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इनसाइड एज 2 रिव्यू: नेताओं की सत्ता, एक्टर्स की साख पे बट्टा और क्रिकेट का सट्टा

# एक्स्ट्रा इनिंग्स-

प्रशांत कनौजिया और देवेंद्र मिश्रा साउथ अफ्रीका के एक लॉकअप में बंद हैं. दोनों एक स्ट्रिप क्लब में एक-दूसरे से लड़ाई करते हुए पकड़ा गए हैं. देवेंद्र मिश्रा को अपने ब्राह्मण होने का दंभ है. वो प्रशांत को उसकी जाति के चलते हेय दृष्टि से देखता है. लेकिन जब इस लॉकअप में कुछ विदेशी आकर देवेंद्र की बेइज्ज़ती करते हैं तब उसे अपनी बनाई दवा के कड़वे स्वाद का पता चलता है. तब वो रियलाईज़ेशन मोड में आकर अपनी और अपने जैसे उच्च जाति के बच्चों की अपब्रिंगिग पर सवाल खड़ा करते हुए कहता है- “ये सब जात, पात धर्म का नाटक, हम नहीं चालू किए. हम इसमें पले बढ़े हैं. यही सीखे हैं. जो सीखे हैं, वो कर रहे हैं बचपन से. किससे मांगे माफ़ी अब बताओ. भगवान से मांगे? ब्राह्मण हैं हम. ब्राह्मण ही तो भगवान का रूप होता है. नहीं? ऐसा ही बोलते हैं न सब?”

ये जेल वाला पूरा सिक्वेंस इनसाइड एज के दूसरे सीज़न का सबसे पावरफुल सिक्वेंस है.

पहले एपिसोड के पहले ही सीन में पता चल जाता है, कि भाई साब कौन हैं. जिसने पूरे सीज़न वन का चक्रव्यूह रचा था.
पहले एपिसोड के पहले ही सीन में पता चल जाता है, कि भाई साब कौन हैं. जिसने पूरे सीज़न वन का चक्रव्यूह रचा था.

# रीप्ले-

चूंकि हम सीज़न 2 का रिव्यू कर रहे हैं इसलिए सीज़न 1 से जुड़े कई स्पॉइलर सुनने को मिल सकते हैं. तो पहले सीज़न में हमने पावरप्ले प्रीमियर लीग (पीपीएल) के बारे में जाना था. एक काल्पनिक देसी क्रिकेट लीग. वही जैसे वास्तविकता में आईपीएल है. इसमें एक टीम है मुंबई मैवरिक्स. इसके 15% शेयर की मालकिन है ज़रीना मलिक. बाकी 85% हिस्सा है विक्रांत धवन का.

ज़रीना. एक फिल्म स्टार. जिसका अतीत बहुत स्वर्णिम रहा है लेकिन अब उसका दौर बीत चुका है. उधर विक्रांत धवन का मकसद है क्रिकेट में लगने वाले सट्टे से करोड़ों कमाना. कैसे? टीम के कुछ लोगों को स्पॉट फिक्सिंग के लिए राज़ी करके. टीम का कैप्टन है अरविंद वशिष्ठ. युधिष्ठिर की तरह सच्चा और ईमानदार. टीम का दूसरा महत्वपूर्ण खिलाड़ी है धाकड़ बैट्समैन वायु राघवन. जिसका गुस्से पर काबू नहीं है. इसलिए ग्राउंड में उसकी परफॉरमेंस और अपनी एक्स, मीरा से उसका रिश्ता कभी भी कंसिस्टेंट नहीं रहता.

उसकी बहन सयानी गुप्ता भी मैवरिक्स से जुड़ी है. एक स्टेटिस्टिक के तौर पर. जो मैदान के बाहर रहकर संख्याओं के बल पर टीम की जीत के लिए कंट्रीब्यूट करती है. मैवरिक्स की टीम का कोच है निरंजन सूरी. जिसे ब्लैकमेल करके विक्रांत फिक्सिंग के लिए मना लेता है. लेकिन जब निरंजन की अंतरआत्मा जागती है तो वो विक्रांत के लिए काम करने से मना कर देता है. इसलिए विक्रांत उसका क़त्ल कर देता है.

देवेंद्र मिश्रा एक नेगेटिव कैरेक्टर है जो विक्रांत के हाथों फिक्स है. वो अपने गांव से आए एक नए खिलाड़ी प्रशांत कनौजिया को पहले उसकी जाति के वजह से बुली करता है फिर ब्लैकमेल करके फिक्सिंग वाले खेल का मोहरा बना लेता है.

बिज़नसमैन, मनोहर हांडा, ‘हरियाणा हरिकेन्स’ का मालिक है. जिसकी टीम तो पीपीएल में खैर कोई खास परफॉर्म नहीं कर पाती लेकिन वो इस सीज़न में उसका रोल फील्ड के बाहर बहुत प्रोमिनेंट रहता है. खास तौर पर जानकारियों को इधर-उधर करने में.

हालांकि विक्रांत धवन के ऊपर ‘भाई सा’ब’ का वरदहस्त है. लेकिन ये भाई सा’ब कौन हैं और क्या करते हैं? दर्शकों को पूरे पहले सीज़न के दौरान नहीं बताया जाता. पहले सीज़न में इस क्लिफहैंगर के अलावा बाकी सभी सवालों के उत्तर मिल जाते हैं. वायु और ज़रीना के प्लान के चलते विक्रांत बर्बाद हो जाता है. ‘शायद’ ज़रीना के हाथों मारा भी जाता है. ज़रीना को बचाने और विक्रम को मारने में भाई सा’ब का ही हाथ होता है. मैवरिक्स विनर के रूप में उभरती है और इस जीत का हीरो वायु बनता है. उधर प्रशांत, देवेंद्र मिश्रा के चंगुल से बच जाता है और उसे उसकी ही पिस्टल छीनकर उसे गोली भी मार देता है.

# सेकेंड इनिंग्स-

सेकेंड सीज़न भाई सा’ब की ही एंट्री से शुरू होता है. भाई सा’ब कौन हैं? यशवर्धन पाटिल. इंडियन क्रिकेट बोर्ड के प्रेज़िडेंट और पीपीएल के फाउंडर. लेकिन पूरे सीज़न भर उन्हें इंडियन क्रिकेट बोर्ड का फिर से प्रेज़िडेंट बनने के लिए जुगत लगाते हुए देखा जा सकता है. विक्रम भी मारा नहीं गया था. वो भी वापस आता है. ज़रीना जिस तेज़ी से चतुराई सीखती है, वही तेज़ी इस सीज़न में भी बरकरार रखती है और भाई सा’ब के करीब होते जाती है. विक्रम के सिर से भाई सा’ब का हाथ हटता है तो वो इधर-उधर भागते-छुपते फिरता है. हालांकि अब वो भाई सा’ब से बदला लेने के भी प्लान करने लगता है.

विक्रम वाले 85% हिस्से की मालकिन मंत्रा पाटिल बनती है. भाई सा’ब की बेटी. और इस टीम यानी मुंबई मैवरिक्स का कैप्टन बनता है वायु. फिर अरविंद का क्या होता है? उसे मनोहर हांडा, हरियाणा हरिकेन्स का कैप्टन बना देता है. पहले सीज़न में मनोहर हांडा की पार्टनर आयशा दीवान अबकी बैंगलोर ब्लिट्ज की मालकिन बन जाती है. बैंगलोर ब्लिट्ज के साथ दिक्कत ये है कि उसके सारे खिलाड़ी फिक्सिंग में इन्वॉल्व हैं. मालकिन आयशा और विक्रम की इच्छा के चलते. बल्कि ये टीम बनाई ही जीतने या हारने के लिए नहीं, फिक्सिंग के लिए है. हरियाणा हरिकेन्स की दिक्कत ये है कि उसके कुछ खिलाड़ी डोपिंग में लिप्त हैं. मनोहर हांडा की इच्छा के चलते और अरविंद की नज़रों से बचकर. उधर मुंबई मैवरिक्स की भी दिक्कत है. पहले तो उस पूरी टीम का फॉर्म. दूसरा उसका कैप्टन, जिसकी गेंद के बजाय मूड स्विंग होता है. (यद्यपि वो बैट्समैन है!) और चौथा, उसके भी कुछ खिलाड़ी फिक्सिंग में लिप्त हैं. भाई सा’ब और ज़रीना की इच्छा के चलते और वायु से छुपकर. मुंबई की तीसरी दिक्कत ये कि उधर प्रशांत अपने पास्ट से पीस नहीं बना पा रहा और उसका परफॉरमेंस बद से बदतर होता जा रहा है.

वायु को देखकर आपको किस क्रिकेटर की याद आती है?
वायु को देखकर आपको किस क्रिकेटर की याद आती है?

आगे क्या होता है? मुंबई, हरियाणा और बंगलौर में से कौन पीपीएल का ये सीज़न जीतता है? क्या यशवर्धन पाटिल फिर से इंडियन क्रिकेट बोर्ड का प्रेज़िडेंट बन पाता है? क्या है वायु और उसकी बहन सयानी का पास्ट जो उन्हें अब तक हॉन्ट कर रहा है? क्या ज़रीना अपने एक्टिंग और क्रिकेटिंग करियर के बीच साम्य बनाते हुए पावर की उन सीढ़ियों को चढ़ पाती है, जिसकी उसको महत्वाकांक्षा है? जिस बेटिंग और फिक्सिंग के खेल में मुंबई मैवरिक्स और बंगलौर ब्लिट्ज एक-दूसरे को डबल क्रॉस कर रहे हैं, उसके फाइनल में कौन जीतता है? क्या अरविंद, क्रिकेट को डोपिंग और फिक्सिंग के जाल से बाहर निकाल पाता है. ये और ऐसे बहुत से उत्तरों के जवाब तो बेशक दर्शकों को दस एपिसोड्स में मिल जाते हैं. लेकिन फिर भी कुछ सिरे यूं खुले रखे जाते हैं कि सीज़न 3 के लिए स्पेस बना रहे.

और हां. अबकी बार का पीपीएल गृह मंत्री की नाराज़गी के चलते इंडिया में नहीं साउथ अफ्रीका में हो रहा है.

# ऑन पेपर्स-

फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी की ये वेब सीरीज़ भारत की पहली घरेलू वेब सीरीज़ कही जाती है. 10 जुलाई, 2017 को रिलीज़ हुआ इसका पहला सीज़न एमी अवार्ड्स के लिए भी नॉमिनेट हुआ था और इसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा था. पहले सीज़न की तरह ही दूसरा सीज़न भी अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ किया गया है. 6 दिसंबर, 2019 को. पहले सीज़न की तरह ही इसमें भी 10 एपिसोड्स हैं. इस दूसरे सीज़न के कुछ एपिसोड निशेष गोयल और कुछ करण अंशुमन ने डायरेक्ट किए हैं. एक एपिसोड निशेष गोयल और गुरमीत सिंह ने मिलकर भी निर्देशित किया है. दूसरे सीज़न का दसवां यानी फाइनल एपिसोड सबसे लंबा है. 57 मिनट का. और सबसे छोटा एपिसोड है 39 मिनट का. दूसरा एपिसोड.

वैसे तो सीरीज़ के हर एपिसोड के शुरू में, कहानी के काल्पनिक होने का डिसक्लेमर ज़रूर आता है. लेकिन सीरीज़ के दूसरे सीज़न में भी पहले ही की तरह ढेर सारे रियल इंसिडेंट का नाट्य रूपांतरण किया गया है. जैसे मूवी ‘पद्मावत’ पर उठा विवाद. ब्राज़ील का ‘लॉकटीगेट स्कैंडल’ (जिसमें यूएस के 4 खिलाड़ी, 2016 के ओलंपिक्स के दौरान एक पेट्रोल पंप में लूटपाट करते हुए पाए गए थे.). रूस की पूरी टीम को ‘डोपिंग’ के चलते समर ओलंपिक्स में बैन कर देना. इलेक्शन के चलते आईपीएल का साउथ अफ्रीका में होना. महेंद्र सिंह धोनी का चेन्नई सुपर किंग्स से राइज़िंग पुणे में चले जाना. राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स पर 2016 की फिक्सिंग के चलते लगा बैन.

कुछ कैरेक्टर्स भी आपको अख़बारों की सुर्ख़ियों और पेज 3 में से उठाए लगेंगे. आप देखकर खुद गेस कीजिएगा. मज़ा आएगा आपको.

देवेंद्र का किरदार निभाने वाले अमित सियाल कानपुर, यूपी से हैं. इसलिए वहां ही बोली नेचुरल ढंग से आती है.
देवेंद्र का किरदार निभाने वाले अमित सियाल कानपुर, यूपी से हैं. इसलिए वहां ही बोली नेचुरल ढंग से आती है.

# प्लेयर स्टेटिस्टिक्स-

सीरीज़ के सबसे बड़े नेगेटिव कैरेक्टर विक्रांत धवन बने हैं विवेक ओबरॉय. विवेक ओबरॉय जब मूंछों में सामने आते हैं तो डिट्टो अपने पिता सुरेश ओबरॉय की तरह लगते हैं. वो अच्छे एक्टर हैं, और ये सीरीज़ उनके कुछ सबसे बेहतरीन प्रोजेक्ट्स में से एक कही जा सकती है. इंट्रेस्टिंग बात ये है कि जितना खौफ वो पहले सीज़न में पैदा कर पा रहे थे, उतना इस सीज़न में नहीं कर पाते. लेकिन पहली बात तो ऐसा एक्टिंग के चलते नहीं, उनके लिए लिखे गए किरदार के चलते हैं. और दूसरी बात ये कि वो इस वजह से ही दूसरे सीज़न में ज़्यादा कन्विंसिंग लगते हैं. लेकिन दूसरे सीज़न में उनकी जगह भाई सा’ब हैं. भाई सा’ब उतने ही इंपॉसिबल लगने लगते हैं जितना विवेक का किरदार पहले सीज़न में था.

भाई सा’ब का किरदार निभाया है ‘अ वेंसडे’ फेम आमिर बशीर ने. उनकी एक्टिंग, मेकअप और उनके मैनरिज्म के चलते लगता ही नहीं कि वो ‘अ वेंसडे’ के जय प्रताप सिंह हैं. जो भाई सा’ब का रुतबा है, उसे अपने एक्सप्रेशंस (या उसकी न्यूनता) के चलते कन्विंसिंग बना ले जाते हैं. ये पोकर फेस उन्हें एक्टिंग में डिक्टिनशन दिलवाता है. वो उन क्षणों में वल्नरेबल भी लगते हैं जब अपनी बेटी मंत्रा या धीरे-धीरे स्ट्रॉन्ग होती जा रही ज़रीना के साथ होते हैं.

ज़रीना बनीं ऋचा चड्ढा की एक्टिंग की खूबसूरती है, अपने को मोल्ड करते रहना. उनका कैरेक्टर आर्क सबसे बेहतरीन है. जैसा ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’ में क्लेरी अंडरवुड का था. उतना ही महत्वाकांक्षी. इस आर्क के हिसाब से ‘घबराहट’ से लेकर ‘कॉन्फिडेंस’ और ‘मासूमियत’ से लेकर ‘चालाकी’ तक के सफ़र को वो बेहतरीन ढंग से स्क्रीन पर उतार लाई हैं.

वायु राघवन का किरदार निभाने वाले तनुज वीरवानी की एक्टिंग बहुत लाउड है. हो सकता है कि ये उनके किरदार की मांग हो.

अंगद बेदी, अरविंद वशिष्ठ के कैरेक्टर की मासूमियत और ईमानदारी को इतनी अच्छी तरीके से निभाते हैं कि लगता ही नहीं है, इस आदमी ने ‘पिंक’ में कितना  निगेटिव रोल किया था.

‘फोर मोर शॉट्स प्लीज़’ और ‘आर्टिकल 15’ फेम सयानी गुप्ता ‘इनसाइड एज’ के इन दो सीज़न्स में रोहिणी राघवन का किरदार निभाने के बाद अब ‘इनसाइड एज’ फेम भी कही जा सकती हैं. उनकी एक्टिंग में कोई नहीं है, सिर्फ एक जगह छोड़कर जहां पर वो अपने कोच की मृत्यु पर ज़ार-ज़ार रोती हैं. ये नकली लगता है.

मनु ऋषि ‘मिर्ज़ापुर’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ जैसे प्रोजेक्ट्स में कैरेक्टर आर्टिस्ट रह चुके हैं. यहां उनका रोल बहुत प्रोमिनेंट है. अगर ‘इनसाइड एज’ का ह्यूमर कोशेंट कोई बनाता और बढ़ाता है तो वो उनका किरदार मनोहर हांडा ही है.

देवेंद्र का किरदार निभाने वाले अमिल सियाल. कानपुर से हैं. और उनका किरदार भी. इसके चलते वो नेचुरल लगते हैं. एक्टिंग भी अच्छी की है. पूरा कनपुरिया टच.

अगर पीपीएल महाभारत है तो अरविंद युधिष्ठिर.
अगर पीपीएल महाभारत है तो अरविंद युधिष्ठिर.

सीरीज़ इतने प्रोफेशनल ढंग से बनाई गई है कि इसमें इंप्रोवाईज़ेशन का कोई स्कोप ही नहीं बचता. इसलिए बाकी सब एक्टर्स का परफॉर्मेंस भी बेहतर और बुरे वाले स्पेक्ट्रम में न झूलकर ‘अपने कैरेक्टर को बेहतर ढंग से निभा गए’ वाले कांटे पर अटक जाता है. लेकिन फिर भी प्रशांत के किरदार को निभाने वाले सिद्धांत चतुर्वेदी की परफॉर्मेंस सभी सीज़न्ड कलाकारों के बीच भी ऐसी चमक पैदा करती है जिसे इग्नोर करना मुश्किल है. जबकि उनका रोल लिखते हुए कोताही बरती गई सी लगती है. चाहे वो गाड़ी तेज़ दौड़ाने वाला सीन हो या एक चीयरलीडर से अफेयर वाला सब-प्लॉट या वो डर, जिसके चलते वो परफॉर्म नहीं कर पा रहा.

# यो-यो टेस्ट-

आइए अब पॉइंट बाई पॉइंट बात कर लें सीरीज़ में क्या अच्छा है क्या बुरा-

# कवर ड्राइव्स

# सिंपलीसिटी- हालांकि कुछ लोगों को ये ड्रॉ-बैक लग सकता है, लेकिन अगर दर्शकों को ध्यान में रखा जाए तो ये एक बहुत बढ़िया बात है कि सीरीज़ में चीज़ें, कैरेक्टर्स, प्लॉट्स और घटनाएं इतनी आसान और लीनियर ढंग से रखी गई हैं कि उनको दिमाग नहीं लगाना पड़ता. इसके चलते ये सीरीज़ एक बेहतरीन बिंज वॉचिंग (एक ही बार में सारे एपिसोड देख लेना) अनुभव बन जाती है. जिसके बाद आपको हैंगओवर नहीं होता.

# क्लाइमैक्स- नहीं. हम आपको क्लाइमैक्स या स्पॉइलर नहीं बता रहे. बस ये बता रहे हैं कि पहले सीज़न की तरह ही दूसरे सीज़न में भी ज़्यादातर सवालों के उत्तर मिल जाते हैं और ‘मिर्ज़ापुर’, ‘अ फैमिली मैन’ या ‘सेक्रेड गेम्स’ की तरह अगले सीज़न तक का लंबा इंतज़ार नहीं करना पड़ता. इस बार भी विक्रांत धवन और मंत्रा पाटिल जैसे क्लिफहैंगर बेशक हैं. लेकिन वो बस इस सीज़न की आने वाले सीज़न के साथ कंटीन्यूटी बनाने रखने के लिए किए गए जतन भर लगते हैं.

# ट्रू देट- वैसे तो बाकी जगहों में भी सिनेमाटोग्राफी, एडिटिंग और कैमरा एंगल्स कमाल हैं. लेकिन जब पीपीएल के मैच वाले सीन आते हैं तो आप हतप्रभ हो जाते हैं. आपको कहीं नहीं लगता कि आप कोई वेब सीरीज़ देख रहे हो, आईपीएल नहीं. ठीक जिस तरह रियल मैच के वक्त एक कैमरे और दूसरे कैमरे के बीच स्विच किया जाता है. ठीक जिस तरह स्कोरबोर्ड या स्टेटिस्टिक्स दिखाए जाते हैं. सब कुछ बैंग ऑन टारगेट है. आपने आकाश चोपड़ा की कमेंट्री तो सुनी होगी न? जब इसमें भी एक कमेंटेटर ‘टीजे का डीजे’ या ‘प्रशांत अब शांत नहीं बैठेंगे’ जैसी बातें करता है तो फिर तो आपको खुद को जगाना होता है कि ये सब रियल नहीं है.

साथ ही ये साफ़ लगता है कि या तो किरदारों ने क्रिकेट की बारीकी ‘परफेक्शन’ की हद तक सीखी हैं. या एडिटिंग और बॉडी डबल के जोड़ से ऐसे रियल्टी के करीब सीन बन पड़े हैं. या ढेरों रिटेक लिए गए हैं कि जब तक वो स्पेसिफिक शॉट या बॉल नहीं पड़ जाती, जैसी स्क्रिप्ट में मेंशन है. या फिर इन तीनों के मेल से ये जादू क्रिएट किया गया है.

क्या रोहिणी इस महाभारत की विभीषण हैं? मतलब अच्छे इंटेंशन, लेकिन...
क्या रोहिणी इस महाभारत की विभीषण हैं? मतलब अच्छे इंटेंशन, लेकिन…

# स्टेटिस्टिक्स- नाथन लीमन. इंग्लैंड की टीम के डेटा एनेलिस्ट.मतलब वो बंदा जो अगर आपकी टीम का हिस्सा है और मैदान से बाहर रहकर सिर्फ गुणा भाग करके किसी मैच का रिज़ल्ट आपकी तरफ मोड़ने की कुव्वत रखता है. और इस बार इंग्लैंड को वर्ल्ड कप जितवाने में इनका बहुत बड़ा हाथ था. इनकी तरह ही रोहिणी का किरदार है. वो जो बातें बताती है. उसको बताने में जो डाटा यूज़ करती है वो सब बड़ा ही कन्विसिंग और रियल लगता है. और इस सब में मेहनत की गई है.

# ट्विस्ट एंड टर्नस- स्क्रिप्ट सिंपल होते हुए भी ‘ट्विस्ट एंड टर्न्स ‘, ‘सस्पेंस’ और थ्रिल से महरूम नहीं है. और इन ट्विस्टस की संख्या 57 मिनट के फाइनल एपिसोड में और ज़्यादा बढ़ जाती है. एंडिंग की एक ‘रीयूनियन’ आपको हतप्रभ करके छोड़ती है.

# और- साउथ अफ्रीका की एग्ज़ोटिक लोकेशंस. एडिटिंग. सिनेमैटोग्राफी और क्रिकेट से जुड़ी रिसर्च इस सीरीज़ के कुछ और प्लस में से एक हैं.

# सिली पॉइंट

# प्रोडक्ट प्लेसमेंट- आप जब कोई मूवी या ऐसा कोई शो देख रहे होते हो, जिसमें आपने पेमेंट किया है तो, बीच-बीच में विज्ञापन या किसी ब्रांड के इंडोर्समेंट से आपको कोफ़्त होती है. खासकर तब जब वो सटल न होकर, ऑन योर फेस हों. मतलब जब लगे कि ये जबरन डाले गए हैं. ऐसे इंडोर्समेंट आपको इस सीरीज़ ने जगह जगह दिखेंगे. कभी किसी चिप्स बनाने वाली कंपनी का, कभी एक स्पीकर बनाने वाली कंपनी तो कभी एक डियोड्रेंट बनाने वाली कंपनी का.

# बेतुके सब-प्लॉट्स- कई सब-प्लॉट्स न भी होते तो भी सीरीज़ के कहन में कोई अंतर नहीं आना था. जैसे प्रशांत की लव लाइफ. पाकिस्तान वाला पूरा सिक्वेंस. वायु-रोहिणी का पास्ट. वगैरह.

हालांकि अगले सीज़न्स में इनकी प्रासंगिकता सिद्ध की जा सकती है लेकिन फिर सीरीज़ को साफ़-सुथरा रखने के लिए इन सब प्लॉट्स को भी तभी डाला जाता जब वो मेन कहानी का हिस्सा बनते, या बनेंगे. जैसे पिछले सीज़न में भाई सा’ब. उनका ज़िक्र आना अगले सीज़न का एक हिंट ज़रूर देता था लेकिन कहानी में बाधा नहीं बनता था.

# बेतुके सीन और सिक्वेंस- कई सीन न होते तो स्क्रिप्ट और ज़्यादा कसी हुई होती. इनसे कहानी में कोई बड़ा अंतर भी नहीं आया. जैसे भाई सा’ब और साउथ अफ्रीका के प्रेज़िडेंट के बीच का वार्तालाप.

# च्यूइंगम- कुछ चीज़ें च्यूइंगम बेवजह चबाई गई है, भले उसमें रस न बचा हो. जैसे प्रशांत का आउट ऑफ़ फॉर्म चलना. वायु-रोहिणी के पास्ट को इरिटेट कर देने की हद तक छुपाए रखना. निरंजन सूरी के कत्ल का केस. वगैरह.

विक्रांत. जो इतना डार्क करैक्टर है कि घृणा होने लगती है. लेकिन वो अब तक बचा कैसे है, सवाल तो ये भी है.
विक्रांत. जो इतना डार्क कैरेक्टर है कि घृणा होने लगती है. लेकिन वो अब तक बचा कैसे है, सवाल तो ये भी है.

# थर्ड अंपायर- सीरीज़ की सबसे बेहतरीन बातों में से एक थी रियल आईपीएल मैचों को एज़ इट इज़ क्लोन कर लेना. लेकिन फिर थर्ड अंपायर के अस्तित्व को ही नकार देना बहुत बड़ा फ्लॉ है. खासतौर पर जब आपको दिखाना है कि फील्ड अंपायर भी फिक्स्ड हैं.

# झूठ- सारे करैक्टर्स इतने पॉश और इतने चमकते हैं कि आप कभी नहीं मान सकते ये रियल में भी होते होंगे. बातें भी ऑर्गेनिक न होकर बनावटी हैं. फ़िल्मी डायलॉग न भी हों तो भी ये लोग हम-आप जैसे बात करते हुए नहीं लगते. प्राइवेट प्लेन से ही ट्रेवल करते हैं. 1000 करोड़ रुपए से ही बेटिंग करते हैं. इसलिए आप उनके इमोशंस से रिलेट नहीं कर पाते. बावज़ूद इसके कि ज़्यादातर किरदार किसी रियल लाइफ सेलिब्रिटी पर बेस्ड हैं, तुलना करना तो दूर आप दोनों का कोई कॉमन रेफरेंस पॉइंट नहीं बना पाते.

# प्रिडिक्टेबिलिटी- रोहिणी का किरदार कभी-कभी फ्यूचर इवेंट प्रेडिक्ट करने लगता है लेकिन ‘तुक्के’ से नहीं ‘चक दे इंडिया’ के कबीर खान की तरह… लेफ्ट देख रही है तो राईट मारेगी… ठीक उसी तरह आप एक दर्शक के रूप में कहानी प्रेडिक्ट करने लगते हो. कि अगर हरियाणा को तो फाइनल में पहुंचना ही है… और इसलिए….

लेकिन एक चीज़ यहां पर जोड़ना ज़रूरी होगा कि ये लेज़ी राइटिंग के चलते नहीं है. बस कुछ ‘बुराई पर तो अच्छाई ही जीतेगी टाइप’ ऑब्वियस चीज़ों के चलते है. वरना स्क्रिप्ट को अनप्रिडिक्टेबल बनाए रखने में अच्छी-खासी मेहनत की गई है. इसलिए ही तो ऊपर ‘ट्विस्ट एंड टर्न्स ‘ वाले खाने में हरा मार्क किया है.

# रिपीटेशन- कई चीज़ें रिपीट होती हुई लगती हैं. जैसे मैच के रिज़ल्ट और उसके नेल बाइटिंग मोमेंट्स. फिक्सिंग के मोमेंट्स.

# मैच समरी-

‘इनसाइड एज’ अपने ट्रीटमेंट में न ‘सेक्रेड गेम्स’ की तरह प्रीमियम लगती है और न ‘कोटा फैक्ट्री’ की तरह लो बजट. न ‘मिर्ज़ापुर’ की तरह इंगेज़िंग है, न ‘गुल्लक’ की तरह ज़मीन से जुड़ी. लेकिन कुल मिलाकर इसमें इतना पोटेंशियल और इतना थ्रिल है कि वीकेंड में आठ घंटे की बिंज वॉचिंग करने पर आपको अफ़सोस नहीं होगा. हर एपिसोड इस ढंग से बनाया गया है कि आप प्ले नेक्स्ट पर क्लिक करते चले जाएंगे.


वीडियो देखें:

फिल्म रिव्यू: पानीपत-

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