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फिल्म रिव्यू: कलंक

करण जौहर की अभिषेक वर्मन डायरेक्टेड ‘कलंक’ सिनेमाघरों मे लग चुकी है. भारी-भरकम स्टारकास्ट से लैस ये फिल्म आज़ादी से ठीक के पहले के दौर में घटती है. कई प्रेम कहानियां एक साथ सुनाती है. जिस तरह की एक्साइटमेंट जनता को इस फिल्म को लेकर थी, वो इसे साल की बड़ी फिल्मों में से एक बना रही थी. इसे देखने के बाद उनकी एक्साइटमेंट कितनी बरकरार रहती है? फिल्म किस बारे में है? एक्टर्स का काम कैसा है? और फिल्म से जुड़ी सारी बातें नीचे करेंगे.

कहानी

कलंक की कहानी शुरू होती है 1946 में लाहौर के हुस्नाबाद शहर में. ये कहानी है सात लोगों के बारे में, जिनकी मोहब्बत पूरी नहीं हो पाती है. ‘कलंक’ के डर से. पहली जोड़ी है बलराज और बहार बेगम की जोड़ी. इन्हें प्रेम हुआ, एक बच्चा हुआ लेकिन शादी नहीं हुई. अनाथों से बड़े हुए इस बच्चे का नाम पड़ा ज़फर. दूसरी ओर है ज़फर का सौतेला भाई देव, जिसकी पत्नी सत्या को कैंसर है. वो कभी भी मर सकती है. लेकिन जाने से पहले अपने पति का घर बसा देना चाहती है. वो गांव की ही एक लड़की रूप से देव की शादी करवा देती है. इतने सब के बाद इस फिल्म की कहानी शुरू होती है. कैसे ये किरदार एक-दूसरे टकराते हैं. प्यार में पड़ते हैं. अलग होते हैं? लेकिन ये सब क्यों होता है, ये जानने के लिए आपको सिनेमाघरों में पूरे तीन घंटे गुज़ारने पड़ेंगे.

अपनी पत्नी सत्या के कहने पर रूप से शादी करता देव.
अपनी पत्नी सत्या के कहने पर रूप से शादी करता देव.

एक्टर्स का काम

फिल्म में संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सोनाक्षी सिन्हा, आदित्य रॉय कपूर और कुणाल खेमू ने लीड रोल्स किए हैं. लेकिन अगर काम की बात करें, तो वो सिर्फ वरुण और आलिया के किरदार के हिस्से आया है. ये पूरी फिल्म इन्हीं की लव स्टोरी के इर्द-गिर्द घूमती है. बाकी की कहानियां इनकी प्रेम कहानी की वजह से सामने आती हैं. आलिया भट्ट एकमात्र ऐसी कलाकार हैं, जिनके कैरेक्टर के साथ एक कनेक्ट बन पाता है. इसलिए आप उनके किरदार के लिए कुछ फील कर पाते हैं. वरुण धवन का किरदार ज़फर लेयर्ड है. लेकिन वो परतें ठीक से खुल नहीं पातीं. उनके कैरेक्टर को बहुत कॉम्प्लेक्स बनाने की कोशिश की गई है लेकिन वो वैसा बन नहीं पाया है. बावजूद इसके वो मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्ज करवाता है. हालांकि वो अपनी पिछली फिल्मों से ज़्यादा अलग कुछ कर नहीं कर पाए हैं. आदित्य रॉय कपूर दिखाई तो पूरी फिल्म में देते हैं, लेकिन वो सिर्फ दिखाई ही देते हैं. इक्के-दुक्के डायलॉग्स के साथ. सोनाक्षी सिन्हा का कैरेक्टर अच्छा करता दिखाई देता है लेकिन उसके पास समय नहीं है. संजय और माधुरी के जिम्मे अपनी प्रेम कहानी बताने और उस पर अफसोस करने के अलावा कुछ नहीं दिया गया है. उसे ऐसे भी बोल सकते हैं कि उन्हें वेस्ट किया गया है. बचते हैं कुणाल खेमू, जिनका किरदार फिल्म के आखिरी मिनट (लिटरली) में अपनी उपयोगिता साबित करता है.

'तबाह हो गए' का इस्तेमाल फिल्म में बहुत सही जगह पर किया गया है.
‘तबाह हो गए’ का इस्तेमाल फिल्म में बहुत सही जगह पर किया गया है.

डायलॉग्स

फिल्म के साथ समस्या ये है कि इससे आप कहीं कनेक्ट नहीं कर पाते. इसमें सबसे बड़ा रोल प्ले करता है डायलॉग. हिंदी-उर्दू मिक्स करके हो रही इस बातचीत से आप कान बचाकर निकल जाना चाहते हैं. कई जगह वो फिल्म की खूबसूरती में चार चांद भी लगाता है. लेकिन वो मौके कम हैं.

सिनेमैटोग्रफी

फिल्म दिखने में इतनी शानदार लगती है कि आप फ्रेम्स के स्क्रीनशॉट ले लेना चाहते हैं. और ये खूबसूरती अपने किरदारों की तबाही को खोलकर सामने रख देती है. सिनेमैटोग्रफी का इस्तेमाल फिल्म की शुरुआत में आलिया भट्ट को सुंदर दिखाने के अलावा और कहीं दिखाई नहीं देता. इसका मतलब ये नहीं कि कैमरे से मेहनत नहीं की गई. कुछ बहुत उम्दा टाइप नहीं दिखाई देता. इस फिल्म की एक दिलचस्प बात ये भी है कि सिर्फ प्रेम में ही नहीं फ्रेम में भी पड़े हर इंसान को देखकर लगता है कि ये घर से शूटिंग के लिए तैयार होकर आए हैं.

फिल्म के इस सीन को कारगिल में शूट किया गया था. इस फिल्म में सिनेमैटोग्रफी बिनोद प्रधान ने की है.
फिल्म के इस सीन को कारगिल में शूट किया गया था. इस फिल्म में सिनेमैटोग्रफी बिनोद प्रधान ने की है.

म्यूज़िक

फिल्म के सारे ही गाने अपने हिसाब से बड़े लेवल पर शूट किए गए हैं. ‘कलंक नहीं इश्क है’ को छोड़कर. लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित यही गाना करता है. वो जितना सुंदर लिखा गया है, उतना ही सुंदर गाया गया है. एक कृति सैनन का आइटम नंबर टाइप गाना भी है ‘ऐरा गैरा’. इसकी अच्छी बात ये है कि ये इसमें महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन नहीं किया गया है. हालांकि ये फिल्म की कहानी में कुछ जोड़ते नहीं हैं. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर यूं तो बहुत भारी है लेकिन सबसे ज़्यादा इंट्रस्टिंग वो तब लगता है, जब एक इंटेंस सीन में उसे बजाने के बदले सन्नाटा कर दिया जाता है. और ये नोटिस में भी आती है. फिल्म का वो गाना आप नीचे सुन सकते हैं:

कोई ऐसी चीज़ जो खली हो

फिल्म की रफ्तार और लंबाई बहुत निराश करती है. आप थक जाते हैं. लेकिन जब फिल्म आखिर में पहुंचती है, तब आप थोड़ा बेहतर मससूस करते हैं. जो काम फिल्म को एक घंटे पहले कर देना चाहिए था, वो आखिर के 10-15 मिनट में करती है. वो वहां अपनी सारी एनर्जी झोंककर खड़ी होती है. सुंदरता और भव्यता पर सारा फोकस रखने के चक्कर में फिल्म की फील मर गई है. आपको लगता है कि आप ऐसी फिल्म देखकर आ रहे हैं, जो आपसे भी ज़्यादा थकी हुई है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

कुल मिलाकर ‘कलंक’ 80 के दशक की किसी फिल्म की झाड़ी-पोछी स्क्रिप्ट लगती है. लेकिन उन फिल्मों जितनी एक्साइटिंग नहीं है. बुरी राइटिंग की वजह से. रिश्तों के बारे में गंभीरता का ढोंग करते हुए हल्की बात करती है. थोड़ा विद्रोह दिखाने की भी कोशिश करती है. लेकिन  सब कुछ जोड़कर-घटाकर भी ऐसा कुछ नहीं बन पाती, जिसके साथ कोई अपने वीकेंड के तीन बेशकीमती घंटे बिताना चाहे.

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