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तो क्या हॉलीवुड की धांसू मूवी 'इंसेप्शन', गोविंदा की 'हसीना मान जाएगी' की कॉपी है?

इंसेप्शन

इंसेप्शन. दुनिया की कुछ बेहतरीन साई-फाई मूवीज़ में से एक. कॉन्सेप्ट इतना धांसू कि इसके डायरेक्टर ने पहले इस कॉन्सेप्ट पर ही सालों काम किया. इसे धीमी आंच में पकने दिया. ग्राफ, टाइमलाइन पता नहीं क्या-क्या बनाई. फिर जाकर स्पेशल इफेक्ट्स, इमोशंस, साइंस और फलसफों को बढ़िया तरीके ब्लेंड करके जो मूवी बनाई वो मास्टर पीस बन पाई.

किस हद तक मास्टर पीस? इस हद तक मास्टर पीस, इतनी कल्ट कि सिर्फ इसकी एंडिंग को लेकर ही ढेरों फैन पेज मिल जाएंगे. इस खबर को पढ़कर गूगल में Inception ending सर्च करके देखिएगा.

अब इसी इंसेप्शन को लेकर मज़ेदार खबर आ रही है. और ये जो खबर आ रही है उस खबर की जड़ जुड़ी है इंसेप्शन के कॉन्सेप्ट से.

# इंसेप्शन का कंसेप्शन-

मूवी बेसिकली इस कॉन्सेप्ट पर बेस्ड है कि अगर हम किसी के सपनों के अंदर घुस जाएं तो उसके राज़ चुराना, या उसके विचार बदलने का काम बड़ा आसान हो जाता है. क्यूंकि सपने सबकॉन्शियस की देन हैं. वो क्रांतिवीर में नाना पाटेकर कहते थे न ‘छोटा मगज़’.

तो किसी व्यक्ति के सपने में घुसने के बाद आप उस सपने में फिर से उस व्यक्ति के सपने में घुस सकते हो. यानी सपने में एक और सपना. वो जैसा बहुत पहले गुलज़ार ने ‘गोलमाल’ में अमोल पालेकर के लिए लिखा था न- इक दिन सपने में देखा सपना… बस वही.

साथ ही अगर वास्तविकता में आप प्लेन में हो तो सपने में आप बर्फ की पहाड़ियों में हो सकते हो. और उसके अंदर वाले सपने में समुद्र तट में…

इसके अलावा भी इस मूवी में सपने से जुड़े और भी बहुत सारे कॉन्सेप्ट हैं-

# जैसे सपने में अगर आधा घंटा बीता है तो वास्तविकता में सिर्फ 5 मिनट. यूं सपने के भीतर वाले सपने में तो वास्तविकता की तुलना में और भी ज़्यादा समय बीत जाएगा.

# जैसे अगर आप सपने में फंस गए तो अनंत काल तक सपने में फंसे रहोगे.

# जैसे आपको कैसे पता चलेगा कि आप सपने में हो? सपनों में कोई ऐसी चीज़ लेकर जाओ जो आपको याद दिलाए कि आप सपने में हो. टोटम (Totem).

# जैसे सपने में चोट लगेगी तो दर्द वास्तविकता में भी होगा, मगर वास्तविकता में चोट नहीं लगेगी.

लेकिन ये ‘जैसे’ से शुरू होने वाले ढेरों कॉन्सेप्ट्स की बात न करके केवल ‘dreams inside dreams inside dreams’ और ‘हर सपने में एक अलग जगह, एक अलग रोल’ वाले कॉन्सेप्ट को ही पकडे रहेंगे. क्यूंकि हमारी बाकी खबर यही से निकल कर आती है.

# ‘कोरा’ कागज़ था ये मन मेरा-

तो कोरा (Quora) में 2010 में एक सवाल पूछा गया कि बॉलीवुड ‘इन्सेपशन’ के माफिक ही कोई मूवी क्यूं नहीं बनाता? इसके जवाब में कई उत्तर आए. आज तक आ रहे हैं. उनमें से एक के जवाब को जावेद जाफ़री ने शेयर कर दिया. क्यूंकि वो सवाल थोड़ी अलग था. और जावेद जाफरी likes the thing if…

# इट्स डिफरेंट-

इस जवाब में, जिसे जावेद जाफ़री ने शेयर किया है, लिखा है कि-

(बॉलीवुड की) ‘हसीना मान जाएगी’ इंसेप्शन के कॉन्सेप्ट के सबसे करीब पहुंच पाई है. क्यूंकि (‘हर सपने में एक अलग जगह, एक अलग रोल वाले कॉन्सेप्ट’ को याद रखिए)-

# लड़कियां बास्केट बॉल खेल रही हैं

# फुटबाल से

# गोल्फ कोर्स में

# सबने टेनिस वाली यूनिफ़ॉर्म पहनी हुई है

# कैप्टन को छोड़कर, जिसने योग करने वाली पैंट पहनी है.

यूं जावेद जाफ़री ने जो स्क्रीन शॉट शेयर किया है उसकी बात में तो दम है. साथ ही इससे एक बात और सिद्ध होती है.

# अरे भाई! वो सब तो ठीक है,  कहना क्या चाहते हो-

देखिए ‘हसीना मान जाएगी’ 1999 में आई थी और ‘इन्सेप्शन’ 2010 में. यानी ये कहना ग़लत होगा कि, ‘हसीना मान जाएगी’, ‘इंसेप्शन’ के कॉन्सेप्ट के सबसे करीब पहुंच पाई है, बल्कि बात तो ये सही है कि, ‘इंसेप्शन’, ‘हसीना मान जाएगी’ जैसे जीनियस कॉन्सेप्ट के सबसे करीब पहुंच पाई है.

वैसे हसीना मान जाएगी के टाइटल सॉन्ग में एक लाइन थी- बात ज़रा इसकी अपने भेजे में डाल. आपने गौर किया? यही तो ‘इंसेप्शन’ का मेन कॉन्सेप्ट, मेन प्लॉट, मेन फलसफा था. मेरा मतलब.  जीनियस…. सोचिए… बात ज़रा इसकी… अपने भेजे में डाल… वाह! नहीं, नहीं, वाह!!

आपका इस पूरी बकवास के बारे में क्या सोचना है और हमारी इस लॉजिकल एप्रोच, इस साइंटिफिक टेंपरामेंट को लेकर आपको क्या कहना है, हमें कमेंट करके ज़रूर बताइएगा. 😉

जाते-जाते आपकी नज़र नाइंटीज़ की मस्ती-


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