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दिल्ली के प्रदूषण पर बनी फ़िल्म, जो कान फ़िल्म महोत्सव में झंडे गाड़ रही है

राहुल जैन. डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर हैं. उनकी दिल्ली के प्रदूषण पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘इनविज़िबल डीमन्स’ को 74वे कान फ़िल्म महोत्सव की स्पेशल ‘सिनेमा फॉर दी क्लाइमेट’ कैटेगरी में प्रदर्शित किया जा रहा है. राहुल ‘इनविज़िबल डीमन्स’ में दिन प्रतिदिन बिगड़ते पर्यावरण के मुद्दे को उजागर कर रहे हैं. फेस्टिवल में ‘इनविज़िबल डीमन्स’ को पसंद किए जाने को लेकर राहुल बेहद खुश हैं. हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू  में ‘इनविज़िबल डीमन्स’ पर बातचीत में क्या कहा. आप भी पढ़िए.

“पर्यावरण के बदलाव से संबंधित मुद्दों पर लोग पिछले कुछ ही सालों से गंभीरता से बात कर रहे हैं. लेकिन लोगों को इस बारे में ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि असल में मानव कैसे अन्य प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है.

ये फ़िल्म डर से निकली है. कुछ ऐसा डर, जैसा किसी बच्चे को लगता है जब वो एकाएक देखता है कि उसके हाथों पर खून लगा हुआ है. वो कंफ्यूज हो जाता है. मुझे भी बिलकुल वैसा ही लगता है, जब आप 50 डिग्री सेल्सियस पर पिघल रहे होते हो, जब AQI (एयर क्वालिटी इंडेक्स) इतना ज्यादा होता है कि आपको घर में मास्क लगाकर कैद में रहना पड़ता है. ये बहुत ही आंतरिक अनुभव हैं. इन भावनाओं से जो डर या कह लीजिए आतंक मेरे मन में जन्मा, वही इस फ़िल्म में दिखता है.”

'इनविज़िबल डीमन्स' का पोस्टर.
‘इनविज़िबल डीमन्स’ का पोस्टर.

राहुल का मानना है कि इंसानों को बचाने की ज़रूरत नहीं है. बल्कि इंसानों से बचाने की ज़रूरत है. बात बढ़ाते हुए आगे कहते हैं,

“हमने जो वातावरण अपने आस-पास बना लिया है, वो इंसान के अलावा अन्य जीवों को भी बहुत प्रभावित कर रहा है. हमारे लालच और तबाही के अन्य जीव भी बेमन से भागीदार बने हुए हैं. ये कहानी नहीं है. ये मेरा अनुभव है. क्यूंकि जब मैं अमेरिका से दिल्ली आया था तब अचानक से बहुत बीमार पड़ गया था. मेरे पास हर चीज़ थी खुद को सुरक्षित रखने के लिए बाहर के प्रदूषण से. लेकिन वातावरण के बदलाव का प्रभाव इतना ज्यादा और इतना तेज़ था कि इस बात ने मुझे विवश कर दिया ये फ़िल्म बनाने के लिए.”

राहुल दिल्ली में ही पले बढ़े और बाद में अमेरिका शिफ्ट हो गए. राहुल से जब पूछा गया कि क्यों उन्होंने दिल्ली शहर के प्रदूषण पर ही फ़िल्म बनाई. जबकि भारत में तो कई शहर प्रदूषित हैं. इस सवाल के जवाब में राहुल ने कहा,

“हां मैं देश के अन्य बड़े राज्यों पर भी फ़िल्म बना सकता था. या पूरे देश के ऊपर ही फ़िल्म बना सकता था. लेकिन मैंने एक ही शहर पर फोकस रखना बेहतर समझा. वो भी वो शहर, जिस पर लगातार सवाल उठ रहे थे. साथ ही खबरों में भी इस शहर को पृथ्वी का सबसे प्रदूषित शहर बताया जा रहा था. और दूसरा मेन कारण ये मेरा होमटाउन था.”

'इनविज़िबल डीमन्स' का सीन.
‘इनविज़िबल डीमन्स’ का सीन.

राहुल जैन ‘इनविज़िबल डीमन्स’ से क्या उम्मीदें रखते हैं. इस संदर्भ में राहुल ने कहा,

“मैं ये तो तय नहीं कर सकता कि कौन मेरा काम देखेगा. कौन नहीं देखेगा. लेकिन अगर मैं किसी काम में दो से तीन साल इंवेस्ट करने जा रहा हूं, तो उसे बहुत अच्छा होना चाहिए. लोगों को उस काम से एक जुड़ाव महसूस होना चाहिए. मैं किसी को खुश करने के लिए काम नहीं कर रहा. लेकिन मैं ये ज़रूर चाहता हूं कि मेरी फ़िल्म ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. सही दर्शकों तक पहुंचे. ख़ासकर दिल्ली के निवासियों तक पहुंचे.”

‘इनविज़िबल डीमन्स’ राहुल की दूसरी फ़िल्म है. राहुल इससे पहले ‘मशीन्स’ नाम की फ़िल्म बना चुके हैं. ये फ़िल्म गुजरात की एक गारमेंट फैक्ट्री में फिल्माई गई थी. फ़िल्म में दिखाया गया था इंडस्ट्री में काम करने वाले लेबर्स को प्रतिदिन किन-किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. ‘मशीन्स’ 2017 में आई थी. उस साल के सनडांस फ़िल्म फेस्टिवल में ‘मशीन्स’ को ‘एक्सीलेंस इन सिनेमैटोग्राफी’ का खिताब मिला था. ‘मशीन्स’ का ट्रेलर आप नीचे देख सकते हैं.

राहुल चाहते हैं ‘मशीन्स’ की तरह उनकी इस फ़िल्म की भी ज्यादा से ज्यादा रीच हो और मेनस्ट्रीम ऑडियंस भी उनकी फ़िल्म को देखे. कहते हैं,

“एक सिनेमा प्रेमी के तौर पर मैं ये नहीं समझ सकता कि क्या एक्स्पेक्ट किया जाए. हां लेकिन मुझे पता है कि ये बड़ी बात है. क्यूंकि सबको लगता है ये बड़ी बात है. एक आर्टिस्ट के तौर पर मुझे इस बात का सुकून है कि जिस काम में मैंने इतना समय दिया उसकी अपनी एक लाइफ़ होगी. जिसे लाखों लोग देखेंगे. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मुझे इस कहानी को दर्शकों के बीच लाने का मौक़ा मिला.”


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


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