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जापान में मुर्दे क्यों लगते हैं बरसों लम्बी लाइनों में, इन 7 तस्वीरों से जानिए

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महर्षि रमण से एक विदेशी ने एक बार पूछा- मोक्ष कैसे मिले? मन भागता है दुनियावी चीज़ों के पीछे?

महर्षि ने मुस्कुराते हुए कहा- मन को बताओ कि ये सब कुछ रहेगा नहीं, अंत में सब कुछ छूट जाएगा.

विदेशी ने कहा- इतना सब कुछ सोचने का समय कहां है?दिमाग चलता ही रहता है.

महर्षि बोले- कभी किसी मुर्दाघाट या अस्पताल चले जाओ, दिमाग ठहर जाएगा.

कहानी यहीं तक थी, लेकिन अगर ये कहानी आज की होती तो महर्षि के जवाब में एक तीसरी चीज़ भी होती. और वो है ‘लाइन’. अंग्रेज़ी में ‘क्यू’, उर्दू में ‘क़तार’, हिंदी में ‘पंक्ति’.

इस निगोड़ी लाइन ने बहुतों को दार्शनिक बना दिया, मोह माया भंग करा दी. आदमी लाइन में लगे-लगे और करे भी क्या? ‘ज़िन्दगी क्या है’ टाइप सवाल दबोच ही लेते हैं. और आदमी मन में कहता है ‘जीते जी’ इस लाइन से छुटकारा नहीं.

दफ़्तर से बॉस लगातार फ़ोन कर के आपकी ऐसी तैसी कर रहा है और आप मेट्रो की लाइन में लगे हैं. पूरा दिन काम से थक कर बेहाल हैं. लेकिन ट्रैफ़िक देख कर लग रहा है कि घर नहीं चांद पर जा रहे हैं. पहुंचने में कई प्रकाशवर्ष लगेंगे. बैंक में, सिनेमा में, रेल टिकट में हर जगह एक ही ईश्वरीय तत्व मौजूद है. लाइन.

लेकिन क्या हो अगर आपको मरने के बाद भी बरसों तक लाइन में लगे रहना पड़े. क्योंकि दफ़न होने को ज़मीन ही नहीं मिली. जापान में ऐसा ही हो रहा है. मर के दफ़न होने के लिए बरसों का इंतज़ार. ज़मीनें बहुत ज़्यादा महंगी हैं.

आइए इन 7 तस्वीरों से समझें जापान की इस त्रासदी को- 

#1 – लगभग डेढ़ करोड़ में मिलती है दफ़न होने भर की ज़मीन.

जहां क़ब्रें देखकर सोसाइटी का भ्रम होता हो, वहां ज़मीनें महंगी तो होंगी हीं
जहां क़ब्रें देखकर सोसाइटी का भ्रम होता हो, वहां ज़मीनें महंगी तो होंगी हीं

#2 –  जापान में अब अपनी क़ब्र के लिए लोग बाक़ायदा ईएमआई पर लोन लेते हैं, जिसे मरने से पाहले चुकाना ज़रूरी है.

गगनचुंबी इमारतों के बीच एक लग्ज़री की तरह दिखाई देती क़ब्रें
गगनचुंबी इमारतों के बीच एक लग्ज़री की तरह दिखाई देती क़ब्रें

 

#3 –   राख रखने के लिए सालाना 22 हज़ार चुकाने के बाद लॉकर भी उपलब्ध हैं, लेकिन उसके लिए 4 साल की वेटिंग है. 

कई लोग मरने के बाद शांति से रहना चाहते हैं, इसलिए पॉश इलाकों में अपनी क़ब्रों का इंतज़ाम करते हैं
कई लोग मरने के बाद शांति से रहना चाहते हैं, इसलिए पॉश इलाकों में अपनी क़ब्रों का इंतज़ाम करते हैं

 

#4 – और अगर आपको ज़मीन पर जगह नहीं मिलती तो आपकी राख को 200 साल के लिए अंतरिक्ष में भेज दिया जाएगा.

इसके लिए बाक़ायदा बुकिंग करानी पड़ती है और कई मुर्दों की राख के साथ आपकी राख की भी एडवांस बुकिंग हो जाती है
इसके लिए बाक़ायदा बुकिंग करानी पड़ती है और कई मुर्दों की राख के साथ आपकी राख की भी एडवांस बुकिंग हो जाती है

 

#5 – और उस पर भी तुर्रा ये कि करोड़ों की क़ब्र लेने के लिए भी बरसों सुनना पड़ेगा ‘आप क़तार में हैं’. 

कई लोग अपने करीबियों को अपने घर के क़रीब रखने के चक्कर में महंगी ज़मीन लेते हैं
कई लोग अपने करीबियों को अपने घर के क़रीब रखने के चक्कर में महंगी ज़मीन लेते हैं

 

#6 – जापानी लोग अपने पीछे किसी पर भरोसा नहीं करते, अपने अंतिम संस्कार की चीज़ें ख़ुद ही खरीदते हैं. 

और अपनी मौत की शॉपिंग भी ख़ुद ही करनी पड़ती है. बाक़ायदा मॉल में शोरूम है भाई साब
और अपनी मौत की शॉपिंग भी ख़ुद ही करनी पड़ती है. बाक़ायदा मॉल में शोरूम है भाई साब

 

#7 – लोग बाक़ायदा अपना ताबूत भी पहले से ही सेट करवा लेते हैं, ये आराम का मामला है.

फिटिंग वगैरह तो सही होनी ही चाहिए ना, वरना मरने वाले का कौन ख्याल करता है.
फिटिंग वगैरह तो सही होनी ही चाहिए ना, वरना मरने वाले का कौन ख्याल करता है.

चलते-चलते एक और फिलॉसफिकल डोज़ लेते जाइए  –

प्लेबॉय मैगज़ीन के संस्थापक बेहद रंगमिजाज़ ह्यू हेफ्नर ने ख़ुद को दफ़नाने के लिए पहले ही ज़मीन ख़रीद ली थी. और ये ज़मीन थी ‘मर्लिन मुनरो’ की क़ब्र के ठीक बगल में. करोड़ों डॉलर देकर ख़रीदा गया ज़मीन का टुकड़ा. दफ़न हो चुकी ख़ूबसूरती का बग़लगीर होने का सुख उस मुर्दे से पूछिए.

इंतज़ार पर लिखे गए बेकेट के एक नाटक वेटिंग फॉर गोडोट में एक कैरेक्टर दूसरे से कहता है – ‘हम इंतज़ार से हमेशा बचते क्यों हैं’. जवाब आता है ‘क्योंकि हम उस भयंकर सन्नाटे की और नहीं जाना चाहते’


वीडियो देखें:-

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Japanese people facing years long Que just to bury their relatives and love ones

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