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कहानी राजू गाइड की, जिसने सबको धोखा दिया और अंत मे साधु बनकर गांव को बचा लिया

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पार्टिशन के 15 और इंडो-चाइना वॉर को तीन साल बीते थे. बंटवारे के बाद आने वाली जेनरेशन को बताने वाली घटनाओं की फेहरिस्त में एक और नाम शामिल हो गया था. भारत-चीन युद्ध. चेतन आनंद जैसा डायरेक्टर इस मसले पर फिल्म बना रहा था. वॉर फिल्म. एकदम मेनस्ट्रीम. फिल्म का नाम था ‘हकीकत’. इस फिल्म ने हमे वो गाना दिया, जिसके बिना 15 अगस्त या 26 जनवरी का कोई भी फंक्शन पूरा नहीं हो सकता. ‘कर चले हम फिदा जानों-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’. ये खबर इस बारे में नहीं है. लेकिन इसका एक स्ट्रॉन्ग कनेक्शन इस खबर से जरूर है. वो हम नीचे बताएंगे, क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में.

जब देव आनंद के साथ एक हॉलीवुड फिल्ममेकर काम करना चाहते थे

साल 1961 में देव आनंद की ‘हम दोनों’ नाम की फिल्म आई थी. फिल्म ने देश ही नहीं, विदेशों में भी खूब धूम मचाया था. ये 1962 बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में इंडिया की ऑफिशियल एंट्री थी. इसे बेस्ट फिल्म (गोल्डन बियर अवॉर्ड) के लिए नॉमिनेट किया गया था. इसकी स्क्रीनिंग और अवॉर्ड सेरेमनी में हिस्सा लेने फिल्म की कास्ट भी जर्मनी गई हुई थी. यहां पर कई और देशों के बड़े राइटर-डायरेक्टर मौजूद थे. यहां देव साहब की मुलाकात पोलिश फिल्ममेकर टेड डेनियलेविस्की और अमरीकी राइटर पर्ल. एस. बक से हुई. वो देव आनंद के साथ एक फिल्म बनाना चाहते थे. तब देव साहब इस आइडिया को लेकर श्योर नहीं थे, इसलिए वहां कुछ फाइनल नहीं हो पाया और देव वहां से निकल गए.

'गाइड' के इंग्लिश वर्ज़न के डायरेक्टर टेड डेनियलेविस्की और राइट पर्ल.एस.बक के साथ देव
‘गाइड’ के इंग्लिश वर्ज़न के डायरेक्टर टेड डेनियलेविस्की और राइट पर्ल.एस.बक के साथ देव

तब एक इंडियन राइटर की विदेशों में बहुत फॉलोविंग थी

वो राइटर थे ‘मालगुडी डेज़’ वाले आर.के नारायण. विदेश में इनका भौकाल होने के पीछे की कहानी भी बहुत इंट्रेस्टिंग है. नारायण इंडिया में बड़े नाम थे. उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका था. ग्राहम ग्रीन (25 से ज़्यादा नॉवल्स के राइटर और लिटरेचर के लिए नोबेल प्राइज़ के लिए दो बार शॉर्टलिस्टेड राइटर) ने नारायण की ग्रूमिंग वगैरह में मदद की थी. अगर नारायण इंडिया के बेस्ट सेलर नॉवेलिस्ट थे, तो ग्रीन विदेशों के. नारायण जब अपना लेखन इंटरनेशल लेवल पर लेकर गए, तब ग्रीन ने इनकी किताबों को पब्लिश कराने में बहुत मदद की थी. अब नारायण इंटरनेशनल राइटर बन गए थे. इनकी एक किताब ‘द गाइड’ दुनियाभर में तारीफें बटोर रही थी. देव आनंद को किसी ने इस किताब का नाम सुझाया. उन्होंने वो किताब खरीदी और एक बार में पढ़ गए. उन्हें कहानी अच्छी लगी थी. अब वो इस पर फिल्म बनाना चाह रहे थे.

आर.के.नारायण का राइटिंग करियर तकरीबन 60 साल लंबा था. नारायण को साहित्य में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण और पद्म् विभूषण पुरस्कार दिया गया है.
आर.के.नारायण का राइटिंग करियर तकरीबन 60 साल लंबा था. नारायण को साहित्य में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण और पद्म् विभूषण पुरस्कार दिया गया था.

जब सत्यजीत रे और देव आनंद एक ही कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे

इंटरनेशनल फिल्म सर्किट में कदम रखने के लिए देव को ये सही कहानी लगी. उन्होंने बर्लिन में उनसे मिलीं पर्ल. एस. बक को फोन किया और इस कहानी के आधार पर स्क्रीनप्ले लिखने की गुज़ारिश की. पर्ल मान गईं. जब ये सब चल रहा था, तब सत्यजीत रे ‘अभिजान’ नाम की एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म में उनकी हीरोइन थीं वहीदा रहमान. उन्होंने वहीदा को ‘द गाइड’ किताब पढ़ने को दी और कहा कि वो चाहते हैं कि वो ये किताब पढ़ें. इस कहानी पर जब वो फिल्म बनाएंगे, तो उनकी हीरोइन वहीदा ही होंगी. वहीदा ने कहा ठीक है. बात आई-गई हो गई. कुछ दिनों बाद वहीदा को देव आनंद का फोन आया. उन्होंने बताया कि वो एक फिल्म बना रहे हैं. वहीदा को जब पता चला कि वो भी ‘द गाइड’ की ही पर फिल्म बना रहे हैं, तो वो चौंक गईं. उन्होंने देव को बताया कि इस कहानी पर रे भी फिल्म बनाने वाले हैं. देव आनंद ने बताया कि अब नहीं बना सकते क्योंकि इस किताब के राइट्स उन्होंने खरीद लिए हैं और वो खुद इस कहानी पर ‘गाइड’ नाम की फिल्म बना रहे हैं.

सत्यजीत रे फिल्में बनाने के मामले में बहुत अनलकी रहे हैं. उनकी एक फिल्म एलियन की स्क्रिप्ट भी चोरी हो गई थी, जिसपर हॉलीवुड फिल्म 'ईटी' बनी.
सत्यजीत रे फिल्में बनाने के मामले में बहुत अनलकी रहे हैं. उनकी फिल्म एलियन की स्क्रिप्ट भी चोरी हो गई थी, जिसपर हॉलीवुड फिल्म ‘ईटी’ बनी.

फिल्म के चक्कर में देव की अपने भाई से खटपट हो गई

पर्ल की लिखी कहानी को पर्दे पर लाने का काम दिया गया टेड डेनियलेविस्की को. इसे आनंद (देव, चेतन और विजय) ब्रदर्स के प्रोडक्शन हाउस नवकेतन फिल्म्स के तहत बनाया जा रहा था. ये नवकेतन फिल्म्स की ‘बाहुबली’ थी. इस प्रोडक्शन हाउस के अंडर में बनने वाली ये पहली कलर फिल्म थी. इसलिए इसमें जी भर के पैसा और मेहनत लगाया जा रहा था. इसे हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में साथ-साथ शूट किया जाना था. अंग्रेजी वाले वर्जन का जिम्मा टेड को दिया गया, तो हिंदी वर्जन देव के भाई चेतन आनंद डायरेक्ट करने वाले थे. चेतन फिल्म में डांसिंग स्किल्स की जरूरत को देखते हुए अच्छी डांसर मानी जाने वाली लीला नायडू को लेना चाहते थे. लेकिन देव वहीदा के नाम पर अड़े हुए थे. शूटिंग के दौरान कुछ सीन्स-सीक्वेंस और कैमरा एंगल को लेकर चेतन और टेड के बीच भी दिक्कतें आ गईं. इसलिए उन्होंने अपने क्रिएटिविटी में कॉम्प्रोमाइज़ करने से फिल्म छोड़ देना ही बेहतर समझा. इतने में उन्हें फिल्म ‘हकीकत’ बनाने की परमिशन इंडियन आर्मी से मिल गई, जो इंडो-चाइना वॉर पर बेस्ड थी. वो उसमें व्यस्त हो गए. इसके बाद फिल्म के हिंदी वर्ज़न को डायरेक्ट करने की जिम्मेदारी देव के दूसरे भाई विजय आनंद को दी गई.

अपने भाइयों चेतन (बीच में) और विजय के साथ देव आनंद. और दूसरी ओर चेतन आनंद की फिल्म 'हकीकत' का पोस्टर.
अपने भाइयों चेतन (बीच में) और विजय के साथ देव आनंद. और दूसरी ओर चेतन आनंद की फिल्म ‘हकीकत’ का पोस्टर.

इस फिल्म से इंडिया की इमेज खराब हो सकती थी

ऐसा लगता था फिल्म के नए-नवेले अपॉइंट किए गए डायरेक्टर विजय आनंद को. विजय इस कहानी को सुनकर शॉक में चले गए थे. ये कहानी एक शादीशुदा महिला और एक टूरिस्ट गाइड के विवाहेत्तर संबंधों पर आधारित थी. विजय को लगता था कि भारतीय ऑडियंस इतना मॉडर्न कॉन्सेप्ट देखने के लिए अभी तैयार नहीं है. और इस कहानी से इंडिया की इमेज भी दुनियाभर में खराब हो जाएगी. विजय ने ये फिल्म डायरेक्ट करने के लिए एक शर्त रखी. उन्होंने देव से कहा आप इंग्लिश वर्जन जैसे चाहें शूट करवाएं, लेकिन हिंदी वर्जन वो तभी शूट करेंगे, जब वो खुद इसका नया स्क्रीनप्ले लिखेंगे. चेतन पहले ही क्रिएटिव डिफरेंस की वजह से फिल्म छोड़ चुके थे और देव नहीं चाहते थे कि विजय भी ये फिल्म छोड़ दें, इसलिए उन्होंने विजय को नया स्क्रीनप्ले लिखने की इजाज़त दे दी.

विजय आनंद डायरेक्टर के साथ-साथ एक्टर भी थे. बतौर एक्टर वो 'हकीकत' और 'कोरा कागज़' जैसी फिल्मों में एक्टिंग कर चुके हैं.
विजय आनंद डायरेक्टर के साथ-साथ एक्टर भी थे. बतौर एक्टर वो ‘हकीकत’ और ‘कोरा कागज़’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं.

जब देव के भाई उन्हें मारना चाहते थे

विजय आनंद एक अच्छे डायरेक्टर थे. ये हम नहीं उनके साथ काम कर चुके एक्टर्स कहते हैं. ‘गाइड’ में उनकी हीरोइन रहीं वहीदा रहमान बताती हैं कि विजय को एक्टर नहीं डायरेक्टर ही बने रहना चाहिए था, क्योंकि वो एक अच्छे डायरेक्टर थे. उन्हें एक्टर्स से काम करवाना आता था. खासकर देव आनंद से. विजय अपन बड़े भाई देव को पापा बुलाते थे. कितना भी कठिन सीन हो विजय देव से करवा ही लेते थे. ‘गाइड’ के क्लाइमैक्स में देव को मरना था. देव आनंद किसी भी सूरत में ये सीन करने को तैयार नहीं थे. उनके अपने रिजर्वेशंस थे. उन्हें लगता था कि जनता अपने पसंदीदा सुपरस्टार को परदे पर मरते देखना पसंद नहीं करेगी. विजय ने ये सीन करने के लिए देव को बहुत मनाया लेकिन देव कुछ भी सुनने को राज़ी नहीं थे. अब इस मामले की तू तू-मै मैं से विजय भी चिढ़ गए थे. वो शूट खत्म करने का ऐलान करने ही वाले थे कि उनके सिनेमैटोग्रफर उनके पास आए. ‘गाइड’ के कैमरा डिपार्टमेंट का काम मशहूर सिनेमैटोग्रफर फैली मिस्त्री को सौंपा गया था. फैली ने विजय से एक मौका मांगा देव को मनाने का, ताकि फिल्म में क्रिएटिव लेवल पर कोई दिक्कत नहीं रहे. फैली गए और देव को समझाने लगे. उन्होंने काफी देर तक कहानी के हिसाब से उस सीन की इंपॉर्टेंस देव आनंद को समझाई. जब देव को वो बात समझ आई, तो उन्होंने उस सीन को ठीक वैसे ही किया, जैसा विजय चाहते थे. आज भी उस सीन को भारतीय सिनेमा इतिहास के कुछ चुनिंदा सीन्स में गिना जाता है.

फिल्म 'गाइड' के आखिरी दृश्यों में देव आनंद और वहीदा रहमान
फिल्म ‘गाइड’ के आखिरी दृश्यों में देव आनंद और वहीदा रहमान

जब करण जौहर के पापा ने देव साहब को मूर्ख बना दिया

करण जौहर के पापा यश जौहर नवकेतन फिल्म्स के प्रोडक्शन कंट्रोलर थे. साथ ही वो फिल्म ‘गाइड’ में विजय आनंद को असिस्ट भी कर रहे थे. करण जौहर ने उस घटना के सालों बाद बाद बताया कि कैसे उनके पिता ने एक बार देव आनंद के साथ खेल कर दिया था. ‘गाइड’ की शूटिंग हिमाचल प्रदेश के रोहतांग पास में होनी थी. क्रू को शूटिंग लोकेशन पर पहुंचने में दिक्कतें आ रही थी. लेकिन देव साहब मानने को तैयार ही नहीं थे. वो रोहतांग में ही शूट करना चाहते थे. रास्ते में एक जगह उनकी टीम आराम कर रही थी. इतने में क्रू के एक मेंबर से यश ने सड़क पर लगे माइलस्टोन को पेंट करवाकर रोहतांग पास (0 किमी.) लिखवा दिया. इसके बाद देव आनंद साहब ने वो सीन वहीं शूट किया.

यश जौहर अपने करियर के शुरुआती दौर में देव आनंद के नवकेतन फिल्म्स के प्रोडक्शन कंट्रोलर थे.
यश जौहर अपने करियर के शुरुआती दौर में देव आनंद के नवकेतन फिल्म्स के प्रोडक्शन कंट्रोलर थे.

जब लिरिस्ट ने काम टालने के लिए बहुत बड़ा अमाउंट मांग लिया

‘गाइड’ के लिए पहले हसरत जयपुरी को बतौर लिरिसिस्ट साइन किया गया था. हसरत के साथ एक लाइन पर मामला ठन गया. हसरत को उनकी लिखी लाइन बदलने के लिए कहा गया क्योंकि देव साहब को वो लाइन पसंद नहीं आई. हसरत अपने लिखे को लेकर जज़्बाती थे उन्होंने लाइन हटाने से इंकार कर वो फिल्म छोड़ दी. इसके बाद शैलेंद्र को इस फिल्म के साइन किया गया. शैलेंद्र को पता चला कि वो देव आनंद की फर्स्ट चॉइस नहीं थे, इसलिए वो मामले को टरकाने की कोशिश करने लगे. इस चक्कर में उन्होंने मेकर्स से एक बड़ा अमाउंट कोट कर दिया. लेकिन मौके की नज़ाकत को देखते हुए शैलेंद्र को साइन कर लिया गया. इसके बाद शैलेंद्र ने फिल्म ‘गाइड’ के सारे गाने लिखे. उनके लिखे का एक नमूना देखते भी जाइए:

इतने जतन से बनी फिल्म ‘गाइड’ के 6 दिसंबर, 1965 को रिलीज़ हुई थी. फिल्म के हिंदी (विजय आनंद) वाले वर्जन को तो बहुत पसंद किया गया. इसे भारतीय सिनेमा इतिहास की कल्ट क्लासिक होने का गौरव प्राप्त है. लेकिन अंग्रेजी में शूट की गई फिल्म कब आई और कब गई, किसी को पता भी नहीं चला. आज इस फिल्म ने अपनी रिलीज़ के 53 साल पूरे कर लिए हैं.


वीडियो देखें: उदित नारायण, जिन्हें भारत की आख़िरी ओरिजिनल आवाज़ कहा जाता है

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