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हॉस्टल डेज़: वेब सीरीज़ रिव्यू

सब कुछ सेट? हो गई मम्मी से बात? रूम सेट हो गया? पेट भरा हुआ है? इंटरैक्शन शुरू करें? चल शुरू हो जा…

ये बात हॉस्टल का एक सीनियर वहां आने वाले एक नए लड़के से कहता है. और ये ‘हॉस्टल डेज़’ का पहला डायलॉग है. जिससे पता चलता है कि हम आगे क्या देखने वाले हैं.

हॉस्टल डेज़. एक मिनी वेब सीरीज़ है. बीते साल दिसंबर में रिलीज़ हुई. अमेज़न प्राइम पर. इसमें कुल पांच एपिसोड हैं. हर एपिसोड लगभग 20 से 30 मिनट का. और इसे प्रोड्यूस किया है द वायरल फीवर यानी TVF ने. इससे पहले TVF ‘पिचर्स’, ‘ट्रिपलिंग’ और ‘परमानेंट रूममेट्स’ जैसे चर्चित सीरीज़ बना चुका है.

# कहानी-

NATTI नाम का एक इंजीयरिंग कॉलेज है. इसके हॉस्टल में कई नए फर्स्ट इयर के छात्र आते हैं. इनमें से तीन एक ही रूम शेयर करते हैं.

# 1) रुपेश भाटी. जैसे कि वो खुद ही अपना परिचय देता है- अनुक्रमांक 170037. चयन यांत्रिक अभियांत्रिकी (मेकैनिकल इंजीनियरिंग) के 4 वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में हुआ है. और अभिरुचियां हैं- दंड पेलना, कब्ज़े वाले प्लॉट छुड़ाना और अच्छे फूटे वाला सांड ढूंढ के अपने गाय का मैथुन करवाना.

# 2) चिराग़ बंसल. कंप्यूटर साइंस. अस्थमा की प्रॉब्लम है. ‘अबे’ और ‘साले’ के अलावा कोई और गाली नहीं आती. कंप्यूटर साइंस.

# 3) अंकित पांडे. तीनों में सबसे मेन या लीड कैरेक्टर. सिविल. रैंक- पचपन सौ दो. उसकी दिक्कत ये कि उसे लगता है वो हॉस्टल की कोई मैमोरी नहीं बना पाएगा. क्यूंकि हॉस्टल में उसकी कोई आइडेंटिटी, कोई पहचान नहीं बन पा रही.

साथ में एक चौथा किरदार भी है. जतिन. एग्रीकल्चर इंजीरियरिंग. इनके बगल वाले रूम में रहता है. हालांकि वो भी फर्स्ट इयर का स्टूडेंट है लेकिन जैसा उसका एक चेला बताता है,

जतिन जी ने 2014 में पहला एंट्रेस एग्ज़ाम दिया. मित्रों का सेलेक्शन हो गया, पर एडमिशन जतिन ने भी ले लिया. कॉलेज में नहीं, हॉस्टल में. फिर दारु सुट्टा बेचकर कमाए पैसों, मित्रों के मेस कार्ड और 7 जाली आई कार्ड की बदौलत इन्होंने इसी हॉस्टल में रहते हुए मात्र 4 सालों में ये एंट्रेस एग्ज़ाम फोड़ दिया.

इसलिए उसकी दबंगई चलती है.

हॉस्टल डेज़ की स्टोरी इन्हीं चार लोगों, उनके हॉस्टल और कॉलेज के अनुभव के इर्द-गिर्द घूमती है. हर एपिसोड में हॉस्टल से जुड़ा एक नया कॉन्फ्लिक्ट, एक नया मुद्दा है. यूं, पढ़ाई, प्रेम, रैगिंग (सॉरी इंटरैक्शन), एग्ज़ाम और दोस्ती का देजा-वू है ‘हॉस्टल डेज़’.

# अच्छी बातें-

हॉस्टल डेज़ के डायरेक्टर राघव सुब्बू को वेब कॉन्टेंट का काफी अनुभव हो चुका है. उनकी ‘कोटा फैक्ट्री’ भी काफी पसंद की गई थी. अपने यूनिक ट्रीटमेंट के चलते. इस सीरीज़ के भी कुछ टेक्निकल पहलू काफी यूनीक हैं. जैसे-

# जब दो लोग वॉट्सऐप पर बात कर रहे हैं तो दोनों एक ही जगह पर आ जाते हैं. इस दौरान ये देखना भी इंट्रेस्टिंग है कि कैसे कई बार किसी मैसेज को रिसीव करने वाला उसके मायने कुछ के कुछ निकाल लेता है.

# हर एपिसोड में एक नया नैरेटर है. कोई ‘साइड कैरेक्टर’. जैसे सिक्यूरिटी गार्ड, लैब असिस्टेंट, स्वीपर या बुक शॉप का दुकानदार.

# ब्लैकबोर्ड को ट्रांसपैरेंट दिखाकर दूसरी तरफ से शूट करना.

लेफ्ट में वो सीन जहां पर ब्लैकबोर्ड से पीछे वीडियो रखा गया लगता है. राईट में वो सीन जहां पर किरदार व्हाट्सएप पर बात करते-करते एक दूसरे के करीब आ जाते हैं.
लेफ्ट में वो सीन जहां पर ब्लैकबोर्ड से पीछे वीडियो रखा गया लगता है. राईट में वो सीन जहां पर किरदार वॉट्सऐप पर बात करते-करते एक दूसरे के करीब आ जाते हैं.

चारों ही लीड एक्टर्स ने नैचुरल एक्टिंग की है. फिर चाहे अंकित के रोल में आदर्श गौरव हों या चिराग बंसल के रोल में लव. लेकिन जतिन और रुपेश के किरदार सेकेंड लीड में होते हुए भी सबसे ज़्यादा वाहवाही लूट ले जाते हैं. और इनको प्ले करने वाले एक्टर्स निखिल विजय और शुभम गौर भी.

शो में ज़्यादा तामझाम नहीं हैं. मतलब सिंपल, शॉर्ट होते हुए भी पर्याप्त क्रिएटिव और रिफ्रेशिंग.

सीरीज़ के डायलॉग्स भी काफी चुटीले और रिफ्रेशिंग हैं-

# कंपटीशन इतना है कि सिर्फ 30-40 हज़ार का ही <पॉज़> नहीं हो पाता. बाकी सब घुस जाता है इंजीनियरिंग में. कॉलेज इतने हैं. (हास्य)

# हर स्टूडेंट अपने ही टाइप का एलिमेंट होता है. जो अपने ही टाइप के बॉन्ड बनाता है. कोई कार्बन है, किसी से भी जुड़ने को तैयार. तो कोई यूरेनियम है, इतना अनस्टेबल कि कोई जुड़ना ही नहीं चाहता. कुछ F Block वाले भी हैं, जो कहने को हैं तो यहीं के पर अलग ही हैं. (उपमा)

# इंजीनियर्स के साथ दिक्कत है. आइडेंटिटी प्रूफ तो कर सकते हैं, बना नहीं सकते. (फलसफा)

# इन्हें लूडो में अपनी गोटी पुकाने से ज़्यादा, तुम्हारी गोटी मारने में मज़ा आता है. (वन लाइनर्स)

'हॉस्टल डेज़' देखकर पता चलता है कि एक हॉस्टल रूम कितना अस्त व्यस्त हो सकता है, अगर वो करण जौहर की मूवी का हॉस्टल रूम न हो तो.
‘हॉस्टल डेज़’ देखकर पता चलता है कि एक हॉस्टल रूम कितना अस्त व्यस्त हो सकता है, अगर वो करन जौहर की मूवी का हॉस्टल रूम न हो तो.

# कुछ चीज़ें जो खटकती हैं-

# शो में सिगरेट, शराब, ब्लू फिल्म, एब्यूसिव लैंग्वेज, रैगिंग और हिंसा (बर्थडे बंप्स) है. और ये सब इस तरह से दिखाई गई है कि कूल लगे. यानी एक तरीके से ‘हॉस्टल डेज़’ इन सबको एन्डोर्स करती लगती है.

# कहीं-कहीं ये सेक्सिस्ट भी लगती है. जैसे एक जगह डायलॉग है-

‘मीठा’, केक अच्छा लगता है, लौंडे नहीं.

दूसरी जगह एक और डायलॉग है-

लड़कों में न, ‘नो मीन्स नो’ नहीं होता है.

हालांकि सीरीज़ अपने ट्रेलर में कहती है कि कॉलेज, न हो हीरानी का 'थ्री इडियट्स' न केजो का 'स्टूडेंट ऑफ़ दी इयर' और न ही अनुराग कश्यप का गुलाल. लेकिन सीरीज़ में कहीं-कहीं फील इन सब की है.
हालांकि सीरीज़ अपने ट्रेलर में कहती है कि कॉलेज, न ही हीरानी का ‘थ्री इडियट्स’ है न केजो का ‘स्टूडेंट ऑफ़ द इयर’ और न ही अनुराग कश्यप का ‘गुलाल’. लेकिन सीरीज़ में कहीं-कहीं फील इन सब की है.

# फाइनल वर्ड्स-

कभी-कभी छिछोरे, कभी-कभी थ्री इडियट्स और कभी-कभी टीवीएफ की ही किसी वेब सीरीज़ की फील देता ये शो काफी हद तक रिफ्रेशिंग है. यानी ‘हॉस्टल डेज़’ एक पारंपरिक थीम का एक गैर-पारंपरिक ट्रीटमेंट है. साथ में है एक नॉस्टैल्जिया. हॉस्टल में रह चुके लोगों के लिए. फिर चाहे वो इंजीयरिंग कॉलेज के हॉस्टल्स हों या होटल मैनेजमेंट के. सब एक जैसे.


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