहानी से लेकर आखिर तक हमें दिखाई देती है. उससे कई बार फ्लो टूटता है.

वैसे तो फिल्म का गुस्से वाला हिस्सा ठीक है. इसे ऐसे समझिए कि कुछ लोगों पर बड़े सालों तक अत्याचार किया गया. अब वो उस जकड़न से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. इस कड़ी में वो जो कुछ भी कर रहे हैं, फिल्म उन्हें काइंड ऑफ सही ठहराती चली जा रही है. यानी उसे किसी गलत चीज़ की तरह नहीं हीरोइज़्म वाले मोड में दिखाया जाता है. जो थोड़ा सा खलता है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

‘कर्णनन’ देखने के बाद ऐसा लगता है मानों लंबे समय बाद एक कंप्लीट फिल्म देखी. एक सोशली रेलेवेंट और अवेयर फिल्म है. तगड़े कॉन्सेप्ट, अच्छी स्टारकास्ट और सुंदर सिनेमटोग्रफी से सजी फिल्म, जिसे आपको देखनी ही चाहिए.


 

 

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