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अंतिम संस्कार जैसे सब्जेक्ट पर बनी ये 7 कमाल की फिल्में, जो आपको जरूर देखनी चाहिए

सिनेमा की असंख्य परिभाषाएं हैं. उन्हीं में से एक कहती है कि सिनेमा समाज का आईना है. जो घट रहा है, उसे दिखाने का जिगरा रखता है. असहज करने वाली हकीकत को परोसने की हिम्मत रखता है. पिछले दिनों बिहार के बक्सर से ऐसी ही असहज करने वाली तस्वीरें आईं. जिन्हें देख पत्थरदिल लोगों का भी दिल पसीज जाए. गंगा नदी में लाशें तैर रही थी. जिनका हुजूम घाट पर आकर लग गया. खबरें आने लगी कि क्रियाकर्म के अभाव में ऐसा किया गया. कोई इसका दोष प्रशासन पर मंढ़ने लगा. तर्क ये भी आया कि अपने परिजनों को नदी में बहाने की परंपरा बड़ी पुरानी है. खैर, हम किसी पर टिप्पणी कर निष्कर्ष निकालने नहीं आए हैं. ये सच है कि शवों को नदी में बहाने तक से लेकर अन्य कई तरीकों की क्रियाकर्म प्रथाएं इस देश में चलती रही हैं. कुछ परंपरा के नाम पर. तो कुछ संसाधनों के अभाव में.

वास्तविकता को आवाज देने वाले सिनेमा में भी इसकी छवि देखने को मिली है. वो भी देश के अलग-अलग हिस्सों से. तो आज हम ऐसी ही फिल्मों से आपको परिचित कराएंगे. जहां क्रियाकर्म जैसे मूल अधिकार के साथ खिलवाड़ हुआ. बात सिर्फ क्रियाकर्म की नहीं. बात है अधिकार की. बात है सफेद कफन में लिपटे उस इंसान के हक की. साथ ही जानेंगे कि कैसे इन फिल्मों ने समाज की कुरीतियों को उधेड़ कर रख दिया.

Spotlight

शुरू करने से पहले एक जरूरी बात. लिस्ट में से कुछ फिल्में हमें वरिष्ठ पत्रकार अरविंद दास ने रिकमेंड की हैं. इसके लिए उनका साधुवाद. चलिए शुरू करते हैं.


#1. संस्कार (1970)

डायरेक्टर: पट्टाभिरामा रेड्डी टिकावारपु

यूआर अनंतमूर्ति के इसी नाम से लिखे उपन्यास पर आधारित फिल्म. कर्नाटक का एक छोटा सा गांव. जहां ज्यादातर ब्राह्मण रहते हैं. रूढ़िवादी किस्म के. परंपरा का पालन करने वाले. इसी गांव के दो किरदारों की कहानी है. पहला है प्रणेशाचार्य. वेदपाठी ब्राह्मण. अपने समाज का मुखिया. बस जीवन में मोक्ष प्राप्त करना चाहता है. उसके लिए कुछ भी समर्पित करने को तैयार है. ये रोल निभाया गिरीश कर्नाड ने. दूसरा किरदार है नारायनप्पा. जन्म से ब्राह्मण. लेकिन कर्मों से नहीं. मांस खाता है. दोस्तों के साथ मिलकर शराब पीता है. एक वेश्या के साथ उसके संबंध हैं. गांव के ब्राह्मणों को वो पसंद नहीं. एक दिन अचानक तेज़ बुखार आने की वजह से नारायनप्पा की मौत हो जाती है. किसी का क्रियाकर्म करने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण के पास है. लेकिन गांव का कोई ब्राह्मण उसके शव को हाथ लगाने को तैयार नहीं. मानते हैं कि उसे हाथ लगाने से वे दूषित हो जाएंगे.

Praneshacharya
फिल्म पर मद्रास सेंसर बोर्ड ने बैन भी लगाया था. फोटो – यूट्यूब स्क्रीनशॉट

ऐसे में कोई हल निकालने की जिम्मेदारी आती है प्रणेशाचार्य पर. वो इसका क्या समाधान निकालता है, यही पूरी फिल्म का केंद्र बिंदु है. इस कन्नड फिल्म को आप यूट्यूब पर देख सकते हैं.


#2. ओंतरजली यात्रा (1987)

डायरेक्टर: गौतम घोष

कमल कुमार मजूमदार के उपन्यास ‘महायात्रा’ पर आधारित फिल्म. नैशनल अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म के सम्मान से भी नवाजी गई. कहानी है एक आदमी की. जो बस कुछ दिनों का मेहमान है. उसे एक ज्योतिष बताता है कि मरणोपरांत मुक्ति तभी मिलेगी जब तुम्हारी पत्नी जलती चिता पर सती हो जाए. ये वो समय था जब सती प्रथा खत्म हो चुकी थी. बावजूद इसके उस शख्स का परिवार एक गरीब लड़की को ढूंढ लाता है. कैसे-न-कैसे उसे मना भी लेते हैं. लेकिन श्मशान घाट में रहने वाला शराबी इस घोर अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का फैसला लेता है. सफल हो पाता है या नहीं, इसका जवाब आपको फिल्म में मिलेगा.

Movie Still 1
शत्रुघन सिन्हा भी इस फिल्म का हिस्सा थे.

#3. घाटश्राद्धा (1977)

डायरेक्टर: गिरीश कसरावल्ली

यूआर अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित एक और फिल्म. उडुपा अपने गांव में एक वेदिक पाठशाला चलाते हैं. पैसों की तंगी है. इसलिए ये स्कूल घर से ही चलता है. उडुपा के अलावा घर में उनकी बेटी भी है. यमुना. विधवा है. यमुना स्कूल के ही एक टीचर से प्रेम करती है. प्रेग्नेंट भी है. लेकिन किसी को इसकी खबर नहीं. एक बार किसी काम से उडुपा को शहर जाना पड़ता है. उसके पीछे स्कूल में हालात बिगड़ जाते हैं. और देखते ही देखते पूरे गांव को यमुना की प्रेग्नेंसी के बारे में पता चल जाता है. उडुपा लौटता है. उसे भी इस सब का पता चलता है. फैसला लेता है कि अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार करेगा. पूरा गांव एक तरफ है. दूसरी तरफ अकेली यमुना. क्या कुछ कर पाती है, यही फिल्म की कहानी है. 1977 में रिलीज़ हुई इस फिल्म को तीन नैशनल अवॉर्ड मिले थे.

Yamuna 1
फिल्म ने तीन नैशनल अवॉर्ड अपने नाम किये थे.

#4. ओका ऊरी कथा (1977)

डायरेक्टर: मृणाल सेन

मुंशी प्रेमचंद. हिंदी साहित्य पर उनकी छोड़ी छाप अमिट है. उनकी लिखी अनेकों कहानियों में से एक थी, कफन. जो मृणाल सेन के निर्देशन में बनी इस फिल्म का आधार भी बनी. वेंकईया और किस्तईया. बाप और बेटे. अपनी मस्ती में रहते हैं. दुनियादारी से कोई सरोकार नहीं. मानते हैं कि मेहनत करने वाले किसान मूर्ख हैं. जो अमीरों की खिदमत करने में लगे रहते हैं. इसलिए दोनों को काम-धंधे में कोई दिलचस्पी नहीं. किस्तईया शादी करना चाहता है. निलम्मा नाम की लड़की से. वेंकईया रिश्ते के लिए नहीं मानता. पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर वो निलम्मा से शादी कर लेता है.

Venkaiya
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘कफन’ पर आधारित है ये फिल्म.

शादी के बाद एक दिन निलम्मा की तबियत बिगड़ जाती है. इलाज के अभाव में उसकी मौत हो जाती है. अब समय आता है उसे अंतिम विदाई देने का. उसी की व्यवस्था करने के लिए दोनों बाप-बेटे गांव में निकल पड़ते हैं. ताकि कम-से-कम कफन का कपड़ा तो मिल सके. किस्तईया अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार कर पता है या नहीं, इसका जवाब आपको फिल्म देगी.


#5. तिथि (2015)

डायरेक्टर: राम रेड्डी

‘आप इस फिल्म के किरदारों को भूल नहीं पाएंगे’, ये कहना था ‘गॉडफादर’ के डायरेक्टर फ्रांसिस फोर्ड कोपोला का. 4 जेनरेशंस की कहानी. सबसे पहला सेन्चुरी गौड़ा. गांव में भेड़-बकरियों के साथ टहलकर समय निकालता है. दूसरा, गौड़ा का बेटा गड़प्पा. अपनी मस्ती में मस्त, दुनियादारी की कोई खोज खबर नहीं. तीसरा, गड़प्पा का बेटा थम्मपा. थोड़ा चंट किस्म का आदमी है. थम्मपा का बेटा अभि, चौथा सदस्य. जवानी में मदमस्त अपने गांव की एक लड़की के पीछे पड़ा है. एक दिन गौड़ा की मौत हो जाती है. बेटे को परवाह नहीं, तो क्रियाकर्म की जिम्मेदारी थम्मपा लेता है. चाहता है कि इसी बहाने गौड़ा की 5 एकड़ ज़मीन हथियाकर बेच डालेगा. इस चक्कर में क्या-क्या झोल चलाता है? जब तिथि यानी गौड़ा की डेथ के 11 दिन बाद वाली तारीख आती है, तब क्या होता है. यही फिल्म की कहानी है.

Century Gowda's Funderal
‘द गॉडफादर’ वाले फ्रांसिस कोपोला ने भी फिल्म की तारीफ की थी.

#6. सद्गति (1981)

डायरेक्टर: सत्यजीत राय

सद्गति यानि मोक्ष. मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम से लिखी कहानी पर बनी है ये फिल्म. जो जाति प्रथा के पक्षधरों से सटीक सवाल करती है. दुखिया एक अछूत है. गांव में अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहता है. एक दिन पत्नी पंडित जी के पास जाने को कहती है. ताकि बेटी की शादी के लिए सही मुहूर्त निकलवाया जा सके. बुखार से तपता दुखिया घर से रवाना हो जाता है. पंडित की चौखट पर पहुंचकर, उससे मुहूर्त निकालने के लिए गुहार लगाता है. पंडित पहले तो आनाकानी करता है. फिर बदले में दुखिया को अपने घर का काम करने को कहता है. झाड़ू लगवाता है. चूल्हे के लिए लकड़ी कटवाता है. इस दौरान दुखिया की तबियत और बिगड़ने लगती है. आगे कहानी में जो होता है, वो हम सबके लिए एक प्रश्न चिन्ह छोड़ जाता है.

Behind The Scene
मुंशी प्रेमचंद की कहानी, जिसे स्क्रीन पर उतारा सत्यजीत राय ने. फोटो – satyajitray.org

सत्यजीत राय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में स्मिता पाटील, ओम पुरी, मोहन अगाशे जैसे दिग्गज एक्टर्स ने काम किया था.


#7. दीक्षा (1991)

डायरेक्टर: अरुण कौल

1977 में आई कन्नड फिल्म घाटश्राद्धा का हिंदी रीमेक. एक आदमी के पांच बच्चों की मृत्यु हो जाती है. छठे का जन्म होता है. पश्चाताप के तौर पर वो उस बच्चे को गुरुकुल में छोड़ आता है. गुरुकुल चलाते हैं आचार्य उड़ुप पंडित. साथ में उनकी बेटी यमुना भी रहती है. कहानी में एक और किरदार है, कोगा. छोटी मानी जाने वाली जाति का आदमी. वेद-पुराण की उसे कोई समझ नहीं. इसलिए आचार्य से ये सब सीखना चाहता है. ताकि मोक्ष प्राप्त कर सके. एक दिन आचार्य को शहर जाना पड़ता है. वापस लौटते हैं तो पूरी दुनिया बदल जाती है. पाते हैं कि पूरा गांव उनकी बेटी का बहिष्कार करने को तैयार खड़ा है. ऐसे में वो खुद क्या करते हैं, यही आगे पता चलता है.

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1977 में आई ‘घाटश्राद्धा’ का हिंदी रीमेक. फोटो – यूट्यूब स्क्रीनशॉट

नाना पाटेकर, केके रैना, मनोहर सिंह और राजश्री सावंत जैसे कलाकार इस फिल्म का हिस्सा थे.


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