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ज़ोरदार फिल्म निर्देशक जो स्टेज पर राष्ट्रपति से अड़ गया - 'पैसे अभी दो'

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चालीस साल में विधु विनोद चोपड़ा ने सिर्फ आठ फीचर फिल्मों का निर्देशन किया है – ‘सज़ा-ए-मौत’ (1981), ‘ख़ामोश’ (1985), ‘परिंदा’ (1989), ‘1942: अ लव स्टोरी’ (1994), ‘करीब’ (1998), ‘मिशन कश्मीर’ (2000), ‘एकलव्य: द रॉयल गार्ड’ (2007) और ‘ब्रोकन हॉर्सेज़’ (2015). इनमें सबसे आखिरी वाली उनकी पहली विशुद्ध हॉलीवुड फिल्म रही है, जहां उन्होंने 60 पार करने के बाद डेब्यू किया. इस फिल्म की ‘अवतार’ और ‘टाइटैनिक’ फेम जेम्स कैमरून ने भी तारीफ की.

इसके अलावा इन आठ में से निश्चित रूप से सबसे लोकप्रिय फिल्म ‘परिंदा’ है. हालांकि ‘1942’ भी अपने दायरे में बहुत ही लोकप्रिय फिल्म रही है लेकिन ‘परिंदा’ अपनी कलात्मकता के लिहाज से ऐसी पहली फिल्म थी जिसमें कई बोल्ड फैसले लिए गए. वैसे सभी आठों ही फिल्में अच्छी रहीं.

विधु विनोद चोपड़ा.
विधु विनोद चोपड़ा.

इसके अलावा उनकी तीन और बहुत बेहतरीन उपलब्धियां रही हैं. 1979 में उनकी पहली और आखिरी डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट ‘एन एनकाउंटर विद फेसेज़’ को ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. वे वहां कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए भी गए थे. उन्होंने हिंदी सिनेमा को राजकुमार हीरानी और संजय लीला भंसाली जैसे ऊंची गुणवत्ता वाले फिल्म निर्देशक दिए हैं.

पुणे फिल्म संस्थान से ही पढ़े भंसाली ने विधु को आठ साल असिस्ट किया और ख़ुद को बेहतर किया. ‘मिशन कश्मीर’ बनाते वक्त जब विधु की पहली पत्नी और उनकी तब तक सब फिल्मों की एडिटर रहीं रेणु सलूजा का देहांत हो गया तो बची एडिटिंग के लिए राजकुमार हीरानी को लाया गया. हीरानी तब से विधु के साथ हैं.

विधु ने निर्माता (और कहीं सह-लेखक भी) के रूप में ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ (2003), ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ (2006), ‘3 ईडियट्स’ (2009), ‘फरारी की सवारी’ (2012) और ‘पीके’ (2014) जैसी अनूठी फिल्में भी दीं जो हमेशा याद की जाएंगी. उन्होंने ‘परिणीता’ और ‘वज़ीर’ भी प्रोड्यूस कीं.

अपने दौर के मुख्यधारा के निर्माता-निर्देशकों में विधु बेहद विशेष हैं. उन चंद या न के बराबर निर्माताओं में से जो अपनी फिल्म के मुनाफे के पीछे नहीं दौड़ते और कला व रचनात्मकता से बिलकुल भी समझौता नहीं करते. उनका पूरा करियर इस बात की तस्दीक करता है कि उन्होंने हमेशा गैर-लोकप्रिय फैसले लेते हुए कदम बढ़ाए. उन्होंने वो किया जो सही था, न कि वो जो फायदेमंद था.

जब राजेश मापुस्कर द्वारा निर्देशित और अपनी लिखी ‘फरारी की सवारी’ वे रिलीज कर रहे थे और 100 करोड़ क्लब का हौव्वा फैलता जा रहा था तो उन्होंने कड़े शब्दों में कहा था कि घटिया फिल्में 100 करोड़ की कमाई कर रही हैं. अपनी सबसे कम कमाई करने वाली फिल्म ‘करीब’ जिसमें स्क्रिप्ट के स्तर पर उनसे व अभिजात जोशी से बड़ी भूल हुई, को भी वे उतना ही पसंद करते हैं जितना अपने समय में भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म ‘3 ईडियट्स’ को.

ये उन जैसे निर्माता के भ्रष्ट न हुए दृष्टिकोण की ही वजह से है कि राजकुमार हीरानी जैसे निर्देशक जिंदा हैं और सार्थक फिल्में बना पा रहे हैं नहीं तो कौन निर्माता है जो चार-चार साल स्क्रिप्ट लिखने के लिए देता है.

जम्मू एवं कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले विधु विनोद चोपड़ा का जन्म आज ही के दिन 1952 में हुआ था. आज वे 64 बरस के हो रहे हैं. उनके फिल्मी जीवन के इन पांच किस्सों में आइए उन्हें जानने का प्रयत्न करते हैं:

1. घटक की मौत ने भीतर शाश्वत गुस्सा भर दिया

विधु बॉलीवुड की mediocrity यानी औसतपन को लेकर बहुत गुस्सा रखते हैं. उन्हें इस बात से घृणा रही है कि कमर्शियल हिंदी फिल्मों में लोग घिसा-पिटा काम करते रहते हैं और फलते-फूलते हैं, वहीं अच्छी विषय-वस्तु वाली फिल्मों की दुर्दशा होती है. उनकी ये सोच तीन दशक से ज्यादा अरसा पहले पुणे के एक अस्पताल में बनी. तब वे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे के विद्यार्थी थे. वहां उनके शिक्षक और भारतीय सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार रित्विक घटक बहुत बीमार थे. सब छात्रों ने मिलकर उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया था. विधु याद करते हैं, “मैंने उन्हें जनरल वार्ड की उन विषाद भरी पीली दीवारों के बीच देखा तो सोचा कि ये घटक हैं.. मर रहे हैं. मैंने उन ढेर सारे सफल निर्देशकों के बारे में सोचा जो घटक की काबिलियत के अंश भर भी नहीं हैं. क्या उन में से किसी का भी अंत किसी ऐसी जगह होगा? एक दिग्गज फटेहाली में मर रहे थे और सिर्फ छात्रों को उनकी परवाह थी. क्या सिनेमा हमेशा इतना ही एकाकी, क्रूर और निष्ठुर ही होना चाहिए? बस उसी जगह मेरे मन में सिनेमा के इस बेहूदा पदनुक्रम को लेकर घृणा पैदा हो गई जिसने सार्थकता को ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया और औसतपने को फलने-फूलने दिया. मैंने तय कर लिया कि आडंबर और परिस्थितियां नहीं बल्कि टैलेंट और ईमान ही मुझसे इज्जत पाएंगे.”

इन्हीं रित्विक घटक ने एक बार विधु विनोद को थप्पड़ लगाया था क्योंकि उन्होंने शेक्सपीयर का नाटक हैमलेट नहीं पढ़ रखा था. इसके बाद विधु ने शेक्सपीयर पढ़ा.

2. राष्ट्रपति ने अवॉर्ड देेने बुलाया, इन्होंने स्टेज पर रोक दिया

एफटीआईआई में अपनी डिप्लोमा फिल्म के तौर पर विधु ने 1976 में शॉर्ट ‘मर्डर ऐट मंकी हिल’ बनाई. इसे बेस्ट शॉर्ट एक्सपेरिमेंटल फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला था. उन्हें खबर मिली कि राष्ट्रपति के हाथों ये पुरस्कार प्राप्त करेंगे और ईनाम में 5,000 रुपये भी दिए जाएंगे तो वे बहुत खुश हुए. लेकिन पुरस्कार समारोह में उन्होंने जाना कि राष्ट्रपति उन्हें 5000 रुपये का चैक नहीं बल्कि बॉन्ड देने वाले हैं जो 7 साल के बाद ही भुनाया जा सकेगा! जब राष्ट्रपति उन्हें बॉन्ड देने लगे तो विनम्रता के साथ विधु ने उन्हें रोक दिया और कहा, “सर, बॉन्ड से काम नहीं चलेगा. मुझे पैसे की जरूरत अभी है.” इससे समारोह में विराम आ गया और दर्शक स्टेज पर हल्का-फुल्का विवाद देखकर चौंक गए. राष्ट्रपति के साथ मौजूद मंत्री हक्के-बक्के हो चुके थे और उन्हें ये बर्ताव बुरा लगा. उन्होंने विनोद से तुरंत स्टेज से उतरने को कहा. विनोद ने नम्रता के साथ लेकिन ज़ोर देकर कहा, “सर, एक बार मैं इस स्टेज से उतर गया तो मुझे कभी वो पैसा नहीं दिखेगा. मेरे पास सिर्फ यही मौका है कि जब तक मुझे रकम नहीं मिलती मैं यहां रहूं.” जब सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने अपनी गारंटी ली तब जाकर वे स्टेज से उतरे. अगले ही दिन उन्हें पैसे मिल गए.

उस समय के बाद से चैक के बजाय बॉन्ड देने की प्रथा बंद कर दी गई.

3. करोड़ों के लिए भी ‘परिंदा’ का अंत नहीं बदला

उनके निर्देशन में बनी सभी फिल्मों में शायद सबसे आइकॉनिक है 1989 में प्रदर्शित ‘परिंदा’. तब की मुख्यधारा की फिल्मों में ऐसे कलात्मक प्रयोग भी नहीं थे. ऐसे दृश्य नहीं थे. ऐसा प्रस्तुतिकरण नहीं था और सबसे खास ऐसा क्लाइमैक्स न था. इस फिल्म का अंत हिंदी सिनेमा की सबसे दर्दनाक अंत वाली कहानियों में से एक है. नए लड़के नाना पाटेकर को एक मराठी नाटक में काम करते हुए देखकर विधु ने उन्हें विलेन अन्ना के रोल में कास्ट किया था. अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित प्रेमी-प्रेमिका बने थे. अन्ना इन दोनों को उनकी शादी की रात बिस्तर में सोते हुए गोलियों से भून देता है. इसे लेकर विधु को वितरकों ने चेताया कि वे इस क्लाइमैक्स को रखकर अपने करियर का अंत करने जा रहे हैं. इसके बाद वे कभी फिल्म न बना सकेंगे. उन्हें कहा गया कि आप फिल्म की हैप्पी एंडिंग रख दीजिए और कमाई में लाखों-करोड़ रुपये का इजाफा हो जाएगा. लेकिन वे नहीं माने.

विनोद जब भी फिल्म बनाते या लिखते हैं तो स्वीडिश फिल्म निर्देशक इंगमार बर्गमैन के बताए तीन नियमों पर हमेशा चलते हैं और राजू हीरानी व अभिजात जोशी समेत अपने सभी साथियों के सामने भी  इन्हें रखते हैं: 1. आपको मनोरंजन करना है; 2. आपको इसके लिए अपनी आत्मा नहीं बेच देनी है; 3. आपको अपनी हर एक फिल्म को अपनी आखिरी फिल्म की तरह बनाना है.

4. पंचम ने धुनें बनाई तो विधु बोले ‘कचरा है’

विधु विनोद ने जब 1994 में प्रदर्शित हुई अपनी अगली फिल्म ‘1942: अ लव स्टोरी’ पर काम शुरू किया तब तक म्यूजिक कंपोजर आर. डी. बर्मन यानी पंचम का फिल्म करियर खत्म हो चुका था. तब विनोद उनके पास गए. लोगों ने हालांकि उन्हें चेताया था कि पंचम का अच्छा संगीत अब पीछे छूट चुका है और उसके गानों की बाजार में अच्छी कीमत भी नहीं मिलेगी. लेकिन विनोद नहीं माने. ख़ैर, जब पंचम ने फिल्म के लिए पहली धुनें बनाईँ तो उनमें पुराने टोटके साथ थे. वो असुरक्षित होकर बनाया गया संगीत था. विनोद ने सुनकर बहुत मुंहफट कहा कि ये सब कचरा है. दो बार और कोशिशें करने के बाद भी पंचम कोई खास नतीजा नहीं ला पाए. उन्हें लगा कि अब ये फिल्म उनके हाथ से गई. उन्होंने विनोद से कहा कि क्या वे उन्हें एक और हफ्ता दे सकते हैं. इस पर उन्हें गले लगाते हुए विनोद ने कहा, “दादा, मैं आपको एक हफ्ता नहीं दूंगा, मैं आपको एक साल दूंगा. बस प्लीज़ वो संगीत दीजिए जिसकी इस फिल्म को जरूरत है.” पंचम बहुत भावुक हो गए और एक हफ्ते बाद लौटे. उनके साथ ‘कुछ ना कहो’ गाना था जिसने जादू कर दिया.

इसके दो साल बाद नए साल 1994 का स्वागत करने वाली रात पंचम मुंबई की फिल्मसिटी में बने ‘1942: अ लव स्टोरी’ के सेट पर पहुंचे. उन्होंने दो गानों की मिक्सिंग खत्म की थी जो बाद में फिल्म की जान बने. आधी रात को सब बत्तियां बुझा दी गईं और पहली बार इन दो गानों को सबके बीच सुनाया गया. लोगों की प्रतिक्रिया जबरदस्त थी. विनोद और पंचम भावुक थे.

5. पेप्सी और बैंक के विज्ञापनों की अभूतपूर्व फीस ली

1998 में विधु की फिल्म ‘करीब’ रिलीज हुई थी. इसकी निराशाजनक कमाई के बाद उन पर काफी कर्ज हो गया था. उन्हें अगली फिल्म ‘मिशन कश्मीर’ बनाने में जुटना था लेकिन पैसे नहीं थे. इस बीच उनके पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा था जिसे न लेने की कसम वे पहले खा चुके थे. दरअसल ये हुआ था ‘परिंदा’ के बाद. इस फिल्म की तकनीकी गुणवत्ता से पेय पदार्थ कंपनी पेप्सी के लोग बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने विधु को आमंत्रित किया कि वे उनके लिए एक विज्ञापन बनाएं जिससे इस ब्रांड को भारत में लॉन्च किया जाना था. विधु ने इसके लिए अभूतपूर्व कीमत मांगी जो उन्हें दी भी गई. दो दिन की शूटिंग के बाद उन्होंने ‘परिंदा’ की कमाई से भी दोगुना ज्यादा पैसा कमा लिया. इतनी सरल कमाई से विनोद चिंतित हो गए कि कहीं इस लोभ में पढ़कर वे फीचर फिल्मों के प्रति अपना मोह न भूल जाएं. तो उन्होंने कसम खा ली कि कभी ऐसी विज्ञापन फिल्म नहीं बनाएंगे जब तक कि उन्हें अपनी अगली फिल्म बनाने के लिए बहुत जरूरत न हो. और ‘मिशन कश्मीर’ की मेकिंग से पहले ऐसी नौबत आ चुकी थी. इसके चलते वे एक बैंक के लिए विज्ञापन बनाने को राजी हो गए. उन्होंने बहुत ज्यादा फीस मांगी.

बैंक के चैयरमैन ने जब उनसे पूछा कि “हमसे इतनी अधिक राशि क्यों ले रहे हैं?” तो विनोद ने हंसते हुए कहा, “क्योंकि आप बैंक हैं!”


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