Submit your post

Follow Us

इरफ़ान के ये विचार आपको ज़िंदगी के बारे में सोचने पर मजबूर कर देंगे

मैं कौन हूं? भगवान क्या है? अध्यात्म क्या है? जीवन का मकसद क्या है? अनंतकाल से ऐसे सवाल लोगों के दिलो-दिमाग को हैरत में डालते रहे हैं. खासकर इंडिया में, जिसे अध्यात्म का देश कहा जाता है. इन पर बहुत से आध्यात्मिक गुरु प्रवचन भी देते रहे हैं. लेकिन किसी फिल्म एक्टर या व्यवसायी को इन विषयों पर बात करते हुए सुनना एक अलग बात है. काफ़ी दिलचस्प है. कुछ दिनों पहले यूट्यूब पर ऐसी चर्चा की एक वीडियो रिलीज़ की गई. इसमें बात कर रहे तीन लोग एंटरप्रेन्योर हैं – आशा जड़ेजा, सनी सिंह और अनु आग़ा, और एक फिल्म एक्टर हैं – इरफ़ान.

इसे यूट्यूब पर रिलीज़ किया है फिल्मकार आनंद गांधी ने. जिन्होंने ‘शिप ऑफ़ थीसियस’ जैसी फिलोसॉफिकल फिल्म बनाई थी. इस वीडियो के शुरुआत में उनके हवाले से बताया गया है कि ये फुटेज उनके ही एक फिल्म प्रोजेक्ट का हिस्सा है. मुंबई के होटल की एक लॉबी में आनंद ने कुछ अनजान लोगों को साथ में खड़ा कर दिया. कहा कि खुलकर बात कीजिए. इरफ़ान वाले ग्रुप को तीन टॉपिक मिले थे – अहम् (मैं), दुनिया की व्यवस्था, और इंसानियत का भविष्य. ये रहा उनकी बातचीत का वीडियो –

1. क्या है इंसान प्रजाति की ख़ासियत   

इरफ़ान कहते हैं कि इंसान बहुत ख़ास प्रजाति है. इसे समझाते हुए कहते हैं:

“प्रकृति का विकास होता रहता है. हरेक प्रजाति बेहतर होती जाती है. लेकिन इंसान ही ऐसा है जो इस एवोलूशन को समझता है. इंसान सोच-विचार कर सकता है. वैसे तो दूसरे जानवरों में भी यह क्षमता होती है, लेकिन केवल इंसान ही गहराई से सोच सकते हैं. लेकिन यही ख़ासियत एक समस्या बन जाती है. क्योंकि ऐसे में इंसान खुद को पूरी सृष्टि का हिस्सा नहीं समझ पाता. वह खुद को अलग देखता है. उसे लगता है कि वह चीज़ों को कंट्रोल कर सकता है. और उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने की सोचता है. यही इंसान की मूर्खता है.”

सनी उनसे सहमति जताते हुए कहते हैं कि असली सवाल यही है:

“क्या हम इस ख़ासियत को अपने वैयक्तिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं, या पूरी मानवता की भलाई के लिए?”

2. इंडिया में अध्यात्म मर चुका है?

सवाल का जवाब देते हुए इरफ़ान कहते हैं कि:

“आजकल पश्चिमी दुनिया में लोग अध्यात्म के पीछे ज़्यादा भाग रहे हैं. क्योंकि उन्होंने इतना ग्राहकवाद देख लिया है, कि अब वे कुछ और चाहते हैं. अपनी ज़िंदगी को ज़्यादा संपूर्ण करने के लिए. लोग उकता गए हैं सामान खरीदते रहने और उपभोग करते रहने से. वे इसके खालीपन को समझ चुके हैं. जबकि इंडिया में लोग अभी ग्राहकवाद के पीछे मरे जा रहे हैं. इसलिए इंडिया में अध्यात्म मर चुका है. पूरी तरह से मर चुका है.”

इस पर सनी उनसे असहमति जताते हैं. कहते हैं कि उन्होंने अपनी आधी ज़िंदगी इंडिया में और आधी अमेरिका में गुज़ारी है. उन्होंने इंडिया में ज़्यादा लोगों को अध्यात्म की तरफ झुके हुए देखा है. इरफ़ान इसे अध्यात्म मानने से इंकार करते हैं. कहते हैं कि:

“सर, यह तो बस दुकानदारी है यहां पर. एक तरह का लालच है, कि अगर मैंने फलां चीज़ की, तो मरने के बाद का मेरा टाइम सही हो जाएगा. मेरा अगला जन्म सुधर जाएगा.” 

अनु आग़ा इरफ़ान की बात पर हामी भरती हैं. अध्यात्म के ओझल होने के उदाहरण गिनवाती हैं:

“आज देश में जिस तरह की चीज़ें हो रही हैं, इन्हें देखकर कौन कहेगा कि अध्यात्म बचा हुआ है? एक आदमी को इस शक पर मार दिया जाता है कि उसने बीफ खाया. क्या यह अध्यात्म है? मारने वालों की छोड़ो, दूसरे लोग भी कह रहे हैं कि सही हुआ. किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर या लेखक को इंडिया नहीं आने दिया जा रहा. कहा जा रहा है कि वह पूरा देश हमारा दुश्मन है. क्या यह अध्यात्म है? लोग शादियों और गहनों पर इतना ज़्यादा खर्च कर रहे हैं, और आसपास के लोगों की चिंता नहीं है.”  

आपको बता दें कि अनु जिस वैचारिक आधार पर बात कह रही हैं, वह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सादा जीवन’ भारतीय फिलॉसोफी के मूल सिद्धांत हैं.

3. जब इरफ़ान सोचने पर मजबूर हुए कि मैं कौन हूं

इरफ़ान को देखकर-सुनकर आशा को महसूस होता है कि उनके कुछ ऐसे अनुभव रहे होंगे. जिन्होंने उनको यह सोचने के लिए विवश किया कि वे कौन हैं. वे इरफ़ान से गुज़ारिश करती हैं कि उनके बारे में उनको बताएं. इरफ़ान बताते हैं:

“जब मैं बहुत छोटा था, 6-7 साल का, मुझे भगवान के बारे में बताया गया. मैं इंतज़ार करता था कि प्रार्थना करने का समय कब होगा. और मैं जब भी प्रार्थना करता था, मुझे रोना आ जाता था. मैं इस भावना के साथ बड़ा हुआ. फिर एक दिन अचानक कुछ हुआ. मैं दसवीं क्लास में था. टीचर ने कहा कि ऊपर कोई नीला आसमां नहीं है. वहां ऊपर केवल अंधेरा है. और अचानक सबकुछ बिखर गया. मैंने हैरत से पूछा कि क्या! ऊपर कोई नीला आसमान नहीं है? और अचानक से मैंने सवाल करना शुरू कर दिया. यह सवाल करने की प्रक्रिया लगातार चलती रही.”

फिर एक समय आया जब वे खुद पर सवाल करने लगे. वे कौन हैं? पता चला कि वे एक प्रोडक्ट हैं. बहुत सारी इंफॉर्मेशन के, अलग अलग प्रभावों के.  जैसे कि वे किसी रोबोट की तरह चल रहे हों. इस रोबोट का प्रोग्राम किसने बनाया?

“मेरे मां-बाप ने कुछ सिखाया. समाज ने कुछ सिखाया. मेरे डर ने और मेरी असुरक्षा की भावनाओं ने. मैं केवल एक औज़ार हूं, जिसे ये सब प्रभाव अपने हिसाब से इधर-उधर चलाते रहे हैं. और अचानक से महसूस होता है कि आप क्या हो. आपकी आज़ादी कहां है?”  

एक शब्द में कहें तो इरफ़ान ‘कंडीशनिंग’ की बात कर रहे हैं. बचपन से बच्चे को उसके माहौल के मुताबिक़ इतना कुछ सिखा दिया जाता है. या कहें कि उसके दिमाग में भर दिया जाता है. वह कभी अपने स्वतंत्र दिमाग से सोच-विचार ही नहीं कर पाता. वह यह भी नहीं सोच पाता कि यह उसकी स्वतंत्र सोच नहीं है. वह कंडीशनिंग को ही अपने विचार समझने लगता है.

Irrfan Discussion
बातचीत के दौरान आशा, सनी, अनु और इरफ़ान

4. दुनिया को मानसिक गुलामी से बाहर निकालने की जरूरत है

इरफ़ान इस कंडीशनिंग को तोड़ने की बात करते हैं.

“हम पर एक जिम्मेवारी है. लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि वे इन सब प्रभावों के प्रोडक्ट हैं. और उन्हें अपनी आज़ादी पानी है. व्यवस्था आपको दबाने की कोशिश करती है. आपको हमेशा एक कठपुतली बना देती है. धर्म और अध्यात्म को पूरी दुनिया में राजनेताओं ने हथिया लिया है.”

आशा और अनु एक साथ बोलती हैं. इसमें नाम जोड़ती हैं धार्मिक ‘नेताओं’ का. पुजारियों, मौलवियों, पादरियों का. इरफ़ान उनकी बात से फ़ौरन सहमत होते हैं. कहते हैं कि राजनेता और धार्मिक नेता बिल्कुल साठ-गांठ में काम करते हैं. ज़ोर देते हुए कहते हैं कि आम आदमी को इस सब कूड़े और लालच से आज़ाद होना चाहिए. मानसिक गुलामी के सबब, यानि कंडीशनिंग का एक शानदार उदाहरण देते हैं:

“ज़रा सोचिए कि यह कितना अजीब है कि दुनिया में इतने सारे संप्रदाय और धर्म हैं. और हर कोई कहता है कि मेरा धर्म सर्वश्रेष्ठ है. और उन्हें लगता है कि मरने के बाद उन्हें कोई बेहतर जगह मिलेगी.”  

ऐसा कहते हुए इरफ़ान हंसने लगते हैं. पूछते हैं कि लोगों को इस सब पर यक़ीन भी कैसे हो जाता है.

5. इरफ़ान लोगों के रोल मॉडल बनकर बदलाव क्यों नहीं लाते?

अनु और सनी अध्यात्म के रहस्य को 2-3 लाइन में सुलझा देते हैं. एकमत होकर यह विचार सामने रखते हैं कि अध्यात्म अपनी ज़िंदगी जीने का तरीका है. आप संतुष्ट रहें, किसी का नुकसान ना करें, और दुनिया में कुछ सकारात्मक योगदान दें. अनु कहती हैं कि दुनिया की स्थिति के ख़स्ताहाल होने के बारे में बड़बड़ाने से कुछ नहीं होगा. अगर भगवान ने आपको समर्थ बनाया है, तो आपको कुछ करना चाहिए. सनी इसी बात को एक कहावत के रूप में बताते हैं:

“जिसको बहुत दिया गया है, उससे कहीं ज़्यादा की अपेक्षा है.”

आपको बता दें कि यह बाइबिल की एक सूक्ति है. सनी कहते हैं कि आपको भगवान ने कुछ दिया है, तो उससे कुछ करो. तब तो कुछ अध्यात्म है. हालांकि समर्थ तो दुनिया में बहुत लोग हैं, लेकिन हर कोई सोच लेता है कि कोई और कर लेगा. यहां सनी इरफ़ान पर जिम्मेवारी डाल देते हैं. कहते हैं कि ये बहुत अच्छे आदर्श हो सकते हैं लोगों के लिए. एक रोल मॉडल.

“इन्होंने उसी ढ़र्रे पर चलने से मना किया, जिस पर सभी लोग चल रहे थे. इन्होंने अलग तरह की फिल्में की. इन्होंने चांस लिया. और इसलिए हर कोई इन्हें प्यार करता है. इसलिए ये लोगों को बता सकते हैं कि मैं मुख्यधारा से दूर रहा. मैंने वह किया जिसमें मुझे विश्वास था. आप वह करो जिसमें आपको विश्वास है. ये कमाल के रोल मॉडल हो सकते हैं.”  

आशा भी सनी की बात से इत्तफ़ाक़ रखती हैं. फिर इरफ़ान पर सवाल दाग़ देती हैं:

“ऐसा क्यों नहीं है कि आप जैसे लोग आगे हों, बजाए कि इन मूर्ख नेताओं के, जिनके पास कोई दूरदृष्टि नहीं है. ऐसा क्यों है कि इंडिया में अच्छे लोग किसी स्थिति का चार्ज नहीं ले रहे, जहां पर वे कुछ बदल सकते हैं?”

वैसे यह सवाल तो हर किसी से पूछा जाना चाहिए. खैर, इरफ़ान समस्या की गहराई को समझाते हैं.

6. कौन है जो देश में बदलाव नहीं आने दे रहा

वे कहते हैं कि एक डिज़ाइन के तहत हम पर प्रहार हो रहा है. ऐसा नहीं कि यह ऐसे ही बेतरतीब ढंग से हो रहा है. यह एक तरीके से किया जा रहा है. हमें उपभोक्तावादी बनाया जा रहा है. यानि सामान के पीछे भागने वाला. हमें मृत बनाया जा रहा है. यानि भावुकता से वंचित. हमें सोचने से मना किया जा रहा है. हर तरफ से सभी प्रभाव हमें ऐसा बना रहे हैं.

“आप देखिए हमारे रोल मॉडल्स को. फ़िल्मस्टार या क्रिकेटर. वे समाज में ऐसा क्या योगदान देते हैं? कुछ नहीं. और उन्हें हमारा रोल मॉडल बना दिया गया है. मीडिया उन्हीं को दिखाती रहती है. मीडिया उस व्यक्ति को नहीं दिखाती जो ज़मीनी स्तर पर कुछ बदलाव ला रहा है. जो समाज को बदल रहा है. लेकिन उसको कोई रोल मॉडल की तरह नहीं दिखाता.”

आशा कहती हैं कि हर तरफ ब्रांडेड कपड़े पहनने वालों को दिखाया जा रहा है. यही ग्राहकवाद का डिज़ाइन है. इस तरह वे पूरी बातचीत को अच्छे से जोड़ देती हैं.

7. हमें कोई रोल मॉडल चाहिए ही क्यों

यहां पर अनु बातचीत को एक नए आयाम पर ले जाती हैं:

“कोई व्यक्ति एक रोल मॉडल नहीं होना चाहिए. जैसे ही आप किसी को रोल मॉडल बनाएंगे, लोग उसमें कुछ कमियां ढूंढेंगे और उसे नीचे खींचने की कोशिश करेंगे.”

इनके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो उस रोल मॉडल का पोस्टर दीवार पर लगा लेते हैं. और उन्हें कोई मतलब नहीं रहता कि उस रोल मॉडल के विचार क्या हैं. अनु कहती हैं कि उन्हें कोई रोल मॉडल नहीं बनना. किसी को उनका किया हुआ काम अच्छा लगता है, तो बढ़िया है. लेकिन साथ ही वे एक इंसान हैं जिनके अंदर बहुत सी खुद की समस्याएं हैं. उन्हें रोल मॉडल बनाकर कोई उनकी नक़ल ना करे.

इरफ़ान अनु की बात से सहमत होते हैं कि वाकई यह भी एक शॉर्टकट ही बन जाता है. लोगों को लगता है कि एक आदमी ही जैसे सब कुछ बदल देगा. सनी अनु से कहते हैं कि उनकी बात तो सही है. लेकिन समस्या यह है कि ज़्यादातर लोग भेड़ प्रवृति के हैं जो फॉलो करना चाहते हैं. इरफ़ान भी उसी क्षण इस पर अफ़सोस जताते हैं कि आज इंडिया ठीक इसी समस्या से पीड़ित है. कि उन्हें कोई चाहिए जिसे वे फॉलो करें.

फिर भी अनु अपनी बात पर अडिग रहती हैं. कहती हैं कि इरफ़ान जैसे किसी एक व्यक्ति के कंधों पर रोल मॉडल बनने का बोझ मत डालो. अगर वे सिगरेट पीते हैं, तो ऐसा ना हो कि उन्हें रोल मॉडल मानने वाले भी सिगरेट पीने लग जाएं. अच्छा काम करना है, और हम सभी को करना है. किसी एक व्यक्ति के करने से नहीं होगा. वैसे भी किसी का अध्यात्म और इंसानियत किसी दूसरे के हाथों में कैसे हो सकता है.


वीडियो देखें – तस्वीर: इरफ़ान की याद में कहे ये शब्द भावुक करते हैं  

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

10 नंबरी

'इक कुड़ी जिदा नां मुहब्बत' वाले शिव बटालवी ने बताया कि हम सब 'स्लो सुसाइड' के प्रोसेस में हैं

इन्होंने अपनी प्रेमिका के लिए जो 'इश्तेहार' लिखा, वो आज दुनिया गाती है

शराब पर बस ये पढ़ लीजिए, बिना लाइन में लगे झूम उठेंगे!

लिखने वालों ने भी क्या ख़ूब लिखा है.

वो चार वॉर मूवीज़ जो बताती हैं कि फौजी जैसे होते हैं, वैसे क्यूं होते हैं

फौजियों पर बनी ज़्यादातर फिल्मों में नायक फौजी होते ही नहीं. उनमें नायक युद्ध होता है. फौजियों को देखना है तो ये फिल्में देखिए.

गहने बेच नरगिस ने चुकाया था राज कपूर का कर्ज

जानिए कैसे शुरू और खत्म हुआ नरगिस और राज कपूर का प्यार का रिश्ता..

सत्यजीत राय के 32 किस्से: इनकी फ़िल्में नहीं देखी मतलब चांद और सूरज नहीं देखे

ये 50 साल पहले ऑस्कर जीत लाते, पर हमने इनकी फिल्में ही नहीं भेजीं. अंत में ऑस्कर वाले घर आकर देकर गए.

ऋषि कपूर की इन 3 हीरोइन्स ने उनके बारे में क्या कहा?

इनमें से एक अदाकारा को ऋषि ने आग से बचाया था.

ईश्वर भी मजदूर है? लेखक लोग तो ऐसा ही कह रहे हैं!

पहली मई को दुनियाभर में मजदूरों के हक़ की बात कही जाती है.

बलराज साहनी की 4 फेवरेट फिल्में : खुद उन्हीं के शब्दों में

शाहरुख, आमिर, अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार्स के फेवरेट एक्टर रहे बलराज साहनी.

जब भीमसेन जोशी के सामने गाने से डर गए थे मन्ना डे

मन्ना डे के जन्मदिन पर पढ़िए, उनसे जुड़ा ये किस्सा.

ऋषि कपूर के ये 13 गीत सुनकर समझ आता है, ये लवर बॉय पर्दे पर कैसे मेच्योर हुआ

'हमको तो तुमसे है, प्यार.'