Submit your post

Follow Us

होटल मुंबई: मूवी रिव्यू

मुंबई के फाइव स्टार होटल के एक आलिशान रूम में एक आतंकवादी बेतहाशा कराह रहा है. उसके पैर में गोली लगी है. वो जानता है कि वो ज़्यादा देर ज़िन्दा नहीं रहने वाला. उसके इर्द-गिर्द लाशों के ढेर लगे हैं. ये वो लोग हैं जिनका इस आतंकवादी ने अपने बाकी साथियों के साथ मिलकर क़त्ल किया है. कुछ लोगों को इन्होने बंदी भी बनाया हुआ है. ये चोटिल आतंकवादी होटल के लैंडलाइन से अपने घर, पाकिस्तान कॉल लगाता है. अपने बाप से उसे पता चलता है कि इस हमले के लिए जिन पैसों का वादा उससे किया गया था, वो पैसे उसके घर वालों को अब तक नहीं मिले. लेकिन वो तो अब उस रास्ते पर चल पड़ा है, जहां से वापस आना नामुमकिन है.

अब वो क्या करेगा? मुंबई हमले (26/11) से जुड़े इस और इस जैसे कई मुश्किल सवालों के दिल दहला देने वाले जवाबों का कोलाज है मूवी ‘होटल मुंबई’.

# कहानी-

फिल्म की शुरुआत मुंबई के एक गंदे से बीच से होती है, जहां पाकिस्तान से आए दस आतंकवादी अपनी नाव से उतरते हैं. ये सभी फोन पर एक कॉमन लीडर से आदेश पा रहे हैं. लीडर जो शायद पाकिस्तान में है. आदेश आता है कि कई टुकड़ियों में बंटकर मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में कत्ले आम मचा दो. उसके बाद एक बार जब ये आंतकवादी ग्रुप्स में बंट जाते हैं तो बाकी सब की स्टोरी ब्रीफ में खत्म करके मूवी सिर्फ मुंबई के ‘ताज होटल’ पर फोकस करने लगती है.

ताज होटल. यहां एक सिख वेटर अर्जुन जैसे-तैसे सही समय पर स्टाफ हर्डल में पहुंच पाया है. हर्डल में हेड शेफ हेमंत ओबेरॉय उसे जूते न पहनकर आने की वजह से भगा ही देता, लेकिन उसकी रिक्वेस्ट से पसीजकर अंततः उसे एक जोड़ी स्पेयर जूते दे देता है. होटल में गेस्ट आ जा रहे हैं. कुछ वीआईपी, कुछ विदेशी, कुछ राजनेता. इतने में लोगों के छोटे से झुंड के बीच आंतकवादी भी अंदर घुस जाते हैं. जहां एक तरफ ये आंतकवादी बिना कुछ देखे-जाने, जो कोई भी समाने आए, या फिर खोज-खोजकर लोगों को मारने में लगे हैं. दूसरी तरफ होटल का अधिकतर स्टाफ अपनी जान की चिंता किए बगैर गेस्ट्स को बचाने में लग जाता है. दिक्कत ये है कि प्रोफेशनल रेस्क्यू टीम दिल्ली में है जिसे आने में अभी ‘घंटों’ हैं.

मुंबई बीच की ओर जाते पाकिस्तानी आतंकवादी. इस दौरान उनका अपने सरदार से कम्यूनिकेशन चालू रहता है.
मुंबई बीच की ओर जाते पाकिस्तानी आतंकवादी. इस दौरान उनका अपने सरदार से कम्यूनिकेशन चालू रहता है.

इसके बाद ये मूवी, होटल स्टाफ और होटल गेस्ट्स की सर्वाइवल स्टोरी बन जाती है. सामान्य लोगों की असामान्य परिस्थितियों में दिखाई हिम्मत की दास्तां बन जाती है. मारे जाने वालों की स्टेटिस्टिक्स, उनकी गिनती जैसे हद असंवेदनशील शै के बदले मानवीय पहलू दिखाने वाला एक ज़िंदा इमोशन बन जाती है.

# कुछ फैक्ट्स-

ये मूवी ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और भारत ने मिलकर प्रोड्यूस की है. 2009 में आई ‘सरवाइविंग मुम्बई’ नाम की डॉक्यूमेंट्री से इंस्पायर्ड ‘होटल मुंबई’ इंडिया में तो 29 नवंबर, 2019 को रिलीज़ हो रही है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में ये मार्च में ही रिलीज़ हो चुकी है. प्रिवेसी को ध्यान में रखते हुए मूवी में कोई भी कैरेक्टर 26/11 वाले इंसिडेंट के रियल सर्वाइवल पर बेस्ड नहीं है लेकिन इन लोगों ने तब जो झेला उससे मूवी काफी, या यूं कहें पूरी तरह इंस्पायर्ड है.

# डिटेलिंग और रिसर्च-

फिल्म का सबसे उजला पक्ष इसकी डिटेलिंग है. खबर आई थी कि फिल्म के डायरेक्टर एंथनी मरास और फिल्म के सह-लेखक जॉन कोली ने पुलिस, होटल ताज के स्टाफ और सरवाइवर्स के बीच फोन पर हुई वास्तविक बातचीत को सुनकर फिल्म के डायलॉग्स लिखे हैं. ताकि घटना को फिल्म में वैसा का वैसा दिखाया जा सके और डायलॉग्स असली लगें.

लेकिन डिटेलिंग यहीं पर खत्म नहीं होती. मुंबई के बीचेज़ की गंदगी से लेकर एक फ्रेंच वाइन के सही उच्चारण तक ये डिटेलिंग, ये परफेक्शन का आग्रह, दर्शकों को काफी प्रभावित करेगा.

ठीक शिफ्ट शुरू होने से पहले होने वाली हर्डल में अर्जुन लेट हो जाता है. इस हर्डल में नाख़ून, जूते और बाकी पर्सनल हाईजीन चेक करना बड़े ही रियल ढंग से दिखाई गई है.
ठीक शिफ्ट शुरू होने से पहले होने वाली हर्डल में अर्जुन लेट हो जाता है. इस हर्डल में नाख़ून, जूते और बाकी पर्सनल हाईजीन चेक करना बड़े ही रियल ढंग से दिखाया गया है.

होटल इंडस्ट्री से आने के कारण मुझे पता है कि वहां के ट्रेड सीक्रेट्स क्या होते हैं. ये सब फिल्म में काफी हद तक जस के तस दिखाए गए हैं. जो बिना रिसर्च के संभव ही नहीं थे. वो सीन जब होटल मैनेजर लॉबी स्टाफ को ब्रीफ देता है कि किस गेस्ट को कैसे विश करना है. वहां पर भी ये डिटेलिंग देखकर एक प्रोफेशनल होटलियर के मुंह से भी वाह निकल सकती है.

होटल ताज के मुंबई और ऑस्ट्रेलिया में बनाए गए सेट्स, 26/11 की कुछ रियल फुटेजेज़, सभी कैरेक्टर्स का अपनी नेटिव लेंग्वेज में बात करना और स्टाफ के कॉस्टयूम्स जैसी कई चीज़ें हैं जो मूवी को रियल्टी के और करीब लाती हैं. किसी वैल रिसर्चड डॉक्यूमेंट्री में अगर इमोशन डाल दिए जाएं तो जो प्रोडक्ट बनेगा वो यकीनन ‘होटल मुंबई’ होगा.

# माइक्रोस्कॉपिक-

26/11 से जुड़ी इतनी घटनाएं, इतनी कहानियां हैं कि अगर सबको पर्याप्त समय दिया जाए तो एक वेब सीरीज़ तैयार हो जाए. लेकिन ये मूवी अपने को इतना नहीं फैलाती कि समेटना मुश्किल हो जाए. जैसा मेरे द्वारा देखी गई पिछली मूवी ’पागलपंती’ में हो गया था.

याद रखिए कि आप माइक्रोस्कोप और टेलिस्कोप में से दोनों होना नहीं चुन सकते. ये फिल्म भी दोनों होने का प्रयास नहीं करती. शुरू से अंत तक माइक्रोस्कॉपिक ही बनी रहती है. ये 26/11 की नहीं सिर्फ ‘ताज होटल’ की बात करती है. उसमें भी उसके आफ्टर मेथ या सिक्यूरिटी ऑपरेशन की नहीं.

# तटस्थता की हिपोक्रेटिक ओथ-

ये मूवी किसी का पक्ष नहीं लेती. लेकिन चूंकि सब कुछ जस का तस परोस देती है तो आप इमोशनली और इंटलेक्चुअली कन्फ्यूज़ नहीं होते और अपने इमोशन्स को सही जगह और सही कैरेक्टर्स पर इंवेस्ट करते हो. यानी ये मूवी इतनी आसान भी नहीं कि आप इसमें अच्छे और बुरे को ठीक-ठीक पॉइंट आउट कर सकें लेकिन इतनी विवादास्पद भी नहीं कि किसी ‘बहस’ के लिए एपेटाइज़र का काम कर सके.

अनुपम खेर का ये रोल उनके 'अ वेंसडे' के रोल की यद् दिलाता है.
अनुपम खेर का ये रोल उनके ‘अ वेंसडे’ के रोल की यद् दिलाता है.

आपको होटल स्टाफ में भी कुछ कम अच्छे लोग बेशक नज़र आएंगे, लेकिन आप उनके लिए भी दुखी होंगे. आप आतंकवादियों के भी कुछ इमोशंस से इत्तेफाक रखेंगे, लेकिन हमदर्दी नहीं. गेस्ट्स की भी कुछ चीज़ें हैं जो आपको नाग़वार गुजरेंगी, लेकिन उनके लिए आपकी हमदर्दी कम नहीं होगी.

# मिनिमलिस्टिक एप्रोच-

जिन लोगों को ये लगता है कि मिनिमलिस्टिक एप्रोच का मतलब न्यूनतम एफर्ट्स का लगना होता है, उन्हें ये मूवी देखनी चाहिए. ताकि पता लगे, मिनिमलिस्टिक एप्रोच का अर्थ होता है नेपथ्य में चाहे कितने ही जतन किए गए हों, कितनी ही भसड़ मची हो, लेकिन स्टेज में आपका प्रोजेक्ट क्लीन दिखे. आप इतना दिमाग लगा चुकें हों कि जो आपका कंटेट कंज्यूम कर रहा उसे न लगाना पड़े. मूवी में होटल के नक्शे से लेकर मुंबई के स्लम्स तक में ये मिनिमलिस्टिक एप्रोच साफ़ दिखती है.

# इमोशन कोशेंट-

‘होटल मुम्बई’ में हर किसी एक्टर का खुद के अलावा भी कोई न कोई बड़ा कंसर्न है. यही चीज़ फिल्म का इमोशन कोशेंट बढ़ाती है. किसी दाई को किसी और का बच्चा अपनी जान से ज़्यादा प्यारा है. अनुपम खेर का कैरेक्टर हेड शेफ अपने से ज़्यादा अपने गेस्ट्स की चिंता करता है.

डायरेक्शन और कैमरा एंगल ऐसे हैं कि कई बार आप अपने को घटनाओं का हिस्सा मानने लगते हो. जैसे घबराहट और भगदड़ दिखाता सीढ़ियों से उतर रहे लोगों के पीछे कैमरा शेक करते हुए दौड़ता है. आतंकवादियों से छुपे हुए किसी कैरेक्टर का डर दिखाने के लिए कैमरा वहां रख दिया जाता है जहां से दर्शक भी वही और वैसे ही देख पा रहे हैं जो और जैसे वो छुपा हुआ कैरेक्टर.

एडिटिंग के चलते सीन इतने अप्रत्याशित हो जाते हैं कि डर, घबराहट स्क्रीन से बाहर आप तक आ ही जाता है. तब जबकि घटनाएं रियल्टी पर बेस्ड हैं और इसलिए आपको बहुत हद तक पता है कि आगे क्या होने वाला है. जैसे सीएसटी (छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) पर हमला करने से पहले आंतकवादियों की तैयारी जो टेंशन बिल्ड करती है, वो गोलियों की बौछार वाले सीन पर जाकर उबाल मारने लगती है.

कत्ले आम चल रहा है और एक आतंकवादी ‘अलिफ़ अल्ला चंबे दी बूटी’ गा रहा है. ये काउन्टर इंटीयूटिव एप्रोच भी एक उदासीनता का वायस बनती है. इसमें कोई म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट नही यूज़ किया गया है. गोया बाथरूम सिंगिंग की तरह गुनगुनाया भर गया है. क्लाइमेक्स के वक्त का बैकग्राउंड म्यूज़िक भी कम ‘जानलेवा’ नहीं है.

अनुपम खेर ने अपने रोल को ठीक वैसे निभाया है जैसे ‘अ वेंसडे’ में निभाया था. कोई फ़ालतू एक्सप्रेशन, कोई फ़ालतू लाइन नहीं. वो अपनी एक्टिंग में इतने प्रोफेशनल हैं कि उनका कैरेक्टर भी अपने काम में प्रोफेशनल लगता है. कई एकेडमी अवार्ड्स जीत चुकी मूवी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाले देव पटेल, इस मूवी में अर्जुन बने हैं, अर्जुन की एक छोटी बच्ची है और उसकी वाइफ भी प्रेगनेंट है. अर्जुन का कैरेक्टर हो या उस आतंकवादी का जो पाकिस्तान कॉल करता है, कोई भी प्लास्टिक नहीं है. अच्छे हों या बुरे, इमोशंस हर मेन एक्टर में है.

# फ़िल्मी एप्रोच-

किसी की ज़िंदगी बचाने के लिए एक सिख का अपनी पगड़ी उतार देना, किसी सिख को पगड़ी के चलते आंतकवादी या उनसे मिला हुआ समझ लेना, ग़लत समय पर फ़ोन की बैटरी खत्म हो जाना या बैटरी ख़त्म होने से ठीक पहले आवश्यक बातें हो जाना, किसी दुर्दांत अपराधी का सिर्फ इश्वर का नाम ले-लेने भर से हृदय परिवर्तन हो जाना जैसे कुछ फ़िल्मी क्लिशे हैं जो थोड़ा खटकते हैं. किसी अन्य फिल्म में होते तो न खटकते लेकिन वो कहते हैं न कि चादर जितनी सफेद हो दाग उतनी आसानी से दिखते हैं.

# एक डायलॉग जो दिक्कत भरा है-

एक प्लेबॉय टाइप का रशियन कैरेक्टर, एक लड़की को प्रभावित कर रहा है. इसके चलते वो उस बूढ़ी औरत के बारे में कुछ अपशब्द बोलता है जिससे इस लड़की की लड़ाई हुई है- She has not been Fucked for 10 years.

जब कैमरा घटनाओं के बदले लोगों पर फोकस होता है, तो एक्टिंग और एस्प्रेशंस साफ़ दिखते हैं. और प्रभावित करते हैं.
जब कैमरा घटनाओं के बदले लोगों पर फोकस होता है, तो एक्टिंग और एस्प्रेशंस साफ़ दिखते हैं. और प्रभावित करते हैं.

हालांकि ये किसी कैरेक्टर के ही विचार हैं, लेकिन फिर भी किसी औरत के फ्रस्टेशन को उसे सेक्स न मिल पाने से जोड़ना एक बहुत ही घटिया पूर्वाग्रह है. इसको हटा दिया जाता तो भी न उस किरदार के चित्रण में और न ही फिल्म के नैरेशन में इत्ता सा अंतर आता.

# सब्जेक्ट-

ऐसे सब्जेक्ट्स पर इतनी ब्रूटल फिल्म, पिक्चर हॉल के लिहाज से बननी चाहिए या नहीं ये एक बड़ी बहस हो सकती है. लेकिन ये ज़रूर है कि ऐसी फ़िल्में सबके लिए, और हर एक समय के लिए नहीं होतीं.

‘पॉपकॉर्न’, ‘इंटरटेनमेंट’, ‘पैसा वसूल’ जैसे शब्दों से आप इसे टैग नहीं कर सकते. और ये सारे टैग हटते ही फिल्म आम दर्शकों से हटकर एक ख़ास छोटे समूह के लिए हो जाती है. सवाल ये भी है कि On a scale of ‘Ice Age’ to ‘Saw’ आपके हाजमे का लेवल क्या है? ‘होटल मुंबई’ एक ऐसी मूवी है जो अच्छी है लेकिन जिसके लिए आप ‘अच्छी’ कहने में भी गिल्ट कॉन्शियस हो जाते हो.

# अंततः-

मूवी के पीछे की रियल स्टोरी जितनी हिला देने वाली है उतना ही उसका ‘होटल मुंबई’ के रूप में एडॉप्शन. यूं ‘होटल मुंबई’ आप तीन तरह से देख सकते हो. अगर आपको 26/11 के बारे में कुछ भी नहीं पता तो बेसिक जानकारी लेने के लिए. अगर आपको थोड़ा बहुत पता है तो उसका नाट्य रूपांतरण देखने के लिए. और अगर आप 26/11 के बारे में सब कुछ जान चुके हैं तो ये जानने के लिए कि आखिर इसमें चीज़ें रियल्टी को कितना और कैसे मिमिक करती हैं.


वीडियो देखें:

शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन ‘कहानी’ वाले बॉब बिस्वास पर फिल्म बना रहे हैं-

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

10 नंबरी

जब प्रेमचंद रुआंसे होकर बोले, 'मेरी इज्जत करते हो, तो मेरी ये फिल्म कभी न देखना.'

वो 5 मौके जब हिंदी के साहित्यकारों ने हिंदी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाई.

अक्षय ने 1.5 करोड़ डोनेट किए, अब शाहरुख़-सलमान समेत इन 5 एक्टर्स की चैरिटी भी जान लो

कुछ एक्टर्स तो दान-पुण्य करके उसके बारे में बात करना भी पसंद नहीं करते.

पवन सिंह का होली वाला नया गाना 'कमरिया' ऐसा क्या खास है, जो यूट्यूब की ऐसी-तैसी हो गई?

लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि कौन-कौन से बॉलीवुड सुपरस्टार्स हैं, जिन्होंने भोजपुरी फिल्मों में काम किया है.

अभिजीत सावंत से सलमान अली तक, अब क्या कर रहे हैं इंडियन आइडल के ये विनर?

कई विनर्स तो म्यूजिक इंडस्ट्री से पूरी तरह से गायब हो चुके हैं.

श्रीदेवी के वो 11 गाने, जो उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेंगे

इन गानों ने आज ख़ुशी देने की जगह रुला दिया है.

ट्रंप जिस कार को लेकर भारत आए हैं, उसकी ये 11 खासियतें एकदम बेजोड़ हैं

ट्रंप की इस कार का नाम है- The Beast.

आयुष्मान खुराना और जीतू से पहले ये 14 मशहूर बॉलीवुड एक्टर्स बन चुके हैं समलैंगिक

'शोले' से लेकर 'दोस्ती' मूवी के बारे में कुछ समीक्षक और विचारक जो कहते हैं, वो गे कम्युनिटी को और सक्षम करता है.

कैसा होता है अमेरिकी राष्ट्रपति का विमान 'एयर फोर्स वन', जिसका एक बार उड़ने का खर्चा सवा करोड़ है!

न्यूक्लियर अटैक हुआ, क्या तब भी राष्ट्रपति को बचा ले जाएगा ये विमान?

'उड़ी' बनाने वाले अब कंगना को लेकर धांसू वॉर मूवी 'तेजस' बना रहे हैं

जानिए मूवी से जुड़ी 5 ख़ास बातें.

कौन थे वेंडल रॉड्रिक्स, जिन्होंने दीपिका को रातों-रात मॉडल और फिर स्टार बना दिया?

वेंडल रॉड्रिक्स नहीं रहे.