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फिल्म रिव्यू- हम दो हमारे दो

बड़े दिनों के बाद एक ऐसी फिल्म देखने को मिली है, जिसे टोटल पैसा वसूल कहा जा सकता है. डिज़्नी+हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई इस फिल्म का नाम है ‘हम दो हमारे दो’. रिवायती तौर पर अगर इसकी कहानी बताएं, तो ये कमोबेश विक्रांस मैस्सी और कृति खरबंदा की पिछले दिनों रिलीज़ हुई फिल्म ’14 फेरे’ टाइप है. ध्रुव और आन्या नाम के दो लोग प्यार में पड़ते हैं. मगर आन्या को जीवन में एक ऐसा लड़का चाहिए, जिसकी प्रॉपर फैमिली हो. मगर अपना हीरो यानी ध्रुव अनाथ है. ऐसे में वो दो लोगों को ढूंढता है, जो उसके माता-पिता का रोल कर सकें. ताकि आन्या से उसकी शादी हो सके. वो दो लोग हैं पुरुषोत्तम और दीप्ति. सालों पुराने बिछड़े हुए प्रेमी. जो अब भी एक-दूसरे के प्यार और साथ होने के इंतज़ार में हैं. फाइनली सब सेट हो जाता है. ध्रुव, आन्या से शादी के लिए छोटा और सुखी परिवार बना लेता है. मगर ये सब लोग एक-दूसरे के साथ सिंक में नहीं हैं. हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने-अपने रोल को अप्रोच कर रहा है. साथ ही इस नाटक में शामिल होने की सबकी अपनी-अपनी वजहें और एजेंडा है.

जब एक ही विषय पर एक से ज़्यादा फिल्में बनती हैं, तो उनकी तुलना होना लाज़िमी है. ’14 फेरे’ अपने विषय को सही से हैंडल नहीं कर पाई थी. बड़ी हॉचपॉच और कंफ्यूज़िंग फिल्म बन गई थी. मगर ‘हम दो हमारे दो’ अपने कॉन्सेप्ट और आइडिया को लेकर बड़ी क्लीयर लगती है. कई बार ऐसा होता है कि लिखते समय पेपर पर चीज़ें बड़ी सुलझी हुई लगती हैं मगर परदे पर वो वैसे उतर नहीं पातीं. ये चीज़ आपको ‘हम दो हमारे दो’ में नहीं दिखेगी. यही चीज़ इस फिल्म के फेवर में काम करती है.

फिल्म 'हम दो हमारे दो' का पोस्टर.
फिल्म ‘हम दो हमारे दो’ का पोस्टर.

‘हम दो हमारे दो’ क्लीन फैमिली एंटरटेनर है. आज कल कॉमेडी के नाम पर हमें फिल्मों में भौंडापन और जबरदस्ती के ठूंसे हुए जोक्स देखने को मिलते हैं. मगर ‘हम दो हमारे दो’ पूरी तरह सिचुएशनल कॉमेडी पर फोकस करती है. इसे जितने अच्छे से लिखा गया है, उसे कैमरे पर उतनी ही खूबसूरती से निभाया गया है. वैसे तो इस फिल्म में राजकुमार राव और कृति सैनन ने लीड रोल्स किए हैं. मगर इस फिल्म को पूरी तरह से परेश रावल और रत्ना पाठक शाह ओन करते हैं. परेश रावल ने पुरुषोत्तम के रोल में कमाल का परफॉर्म किया है. कॉमिक टाइमिंग के मामले में अब भी परेश रावल का हाथ पकड़ पाना किसी एक्टर के बस की बात नहीं है. ये आदमी जिस महिला के साथ प्रेम में है, उसकी शादी हो चुकी है. ये आज भी उम्मीद और गिल्ट में जिए जा रहा है. पुरुषोत्तम, 10 साल से दीप्ति के शहर में डेरा डाले हुए है. उसका पास्ट दोबारा उसके पास जाने से उसे रोक रहा है. उसके जीवन का इकलौता मक़सद है, दीप्ति को वापस पाना है. जबकि दीप्ति समय के साथ आगे बढ़ चुकी है. नियति और ध्रुव इन दोनों को एक बार फिर साथ लाते हैं.

अपना पहला प्रेमी जोड़ा यानी आन्या और ध्रूव.
अपना पहला प्रेमी जोड़ा यानी आन्या और ध्रूव.

ध्रुव बने हैं राजकुमार राव. जब मैं ये फिल्म देखने जा रहा था, उससे पहले दफ्तर में मैंने हमारे साथी निखिल जी के सामने इस फिल्म का ज़िक्र किया. उन्होंने इस फिल्म का नाम सुनते ही कहा- ‘ये राजकुमार राव टाइप की फिल्म है क्या’. इससे ये पता चलता है कि राजकुमार राव लगातार एक ही तरह के रोल्स कर रहे हैं. राज देश के सबसे अच्छे एक्टर्स में गिने जाते हैं. उनके लिए इस तरह के रोल्स करना कोई बड़ा चैलेंज नहीं है. कृति सैनन ने उनकी लव इंट्रेस्ट आन्या मेहरा का किरदार निभाया है. एक ट्रैजिक सी बैकस्टोरी वाली मगर लाइफ को फुल ऑन एंजॉय करने वाली लड़की. ये किरदार इस फिल्म का कैटलिस्ट है, जिसकी वजह से चीज़ें घटनी और बदलनी शुरू होती हैं. ‘मीमी’ के बाद से कृति में अच्छा-खासा इंप्रूवमेंट देखने को मिल रहा है. हालांकि ‘हम दो हमारे दो’ उस तरह की फिल्म है, जो लीड और सपोर्टिंग स्टारकास्ट का फर्क खत्म कर देती है. आपके कथित हीरो-हीरोइन कब बैकग्राउंड में चले जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता. इन चारों के अलावा फिल्म में अपारशक्ति खुराना और मनुऋषि चड्ढा भी नज़र आए हैं. मनु ने कॉमेडी से हटकर थोड़ा कुछ किया है, जो बढ़िया लगता है. मगर अपारशक्ति खुराना अपने अपार टैलेंट को हीरो का बेस्ट फ्रेंड बनकर लगातार ज़ाया कर रहे हैं. उनकी पिछली फिल्में उठाइए और उनके किरदारों में ‘अंतर बताओ तो जाने’ वाला गेम खेलकर देखिए. मामला साफ हो जाएगा.

दूसरा कपल यानी पुरुषोत्तम और दीप्ति.
अपना दूसरा कपल यानी पुरुषोत्तम और दीप्ति.

‘हम दो हमारे दो’ एक स्वीट सी रॉम-कॉम है. इससे आप कुछ बहुत गंभीर या आपका जीवन बदल देने वाली बात कहने की उम्मीद नहीं करते. मगर आज के समय में एक ढंग की रोमैंटिक कॉमेडी का भी अकाल पड़ा हुआ है. क्योंकि हर फिल्म में आपको एक प्रासंगिक और स्टिग्मा संबंधित मसला उठाना पड़ता है. उसे कॉमेडी में पिरोना पड़ता है. वो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर परफॉर्म करती हैं. तो ये एक खांचा सा बन गया है. ‘हम दो हमारे दो’ उस खांचे को तोड़ने की कोशिश नहीं करती. ना ही बहुत अलग करने की कोशिश करती है. बस ये फिल्म जो करना चाहती है, उसे अच्छे से करती है. यही इसकी यूएसपी है.

हीरो और हीरोइन को पिताओं का मिलन. फिल्म में ये रोल्स परेश रावल और मनु ऋषि चड्ढा ने किया है. कमाल की बात कि ये दोनों ही असली पिता नहीं हैं.
हीरो और हीरोइन को पिताओं का मिलन. फिल्म में ये रोल्स परेश रावल और मनु ऋषि चड्ढा ने किया है. कमाल की बात कि ये दोनों ही असली पिता नहीं हैं.

सिनेमा को दो तरीके से देखा जाता है. पहला, सिनेमा समाज के आइने के रूम में काम करता है. यानी समाज में जो हो रहा है, उसे दिखाता है. सिनेमा की दूसरी डेफिनेशन ये भी है कि ये लोगों को रियलिटी से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां सबकुछ अच्छा-अच्छा होता है. यानी खालिस एंटरटेनमेंट. ‘हम दो हमारे दो’ इन दोनों ही पैमानों पर खरी उतरती है. वो सोसाइटी में होने वाली चीज़ें दिखाकर हमें एंटरटेन करती है. हम ये नहीं कह सकते कि ये परफेक्ट फिल्म है. क्योंकि सबका परफेक्ट अलग-अलग होता है. सिंपल फंडा ये है कि जो चीज़ आपको अच्छा महसूस करवा रही है, वो अच्छी है. ‘हम दो हमारे दो’ एक दर्शक के तौर पर मुझे फील गुड करवा पाई.

हैप्पी एंडिंग से ऐन पहले की बात.
हैप्पी एंडिंग से ऐन पहले की बात. वो कहते हैं न मोमेंट्स बिफोर डेस्ट्रक्शन.

फिल्म के डायलॉग्स बिल्कुल ही बोलचाल की भाषा में हैं. सुनकर ऐसा लगता है कि जो बोला जा रहा है, उस सिचुएशन में आप भी वैसा ही कुछ बोलते. बैकग्राउंड म्यूज़िक बड़ा सॉफ्ट सा है, जो कानों को अच्छा लगता है. फिल्म का म्यूज़िक बिल्कुल फॉर्मूला के मुताबिक है. एक रोमैंटिक, एक फैमिली, एक सैड और एक पार्टी सॉन्ग. आप इस बफे में से चुन लीजिए, आपको क्या कंज़्यूम करना है.

ओवरऑल ‘हम दो हमारे दो’ एक सिंपल फिल्म है, जो अपनी टार्गेट ऑडियंस को कायदे से केटर करती है. आपको जो वादा करती है, वो डिलीवर करती है. हो सकता है इसे देखने के बाद आप लंबे समय तक याद न रख पाएं. मगर जितनी देर ये फिल्म चलती है, वो समय आप एंजॉय करते हैं.

‘हम दो हमारे दो’ को आप डिज़्नी+हॉटस्टार पर स्ट्रीम कर सकते हैं.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- भवाई

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