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वेब सीरीज़ रिव्यू: इल्लीगल सीज़न 2

2020 में वूट पर एक सीरीज़ आई थी, ‘इल्लीगल’. तारीख पर तारीख जैसे लाउड और ओवर द टॉप कोर्टरूम सीन्स से इतर, इस शो ने वास्तविक लीगल प्रोसिडिंग को स्पेस देने की कोशिश की. हालांकि, तुलनात्मक तौर पर इसे ‘सूट्स’ जैसे शोज़ से कंपेयर नहीं किया जा सकता. फिर भी इसे क्लोज़ टू रियलिटी बताया गया. कहानी के सेंटर में थी निहारिका, एक नई लॉयर जिसके लिए इंसाफ और आदर्श जैसे शब्द सिर्फ खोखले वादे नहीं. वो जनार्दन जेटली की लॉ फर्म जॉइन करती है. जनार्दन जेटली यानी जेजे शातिर है, अनुभवी है और धूर्त भी. जेजे की फर्म में काम करने के दौरान निहारिका एक मॉरल डिलेमा में फंसने लगती है. उसकी ड्यूटी और आदर्श उसे विपरीत दिशा में खींचने लगती है. जब बर्दाश्त की हद बढ़ने लगती है तो वो जेजे के ही खिलाफ खड़ी हो जाती है. ऐसे में उसे क्या चैलेंजेस फेस करने पड़ते हैं, ये हमने ‘इल्लीगल’ के सीज़न वन में देखा.

अब वूट पर शो का सेकंड सीज़न आया है. फर्स्ट सीज़न की राइटिंग के हिस्से तारीफें आईं थी, हालांकि कुछ खामियां भी उभर कर निकलीं. सेकंड सीज़न उन खामियों को दूर करने में कितना कामयाब साबित हुआ, यही जानने के लिए मैंने शो देख डाला. क्या अच्छा लगा और क्या नहीं, अब उसी पर बात करेंगे.


# सिर्फ प्लॉट को नहीं, सब प्लॉट्स को भी स्पेस दी है

निहारिका जेजे की फर्म छोड़ देती है, और फर्स्ट सीज़न में अपने कोर्टरूम राइवल रहे पुनीत टंडन के साथ मिलकर एक नई फर्म खोलती है. जिसका उसे हर्जाना भी चुकाना पड़ता है. कहानी शुरू होती है एक इनफ्लुएंसर के मर्डर से, जिसके लास्ट डायल पर निहारिका का नंबर था. न चाहते हुए भी उसे इस केस में इंवॉल्व होना पड़ता है. शो शुरू भले ही इस मर्डर से शुरू होता है. लेकिन आगे निहारिका और भी केसेस पर काम करती है. जैसे एक बड़ी कंपनी जिसका मालिक बैंक लोन को डिफॉल्ट कर गायब हो जाता है. एम्प्लॉईज़ को सैलरी नहीं मिलती. उन सब के बिहाफ पर निहारिका उनका केस लड़ती है.

इस शो ने वास्तविक लीगल प्रोसिडिंग को स्पेस देने की कोशिश की
शो कोर्टरूम ड्रामा को रियलिटी के क्लोज़ रखता है.

अब आगे बात करने से पहले शो की राइटिंग की तारीफ करनी ज़रूरी है, जिसने हर सब प्लॉट को बराबर स्पेस दिया और कहीं भी चीजें कॉम्प्लिकेट नहीं होने दी. माने ऐसा नहीं था कि एक सब प्लॉट दूसरे से ज्यादा ज़रूरी था. जैसे पहले इनफ्लुएंसर के मर्डर पर बात करते हैं. पुलिस जांच में सामनें आता है कि एक स्टॉकर उस लड़की का पीछा कर रहा था. उसे धर लिया जाता है, सामने आता है कि वो एक माइनर है. जिसने उस इनफ्लुएंसर को स्टॉक किया, उसे उलटे-सीधे मैसेज भेजे लेकिन उसके मर्डर में उसका कोई हाथ नहीं था. अब यहां शो मॉरेलिटी की थिन लाइन पर चलता है. जहां सोशल मीडिया वाली जनता स्टॉकर को फांसी पर लटकाना चाहती है. उस लड़के ने जो किया, वो सरासर गलत था. लेकिन क्या डेथ सेंटेंस की मांग करना ज़ायज है, ये ट्रिकी सवाल शो आपसे पूछता है.

शो सोशल मीडिया हेट और स्टॉकिंग कल्चर पर भी बात करता है, कि कैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सिर्फ अपनी एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए किसी भी किस्म का कंटेंट प्रोमोट करने में कोई झिझक नहीं दिखाते. खुद पर बात आती है तो पल्ला झाड़ लेते हैं कि आपने ऐसे कंटेंट पर क्लिक ही क्यों किया, सबको फ्री चॉइस का अधिकार है. लेकिन ये वास्तविकता में फ्री चॉइस का बस भ्रम भर होता है. अभी कुछ समय पहले ऐसे ही मिलते-जुलते आरोप फेसबुक पर भी लगे थे. जहां एक विसल-ब्लोअर ने दावा किया कि सोशल मीडिया जायंट जान-बूझकर नफरत परोस रहा है. ऐसे माहौल में ‘इल्लीगल’ का ये सब प्लॉट काफी रेलेवेंट लगता है.

ये देखने में इंट्रेस्टिंग होता कि निहारिका सच की तह तक कैसे पहुंची
नेहा शर्मा लगातार एक्सपेरिमेंट्स करती जा रही हैं.

शो का एक हिस्सा कोर्टरूम्स में भी बीतता है. जहां अगर आप ओवर द टॉप ड्रामा के आदी हैं, तो निराश होंगे. क्योंकि यहां वकील कोर्टरूम में पुराने केसेज़ को कोट करते हैं, धाराओं की याद दिलाते हैं लेकिन चीर दूंगा-फाड़ दूंगा टाइप रवैया नहीं रखते. अगर आप कोर्ट हियरिंग पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि ये रियलिटी से दूर नहीं. लेकिन ऐसा नहीं है कि शो में सारे प्लस पॉइंट्स ही हैं, अब आपको कुछ नेगेटिव पॉइंट्स के बारे में बताते हैं.


# कुछ तो गड़बड़ है दया

शो के पहले सीज़न से जनता को शिकायत थी कि वहां केस की रिसर्च को फुटेज नहीं दिया. ये देखने में इंट्रेस्टिंग होता कि निहारिका सच की तह तक कैसे पहुंची. जब सेकंड सीज़न आया तो लगा कि ये शिकायत दूर होगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इस बार भी ज्यादातर रिसर्च वाला काम डायलॉग्स में निपटा दिया. ये चेंज किया जा सकता था.

स्टॉक करता, उलटे सीधे मैसेज करता
डायरेक्शन शो का सबसे कमजोर पक्ष साबित हुआ.

इस सीज़न में सबसे ज्यादा खटकने वाली चीज सिर्फ कम रिसर्च नहीं, समस्या उससे गहरी है. ये शो ‘अच्छी राइटिंग जो बुरे डायरेक्शन से जूझ रही है’ का करेक्ट एग्ज़ाम्पल है. अनगिनत मौकों पर आपको कंटीन्यूटी ब्रेक देखने को मिलेंगे, जो किसी भी तरह इंटेंशनल नहीं थे. जैसे एक सीन में निहारिका कॉल पर होती है और उसने इयरफोन्स लगाए होते हैं, पर अगले शॉट में जादू और इयरफोन्स गायब. अगर आप ऐसी गलतियों को इग्नोर भी करना चाहें तो भी नहीं कर सकेंगे. क्योंकि मेकर्स ने ऐसी गलतियां बार-बार की है, जैसे चाहते थे कि ऑडियंस बस स्पॉट करती रहे. एक जगह निहारिका रोड पर दौड़ रही है. एक शॉट में उस रोड पर डिवाइडर है. अगले शॉट में रोड ही अलग. मतलब ये सब अवॉइड किया जा सकता था.


# किरदार बनावटी नहीं, असली लगते हैं

आम तौर पर राइटर्स एक किस्म के किरदार को एक टाइप के कैरेक्टरस्टिक दे देते हैं. जैसे अच्छा इंसान है तो सिर्फ अच्छाई ही करेगा. बुरा है तो बस बुरा, ऐसा नहीं कि वो बुरा आदमी भी किसी के साथ तो अच्छा होगा. ‘इल्लीगल’ उस मामले में डिलीवर कर जाता है. यहां कैरेक्टर्स परफेक्ट नहीं, इसलिए रियल लगते हैं. अपने आदर्शों को ज़रूरत के हिसाब से तोड़ते-मोड़ते रहते हैं.

पीयूष मिश्रा जेजे बने हैं, ऐसा वकील जो अपने फायदे के लिए अपने बच्चों तक को ठग ले. उन्हें हर मिनट स्क्रीन पर देखना एक डिलाइट था. ऐसा इंसान जो हद से ज़्यादा मीठा बोलता है, लेकिन अंदर से उतना ही शातिर है. नेहा शर्मा ने निहारिका का रोल अदा किया. पिछले कुछ समय से वो अपने किरदारों के साथ एक्सपेरिमेंट्स कर रही हैं, और सिर्फ ‘तुम बिन 2’ फ़ेम बनकर नहीं रहना चाहती. यहां उनका काम एक्स्ट्रा ऑर्डिनेरी तो नहीं, लेकिन बुरा भी नहीं. वो डिलीवर कर देती हैं.

बड़े बाप का बेटा
अक्षय ओबेरॉय का कैरेक्टर स्टैंड आउट करता है.

मेरे लिए सबसे ज्यादा अक्षय जेटली का कैरेक्टर स्टैंड आउट करता है. जिसे पहली नज़र में देखकर लगता है कि वो एक मिसफिट है, ऐसी दुनिया में बिलॉन्ग नहीं करता. ज़िंदगी भर बड़े बाप की परछाई में रहा, उससे अलग खुद की कोई पहचान नहीं. इतना बुरा इंसान नहीं जितना उसके पिता की चॉइसेज़ ने उसे बना दिया है. पर अक्षय कोई संत भी नहीं. अपनी ज़रूरत के हिसाब से मैनिप्युलेट करने से भी नहीं कतराता. ‘गुड़गांव’ वाले अक्षय ओबेरॉय ने अक्षय का किरदार निभाया है. उन्हें यहां देखकर कह सकते हैं कि ये उनके करियर की बेस्ट परफॉरमेंसेज़ में से एक है.


# दी लल्लनटॉप टेक

‘इल्लीगल’ सीज़न 2 में कुछ खामियां ज़रूर है, लेकिन फिर भी इसे देखा जा सकता है. एटलीस्ट ये ग्रांड बनने की कोशिश नहीं करता, यही इसकी सबसे अच्छी बात है. फिर बता दें कि ‘इल्लीगल’ सीज़न 2 को आप वूट पर स्ट्रीम कर सकते हैं.


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