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आज शहीद हुआ था वो क्रांतिकारी, जिसकी शहादत पर गांधी के दो बोल नहीं फूटे थे

हर 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को को नारे लगवाए जाते हैं. महापुरुषों का नाम ले लेकर. जिन्होंने आजादी दिलाने में बड़ा रोल निभाया. उनमें से हम तमाम को अपना रोल मॉडल भी चुने हुए हैं. किसी के गांधी हैं. किसी के भगत सिंह. किसी के नेहरू. किसी के सुभाष. उनकी जय बोली जाती है, ‘अमर रहें’ के उद्घोष के साथ.

इन तमाम नामों में एक नाम नहीं आता है. जिसने भगत सिंह और उनके साथियों को जेल में आर-पार की लड़ाई लड़ने को मजबूर कर दिया. इनके बारे में पहले थोड़े में जान लो.

जतींद्र नाथ दास 1904 में पैदा हुए था. इनको जतिन भी कहते हैं. पैदाइश की जगह कलकत्ता. बहुत हल्की उम्र में बंगाल का क्रांतिकारी ग्रुप ‘अनुशीलन समिति’ जॉइन कर लिया. केवल 16 साल की उम्र थी, जब आंदोलन के चलते दो बार जेल जा चुके थे. गांधी के असहयोग आंदोलन में भी चले गए थे.

सन 1929 में आज ही की तारीख यानी 13 सितंबर को वो लाहौर जेल में शहीद हुए. कैसे हुए, ये हम आगे बताते हैं. आपको उनके बारे में कुछ किस्सों के रास्ते.

जतिन की अंतिम यात्रा की तस्वीर
जतिन की अंतिम यात्रा की तस्वीर

1. लाहौर जेल में एंट्री

14 जून सन 1929 में जतींद्र अरेस्ट किए गए. डाल दिए गए लाहौर जेल में. उन्होंने कुबूल किया था कि उन्होंने बम बनाए, भगत सिंह और बाकी साथियों के लिए.

वहां जेल में भारतीय राजनैतिक कैदियों की हालत एकदम खराब थी. उसी तरह के कैदी यूरोप के हों, तो उनको कुछ सुविधाएं मिलती थीं. यहां के लोगों की जिंदगी नरक बनी हुई थी. उनके कपड़े महीनों नहीं धोए जाते थे. तमाम गंदगी में खाना बनता और परोसा जाता था. धीरे-धीरे भारतीय कैदियों में गुस्सा भरता गया. और कुछ लोगों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया माने मांग पूरी न होने तक खाना-पीना सब बंद. मांग ये थी कि बराबरी मिले, राजनैतिक कैदियों को.

2. शुरुआत हंगर स्ट्राइक की

कुछ लोगों ने भूख हड़ताल शुरू की. उनकी हालत खराब हुई. तो बाकी कैदी भी हड़ताल पर चले गए. सब कर रहे थे तो उनसे भी मनुहार की गई. उन्होंने इस शर्त पर भूख हड़ताल शुरू की कि ‘जीत या मौत.’ उसके पहले कोई हड़ताल खत्म कराने की कोशिश नहीं करेगा. वो तारीख थी 15 जून, सन 1929. ये हड़ताल 63 दिन चली.

3. जेल महकमे की ज्यादती

जेल में जो अफसर लोग तैनात थे, वो किसी भी कीमत पर हंगर स्ट्राइक तोड़वाने के लिए उतावले थे. हर जुगाड़ लगाया. पहले टेस्टी खाना पीना देना शुरू किया. फिर जबरदस्ती नाक में नली डालकर दूध पिलाने की कोशिश की जाने लगी. एक दिन इसी कोशिश में जतींद्र को भयानक खांसी आ गई. फेफड़ों में दूध चला गया. हालत खराब.

जेलर ने उनकी देख-रेख के लिए छोटे भाई किरणचंद्र को रखा. जतींद्र तैयार नहीं हो रहे थे. लेकिन फिर कसम उठवाई. कि हमारी स्ट्राइक के बीच में न आओगे. और बेहोशी में कोई सुई-उई न लगाए एनर्जी वाली.

4. आखिरी यात्रा

फिर वो कयामत का दिन आया. 13 सितंबर. इंसान बिना पानी पिए एक हफ्ता जिंदा रहता है. साइंस के हिसाब से. और बिना खाए एक महीना. लेकिन जतींद्र 63 दिन झेल गए. और फिर उनकी जिंदगी जीत गई. वो दुनिया छोड़ गए, अपने आगे की लड़ाई बाकियों के भरोसे छोड़कर. उनकी बॉडी लाहौर से कलकत्ता रवाना की गई. ट्रेन से. जिस-जिस स्टेशन पर ट्रेन रुकी, लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा उन्हें देखने के लिए.

5. गांधी ने क्या कहा था

इस तरह आजादी के आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल से शहीद होने वाले अकेले क्रांतिकारी बने जतींद्र दास. उनके बारे में एक बात अक्सर उठती है. कि गांधी ने उनको श्रद्धांजलि तक नहीं दी. लेकिन ये सच नहीं है. उन्होंने श्रद्धांजलि दी थी. लेकिन जतींद्र के आंदोलन और हड़ताल से उनको खास इत्तेफाक नहीं था. इसका जिक्र उनके एक लेटर में मिलता है. जो उन्होंने लिखा था अपने पर्सनल सेक्रेट्री और एक्टिविस्ट महादेव देसाई को. सितंबर 22, 1929 को.

”अभी तक मैंने जतिन के बारे में कुछ नहीं लिखा है. मुझे इस बात में जरा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर मेरे बहुत घनिष्ठ लोग मेरी बात न समझें. निजी तौर पर मुझे नहीं लगता कि मेरे नजरिये में बदलाव की जरूरत है. मुझे इस आंदोलन में कुछ भी सही नहीं लगता. मैंने चुप रहना ठीक समझा, क्योंकि मुझे पता है कि मेरा बोला हुआ गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा.”

हालांकि गांधी खुद अनशन करते थे अपनी मांग मनवाने के लिए. लेकिन क्रांतिकारी हथियार उठाने के बाद जेल गए थे, इसलिए वो उनसे कुछ खास सहानुभूति नहीं दिखा पा रहे थे.

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