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वो नेता जो मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी सीट नहीं बचा पाए

हर राज्य में ढेर सारी विधानसभाएं होती हैं. उनमें जीतने वाले ढेर सारे विधायक होते हैं. लेकिन सारे विधायक एक ही हैसियत के तो होते नहीं हैं. जो बड़े नेता होते हैं, वो मंत्री बनाए जाते हैं. जो सबसे बड़ा नेता होता है, वो मुख्यमंत्री बन जाता है. लेकिन सोचिए कि कोई मुख्यमंत्री ही चुनाव हार जाए, तो?

झारखंड विधानसभा चुनाव में रघुबर दास के साथ यही हुआ. सूबे में पांच साल सरकार चलाने वाले पहले सीएम 2019 के चुनाव में अपनी विधायकी गंवा बैठे. 24 साल की विधायकी. जमशेदपुर सीट से. उन्हें हराया उन्हीं की कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय ने. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था.

रघुबर दास की हार ने हमें उन नेताओं की याद दिला दी जो मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी सीट बचाने में फेल हो रहे. आप भी देखिए कौन-कौन हैं इस लिस्ट में:

#1. सिद्धारमैया

Siddaramaiah

2013 में कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव जीता और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने. 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दो सीटों से लड़ने का फैसला किया. पहली मैसूर लोकसभा सीट की चामुंडेश्वरी (215) सीट और दूसरी बगलकोट लोकसभा सीट की बादामी (23) सीट. सिद्धारमैया दो अलग-अलग छोरों से जनता को प्रभावित करना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाए. वो चामुंडेश्वरी में 36,042 वोटों से हार गए. बादामी सीट पर जीते भी, तो महज़ 1,696 वोटों से.

#2. हरीश रावत

Harish Rawat

2014 से 2017 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे. चार बार सांसद और एक बार विधायक बने. 2014 में धरचुला विधानसभा सीट का उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे. 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में वो दो सीटों पर लड़े और दोनों पर हार गए. ये रही डिटेल-

पहली सीट: हरिद्वार रूरल (35)
किसने हराया: बीजेपी के यतीश्वरानंद ने
कितने वोटों से हराया: 12,278 वोटों से. रावत को 32,686 वोट मिले और यतीश्वरानंद को 44,964 वोट मिले.

दूसरी सीट: किच्चा (67)
किसने हराया: बीजेपी के राजेश शुक्ला ने
कितने वोटों से हराया: 2,127 वोटों से. रावत को 38,236 वोट मिले और राजेश शुक्ला को 40,363 वोट मिले.

#3. लक्ष्मीकांत पारसेकर

Laxmikant Parsekar

नवंबर 2014 से मार्च 2017 तक गोवा के मुख्यमंत्री रहे. इन्होंने पहला चुनाव 1988 में लड़ा था, जिसमें वो हार गए थे. 1994 से 1999 तक गोवा बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी रहे. 1999 का चुनाव भी हारे, फिर 2002 में पहली बार जीत दर्ज की. 2000 से 2003 और 2010 से 2012 तक गोवा बीजेपी के अध्यक्ष रहे. 2014 में गोवा के तब के सीएम मनोहर पर्रिकर को मोदी कैबिनेट में जगह दी गई, तो पारसेकर को सीएम बनाया गया. लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में वो अपनी सीट नहीं बचा पाए. ये रही डिटेल-

कौन सी सीट थी: मेंदरिम (1)
किसने हराया: कांग्रेस के दयानंद रघुनाथ सोपते ने
कितने वोटों से हराया: 7,119 वोटों से. पारसेकर को 9,371 वोट मिले और रघुनाथ को 16,490 वोट मिले.

#4. भुवन चंद्र खंडूरी

Bhuwan Chandra Khanduri

2007 से 2009 और 2011 से 2012 के बीच उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे बीसी खंडूरी सेना से ताल्लुक रखते हैं. मेजर जनरल रैंक से रिटायर हुए खंडूरी को 1982 में अति विशिष्ट सेवा मेडल दिया गया था. गढ़वाल लोकसभा से जीतने वाले वो पहले सांसद हैं और यहां से कुल 5 बार जीते. 2007 में इनके नेतृत्व में बीजेपी को उत्तराखंड में जीत मिली. 2009 तक सीएम रहे. फिर 2011 से 2012 के बीच सीएम रहे और 2012 के विधानसभा चुनाव में अपनी सीट हार गए. ये रही डिटेल-

कौन सी सीट थी: कोटद्वार (41)
किसने हराया: कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने
कितने वोटों से हराया: 4,623 वोटों से. खंडूरी को 27,174 वोट मिले और नेगी को 31,797 वोट मिले.

#5. शीला दीक्षित

Sheila Dikshit

दिल्ली में कांग्रेस की दिग्गज नेता शीला लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनीं. 1998 से 2013 तक सीएम रहीं शीला दिल्ली में सबसे लंबे वक्त सीएम रहने वाली नेता हैं. लेकिन 2013 में आम आदमी पार्टी के फ्रेम में आने और भ्रष्टाचार का मुद्दा ज़ोर पकड़ने के बाद उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी. ‘आप’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल खुद शीला के सामने खड़े हुए थे. 2013 के चुनाव में वह अपनी सीट नहीं बचा पाई थीं. डिटेल ये रही-

कौन सी सीट थी: नई दिल्ली (40)
किसने हराया: आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने
कितने वोटों से हराया: 25,864 वोटों से. शीला को 18,405 वोट मिले और केजरीवाल को 44,269 वोट मिले.

#6. शांता कुमार

Shanta Kumar

हिमाचल प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री शांता कुमार का राजनीतिक करियर 1963 में शुरू हुआ. 1972 में वो पहली बार विधानसभा पहुंचे, जहां 1985 तक रहे. 1990 में दोबारा चुने गए, तो 1992 तक रहे. शांता 1977 से 1980 तक, फिर 1990 से 1992 तक सीएम रहे. 92 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें बरखास्त कर दी गईं. 1993 में राज्य में चुनाव हुए, जिसमें शांता कुमार अपनी सीट नहीं बचा पाए.डिटेल यूं है-

कौन सी सीट थी: सुलाह (45)
किसने हराया: कांग्रेस के मानचंद राणा ने
कितने वोटों से हराया: 3,267 वोटों से. शांता को 13,478 वोट मिले और मानचंद को 16,745 वोट मिले.

#7. वीरभद्र सिंह

Virbhadra Singh

28 साल की उम्र में सांसदी का चुनाव जीतने वाले वीरभद्र सिंह 8 बार विधायक बन चुके हैं. 2017 के हिमाचल विधानसभा चुनाव में सत्ता उनके हाथ से चली गई, जिसमें उन्होंने विधायकी का अपना आठवां चुनाव जीता. हिमाचल में ये सबसे ज़्यादा वक्त तक सीएम रहने वाले नेता हैं. वो 1983, 1993, 2003 और 2012 में सीएम रह चुके हैं. लोकसभा चुनाव पांच बार जीत चुके हैं. इन पर आय से 6.1 करोड़ रुपए की ज़्यादा संपत्ति के मामले में इन पर CBI जांच भी चल रही है. बतौर सीएम चुनाव 1990 में हारे थे. उस चुनाव में वीरभद्र दो सीटों- रोहरू और जुब्बल कोटखाई से लड़े थे और एक सीट हार गए थे. डिटेल ये रही-

कौन सी सीट थी- जुब्बल कोटखाई
किसने हराया- जनता दल के रामलाल ने
कितने वोटों से हराया- 1,486 वोटों से

#8. ललथनहवला

Lal Thanhawla

मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहवला 2018 में दो सीटों सेरछिप और चंफई (दक्षिण) से चुनाव लड़े और दोनों ही सीटों पर हारे. चंफई (दक्षिण) की सीट पर उन्हें मिजो नेशनल फ्रंट के टीजे लालनुनत्लुअंगा से हार मिली तो वहीं सेरछिप सीट पर जोरम पीपुल्स मुवमेंट के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालदुहोमा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 76 साल के कांग्रेस नेता ललथनहवला दिसंबर 2008 से राज्य के मुख्यमंत्री रहे. 2013 में ललथनहवाला रिकॉर्ड पांचवी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.

#9. कैलाश नाथ काटजू

Kailash Nath Katju
Kailash Nath Katju

मध्यप्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू. कहने को तीसरे लेकिन टेक्निकली फुल टाइम पहले मुख्यमंत्री. जावरा. उनका विधानसभा क्षेत्र. साल 1962. जावरा से चुनाव हारे. सीट नंबर 281. जनसंघ के लक्ष्मीनारायण जमनलाल को कुल 14548 वोट मिले और कांग्रेस के कैलाशनाथ त्रिभुवननाथ काटजू को 13048. कैलाशनाथ मुख्यमंत्री रहते 1500 वोटों से चुनाव हार गए थे.

#10.  चंद्रभान गुप्ता

Chandra Bhanu Gupta

साल 1958 में हमीरपुर की मौदहा सीट पर उपचुनाव हुए थे. उस वक्त चंद्रभान गुप्ता यूपी के सीएम थे. चंद्रभान को सीएम बना दिया था लेकिन एमएलए नहीं थे. उन्हें विधायक बनाने के लिए मौदहा सीट के विधायक ब्रजराज सिंह ने अपनी सीट छोड़ दी. बुंदेलखंड में राठ के दीवान शत्रुघ्न सिंह की पत्नी रानी राजेंद्र कुमारी इंडिपेंडेंट कैंडि‍डेट के तौर पर उनके सामने थीं. कहा जाता है कि अफवाह उड़ी थी कि चुनाव जीतने पर सीएम चंद्रभान राजेंद्र से जबरदस्ती शादी करेंगे. ये अफवाह चुनाव से घंटों पहले फैली और लोगों ने सच मान लिया. एकतरफा वोटिंग हुई और चंद्रभान गुप्ता सीएम रहते हुए वि‍धानसभा चुनाव हार गए. इसके बाद वह 1960 में फिर से मैदान में उतरे, चुनाव जीते. वह 3 बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

#11. हेमंत सोरेन

Hemant Soren

2014 में झारखंड में चौथी विधानसभा के चुनाव हुए. इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा की कमान हेमंत सोरेन के हाथ में थी. लोकसभा चुनावों में मोदी लहर ने झारखंड को भी अपनी चपेट में लिया था. झारखंड विधानसभा चुनाव में भी लहर कायम रही. बीजेपी ने सरकार बनाई. 2014 में हेमंत सोरेन दो सीटों से चुनाव लड़े. झारखंड की उप-राजधानी दुमका और बरहैट से. दुमका शिबू सोरेन की कर्मस्थली रही है. लेकिन हेमंत सोरेन वो सीट बचा नहीं पाए. दुमका में उनको बीजेपी के लुइस मरांडी ने हरा दिया था. बरहैट में उनको जीत मिली.


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