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ये इंडियन साइंटिस्ट छिपकली की कटी पूंछ की तरह आदमी का कटा हाथ उगा देता!

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हर गोबिंद खुराना. वो वैज्ञानिक जिसके बर्थडे पर गूगल ने 2018 में डूडल बनाया था. अगर आज वो जिंदा होते, तो 97 साल के होते. हर गोबिंद खुराना ने DNA पर खूब काम किया. दुनिया का पहला सिंथेटिक जीन बनाने के लिए उन्हें नोबेल प्राइज मिला था. वो पहले NRI थे, जिन्हें ये सम्मान मिला. वो क्या थे, किस मुकाम पर पहुंचे और क्यों इतने मशहूर हैं, ये नीचे पॉइंटर्स में जान लीजिए:

1. हर गोबिंद खुराना रायपुर में पैदा हुए. साल था 1922. छोटा सा गांव, गरीब परिवार. उनका परिवार अपने गांव का इकलौता पढ़ा-लिखा परिवार था. उनके पिता अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखने पर खूब जोर देते थे. उस वक्त बहुत कम मां-बाप ही बच्चों को पढ़ाने की अहमियत समझते थे.

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हर गोबिंद खुराना आज जिंदा होते, तो 97 साल पूरे करने का जश्न मनाते. और ये जश्न उन अकेले का नहीं होता. ऐसे ही जैसे आज उन्हें याद करने वालों में हम हिंदुस्तानी अकेले नहीं हैं. दुनिया याद कर रही है उनको.

2. खुराना को खूब सारे स्कॉलरशिप मिले. इन्हीं स्कॉलरशिप्स की वजह से परिवार उनकी पढ़ाई का खर्च उठा पाया. भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले 1945 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से अपना MA पूरा किया. फिर PhD पूरी की. 1948 में भारत सरकार ने उन्हें स्कॉलरशिप देकर आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजा. हर गोबिंद खुराना पहुंच गए ब्रिटेन. वहां यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में शोध करने लगे. यहां से उनका सफर आगे बढ़कर स्वीट्जरलैंड पहुंचा.

3. स्वीट्जरलैंड में उनको मिले प्रफेसर व्लादीमिर प्रेलोग. हर गोबिंद खुराना ने खूब नाम कमाने के बाद भी कई बार इन प्रफेसर साहब का जिक्र किया था. कहते थे, मुझे आगे बढ़ाने और इस लायक बनाने में प्रफेसर साहब का बड़ा हाथ रहा. इसी स्वीट्जरलैंड में खुराना मिले एलिजाबेथ सिबलर से. प्यार हुआ और दोनों ने शादी कर ली.

अब डॉक्टर इंसान के कट चुके अंग को दोबारा उगाने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह के कुछ प्रयोग सफल भी हुए हैं. इसका श्रेय हर गोबिंद खुराना को जाता है.
अब डॉक्टर इंसान के कट चुके अंग को दोबारा उगाने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह के कुछ प्रयोग सफल भी हुए हैं. इस कामयाबी का बहुत सारा श्रेय हर गोबिंद खुराना को भी जाता है.

4. 1952 में हर गोबिंद खुराना को कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ऑफर आया. खुराना ने स्वीट्जरलैंड में अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और पहुंच गए कनाडा. यूनिवर्सिटी ने कहा कि रिसर्च करने के लिए जैसी आजादी चाहोगे, मिलेगी. बस तुम जी लगाकर रिसर्च करते रहो. यहीं पर उन्होंने सिंथेटिक जीन पर काम शुरू किया. इसी काम के लिए आगे चलकर उनको नोबेल प्राइज मिला.

5. इतने सारे देशों से होते हुए आखिरकार हर गोबिंद खुराना पहुंचे अमेरिका. साल था 1960. यहां यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कोन्सिन को. वहीं काम शुरू किया. 1966 में उन्हें अमेरिका की नागरिकता भी दे दी गई. इतने काबिल आदमी को अपना हिस्सा बनाना तो किसी भी देश के लिए सम्मान की बात थी.

6. अमेरिका आने के आठ साल बाद, यानी 1968 में हर गोबिंद खुराना को चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल प्राइज दिया गया. विषय बड़ा गंभीर था. हम बता देते हैं, समझने की जिम्मेदारी आपकी- जेनेटिक कोड (फिल्मी भाषा में समझें तो आपकी रगों में बहता खानदान का खून, माने विज्ञान का वंशानुक्रम) की व्याख्या और प्रोटीन सिंथेसिस में इसकी भूमिका.

हर गोबिंद खुराना से पहले दो भारतीयों को नोबेल प्राइज मिल चुका था. साहित्य के क्षेत्र में रविंद्रनाथ टैगोर को और भौतिकी के क्षेत्र में सर सी वी रमण को. मगर हर गोबिंद खुराना नोबेल पाने वाले पहले NRI बने. उनको मेडिसिन की फील्ड का नोबेल दिया गया.
हर गोबिंद खुराना से पहले दो भारतीयों को नोबेल प्राइज मिल चुका था. साहित्य के क्षेत्र में रविंद्रनाथ टैगोर को और भौतिकी के क्षेत्र में सर सी वी रमण को. मगर हर गोबिंद खुराना नोबेल पाने वाले पहले NRI बने. उनको मेडिसिन की फील्ड का नोबेल दिया गया.

7. हर गोबिंद खुराना की रिसर्च में इतना खास क्या था कि उन्हें नोबेल मिला? इसका जवाब है DNA.ये जो DNA चीज है, उसके बिना हमारा शरीर नहीं बन सकता है. कोशिकाओं के अंदर होता है ये. इंसान के तौर पर हमारा विकास कैसे हुआ, हमारा खानदान कौन सा है, जैसे तमाम राज इस DNA में कैद हैं. हमारे शरीर में एक चीज होती है- न्यूक्लियोटाइड. ये ही चीज शरीर में न्यूक्लेइक एसिड बनाती है. शरीर में कई तरह के न्यूक्लेइक एसिड होते हैं. इनमें से एक DNA भी है. अब शरीर में एक एमिनो एसिड भी होता है. कुल 21 तरह के एमिनो एसिड होते हैं. इसकी सप्लाई हमें खाने से मिलती है. हम जो भी खाते हैं, उसमें मौजूद प्रोटीन को हमारा शरीर एमिनो एसिड में तोड़ देता है. फिर शरीर बहुत सारी जरूरतों में इस एमिनो एसिड का इस्तेमाल करता है. मांसपेशियां बनाने के लिए भी इसी की जरूरत होती है. हर गोबिंद खुराना ने अपनी रिसर्च से मालूम किया कि DNA में न्यूक्लियोटाइड्स का क्रम तय करता है कि कौन सा एमिनो एसिड बनेगा. माने. इस रिसर्च से पता चला कि किस तरह के प्रोटीन का इस्तेमाल कर शरीर कोशिकाओं का निर्माण करता है. और कोशिकाओं के बारे में तो पता ही होगा. कि ये जीवन का मूल हैं. इनसे ही जीवन पनपता है. शॉर्ट में बताएं, तो कोशिकाओं को विकसित करने का तरीका मालूम होने के बाद ही आज वैज्ञानिक किसी कट चुके अंग को दोबारा विकसित करने की कला जान पाए हैं. वैसे ही, जैसे छिपकली की कटी पूंछ वापस बढ़ जाती है.

कोशिकाओं में जीवन का सार है. जब छिपकली की पूंछ कट जाती, तो खुद-ब-खुद दोबारा उग आती है. इसमें कोशिकाओं का ही तो कमाल है. और DNA का भी. आपका शरीर कैसे काम करता है, इसका फंक्शन क्या है, ये सारे राज DNA में छुपे होते हैं.
कोशिकाओं में जीवन का सार है. जब छिपकली की पूंछ कट जाती, तो खुद-ब-खुद दोबारा उग आती है. इसमें कोशिकाओं का ही तो कमाल है. और DNA का भी. आपका शरीर कैसे काम करता है, इसका फंक्शन क्या है, ये सारे राज DNA में छुपे होते हैं.

8. हर गोबिंद खुराना को बस नोबेल ही नहीं मिला. उनके नाम के साथ जुड़े तमगों की लिस्ट लंबी है. 1972 में उन्होंने दुनिया का पहला कृत्रिम जीन बनाया था. फिर चार साल तक जुटे रहे और जैविकीय कोशिका के अंदर विकसित होने और काम करने वाले आर्टिफिशल जीन को तैयार करने में कामयाबी हासिल की. विज्ञान की दुनिया के जो सबसे मशहूर और भारी-भरकम सम्मान हैं, वो हर गोबिंद खुराना को मिले. बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए लास्कर अवॉर्ड और फिर अमेरिका के राष्ट्रपति के हाथों दिया जाने वाला नैशनल मेडल ऑफ साइंस.

9. हर गोबिंद खुराना 9 नवंबर, 2011 को गुजर गए. उनकी पत्नी एलिजाबेथ उनसे 10 साल पहले 2001 में गोलोक सिधार गईं थीं. एक बेटी एमिली 1979 में गुजर गई. बाकी दो बच्चे- जूलिया और डेव माशाअल्लाह अभी दुनिया को गुलजार कर रहे हैं.


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