Submit your post

Follow Us

'कुछ कुछ होता है' की गलत politics के लिए करण जौहर सॉरी, अब इन 5 डायरेक्टर्स को भी गलती माननी चाहिए

फराह खान, अक्षय कुमार जैसे आर्टिस्ट हैं जिनका कहना रहा है कि ‘ये डार्क सी, सुस्त सी फिल्मों को पसंद करने वाले लोगों (आलोचकों) को बॉलीवुड फिल्मों के बारे में लिखने से बैन कर देना चाहिए. क्योंकि ये लोग सिनेमा की कोई समझ नहीं रखते.’ ये अचरज की बात है कि फराह-अक्षय जैसों को सिनेमा और सामाजिक विकास का पूरा अंदाजा है? हो सकता है बीस साल बाद ये दोनों ही बोल रहे हों कि जिस फिल्म में सामाजिक संदेश नहीं वो फिल्म का कोई मतलब नहीं जैसे कि ‘बजरंगी भाईजान’ के दौरान से सलमान खान को कहते सुना गया. जबकि एक समय में सीरियस सवाल करने वालों को भरी महफिल में ये सलमान ही जलील करते थे.

यानी ये सिर्फ समय की बात है जब आलोचकों की बातें आपको समझ आने लगती हैं. जैसे करण जौहर को ले सकते हैं. एक समय तक उन्हें घृणा से देखा जाता रहा क्योंकि उनकी फिल्में भारी मेलोड्रामा, उपभोक्तावाद, ब्रैंड्स और अरबपतियों के भावनात्मक जीवन को लेकर उपजी चिंताओं को लेकर ही बनती थीं. लेकिन आज वे एक फिल्मकार के तौर पर इवॉल्व हो रहे हैं. वे अपनी समझ और सोच को विस्तृत करते चल रहे हैं. ‘ऐ दिल है मुश्किल’ तक आते-आते देखा जा सकता है. समलैंगिकता पर उनकी खुली राय भी इसी कड़ी में है.

करण जौहर
करण जौहर

करण ने मुंबई में संपन्न हुए एक लिट-फेस्ट में कहा कि वे अपने डायरेक्शन वाली पहली ही फिल्म कुछ कुछ होता है में अंजलि के रोल के किए गलत चित्रण को मानते हैं. अपनी फिल्मों के ऐसे निहितार्थ और आलोचना, ज्यादातर फिल्ममेकर समझने और मानने को तैयार नहीं होते जिसका जिक्र आलोचक हमेशा करते रहते हैं. करण ने कहा, “ये फिल्म मेरे लिए बहुत खास है और रहेगी, लेकिन काजोल का किरदार (अंजलि) ऐसा है जिसे मैं उस तरीके से नहीं दिखाना चाहूंगा. ये फिल्म देखने के बाद शबाना आजमी ने मुझे फोन किया और डांटा था. अब जब मैं मुड़कर देखता हूं तो मुझे इस तर्क में कमी नजर आती है कि जब अंजलि टॉमबॉय थी तो उसके कोई बॉयफ्रेंड नहीं था. लेकिन जैसे ही उसने (भारतीय प्रेमिकाओं/नायिकाओं को लेकर बना स्टीरियोटाइप) बाल बढ़ा लिए और साड़ी पहन ली तो उसके बॉयफ्रेंड हो गया. मुझे महसूस होता है कि कुछ कुछ होता है में ये जो पॉलिटिक्स है वो निश्चित तौर पर सवालों के दायरे में है.”

फिल्में जनता के लिए बनती हैं. ज्यादा से ज्यादा बड़े जनसमुदाय को एक ही तरह की कहानी और बात से लुभाने के लिए पहले तो विषय का सामान्यीकरण कर दिया जाता है और बाद में उन्हीं घिसे-पिटे टोटकों को नए कपड़ों में दिखाते रहा जाता है जो गलत हैं लेकिन लोगों को पसंद हैं. ठीक वैसे ही जैसे राजनेताओं के भाषण होते हैं. आसानी से पता लगाया जा सकता है कि क्या झूठ बोला जा रहा है और कौन का डायलॉग तालियां बटोरने मात्र के लिए बोला जा रहा है लेकिन फिर भी जनता तालियां ही बजाती जाती है.

ऐसी फिल्मों और उन्हें बनाने वालों की सूची बड़ी लंबी है जिन्हें अपनी पॉलिटिक्स के लिए करण जौहर के अंदाज में विचार करना चाहिए और चर्चा करनी चाहिेए. ऐसी पांच फिल्मों की बात यहां कर रहे हैं:

#1. अ वेडनसडे
2008, डायरेक्टर और राइटर: नीरज पांडे

6368_19148

एक आम आदमी है. दुनिया की किसी और चीज से इतना तंग नहीं होता जितना मुंबई बम धमाकों से हो जाता है. इतना ज्यादा कि पुलिस को मजबूर करता है कि अपनी कस्टडी से चार ‘आतंकियों’ को उसकी बताई जगह रिहा कर दे. फिर वो बम से उन्हें उड़ा देता है. फिल्म के राइटर-डायरेक्टर वही पॉलिटिक्स करते हैं जो महीन परदे में रहती है. वे बहुत बारीकी से अपने उन इरादों को ढक देते हैं जो असली हैं. वे राइट विंग पॉलिटिक्स करते हैं. सब आतंकियों को मुस्लिम दिखाते हैं जबकि हिंदु दलों के बम विस्फोट के केस भी देश में चल रहे हैं. दर्शक उनसे घृणा करें इसलिए चारों आतंकियों को दंभ भरते हुए दिखाते हैं कि उन्होंने कौन-कौन से धमाके किए. ऐसा असल में कोई नहीं करता.

हत्यारे विजिलांते को वो ‘आम आदमी’ का नाम देते हैं. वो आम आदमी जिसे आर. के. लक्ष्मण के कार्टूनों में हमेशा अहिंसक पाया है. उसे भुनाते हुए नीरज पांडे इससे हिंसा करवाते हैं. दक्षिणपंथी विचारधारा वाले बेहद खुश होते हैं. नीरज अपने केंद्रीय पात्र से लंबा डायलॉग बुलवाते हैं ये साबित करने के लिए कि बहुत हो गया, अब आम आदमी तंग हो चुका है. वह कॉकरोच (मुस्लिम आइडेंटिटी वाले अपराधी) मार रहा है. नीरज की चतुराई देखिए कि अंत तक इस आम आदमी का धर्म नहीं बताते. ताकि कभी घेर लिए गए तो कह देंगे कि वो मुस्लिम भी हो सकता है. हालांकि कहीं से भी उसकी आइडेंटिटी मुस्लिम नहीं लगती, बस सिर्फ एक्टर (नसीरुद्दीन शाह) मुस्लिम पहचान वाला कास्ट करते हैं. वहीं एटीएस के गुस्सैल इंस्पेक्टर को मुसलमान रखते हैं. आरिफ खान. ये रोल जिमी शेरगिल ने किया. ये मुस्लिम पात्र इन चारों ‘आतंकियों’ से नफरत करता है और मन ही मन उस विजिलांते आम आदमी को सपोर्ट करता है. यानी सार ये कि कमिश्नर से लेकर टीम के सब लोग हिंदु हैं, वो आम आदमी भी हिंदु मेजोरिटी का ही प्रतिनिधि लगता है और फिल्म की ओर से मैसेज जाता है कि मुस्लिम आतंकवाद स्वीकार नहीं होगा.

अपनी पॉलिटिक्स में नीरज लोगों को इतना चतुराई से उलझा लेते हैं कि किसी को ये ख़याल नहीं आता कि न्यायपालिका का काम क्या कोई भी ‘आम आदमी’ करने लगेगा? अगर कोई भी आदमी तय कर लेगा कि वो सही-गलत का सही ज्ञान रखता है और वो अपने जीवन में परेशानी पैदा कर रहे कॉकरोच को ख़ुद मारेगा तो भी एक कश्मीरी अलगाववादी भी अपनी पॉलिटिक्स में सही है. तो फिर एक बंदूक थामे नक्सली भी अपनी जगह रही है. सबको फिर अपने-अपने हिसाब से हिंसा करने दी जाए. हर फिल्म बनाने वाला जानता है कि हरेक किस्म की पॉलिटिक्स पर बहुत ही पॉपुलिस्ट और convincing फिल्म बनाई जा सकती है. फिल्ममेकिंग इतनी सम्मोहक कला है कि दर्शक जान भी न पाएगा कि वो किस पॉलिटिक्स के लिए इस्तेमाल कर लिया गया है.

#2. बाहुबली: द बिगिनिंग
2015, डायरेक्टर: एस एस राजामौली, राइटर: के वी विजयेंद्र प्रसाद

prabhas-spreading-water-on-tamanna

कहानी में अवंतिका (तमन्ना) एक बाग़ी समूह का हिस्सा है जो दुष्ट शासक भल्लाल देव के खिलाफ लड़ाई छेड़े हुए है. अवंतिका का सपना रहा है कि वो सबसे योग्य यौद्धा बने और भल्लाल देव को मारे. उसे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए. लेकिन लेखक पिता प्रसाद और डायरेक्टर बेटे राजामौली यहां शिवा के किरदार को लाते हैं जो राजपरिवार से है लेकिन हमेशा झरने के नीचे बसने वाले आदिवासियों के बीच पला. वह एक दिन असंभव झरने पर चढ़कर ऊपर पहुंचता है अवंतिका की सुंदरता पर मोहित होकर. वह जब उसे मिलता है तो उसकी गंभीरता का मजाक बनाते हुए उसके साथ खेलता है. फिल्म बनाने वालों ने तय किया कि शिवा के आगे अवंतिका की सारी ताकत व्यर्थ है क्योंकि वो एक औरत है.

न सिर्फ शिवा उससे खेलता है बल्कि काजल, बिंदी, झुमके, लिपस्टिक, गजरे और सेज पर लिटाने लायक सुंदर कपड़ों में डाल देता है. न जाने कैसे. वो हक्की बक्की है. फिर आगे जाकर वो अवंतिका से कहता है कि तुम घर बैठो, तुम्हारी ओर से भल्लाल देव से मैं लड़ूंगा. फिल्म स्थापित कर देती है कि ये लड़ाई-वड़ाई औरतों के बस की नहीं, उन्हें पुरुष के उपभोग के लिए सुंदर लगना चाहिए और जब भी उसका मन हो उसका दिल बहलाना चाहिए. बदले में वो सौंदर्य प्रसाधन का सामान देगा, सुरक्षा देगा, वीर्य देगा. औरतों का ऐसा चित्रण करके राजामौली-प्रसाद अपनी रुढ़िवादी राजनीति आरोपित करते हैं.

#3. सिंघम और सिंघम रिटर्न्स
2011-14, डायरेक्टर: रोहित शेट्‌टी, राइटर: साजिद-फरहाद और यूनुस सजावल

Singham-Returns-Ajay-Devgan-HD-Pictures

महेश भट्‌ट कहते हैं, “कोई इतना अच्छा भी नहीं होता जितना आपको लगता है और कोई इतना बुरा भी नहीं होता जितना आप समझते हैं.” फिल्मी कहानियों में मुख्यधारा के डायरेक्टर या पारंपरिक मेकर्स हमेशा इसी का उल्टा करते हैं. वे ‘बुरे’ को सिर्फ बहुत बुरा दिखाते हैं और ‘अच्छे’ को सिर्फ बहुत अच्छा. रोहित शेट्‌टी ऐसे ही निर्देशकों में से हैं. उनकी सिंघम फिल्में कहानियां हैं एक ऐसे पुलिसवाले कि जो बहुत ज्यादा अच्छा है. वो ‘राम’ है. और उसे ‘रावण’ मिलता है. तो वो अपनी शपथ, ट्रेनिंग सब भूल जाता है और न्यायपालिका की अवमानना करके रावणों को ख़ुद ही मार देता है. लोग चूंकि हर साल स्टेडियमों में खड़े होकर रावण जलाते हैं तो फिल्म में ऐसे क्लाइमैक्स में उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता. ये और बात है कि ये तमाम लोग घर जाकर रावणों वाले सारे काम ख़ुद करते हैं लेकिन ये दोगलापन सामाजिक संस्कारों में पिलाया जाता है इसलिए न तो कोई रोहित शेट्‌टी, न ही कोई आम दर्शक इसके विपरीत सोच पाता है. लेकिन फिर इसी राह चलकर समाज में कुछ ठीक न हो तो उसकी जिम्मेवारी नहीं लेते. दोनों ही सिंघम फिल्मों में विलेन को पुलिस खुद कानून तोड़कर मारे इसके लिए सिंघम को बहुत ही अच्छा मैन्युफैक्चर किया जाता है और जयकांत शिकरे व सत्यराज बाबा को बहुत ही बुरा. ये बड़ी हास्यास्पद बात है कि सिंघम पुलिसवालों के ह्रदय परिवर्तन की गुंजाइश मन में रखता है जो ‘दबाव में’ रिश्वत लेते हैं या मर्डर करते हैं लेकिन उन ‘अपराधियों’ के ह्दय परिवर्तन की नहीं जो पुलिस स्टेशन से बाहर वैसे ही अपराध करते हैं.

#4. बाजीराव मस्तानी
2015, डायरेक्टर: संजय लीला भंसाली, राइटर: प्रकाश कपाड़िया और भंसाली

bajirao_aswesay_1

कट्‌टर ब्राह्मणवाद वाले 18वीं सदी के उस युग में एक हिंदु प्रधान मंत्री बाजीराव का प्रेम के लिए एक मुस्लिम युवती से शादी करना और उसके लिए मां, भाइयों, रिश्तेदारों समेत पूरे साम्राज्य से टक्कर ले लेना और मर जाना, ये भंसाली की फिल्म की बहुत ही खास बात है. इसके लिए ही इसे तमाम तारीफें मिलीं. उनका निर्देशन जबरदस्त था. हमें बाजीराव के दुख देख बेचैनी होती है, उसका रोमांस देख खुशी होती है, जब जब वो किसी के खिलाफ होता है हम उसके साथ होते हैं और जब जब उसकी तलवार लहराती है तो हमारी भुजाएं फड़कती हैं और हम सम्मोहित होकर देखते हैं. लेकिन इसका जो पहलू हमें निर्देशक नहीं बताते वो ये कि सेनापति के तौर पर बाजी ने 40 लड़ाइयां लड़ीं और उन युद्धों में बहुत सारे हिंदु भी मारे गए. फिल्म में बाजीराव को लड़ते हुए देखना जितना मीठा-मीठा और रोम-रोम आनंदित कर देने वाला है, ये इमोशन ऐतिहासिक हकीकत के नदियों भर बहे खून और बर्बरता की सारी हदों की ओर पीठ करके हम तक लाए जाते हैं. फिल्म की तार्किक और शारीरिक सजावट ऐसी है कि हमें ऐसा कुछ भी दिखता नहीं.

मराठा शासन ने न सिर्फ मुगलों बल्कि भारत की मूल जातियों के लोगों का भी दमन किया गया. कहा जाता है कि जहां से पेशवाओं की सेना गुजरती थी इंसानों ही नहीं पशुओं की भी लाशें ही मिलती थीं. इन शासकों को दक्षिण एशिया के ‘मंगोल’ कहा जाता था जो जहां से निकलते थे औरतों, बच्चों, पशुओं की लाशें ही मिलती थीं. तब नीची जाति के लोगों को गले में घंटी बांधकर और पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था. ताकि रास्ते में ब्राह्रमण आ रहे हैं तो उन्हें पता चल जाए कि ‘नीची’ जाति का आ रहा है. झाड़ू इसलिए कि जहां से वो इंसान गुजरे झाड़ू से उसके ‘गंदे कदम’ मिटते जाएं. फिल्म में न तो ऐसी प्रथाएं यूं दिखती हैं कि हमें घृणा हो जाए, न ही इसकी विस्तृत तस्वीर बनाई जाती है.

#5. हॉलिडे: अ सोल्जर इज़ नेवर ऑफ ड्यूटी
2014, डायरेक्टर-राइटर: ए आर मुरुगदास

holiday-2b

टीवी पर अक्षय कुमार स्टारर ये फिल्म आए दिन प्रसारित होती रहती है. देखते हुए हमें इसमें कुछ भी गलत नहीं नजर आता है. लेकिन इसकी भी पॉलिटिक्स है जो घातक है. इसमें होता ये है कि वो भारतीय फौज में कैप्टन है. छुटि्टयों पर अपने घर मुंबई आया हुआ है. अब इस दौरान वो अपने सब-इंस्पेक्टर दोस्त के साथ टलहता है और आतंकियों के स्लीपर सेल्स का पता लगाता है, बड़े पैमाने पर उन्हें मारने का ऑपरेशन अंजाम देता है. ये फिल्म दो चीजें बहुत गलत करती है. पहला ये कहने की कोशिश करती है कि सिविलियन प्रशासन में आर्मी का आदमी ज्यादा कुशल है और पुलिस कमतर है. जबकि टेक्नीकल रूप से सेना में सिविलियन एडमिनिस्ट्रेशन के दायरे में, आम जीवन में व्यवहार प्रबंधन नहीं सिखाया जाता है. वहां युद्ध की ट्रेनिंग दी जाती है, वो भी अनजान शत्रुओं से. ऐसी ट्रेनिंग में ज्यादातर हिस्सा दुश्मन को मारने के हथियारबंद मिशन के बारे में होता है. सिविलियन इलाकों में किसी भी तरीके के अपराध का सामना करने के लिए पुलिस होती है. वो समुदायों और लोगों के साथ मिलकर न्याय व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए काम करती है. सेना की ट्रेनिंग इसके लिए नहीं होती.

लेकिन यहां विराट बख्शी का किरदार सिविलियन इलाके में वैसे ऑपरेट करता है जैसे उसे बॉर्डर पर या आधिकारिक मिशनों में करना चाहिए. वो लोगों को रिक्रूट करता है और बड़े पैमाने पर संभावित आतंकियों के माथे में गोली मरवाता है. इस ऑपरेशन के लिए वो सेना के अपने किसी सीनियर से मंजूरी नहीं लेता. यानी सीधे सीधे वो सिविलियन कानून भी तोड़ता है और एक सैनिक बनने के लिए उसने जो भी शपथ ली है उन्हें भी भंग कर देता है. यानी वो सैनिक बनने के योग्य नहीं है. फिल्म में कैप्टन विराट के पुलिसकर्मी दोस्त मुकुंद को भोंदू दिखाया गया है कि वो मामूली रूप से भी कुशल नहीं है, वहीं विराट चूंकि सैनिक है इसलिए परफेक्ट है. इन दो छवियों से बड़े लापरवाह ढंग से खेला जाता है. ये वही कथानक है जो इन दिनों चल रहा है कि कोई भी डिबेट हो उसमें कहा जाता है सैनिक सीमा पर खड़े हमारी सुरक्षा कर रहे हैं और आप यहां लाइन में भी नहीं खड़े हो सकते. या ये कि पहले एक दिन सीमा पर सैनिक की जिंदगी जीकर देखो.

‘हॉलिडे’ में मोटी दिक्कत इसी पॉलिटिक्स से है. महिलाओं के उस चित्रण की तो बात हो ही नहीं रही जिसमें उनका अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि नायक की प्रेमिका की जॉब कर सके. बीच-बीच में जब विराट को आतंकवादियों को मारने से उसे फुर्सत मिल जाती है तो वो सबा (सोनाक्षी) से हंसी-मजाक कर आता है, छेड़ आता है, गाने गा आता है. इसके आगे फिल्म में औरत का कोई वजूद नहीं है.

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

सीरीज रिव्यू : गिल्टी माइंड्स

सीरीज रिव्यू : गिल्टी माइंड्स

कुछ बढ़िया ढूंढ़ रहे हैं, तो इसे देखना बनता है.

फिल्म रिव्यू- ऑपरेशन रोमियो

फिल्म रिव्यू- ऑपरेशन रोमियो

'ऑपरेशन रोमियो' एक फेथफुल रीमेक है. मगर ये किसी भी फिल्म के होने का जस्टिफिकेशन नहीं हो सकता.

फिल्म रिव्यू: जर्सी

फिल्म रिव्यू: जर्सी

फिल्म अपने इमोशनल मोमेंट्स को जितना जल्दी बिल्ड अप करती है, ठीक उतना ही जल्दी नीचे भी ले आती है.

वेब सीरीज़ रिव्यू: माई

वेब सीरीज़ रिव्यू: माई

सीरीज़ की सबसे अच्छी और शायद बुरी बात सिर्फ यही है कि इसका पूरा फोकस सिर्फ शील पर है.

शॉर्ट फिल्म रिव्यू- लड्डू

शॉर्ट फिल्म रिव्यू- लड्डू

एक मौलवी और बच्चे की ये फिल्म इस दौर में बेहद ज़रूरी है.

फिल्म रिव्यू- KGF 2

फिल्म रिव्यू- KGF 2

KGF 2 एक धुआंधार सीक्वल है, जो 2018 में शुरू हुई कहानी को एक सैटिसफाइंग तरीके से खत्म करती है.

फ़िल्म रिव्यू: बीस्ट

फ़िल्म रिव्यू: बीस्ट

विजय के फैन हैं तो ही फ़िल्म देखने जाएं. नहीं तो रिस्क है गुरु.

वेब सीरीज रिव्यू: अभय-3

वेब सीरीज रिव्यू: अभय-3

विजय राज ने महफ़िल लूट ली.

वेब सीरीज़ रिव्यू : गुल्लक 3

वेब सीरीज़ रिव्यू : गुल्लक 3

बाकी दोनों सीज़न्स की तरह इस सीज़न की राइटिंग कमाल की है.

फिल्म रिव्यू- दसवीं

फिल्म रिव्यू- दसवीं

'इतिहास से ना सीखने वाले खुद इतिहास बन जाते हैं'.