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इबारत : गिरफ़्तारी भागने का मौक़ा होने के बाद भी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल भागे क्यों नहीं?

आज शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का जन्मदिन है. रामप्रसाद बिस्मिल का नाम काकोरी केस में सामने आया था. दस क्रांतिकारियों ने मिलकर ट्रेन से अंग्रेज़ों का ले जाया जा रहा रुपया लूट लिया था. इस केस में जब पुलिस ने बिस्मिल को गिरफ़्तार किया तब का किस्सा बड़ा रोचक है. बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि रात भर के जागे पुलिसवाले इन्हें बिना हथकड़ी लगाए ही सो गए थे. सिर्फ़ एक पुलिस मुंशी जागकर लिखा-पढ़ी कर रहा था. बिस्मिल चाहते तो आराम से निकल भागते. लेकिन मुंशी असल में क्रांतिकारी रोशनलाल के रिश्तेदार थे. बिस्मिल ने उन्हें बुलाकर पूछा कि मैं भागने की सोच रहा हूं लेकिन इसके बाद आप पर मुसीबत आएगी. नौकरी जा सकती है. अगर इतना कष्ट सहने को तैयार हो तो मैं निकल जाऊंगा. मुंशी ने बिस्मिल के पांव पकड़ लिए कि अगर वो भाग गए तो उसका परिवार भूखों मर जाएगा. इसलिए बिस्मिल वहीं सुबह तक चुपचाप बैठे रहे.

काकोरी केस में बिस्मिल समेत और भी कई आरोपियों को जेल में रखा गया था. गिरफ़्तारी सबकी हो ही चुकी थी. सिवाय चंद्रशेखर आज़ाद के. बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लखनऊ जेल का एक क़िस्सा बताते हैं. वहां जेलर पंडित चम्पालाल इन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे. बाक़ी क्रांतिकारियों से भी परिवार की तरह पेश आते थे. बिस्मिल ने धीरे-धीरे अपने जेल की सलाखें काट ली थीं. बस अब किसी रात सलाखें उठाकर निकल जाना था. लेकिन क्योंकि सबका विश्वास था कि बिस्मिल कभी जेल से नहीं भागेंगे इसलिए बिस्मिल महीनों तक दुविधा में रहने के बाद नहीं ही भागे.

फांसी की सज़ा होने तक बिस्मिल के पास भागने के कई मौक़े थे. लेकिन बिस्मिल आख़िरकार फांसी की सज़ा पूरी करके ही गए. आज के इबारत में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की लिखी कही वो दस बातें सुनते हैं जो आज भी बिस्मिल की याद दिलाती हैं –

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भारतवर्ष की राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक किसी प्रकार की परिस्थिति इस समय क्रांतिकारी आन्दोलन के पक्ष में नहीं है. कारण? भारतवासियों में शिक्षा का अभाव है.

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भारत की आने वाली शिक्षित पीढ़ी को चाहिए कि वो श्रमजीवी और किसानों को उनके गांवों में जाकर उनकी दशा सुधारें, उन्हें व्यापार की कुछ समझ दें.

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जिस देश में करोड़ों मनुष्य अछूत समझे जाते हों उस देश को स्वाधीन होने का कोई अधिकार नहीं है.

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जब भारत की अधिकांश जनता शिक्षित हो जाएगी, केवल तभी जनता का हर आन्दोलन क़ामयाब होगा और दुनिया की कोई ताक़त उसे दबा नहीं पाएगी.

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अशफाक़उल्ला अगर मुसलमान होकर भी आर्यसमाजी रामप्रसाद के दाहिने हाथ बनकर क्रांति कर सकते हैं, तो क्या भारतवर्ष के हिंदू मुसलमान अपने फ़ायदों का ख्याल छोड़कर एक नहीं हो सकते?

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हिंदू मुस्लिम एकता ही हम लोगों की यादगार और अंतिम इच्छा है, चाहे वो कितनी ही मुश्किलों से हासिल हो.

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मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या ,

दिल की बर्बादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या !

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हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था मां-बाप ने दुःख सह-सह कर

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ये कह – कह कर बसर की उम्र हमने क़ैद-ए-उल्फ़त मेँ
वो अब आज़ाद करते हैँ, वो अब आज़ाद करते हैँ,

सितम ऐसा नहीँ देखा जफ़ा ऐसी नहीँ देखी,
वो चुप रहने को कहते हैँ, जो हम फरियाद करते हैँ…

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बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
लटकते आए अक्सर पैक़रे ईसार फांसी से,

लब-ए-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से…


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