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अमिताभ की उस फिल्म के 6 किस्से, जिसकी स्क्रीनिंग से डायरेक्टर खुद ही उठकर चला गया

साल 1977 की 27 मई को एक फिल्म रिलीज़ हुई थी. ‘अमर अकबर एंथनी’. डायरेक्ट किया था मनमोहन देसाई ने. अगर आज के समय में बनी होती, तो बेस्ट फिल्म फॉर नेशनल इंट्रीग्रेशन के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत जाती. लेकिन कोई बात नहीं, जिस दौर में आई थी तब भी अचीवमेंट में कोई कमी नहीं थी. अमिताभ बच्चन को इसके लिए उनके करियर का पहला फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला था. और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी को बेस्ट म्यूज़िक डायरेक्टर का. जिस साल रिलीज़ हुई, उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी. इसके कैची गाने और वन लाइनर्स ने इंडिया में मसाला फिल्मों के लिए नया ट्रेंड सेट कर दिया. कहा जाता है इंडिया से ज़्यादा बड़ी हिट वेस्टइंडीज़ में हुई थी. लेकिन इसके बनने का प्रोसेस ऐसा था कि फिल्म कंप्लीट हो गई लेकिन डायरेक्टर को पता ही नहीं था. उनके बेटे ने बताया तब पता चला. इसकी मेकिंग के ऐसे-ऐसे मजेदार किस्से हैं कि संडे बन जाए, कहीं जाना नहीं है, बस स्क्रीन सरकाना है:

1.) लिखते वक्त फिल्म में अमिताभ बच्चन के किरदार का नाम था एंथनी फर्नांडीस. मनमोहन देसाई म्यूज़िक के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लिरिसिस्ट आनंद बख्शी के साथ बैठे थे. टाइटल सॉन्ग तैयार हुआ. ‘माय नेम इज़ एंथनी फर्नांडीस, मैं दुनिया में अकेला हूं’. सुनते-गाते समय सरनेम अटक रहा था, गाने का  फ्लो खराब हो रहा था. तो नाम बदलने की बात हुई. लेकिन सवाल ये था कि रखा क्या जाएगा? लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तब बताया कि 1930 के दशक में एक बड़े मशहूर म्यूज़िक अरेंजर हुआ करते थे – एंथनी गोंजाल्वेस. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने उन्हीं से संगीत की तालीम ली थी. उन्हें ट्रिब्यूट देने के लिए हीरो का नाम बदलकर रख दिया गया एंथनी गोंजाल्वेस. इसके बाद जो गाना तैयार हुआ, वो आप यहां सुनिए:

2.) मनमोहन देसाई बड़े मस्तमौला आदमी थे. जिसके साथ भी फिल्म करते, कहते कोई तैयारी करके सेट पर मत आना. ये कोई सत्यजीत रे की फिल्म नहीं है. एकदम इम्प्रॉम्पटू शूट करेंगे. उन्हें फिल्मों के आइडिया भी कुछ ऐसे ही आया करते थे. एक बार स्क्रीनप्ले राइटर प्रयागराज अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने के लिए उनके फार्म हाऊस की चाबी मांगने आए. मनमोहन देसाई बैठे अखबार पढ़ रहे थे. उन्हें एक खबर देखी कि जैक्सन नाम का एक शराबी अपने तीन बच्चों को पार्क में छोड़कर चला गया. इस खबर से वो थोड़े उत्साहित हो गए और इसपर फिल्म बनाने के बारे में सोचने लगे. प्रयाग को पकड़ा और दिनभर फिल्म बनाने के लिए कहानी डिस्कस करते रहे. प्रयाग की छुट्टी कैंसिल कर अगले तीन दिन में फिल्म की कहानी तैयार करवा ली. फिल्म ‘आ गले लग जा’ का स्टोरी आइडिया उन्हें अपने बेटे के स्कूल में आया था जहां उन्होंने कुछ बच्चों को स्केटिंग करते हुए देखा था. उसके बाद उन्होंने अगले सात दिनों में उसकी भी कहानी तैयार करवा ली.

ऋषि कपूर पहले ये फिल्म नहीं करने वाले थे. जैसे ही उन्होंने अकबर नाम सुना, फिल्म करने से मना कर दिया. इसके बाद उन्हें मनमोहन देसाई ने उनका रोल समझाया और फिल्म में लिया.
ऋषि कपूर पहले ये फिल्म नहीं करने वाले थे. जैसे ही उन्होंने अकबर नाम सुना, फिल्म करने से मना कर दिया. इसके बाद मनमोहन देसाई ने उन्हें उनका रोल समझाया और फिल्म में लिया.

3.) ‘अमर अकबर एंथनी’ में विनोद खन्ना के कैरेक्टर के अपोज़िट कोई हीरोइन नहीं रखी गई थी. मनमोहन देसाई को लगा कि उनका कैरेक्टर थोड़ा सीरियस किस्म का है, इसलिए उनके साथ किसी हीरोइन को रखना ठीक नहीं लगेगा. विनोद खन्ना को जैसे ही ये बात पता लगी, वो पहुंच गए डायरेक्टर के पास. उन्होंने मनमोहन देसाई से कहा कि अमिताभ और ऋषि कपूर के साथ हीरोइनें हैं, इसलिए उनके साथ भी होनी चाहिए. मनमोहन ने बहुत समझाया लेकिन विनोद मानने को तैयार ही नहीं थे. बाद में विनोद खन्ना के साथ शबाना आज़मी को कास्ट किया गया. और फिर उनके लिए अलग से एक रोल लिखा गया.

फिल्म में विनोद ने अमिताभ के बड़े भाई का रोल किया था, जबकि असल लाइफ में वो उनसे चार साल छोटे थे.
फिल्म में विनोद ने अमिताभ के बड़े भाई का रोल किया था, जबकि असल लाइफ में वो उनसे चार साल छोटे थे.

4.) मनमोहन देसाई ‘अमर अकबर एंथनी’ और ‘परवरिश’ की शूटिंग एकसाथ, एक ही स्टूडियो में कर रहे थे. दोनों फिल्मों की कास्ट भी लगभग एक सी ही थी. वो चाहते थे कि दोनों फिल्मों को जल्द से जल्द रिलीज़ किया जाए. पहले वो ‘परवरिश’ का एक सीन शूट करते, फिर ‘अमर अकबर…’ का. लेकिन सारी तैयारी धरी की धरी रह गई, जब साल 1975 में इमरजेंसी लग गई और मनमोहन की फिल्में अटक गईं. इसी का नतीज़ा रहा कि 1977 में उनकी एक के बाद एक चार फिल्में ‘धरमवीर’, ‘चाचा-भतीजा’, ‘परवरिश’, और ‘अमर अकबर एंथनी’ रिलीज़ हुईं और सब सुपरहिट रहीं.

5.) 1972 में राइटर जोड़ी सलीम-जावेद ने अमिताभ को मनमोहन देसाई से पहली बार मिलवाया था. देसाई उनसे बिलकुल प्रभावित नहीं हुए. उन्होंने कहा- ‘मैं इसे बस एक ही रोल दे सकता हूं. चिकन रोल’. इसके कुछ ही साल बाद वो अमिताभ के साथ फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ में काम कर रहे थे. सेट पर अमिताभ को बताया गया कि फिल्म में उनका एक मिरर सीन है. जहां उन्हें आईने में देखकर डायलॉग बोलना है. मनमोहन ने अमिताभ को स्क्रिप्ट थमाई और दूसरी फिल्म की शूटिंग करने चले गए. डायरेक्टर का वेट करते-करते काफी टाइम हो गया. असिस्टेंट डायरेक्टर्स ने कहा सर सेटअप तैयार है, आप सीन शूट कर लीजिए. अमिताभ ने डायलॉग याद करने की बजाय इस सीन को इंप्रोवाइज़ करने का सोचा और डायरेक्टर के बगैर ही वो सीन शूट कर दिया. आप वो सीन भी देख लीजिए:

6.) मनमोहन देसाई की एक आदत थी. वो जनता का रिएक्शन देखने के लिए उनके साथ थिएटर में बैठकर फिल्म देखते थे. जैसे ही कोई बीच में उठता वो उसे रोक देते थे. कई बार तो नौबत हाथापाई तक भी हो पहुंच जाती थी. ‘अमर अकबर एंथनी’ का प्रीमियर चल रहा था. फिल्म का स्टार कास्ट और इंडस्ट्री के जाने-माने लोग बैठकर फिल्म देख रहे थे. जैसे ही वो आईने वाला सीन खत्म हुआ, मनमोहन खुद ही उठकर बाहर निकलने लगे. अमिताभ ने सोचा कहां गड़बड़ हो गई. भागते-भागते उनके पास पहुंचे. पूछा क्या हुआ? जवाब आया- अब से मेरी सभी फिल्मों में तुम काम करोगे. इसी फिल्म से मनमोहन देसाई डायरेक्टर के साथ प्रोड्यूसर भी बन गए. और फिल्में बनाईं ‘नसीब’ (1981), ‘देशप्रेमी’ (1982), ‘कूली’ (1983), ‘मर्द’ (1985) और ‘तूफान’ (1989). सब में बच्चन.


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